बुधवार, 5 अगस्त 2020

‘कोरोना’ की चेतावनी--मुम्बई जैसे महानगरों 
पर से आबादी का बोझ घटाना अत्यंत जरूरी
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हिन्दी फिल्म-धारावाहिक निर्माण स्थल 
हिन्दी प्रदेश में स्थानांतरित हो
इससे बोझ घटाने की शुरूआत भी हो जाएगी 
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हिन्दी फिल्मों व धारावाहिकों का निर्माण स्थल अब मुम्बई
से हटाकर किसी हिन्दी प्रदेश में जल्द से जल्द स्थापित कर दिया जाना चाहिए।
  इसके लिए हिन्दी फिल्मों के नामी -गिरामी रहे बुजुर्ग अभिनेतागण ऐतिहासिक भूमिका निभा सकते हैं।वे मार्ग दर्शक काम कर सकते हैं।
महाराष्ट्र में मराठी और गुजराती फिल्में जरूर बनें।
   वैसे भी घनी आबादी वाले महानगरों पर से आबादी का बोझ घटाने का संदेश ‘कोरोना’ ने दे ही दिया है,यदि आप उस संदेश को ग्रहण करना चाहें तो ।
नहीं ग्रहण करेंगे तो 
पछताने सिवा कोई चारा भी नहीं रहेगा।
क्योंकि यह तय  नहीं कि निकट भविष्य में कोरोना
जैसी कोई अन्य महा विपत्ति नहीं ही आएगी।  
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बिहार के अगिया वैताल नेता व पूर्व सांसद पप्पू यादव ने तो सुशांत सिंह राजपूत के हत्यारों के नाम भी जाहिर कर दिए हैं।
मैं उतनी जल्दीबाजी में नहीं हूं।
पर, मेरा भी यह कहना है कि सुशांत के इंतकाल को लेकर अनेक सवाल अनुत्तरित हंै ।
उनके  जवाब सी.बी.आई. जांच से ही मिल सकते हैं।
वह भी तब जब जांच सबसे बड़ी अदालत की निगरानी में हो।
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वैसे तो इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट अपने विवेक से  निर्णय करेगा,पर यदि वह सी.बी.आई.जांच के पक्ष में निर्णय करता है तो उसे साथ- साथ एक काम और भी करना चाहिए।
अदालत संदिग्धों की नार्को, पाॅलीग्राफ व ब्रेन मैपिंग जांच की भी अनुमति दे दे।
क्योंकि अधिकतर सबूत मिट चुके हैं या मिटाए जा चुके हैं।
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यदि सुप्रीम कोर्ट अदालती निगरानी सहित सी.बी.आई.जांच
की अनुमति नहीं देता है तो फिर हिन्दी फिल्मों का काम मुम्बई से समेट कर किसी हिन्दी राज्य में ले जाने की शुरूआत जल्द से जल्द ही कर देनी चाहिए।
अन्यथा, ...........!!!!!
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सुरेंद्र किशोर -  4 अगस्त 20


