गुरुवार, 23 नवंबर 2023

 


नवंबर, 1917 की 23 तारीख को लोकबंधु 

राजनारायण का जन्म हुआ था जो 

चलते-फिरते आंदोलन थे 

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--सुरेंद्र किशोर--

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यह बात सत्तर के दशक की है।

लोहियावादी समाजवादी नेताओं में फूट पड़ 

गयी थी।

सन 1967 में डा.राममनोहर लोहिया के असामयिक निधन के 

बाद लोहियावादी समाजवादी मुख्यतः राजनारायण और मधु लिमये के खेमों में बंट गये थे।

 जार्ज फर्नांडिस, मधु लिमये के साथ थे।

पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर समाजवादियों की एकता के पक्षधर थे।

उन्होंने एकतावादी-समतावादी नाम से एक पार्टी भी बना ली थी।

 जब एकता का कर्पूरी जी का प्रयास सफल नहीं हुआ तो वह जयप्रकाश नारायण से मिले।

कर्पूरी जी ने जयप्रकाश जी से कहा कि आप पार्टी में एकता के लिए राजनारायण जी को व्यक्तिगत पत्र लिख दें।

जेपी राजी हो गये।

उन्होंने लिख दिया।

पत्र अंग्रेजी में था।

दूसरे दिन मैं वह पत्र लेने पटना के कदमकुआं स्थित जेपी के आवास पर गया था।

जेपी के निजी सचिव सच्चिदानंद ने चिट्ठी तैयार रखी थी।

चिट्ठी लिफाफे रखी थी।

पर, लिफाफा बंद नहीं था।

स्वाभाविक उत्सुकता के तहत मैंने उसे खोल कर पढ़ा।

उस पत्र की कुछ ही बातें मुझे याद हैं।

उस पत्र से राजनारायण यानी नेताजी के प्रति जेपी के स्नेह का पता चला।

फिर समाजवादी आंदोलन में राजनारायण के महत्व का भी पता चला।

साथ ही, जेपी ने उस पत्र में राजनारायण से यह उम्मीद की थी कि वे समाजवादियों की एकता बनाये रखने में अपनी भूमिका निभाएं।

 जेपी की चिट्ठी उनके आवास से लाने का यह मौका मुझे इसलिए मिला था क्योकि मैं समाजवादी कार्यकत्र्ता के नाते  उन दिनों कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।

कर्पूरी ठाकुर उन दिनों बिहार विधान सभा मंे प्रतिपक्ष के नेता थे।

उससे पहले कर्पूरी जी सन 1970 में बिहार के मुख्य मंत्री और 1967 में उप मुख्य मंत्री रह चुके थे।

 वह 1952 से ही लगातार विधायक थे और समाजवादी आंदोलन में उनका बड़ा मान था।

पर, मुझे बाद में लगा कि जेपी की चिट्ठी भी समाजवादियों की खेमेबाजी पर कोई सकारात्मक असर नहीं डाल सकी।

उन्हीं दिनों ही बांका में हुए लोक सभा उप चुनाव में राज नारायण जी का मुकाबला मधु लिमये से हो गया।

दरअसल कर्पूरी ठाकुर ने ही लोक सभा के उस उप चुनाव में राजनारायण जी को उम्मीदवार बनवा दिया था।

संभवतः राजनारायण जी वहां की चुनावी संभावना के बारे मंे पहले से ही सशंकित थे।

 यह बात मैं व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह रहा हूं।

मैं राजनारायण जी से पहले से परिचित था।

पर शायद उन्हें इस बात की खबर नहीं थी कि मैं इस बीच कर्पूरी जी का निजी सचिव बन चुका था।

राजनारायण जी बांका जाने के लिए पटना रेलवे स्टेशन से गुजरने वाले थे।

वह वहां नामांकन दाखिल करने जा रहे थे।

कर्पूरी जी के साथ मैं भी नेता जी यानी राज नारायण जी से मिलने पटना जंक्शन गया था।

 मुझे देखा तो नेता जी मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे सबसे अलग ले गये।

  अपने कमजोर कंधे पर उनके भारी हाथ का दबाव मुझे आज भी याद है।

  उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मेरा बांका में उप चुनाव लड़ना सही रहेगा ?

मैं क्या कहता !

