बुधवार, 13 मई 2020

बिहार विधान परिषद की राह सुरक्षित


जो नेता यह समझते हैं कि उनके लिए आगे भी बिहार विधान मंडल के किसी न किसी सदन का 
सदस्य बने रहना जरूरी है, वे अगले द्विवार्षिक चुनाव में विधान परिषद के सदस्य बन जाएं।
क्योंकि कुछ लोगों के लिए बाहर की राजनीतिक हवा अभी अनिश्चित दिखाई पड़ रही है।

किसके लिए अनिश्चित है, इस पर कुछ कहना अभी ठीक नहीं है। याद रहे कि मैं न तो किसी दल का नाम ले रहा हूं और न ही किसी नेता का। इसलिए इस पोस्ट पर किसी को नाराज हो जाने का कोई आधार नहीं बनता है।

................................

सुरेंद्र किशोर--10 मई 2020

मंगलवार, 12 मई 2020

मजदूर आपूर्ति करने को मजबूर राज्य

सुरेंद्र किशोर

लोगों को यदि सिर्फ रोजी-रोटी के लिए अपना राज्य छोड़कर कहीं और जाना पड़े तो यह चिंताजनक है।


बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों की वापसी और इस दौरान उनकी तकलीफें वास्तव में आजादी के बाद देश का समरूप विकास न हो पाने का नतीजा है। आजादी के बाद 1952 में एक अविवेकपूर्ण समझ के तहत केंद्र सरकार ने रेल भाड़ा समानीकरण नीति बनाई। इसके कारण बिहार, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल के एक बड़े हिस्से को उनके खनिज पदार्थों के भारी भंडारों का पूरा लाभ नहीं उठाने दिया गया। जिन राज्यों ने लाभ उठाया, उन्होंने पिछड़े राज्यों से सस्ते मजदूर बुलाकर उन पर दोहरी चोट कर दी। क्योंकि मजदूरों की कमी के कारण उन राज्यों की कृषि भी विकसित नहीं हुई। लिहाजा वहां से मजदूरों का पलायन होता रहा।

इसी समस्या के चलते 1960-70 में देश के भीतर आंतरिक उपनिवेश बनाने का आरोप लगा। इसके बाद भी केंद्र सरकार की नींद नहीं टूटी। लगातार मांग के बाद अंततः 1992 में रेल भाड़ा समानीकरण नीति को समाप्त किया गया। लेकिन तब तक बिहार जैसे गरीब राज्य को एक अनुमान के अनुसार दस लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका था। 1952 से लेकर 1992 तक इतनी राशि का बिहार में निवेश हुआ होता तो वहां के करीब 30 लाख मजदूरों को रोजी-रोटी के लिए पलायन नहीं करना पड़ता।

आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में कृषि और इससे संबंधित क्षेत्र में केंद्र ने बिहार में प्रति व्यक्ति 172 रुपए खर्च किए, जबकि उसी अवधि में पंजाब में 594 रुपए खर्च किए। भाखड़ा नांगल परियोजना पर तो भारी खर्च किया गया, लेकिन जब बिहार ने कोसी योजना के लिए पैसे की मांग की तो केंद्र ने कहा कि श्रमदान से बांध बनवाइए। बाद में बिहार की दो बड़ी कोसी और गंडक सिंचाई परियोजनाएं भ्रष्टाचार के कारण तबाह हो गईं।

कृषि क्षेत्र में इच्छित उपलब्धि नहीं मिल सकी। उसकी क्षतिपूर्ति के लिए बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग हुई तो उसे पूरा करने में केंद्र ने संवैधानिक कठिनाई बताई। देश के जिन राज्यों से प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों में जाने को बाध्य हैं, उनमें बिहार अग्रणी है। नतीजतन बिहार के किसानों को भी मजदूरों की कमी महसूस होती है।