सोमवार, 3 अगस्त 2020

    कमल नाथ और गहलोत सरकारों के बाद अब
महाराष्ट्र सरकार ने भी बंद कर दी जेपी सेनानी पेंशन 
अब केंद्र सरकार करे सेनानियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था 
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--सुरेंद्र किशोर--
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कांग्रेस के दबाव में महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार
ने जेपी सेनानी पेंशन योजना बंद कर दी।
वहां 3 हजार लोगों को 10 हजार रुपए प्रतिमाह मिल रहे थे।
  पिछली राजग सरकार ने इसे चालू किया था जिस सरकार में शिवसेना भी शामिल थी।
इससे पहले मध्य प्रदेश की पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार और राजस्थान की मौजूदा अशोक गहलोत सरकार ने ऐसी पेंशन योजनाओं  को बंद कर दिया ।
जेपी आंदोलन के दौरान आपातकाल में जेल गए राजनीतिक नेताओं व कार्यकत्र्ताओं के लिए पेंशन की व्यवस्था विभिन्न राज्य सरकारों ने की ।
बिहार में भी यह अब लागू है।
कुछ राज्य सरकारों द्वारा बारी -बारी से इसे बंद कर दिए जाने के बाद अब इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि खुद केंद्र सरकार ऐसी पेंशन योजना शुरू करे।
याद रहे कि कई मामलों में इंदिरा गांधी सरकार ने जेपी आंदोलनकारियों को आपातकाल में इतना अधिक प्रताड़ित
किया था जितना अंग्रेजों ने भी स्वतंत्रता सेनानियों को नहीं किया था।आपातकाल में कई परिवार बर्बाद हो गए ।
इंदिरा सरकार ने गिरफ्तारी के खिलाफ अदालती सुनवाई का
प्रावधान समाप्त करके एक लाख से अधिक राजनीतिक नेताओं, कार्यकत्र्ताओं व पत्रकारों  को अनिश्चितकाल के लिए जेलों में ठूंस दिया था।
जो लोग फरार थे,उनमें से भी अनेक लोगों को अपार कष्ट झेलने पड़े थे।
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---सुरेंद्र किशोर-1 अगस्त 20

जब पूरी सरकार आरोपियों को बचाने में लगी होती है,तो वही होता है जो पटना के सिटी एस.पी.विनय तिवारी के साथ मुम्बई में हुआ।
खैर, उन्हें तो सिर्फ क्वारंेटाइन किया गया है।
चारा घोटाले की जांच कर रहे सी.बी.आई.अफसर डा.यू.एन. विश्वास पर तो पटना में जान पर खतरा था।वे भारी सुरक्षा में ही अपने आॅफिस से यहां निकलते थे।
डा.विश्वास कोलकाता से जब भी पटना के लिए रवाना होते थे तो अपनी पत्नी को कह कर आते थे कि शायद यह तुमसे मेरी आखिरी मुलाकात हो !
यह बात उन्होंने यहां हम संवाददाताओं को बताई थी।
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सुरेंद्र किशोर-3 अगस्त 20

