गुरुवार, 17 मार्च 2022

 सन 2014 में इस देश के 14 राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं।

तब तक केंद्र में भी मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री थे।

पर,पिछले 8 वर्षों में क्या हुआ ?

अब दो राज्यों में ही कांग्रेस की सरकारें हंै।

 कांग्रेस नेतृत्व की यही ‘उपलब्धि’ है।

विनोबा भावे कहते थे कि यदि आपका रसोइया 100 में से 60 रोटियां जला दे तो क्या उसे आप रसोइया बनाए रखेंगे ?

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पर,विनोबा की बात व्यक्तिगत रसोई घर तक सीमित रहती  है। 

क्योंकि रसोई आपकी है और आटा भी आपका।

पर कुछ राजनीतिक दलों व नेताओं के लिए तो न तो पार्टी उनकी है और न ही देश।

फिर फिक्र करने क्या जरूरत  ?

जब तक हो सके दल व देश से फायदा उठा लो।

बाद में देश जाने और दल जाने !

हमारी तो कोई ‘पूंजी’ लगी नहीं है।

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सोमवार, 14 मार्च 2022

 कौन हारा, कौन जीता ? 

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गत पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में भाजपा की  विधान सभा की सीटें 3 से बढ़कर 77 हो गईं ।

फिर भी इस देश के  खास तरह के बुद्धिजीवियों-पत्रकारों-नेताओं ने कहा कि भाजपा बंगाल में बुरी तरह हार गई।

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उत्तर प्रदेश चुनाव में सपा अपनी पिछली सीटों की अपेक्षा तिगुनी सीटें पा गईं।

77 में तीन से भाग दीजिए।

कितना आएगा ?

तिगुना से कितना अधिक है ?

पर, कोई ‘सेक्युलर’ या ‘गैर सेक्युलर’ यह नहीं कह रहा है कि सपा बुरी तरह हार गई।

बल्कि यह कहा जा रहा है कि अखिलेश बहादुरी से लड़े।

तब सेक्युलर ब्रिगेड की ओर से यह नहीं कहा गया कि ममता के ‘जंगल राज’ के बावजूद  भाजपा बहादुरी से लड़ी।

याद रहे कि चुनाव आयोग के एक अफसर ने तब कहा था कि पश्चिम बंगाल में नब्बे के दशक के बिहार जैसा ‘जंगल राज’ है।

बंगाल में जिस तरह भाजपा सत्ता में आने का दावा कर रही थी,उसी तरह का दावा सपा उत्तर प्रदेश में कर रही थी।

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सुरेंद्र किशोर



रविवार, 13 मार्च 2022

 जज ने अपने वेतन से लाचार 

विधवा के बैंक कर्ज चुकाए

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सुरेंद्र किशोर

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यह कहानी भागलपुर जिले के नव गछिया की है।

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अमिताभ चैधरी ने अपने वेतन के पैसे से एक लाचार विधवा के बैंक कर्ज चुका दिए।

 लोक अदालत में उनके सामने एक सर्टिफिकेट केस आया।

नंदलाल दास ने स्टेट बैंक से कर्ज लिया था।

 कैंसर से उसकी मौत हो गई।

उसका पुत्र मंद बुद्धि का है।

विधवा कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं थी।

कर्ज तो अधिक था कि जज ने मामला का समझौता 25 हजार रुपए में करवाया। 

25 हजार रुपए जज ने स्वयं भगतान कर दिया।

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13 मार्च 22


    ग्रामीणों ने तो सड़क का आकार दे दिया

   शासन अब इसे बेहतर ‘मोटरेबल’ बनाए

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सुरेंद्र किशोर

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यह पटना एम्स के पास के मेरे गांव की कहानी है।

इसे आज के दैनिक भास्कर,पटना ने प्रकाशित किया है।

फुलवारीशरीफ अंचल की भुसौला दानापुर ग्राम पंचायत में एक गांव है--कोरजी।(कुर्जी नहीं)

  कोरजी से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित है नेशनल हाईवे।

 इसी नेशनल हाईवे पर थोड़ी ही दूरी पर पटना एम्स अवस्थित है।

किंतु वहां पहुंचने के लिए लोगों को पहले घुमावदार राह अपनानी पड़ती थी।

कुछ साल पहले कोरजी के ग्रामीणों ने तय किया कि हम जमीन और चंदा देकर सड़क बनाएंगे।

चंदा देने वालों में इन पंक्तियों का लेखक भी था।

कोरजी गांव के विद्यानंद शर्मा तथा अन्य 20 किसानों ने सड़क के लिए अपनी जमीन मुफ्त में दे दी।

  सड़क तो बन गई है।

पर,इसे बेहतर मोटरेबल बनाने की अभी जरूरत है।

शायद भास्कर में छपी इस खबर के बाद किसी हुक्मरान की नजर इस पर और इस सड़क को बेहतर बनाने का कोई उपाय हो।

इससे अन्य स्थानों के वैसे लोगों को भी प्रोत्साहन मिलेगा जो लोग अपने प्रयास से सार्वजनिक काम करना चाहते हैं या करते हैं।

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11 मार्च 22 


गुरुवार, 10 मार्च 2022

 इन चुनाव नतीजों में कुछ बातें खास तौर से 

गौर करने लायक हैं।

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इन चुनावों में कौन हार रहा है ?