इन मजदूरों को दूसरे राज्यों में अपने यहां की अपेक्षा कुछ अधिक मजदूरी मिल जाती है तो उसकी वजह उन राज्यों का संपन्न होना है। उनकी संपन्नता में अन्य बातों के अलावा रेल भाड़ा समानीकरण नीति का बड़ा हाथ है। इस नीति के तहत खनिज पदार्थों को एक से दूसरी जगह ले जाने का रेल भाड़ा समान कर दिया गया था। यानी सौ टन खनिज पदार्थ धनबाद से रांची ले जाने का जितना भाड़ा लगता था, उतना ही भाड़ा धनबाद से बंबई ले जाने के लिए लगता था। ऐसे में दूसरे प्रदेशों का कोई उद्योगपति बिहार या ओड़िशा में उद्योग क्यों लगाता ?

अंग्रेजों के जमाने में ऐसी नीति नहीं थी। इसीलिए गुजरात के जमशेदजी टाटा ने अविभाजित बिहार के खनिज बहुल इलाके में बड़ा उद्योग लगाया। आज वह जमशेपुर के नाम से जाना जाता है। वहां टाटा उद्योग में बिहार और आसपास के राज्यों के हजारों लोगों को नौकरियां मिलीं। पर भाड़ा नीति के आ जाने के बाद अन्य राज्यों के किसी उद्यमी के समक्ष उद्योग लगाने के लिए खनिज बहुल राज्यों में आने की मजबूरी नहीं रह गई। नतीजा यह हुआ कि बिहार, ओड़िशा जैसे राज्यों का विकास थम गया।

यदि कृषि पर आधरित उद्योगों का जाल बिछाया गया होता तो आम किसानों की क्रय शक्ति बढ़ती। उससे उद्योगों का भी विकास होता। इसके साथ ही मजदूरों को अपने ही घर में काम मिल जाता। विकास नहीं होने के कारण राज्य सरकारों के पास आंतरिक संसाधन जुटाने के स्रोत नहीं बढ़ सके।

चूंकि केंद्रीय सहायता राज्य के आंतरिक राजस्व के अनुपात में मिलती है इसलिए पिछड़े राज्यों को वह भी कम मिली। जरूरत के अनुपात में कृषि और उद्योग का विकास नहीं होने के कारण पिछड़े राज्यों को आंतरिक संसाधन जुटाने में भी दिक्कतें आती रहीं। परिणामस्वरूप ऐसे राज्य मजदूर आपूर्तिकत्र्ता राज्य बन कर रह गए।

1970 में बिहार का विकास के मामले में देश में नीचे से दूसरा स्थान था। उससे निचले पायदान पर ओड़िशा था। वह भी खनिज पदार्थों की उपलब्धता के मामले में संपन्न है। बिहार में कुछ दशकों तक ऐसी सरकारें रहीं जिनकी विकास में कम ही रुचि थी।

2005 के बाद विकास की एक नई शुरुआत हुई। फिर 2015 में मोदी सरकार ने बिहार के लिए सवा लाख करोड़ रुपए के एक बड़े आर्थिक पैकेज की घोषणा की। उसके तहत काम भी शुरू हो चुका है। उससे राज्य को कुछ राहत मिली है। लेकिन वह पैकेज भी राज्य की कायापलट के लिए नाकाफी साबित हो रहा है। इसीलिए समय- समय पर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठती रही है।

कोई व्यक्ति बेहतर भविष्य और अच्छी आय के लिए किसी अन्य राज्य में जाए तो बात समझ में आती है। पर सिर्फ रोजी-रोटी के लिए अपना राज्य छोड़कर कहीं और जाए तो यह चिंताजनक तो है ही, असमान विकास का सूचक भी है। कोरोना के इस दौर में यूपी, बिहार, ओड़िशा आदि के प्रवासी मजदूरों को अन्य राज्यों में जो कटु अनुभव हुए हैं, उससे यही लगता है कि वे पहले जैसे उत्साह से बाहर नहीं जाएंगे। इसलिए जहां वे हैं, वहीं विकास का काम करना पड़ेगा।