बढ़ते आकर्षण के बीच जैविक खेती को अधिक सरकारी मदद की दरकार--सुरेंद्र किशोर



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पढ़े-लिखे फिल्म अभिनेता दिवंगत सुशांत सिंह राजपूत जैविक खेती करने के लिए केरल जाना चाहते थे।
पर, उन्हें नहीं जाने दिया गया था।
  इससे इस बात का भी पता चलता है कि इस देश के जागरूक लोग जैविक खेती की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।वे रासायनिक खाद के खतरनाक असर को जान चुके हैं। 
रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं से बढ़ते  कुप्रभाव के कारण जैविक खेती मजबूरी बनती जा रही है।
हाल की खबर के अनुसार पशुओं के शरीर में भी कीटनाशक दवाओं का कुप्रभाव देखा जा रहा है।
नतीजतन दूध में भी उसका अंश आ रहा है।
हाल में बंगलुरू से यह खबर आई कि एक व्यक्ति ने शुद्ध दूध प्राप्त करने के लिए अपने मकान की छठी मंजिल पर गाय पाल रखा था।
पुलिस को पता चला तो गाय जब्त की गई।
याद रहे कि बंगलुरू के उस इलाके में गोपालन  वर्जित है।
इससे शुद्ध दूध की भारी कमी की समस्या का भी पता चलता है।
याद रहे कि रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं से न सिर्फ कैंसर का प्रकोप बढ़ा है बल्कि खेत भी खराब हो रहे हैं।
देश के कई हिस्सों में खेत खराब होने के साथ -साथ भूजल भी जहरीला और कैंसर कारक हो रहा है। 
   केंद्र व राज्य सरकारों का जैविक खेती की ओर  पहले की अपेक्षा इधर अधिक ध्यान गया है।
इस दिशा में कई महत्वपूर्ण काम भी हुए हैं।किंतु जरूरत के अनुपात में वे काफी कम हैं।
निजी प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रहे है।
कोरोना महामारी के कारण महा नगरों से वैसे कई लोगों ने गांवों की ओर रुख किया है जिनके पास अपनी पुश्तैनी जमीन उपलब्ध हंै।
उनमें से अनेक लोग जैविक व औषधीय खेती की ओर उन्मुख हुए हैं।
जैविक -औषधीय खेती में सामान्य खेती की अपेक्षा अधिक मुनाफा  भी है।
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   जैविक सामग्री  आॅनलाइन उपलब्ध
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पटना व आसपास के इलाकों में जैविक खाद्य व भोज्य पदार्थ अब आॅनलाइन भी उपलब्ध हैं।
मैंने हाल में चने का सत्तू मंगवाया ।
आटा-चावल मंगवाने वाला हूं।
 अन्य कई सामग्री भी आॅनलाइन उपलब्ध हैं।
स्वास्थ्य रक्षा के लिए यह जरूरी है।
हालांकि जैविक सामग्री महंगी है।
चने का सत्तू  बाजार में 160 रुपए किलो बिक रहा है।पर जैविक सत्तू का दाम करीब 300 रुपए प्रति किलो पड़ रहा है।
ऐसे में जैविक खेती को सरकारी सब्सिडी की जरूरत पड़ेगी,यदि उसका अधिक प्रचार-प्रसार करना है।
जैविक खाद्य व भोज्य पदार्थ के स्वाद हमें गांव के दिनों की याद दिला देते हैं।
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  बिहार की राजनीति के ओवैसी घटक
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वैसे तो बिहार विधान सभा का अगला चुनाव मुख्यतः दो गठबंधनों के बीच ही लड़ा जाएगा।
अधिकतर सीटों पर सीधा मुकाबला होगा।ऐसा पहले भी होता रहा है।
  किंतु इस बार कुल 243 में से  कुछ सीटों पर ओवैसी की पार्टी इस मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती है।
गत साल एक त्रिकोणीय मुकाबले में किशनगंज विधान सभा क्षेत्र के चुनाव में ए.आईएम.आई.एम.को विजय मिल गई ।
  मुस्लिम बहुल किशनगंज लोक सभा क्षेत्र में 2019 में  कांग्रेस की जीत हो गई थी।
पर वहां भी असद्द्दीन ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार को  2 लाख 95 हजार मत मिल गए।
   इससे ओवैसी का मनोबल बढ़ा है।
ओवैसी ने घोषणा कर रखी है कि हमारी पार्टी बिहार विधान सभा के 32 क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़ा कराएगी।
जाहिर है कि वे वैसे क्षेत्र होंगे जहां अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अपेक्षाकृत अधिक अल्पसंख्यक आबादी है।
  राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन के भीतर के मतभेद भले इस बीच निपट जाएं,किंतु ओवैसी की पार्टी सीमित क्षेत्रों मेें ही सही, महागंठबंधन का खेल बिगाड़ सकती है।
वैसे हैदराबाद में जन्मी इस पार्टी को  बिहार में कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल होने की उम्मीद कम ही है।
  पर, सवाल यह है कि क्या ओवैसी महागठबंधन से तालमेल करेंगे ?
लगता तो नहीं है।
क्योंकि उनकी महत्वाकांक्षा एन.डी.ए.को हराने की अपेक्षा अपनी खुद की सीटें बढ़ाने की है।
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 भारी वाहनों से सड़कों का नुकसान   
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भारी वाहनों के कमजोर सड़कों और पुलों से गुजरने का क्या नतीजा होता है ?
नतीजा सब जानते हैं।
सड़कें और पुल समय से पहले टूट जाते हैं।
उनके पुनर्निर्माण पर भारी खर्च आता है।
संभवतः इस क्षति का राष्ट्रीय स्तर पर कोई आकलन नहीं हुआ है।
 यदि आकलन हो तो चैंकाने वाले आंकड़े मिल सकते हैं।
  यदि क्षति की राशि में से एक तिहाई पैसे भी निजी गार्ड पर खर्च किया जाए तो सड़कों-पुलों की रक्षा बेहतर तरीके से हो सकती है।
 अब यह सर्वज्ञात तथ्य है कि अधिकांश पुलिस फोर्स की बड़े निजी वाहनों से मिलीभगत रहती है।
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  और अंत में
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 अयोध्या में अगले माह राम मंदिर का शिलान्यास हो जाएगा।
लोगबाग उम्मीद कर रहे हैं कि इस मंदिर का प्रबंधन देर-सवेर वहां एक ऐसे मेडिकल काॅलेज की स्थापना करेगा जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देगा।
कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में योग्य व प्रतिबद्ध डाक्टरों की भारी कमी देश में भी महसूस की गई है।
वह कमी दूर करने में क्यों न प्रस्तावित राम मंदिर
का भी योगदान हो !
दक्षिण भारत में कई मेडिकल काॅलेज वहां मंदिरों से संबद्ध रहे हैं।   
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31 जुलाई 20