आम तौर पर वही जो राजनीति में वंशवाद-परिवारवाद-जातिवाद-संप्रदायवाद को बुरा नहीं मानते।

जो अपने व अपने सहयोगियों के भ्रष्टाचारों और घोटालों का मजबूती से बचाव करते हंै।

जिनकी दृष्टि में कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता पर रखने की कोई जरूरत नहीं है।

जो यह मानते हैं कि विकास से नहीं बल्कि सामाजिक-धार्मिक समीकरणों से वोट मिलते हैं।

जिनके लिए आतंकवाद-जेहाद वाद-अलगाव वाद कोई समस्या नहीं है।

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10 मार्च 22.


   


 कहीं जन औषधि केंद्रों का हाल आई डी पी 

एल जैसा न हो जाए !!

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सुरेंद्र किशोर

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जन औषधि केंद्र से मिल रही सस्ती दवाओं के 

कारण इस देश के मरीजों ने गत साल  

अपने 5 हजार करोड़ रुपए बचाए ।

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संकेत हैं कि यह बचत आने वाले दिनों में बढ़ सकती है।

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यदि एक तरफ मरीजों ने बचाए हैं तो दवा व्यवसाय में लगे अति मुनाफाखोर लोगों ने इतने ही पैसे गंवाएं भी हैं।

यानी, उनके मुनाफे में कमी आई है।

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जिन मुनाफाखारों को हर साल हजारों करोड़ रुपए का ‘घाटा’ 

होने लगेगा,वे चुप नहीं बैठेंगे।

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मेडिकल क्षेत्र के अति मुनाफाखोरों पर नकेल कसने के लिए 

सन 1961 में केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में आई.डी.पी.एल.की स्थापना की थी।

 उसका दवा कारखाना बिहार के मुजफ्फर पुर में भी था।

उसकी दवाएं अत्यंत सस्ती व कारगर होती थीं।

पटना के मशहूर डाक्टर शिवनारायण सिंह सिर्फ उसी

कंपनी की दवा लिखते थे।

  उनकी दवा इसलिए भी कारगर होती थी क्योंकि आई.डी.पी.एल. की दवाओं में मिलावट से किसी को कोई खास लाभ नहीं होता था।

ब्रांडेड कंपनी की जो दवा दस रुपए में मिलती थी,आई डी पी एल की उसी फार्मूले वाली दवा दस आने में।

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मुनाफाखोर मेडिकल माफिया तथा अन्य तत्वों ने मिलकर आई डी पी एल को बंद करा दिया।

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जाहिर है कि निहितस्वार्थी तत्व जन औषधि केंद्रों की दवाओं को भी विफल करने के लिए सक्रिय हो गए होंगे।

  अब यह केंद्र सरकार की सतर्कता पर निर्भर है कि वह आई डी पी एल की पुनरावृति कैसे रोकती है।

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साठ के दशक में लोक सभा में यह आवाज उठी थी कि जिस पेंसिलिन के उत्पादन में मात्र तीन आने का खर्च आता है,उसे सात रुपए में क्यों बेचा जाता है ?

याद रहे कि दवा क्षेत्र में भारी अतार्किक मुनाफे को अब भी केंद्र सरकार नहीं रोक पाई है।

हां,जन औषधि की दवाओं की समानांतर व्यवस्था करके परोक्ष रूप से मुनाफा रोकने का सराहनीय प्रयास जरूर हो रहा है।

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देखना है कि अंततः मुनाफाखोर जीतते हैं या सरकार !!

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10 मार्च 22


 सन 2014 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले मशहूर कन्नड़ लेखक  यू.आर.अनंतमूत्र्ति 

ने कहा था कि यदि नरेंद्र मोदी सत्ता में आ गए तो मैं यह देश छोड़ दूंगा।

हालांकि उन्होंने बाद में अपना इरादा बदल लिया था।

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हाल में शायर मुनव्वर राणा ने कहा कि यदि योगी की सरकार फिर बन जाएगी तो मैं उत्तर प्रदेश छोड़ दूंगा।

उम्मीद है कि मुनव्वर साहब ने भी अब तक अपना इरादा बदल लिया होगा।

वैसे किसी मीडिया ने अब तक उनकी कोई खोज-खबर नहीं ली है।

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सुरेंद्र किशोर 

10 मार्च 22