इन दिनों उत्तर प्रदेश, बिहार, ओड़िशा छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के हजारों मजदूर अपने घर लौट रहे हैं। कुछ घर जाने की जिद में उग्र हो रहे हैं। यदि मौजूदा केंद्र सरकार देश के सम्यक विकास पर जोर देकर आजादी के बाद के अधूरे काम को पूरा करे तो मजदूरों के सामने कोरोना महामारी जैसी स्थिति में अपने घरों को लौटने के लिए ऐसी जिद्दोजहद करने की नौबत फिर नहीं आएगी। यह काम राज्य और केंद्र मिलकर ही कर सकते हैं।

  --लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।

......................................

12 मई 2020 के दैनिक जागरण में प्रकाशित। 

पत्रकारिता के लिए नया संकट काल

पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए नया संकट काल चल रहा है। संपादकों, पत्रकारों पर देश के अलग- अलग हिस्सों में मुकदमे किए जा रहे हैं। इनके पीछे सरकारें, पार्टियां हैं। इसके शिकार पहले वामपंथी माने जाने वाले संपादक हो रहे थे। अब कथित दक्षिणपंथियों की बारी है। यह बेहद खतरनाक है।

---राहुल देव, जनसत्ता के पूर्व संपादक।

.....................................

केरल पुलिस ने जी.न्यूज के सुधीर चौधरी के खिलाफ गैर जमानती धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया है। ठीक है। किसी को भी किसी से शिकायत है तो उसे मुकदमा करने का पूरा अधिकार है। पर, एक हिन्दी न्यूज चैनल के खिलाफ गैर हिन्दी राज्य में मुकदमा ?!!! क्योंकि वहां सी.पी.एम. की सरकार है ? यह बात कुछ हजम नहीं हुई !!!

किसी हिन्दी राज्य की पुलिस-अदालत पर भरोसा नहीं रहा? सारे हिन्दी राज्यों में भाजपा का शासन तो है नहीं।

---सुरेंद्र किशोर

.........................