रविवार, 2 अगस्त 2020

पूर्व राज्य सभा सांसद अमर सिंह नहीं रहे
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  ‘‘ अमर सिंह नहीं होते तो मैं मुम्बई में 
 टैक्सी चला रहा होता-अमिताभ बच्चन’’
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अमर सिंह नहीं रहे।
एक जमाने में अनिल अम्बानी, अमर सिंह और अमिताभ बच्चन की गहरी दोस्ती थी।
 समय के साथ  अलग हो गए।
बीच में अमर व बच्चन के बीच आई कटुता भीषण थी।
अमर ने बच्चन के लिए कटु वचन बोले थे।
अमर ने उस पर बाद में  पश्चाताप भी किया था।
इस साल बच्चन ने अमर सिंह के पिता की बरखी पर उन्हें शोक संदेश भेजा।
फिर भी पहले वाली आपसी मधुरता न लौट पाई।
बहुत पहले यह खबर आई थी कि अमिताभ बच्चन जब भीषण आर्थिक संकट में थे तो अमर सिंह उनके बहुत काम आए थे।
पर जिस तरह दुश्मनी स्थायी नहीं होती ,उसी तरह दोस्ती भी।
अमिताभ बच्चन की चर्चा होने पर द संडे एक्सप्रेस से बातचीत में 2016 में अमर सिंह ने कहा था कि जो मेरे साथ नहीं है,उसे मैं भूल जाता हूं।
जो समय बीत जाता है,वह वापस नहीं आता।
मैंने अपने जीवन के 20 साल बच्चन परिवार को दिए।
अपनी बेटियों से अधिक उनके बच्चांे का ध्यान रखा।
जब उनका जहाज डूब रहा था, घर नीलाम हो रहा था ,वैसे गाढ़े वक्त में मैंने उनका साथ दिया था।
अमिताभ ने स्वीकारा भी था कि 
‘‘यदि अमर सिंह नहीं होते तो मैं मुम्बई में टैक्सी चला रहा होता।’’
( द संडे एक्सप्रेस -9 अक्तूबर 2016 )
  खैर, अमिताभ-अमर की दोस्ती और अलगाव के बारे में हमारे पास फिलहाल अमिताभ का पक्ष नहीं है।
इसलिए अधिक कुछ नहीं कहना।
अमर  कथा  मैंने इसलिए लिखी कि लोग जानें कि दोस्ती को 
स्थायी नहीं मान लेना चाहिए,यदि उसे ठीक से निभाने आपको नहीं आता।
किसी ने ठीक ही कहा है कि 
‘‘दोस्ती की  डोर में प्यार का मांझा लगातार लगाते रहना होता है।
तभी उसमें स्थायित्व आता है।’’
पता नहीं, मांझा किसने कम लगाया ?
 अमिताभ ने या 
 अमर ने ?
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--सुरेंद्र किशोर--1 अगस्त 20 
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 सी.बी.आई.जांच आखिर हो भी तो कैसे ?
जब जांच के तार्किक परिणति तक पहुंचने से
महाराष्ट्र की राजनीति व मुम्बई फिल्म जगत की 
चूलें हिल जाने वाली हो !
   --सुरेंद्र किशोर--
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सुशांत सिंह राजपूत की हत्या और उससे पूर्व
की सनसनीखेज घटनाओं का पूरा व सिलसिलेवार विवरण सोशल मीडिया में तैर रहा है।
उसे पढ़ने से यह साफ लग जाता है कि विवरण तथ्यपूर्ण व तार्किक है।