11 मई 2020

सोमवार, 11 मई 2020

 डी.जी.पी.का मौन संदेश-
 छोटा नहीं है कोई काम !
  --सुरेंद्र किशोर--
गाय दुहते बिहार के डी.जी.पी गुप्तेश्वर पांडेय की 
तस्वीर छाप कर दैनिक भास्कर,पटना ने बढ़िया 
काम किया है।
इससे समाज में अच्छा संदेश जाता है।
संदेश यह कि कोई भी काम छोटा नहीं है।
ऐसी तस्वीरों से आज के युवजन को खास तौर पर संदेश
 मिल सकता है यदि लेना चाहें।
काफी पहले मैंने जब सुना कि आई.ए.एस.अधिकारी 
रामउपदेश सिंह ‘विदेह’ को गाय दुहते देखा गया है तो 
मुझे आश्चर्य हुआ था।
कहां कमिश्नर स्तर के अफसर और कहां गाय 
दुहने जैसा काम !
खैर, अब आश्चर्य नहीं होता।अब खुशी होती है।
  हाल में रिटायर आई.पी.एस.अधिकारी एस.के. भारद्वाज को 
खेती करते देखा गया है।
  पूर्व केंद्रीय मंत्री डा.राम सुभग सिंह सक्रिय राजनीति से जब अलग हो गए थे तो वे आरा स्थित अपने आवास में गोपालन 
करते थे।
गोपालन यानी सचमुच गोपालन।
दूर खड़े होकर गोपालन नहीं।
  सी.बी.आई.के पूर्व निदेशक राजदेव सिंह हमारे इलाके 
के थे।
या यूं कहिए कि मैं उनके इलाके का मूल निवासी हूं।
मेरे बाबू जी उनसे मिलने कभी-कभी पटना आते थे।
एक बार की बात है।
तब पटना में उनका मकान बन रहा था।
राजदेव बाबू, जिनकी ईमानदारी की लोग कसमें खाते हैं,
भवन निर्माण के काम में मजदूरों के साथ-साथ 
खुद भी ईंट ढोते थे।
बाबू जी ने उन्हें ऐसा करते देखा था।
तब अक्सर बाबू जी हमलोगों से कहा करते थे कि 
‘तोहरा लोग के राजदेव सिंह से शिक्षा लेवे के चाहीं।’’
कुछ ऐसे अन्य उदाहरण भी मिल सकते हैं जिनकी मीडिया
 में चर्चा होनी चाहिए।  
आज के संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण है।
बिहार के अनेक युवकों को अपने गांव में कोई छोटा-मोटा
काम करने में शर्म महसूस होती है।
पर, वे ही अन्य राज्यों में जाकर उससे भी छोटा काम 
अधिक मेहनत व तन्मयता के साथ करते हैं।
 जब कोरोना जैसी विपत्ति आती है तो 
वहां भागकर अपनी मातृभूमि में एक बार फिर शरण लेने 
के लिए जान लेने-देने को उतारू हो जाते हैं।
अरे, भई अपने डी.जी.पी.जैसे बड़े लोगों से शिक्षा लीजिए।
अपने ही घर में रहकर छोटे से शुरू कीजिए।
एक दिन यहीं बड़ा काम करने का भी अवसर मिल सकता है।
मैंने अपने इलाके के एक व्यक्ति को बचपन से देखा है।
करीब पांच दशक पहले उन्होंने टायर गाड़ी चलाकर माल 
ढोना शुरू किया था।
उन्हें तब रोज के 25 रुपए मिलते थे।
धीरे -धीरे वे आर्थिक रूप से आगे बढ़ते चले गए।
आज स्थिति यह है कि जिसे भी अपनी जमीन बेचनी 
होती है तो सबसे पहले उसी व्यक्ति के यहां जाता है।   
------------
--11 मई 2020

रविवार, 10 मई 2020

मेरी लघु साइकिल यात्रा !

मुझे भी अपनी एक लघु साइकिल यात्रा की याद आ गई। प्रवासी मजदूरों की लंबी-लंबी तकलीफदेह साइकिल यात्राओं के चित्र अखबारों में देखने के बाद ऐसा हुआ। पर, मेरी यात्रा तो मात्र 57 किलोमीटर की थी। पर, उसी से ऐसी यात्रा की तकलीफ का अनुभव हुआ।

वह यात्रा थी--आरा से पटना के बीच। 1963 की बात है। तब मैं आरा में पढ़ता था। एक दिन मेरे मित्र और सहपाठी रामकुमार गुप्ता ने कहा कि ‘चलो पटना सिनेमा देखने।’ दरअसल उन दिनों आरा में सिर्फ दो ही सिनेमा हाॅल थे--रूपम और मोहन। पता नहीं, आज कितने है !

वहां कितना देख पाते सिनेमा !! वह उम्र ही थी सिनमा देखने की। अब तो दशकों हो गए सिनेमा हाॅल गए। खैर, हम दोनों एक ही साइकिल पर पटना के लिए चल दिए। कभी मैं साइकिल चलाता और वह सहयात्री होता तो कभी वह चलाता और मैं सहयात्री। आरा से पटना तक की यात्रा तो हमने पूरी कर ली। ‘पर्ल’ में सिनेमा देखा। फिर साइकिल से ही आरा लौटने लगा। पर हमलोग थककर चूर हो चुके थे। दानापुर पहुंचकर ट्रेन पर साइकिल लादी और आरा वापस।

अब अंदाज लगाइए,उन मजदूरों की तकलीफों की। सैकड़ों किलोमीटर की साइकिल यात्राओं के बाद वे घर लौट रहे हैं। यह जरुर है कि वे हम लोगों की तरह सुकुमार नहीं हैं। रामकुमार गुप्त तो आरा के एक बहुत बड़े व्यापारी परिवार का है। पिछले कई वर्षों से रामकुमार से मेरा कोई संपर्क नहीं है। पर, उसकी याद आती है।

जीवन के जिस मोड़ पर जब जहां जो मिला, मित्र बना या परिचित, उनमें से अधिकतर बारी -बारी से यदाकदा मुझे याद आते रहते हैं। उम्मीद है कि और लोगों को भी अपने मित्र याद आते होंगे। वह भी निःस्वार्थ भाव से !