देशहित में अब सी.बी.आई.से इसकी पुष्टि करानी और जरूरी भी है।
   यह अकारण नहीं है कि महाराष्ट्र सरकार के गृह मंत्री ने जोर देकर कह दिया है कि किसी भी हालत में इस घटना की जांच का भार सी.बी.आई.को नहीं दिया जाएगा।
   कैसे दिया जाएगा भई ?
कोई अपनी ही सरकार की चूलें क्यों हिलाना चाहेगा ?
  राज्य सरकार मुम्बई फिल्म जगत पर हावी बेलगाम माफिया तत्वों से दुश्मनी क्यों मोल लेगी ?
हां, अब सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी बढ़ गई है।
उसे यह तय करना है कि हत्यारों ,बलात्कारियों और बेलगाम माफियाओं से इस देश को बचाना है या डूबते देखते 
रहना है ?
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उच्चस्तरीय साजिश के तहत केंद्रीय मंत्री ललित नारायण मिश्र को 1975 में दिन दहाड़े  समस्तीपुर में मार डाला गया।
मिश्र हत्याकांड की सही जांच हो गई होती तो तब की केंद्र सरकार की चूलें हिल जातीं।
  1983 में बिहार विधान सभा सचिवालय की एक महिला स्टाॅफ श्वेतनिशा त्रिवेदी उर्फ बाॅबी की जहर देकर हत्या कर दी गई।
उस केस को भी रफादफा कर दिया गया।
उसकी भी सही जांच हो जाती तो बिहार की राजनीति की चूलें हिल जातीं।
 तब एक नेता ने तैश में मुझसे कहा था कि ‘‘आप नक्सलाइट हैं क्या ?
क्यों इस लोकतांत्रिक सिस्टम को बर्बाद करना चाहते हैं ?’’
 यानी बाॅबी के गुनाहगारों तक पहुंचने पर लोकतंत्र पर खतरा था।
 यह उनकी अतिशयोक्ति नहीं थी।जान लीजिए,उस केस की गंभीरता।
 याद रहे कि जिन दो पत्रकारांे की खबरों के आधार पर बाॅबी की लाश कब्र निकाल कर पटना के कत्र्तव्यनिष्ठ एस.एस.पी. 
किशोर कुणाल ने जांच शुरू की दी ,उनमें मैं प्रमुख था।
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जब उच्चत्तम स्तर से सी.बी.आई.पर पड़े दबाव के कारण बाॅबी केस को रफा- दफा कर दिया गया तो कुणाल ने कहा था,
‘‘समरथ को नहि दोष गुसाई।’’
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.यदि सुशांत सिंह राजपूत हत्याकांड की  सी.बी.आई.से जांच कराने का आदेश सुप्रीम कोर्ट नहीं देगा तो एक बार फिर कहा जाएगा कि 
‘‘समरथ को नहि दोष गुसाई।’’
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2 अगस्त 2020

शनिवार, 1 अगस्त 2020

मर्ज सिर में, इलाज पैरों का

इस देश के एक खास तरह के राजनीतिक संगठन  अपने घटते जनाधार को बचाने के लिए बहुत हाथ -पांव मार रहे हैं। पर, वे सफल नहीं हो पा रहे हैं।
आखिर वे सफल होंगे तो कैसे !! ? मर्ज सिर में है और इलाज अपने पैरों का कर रहे हैं !
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-----सुरेंद्र किशोर--31 जुलाई 2020