---------------------

--सुरेंद्र किशोर - 10 मई 2020

शनिवार, 9 मई 2020

     
भारत सरकार ने एक हजार अमेरिकी कंपनियों को 
चीन से निकाल कर यहां आने के लिए आमंत्रित किया है।
  कोरोना विपत्ति की पृष्ठभूमि में चीन-अमेरिका संबंध को देखते हुए यह संभव है कि वे कंपनियां भारत आने पर गंभीरतापूर्वक विचार करंे।
  पर, मेरी समझ से इसमें एक ही बड़ी बाधा है।
वह बाधा इस देश में सरकारी भ्रष्टाचार के स्तर को लेकर है। 
भारत में विभिन्न सरकारी स्तरों पर भारी भ्रष्टाचार है।
केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल स्तर पर तो आज पहले जैसा भले घोटालों-महा घोटालों  का दौर नहीं है,
पर उससे नीचे के स्तरों पर यहां अमेरिकी कंपनियों को भारी भ्रष्टाचार से पाला पड़ेगा।
  उस स्थिति में वे यहां कितने दिनों तक टिक पाएंगी ?
हां, यहां आ जाने पर उन्हें यदि टिकाए रखना है तो भारत  सरकार को कुछ ठोस व कठोर उपाय करने होंगे।
  चीन में भ्रष्टाचार के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है।
यहां भी वह प्रावधान करना पड़ेगा।
अमेरिका मंे तरह -तरह के अपराधियों में से 93 प्रतिशत को अदालतों से सजा हो जाती है।
यहां का प्रतिशत सिर्फ 46 है।
वैसे उपाय यहां भी करने हांेगे ताकि सजा का प्रतिशत बढ़े।
............................
मुझे पहले लगता था कि यदि देश का प्रधान मंत्री खुद पैसे बनाने वाला नहीं हो या अपने लोगों को पैसे न बनाने दे तो देश भर के शासन तंत्र पर उसका सकारात्मक असर पड़ेगा।
पर, मोदी जी के राज में भी ऐसा नहीं हो सका।
...................
मोदी जैसा ईमानदार व लोकप्रिय नेता कोरोना संकट की पृष्ठभूमि में उपर्युक्त कड़े कदम यदि उठाए तो अधिकतर जनता उनकी वाहवाही करेगी।
पर क्या वे इस देश के भ्रष्टों यानी दीमकों पर सर्जिकल स्ट्राइक करने का साहस कर पाएंगे ?
  मोदी, किसी को बार-बार मौका नहीं मिलता।
यदि निर्णायक आप कदम नहीं उठाएंगे तो फिर इस देश में शीर्ष स्तर पर महा घोटालेबाज हावी हो जाएंगे।
........................
इस नारे को सार्थक करने का माकूल समय आ गया है कि ‘मोदी है तो मुमकिन है ?
----सुरेंद्र किशोर--7 मई 20

‘‘.....सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के तत्काल बाद 
जस्टिस दीपक गुप्त ने कहा कि 
‘‘देश का लीगल सिस्टम अमीरों और ताकतवरों 
के पक्ष में हो गया है।
.......जब कोई अमीर सलाखों के पीछे होता है 
तो कानून अपना काम तेजी से करता है।
लेकिन गरीबों के मुकदमों में देरी होती है।’’
................................
सुरेंद्र किशोर--9 मई 2020