 कर्पूरी जी का मैं निजी सचिव था।

हालांकि एक राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप मैं यह महसूस कर रहा था कि सही नहीं रहेगा।

फिर भी मुझे कहना पड़ा कि आपका लड़ना ठीक रहेगा।

नेता जी लड़े और हारे।

मधु लिमये जीत गये।

समाजवादी आंदोलन के लोगों के बीच पहले ‘नेता जी’ राजनारायण ही थे।

मुलायम सिंह यादव तो बाद में नेता जी कहलाए।

   राजनारायण से मेरी थोड़ी लंबी मुलाकात एक बार छपरा में हुई थी जहां वह एक राजनीतिक कार्यक्रम के सिलसिले में आए थे।

उससे पहले सन 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के गया राष्ट्रीय सम्मेलन में मैं उनसे आॅटोग्राफ के लिए मिला था।

उन्होंने मेरे आॅटोग्राफ बुक पर एक अच्छी कबीरवाणी लिख दी।

मैंने तब कई अन्य राष्ट्रीय समाजवादी नेताओं के भी आॅटोग्राफ लिये थे।

राजनारायण जी से छपरा वाली मेरी मुलाकात संभवतः सन 1969 में हुई।

 तब मैं वहां छात्र था और लोहियावादियों की पार्टी के छात्र संगठन ‘क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ’ का जिला सचिव था।

उसके प्रदेश स्तर के नेता युवा नेता दिवंगत नरेंद्र सिंह थे जो बाद में बिहार सरकार में मंत्री बने थे।

 बिहार में युवजन सभा से हटकर छात्रों का भी एक संगठन था जिसका नाम था क्राांतिकारी विद्यार्थी संघ।

 छपरा में नेता जी के सबसे करीबी थे वकील रवींद्र वर्मा।

  ठीक उसी तरह, जिस तरह पटना में भोला प्रसाद सिंह।

 वर्मा जी वकील थे और इलाहाबाद विश्व विद्यालय के छात्र रह चुके थे।

वहीं वे समाजवादियों के प्रभाव में आए थे।

  वर्मा जी अब नहीं रहे।

पर इस अवसर पर इतना जरूर कहूंगा कि समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने में अपने छोटे दायरे में ही सही, पर,उनका जितना योगदान था,उस अनुपात में न तो उनकी पार्टी ने और न ही समाजवादी सरकारों ने उन्हें कुछ  दिया।

खैर, उसकी चिंता उन्हें नहीं थी।

तब देश के अन्य अधिकतर समाजवादी भी उसकी चिंता नहीं करते थे।

  खैर, वर्मा जी राजनारायण जी को लेकर टैक्सी से सारण जिले के एक सुदूर गांव की ओर जा रहे थे 

जहां कार्यक्रम था ।

मैं भी साथ था।

 वर्मा जी ने राजनारायण जी से मेरा परिचय कराया, 

‘ये हैं सुरेंद्र अकेला।

अच्छे कार्यकत्र्ता हैं।’

 नेता जी ने अपने लहजे में सवाल किया, 

‘का हो अकेला ! 

अभी अकेले हउ अ ?

 शादी नइख कइले ?’ 

मैंने कहा कि जी नहीं।

इस पर नेता जी ने वर्मा जी से कहा कि 

‘रवींदर, फलां .......की छोटी बहन से इसकी शादी करा दूं ?

 वह मेडिकल में पढ़ती है।’ 

उन्होंने लखनऊ के अल्पसंख्यक समुदाय की एक समाजवादी महिला का नेता का नाम लिया था।

जानबूझ कर मैं उनका नाम यहां नहीं लिख रहा हूं।

मैंने कहा कि 

‘नेता जी , बहुत गैप है।

कहां वह मेडिकल छात्रा और कहां मैं जो बी.एससी. की परीक्षा छोड़कर कार्यकत्र्ता बना हुआ हूं।’

 नेता जी ने कहा कि 

‘मैं सारा गैप पाट दूंगा।’

 पता नहीं, वह मजाक कर रहे थे या वह सिरियस थे।

पर, मुझे उनके चेहरे के भाव से लगा कि वे सिरियस थे।

पता नहीं वे चाहते हुए भी ऐसी शादी करा पाते या नहीं,पर उनका आत्म -विश्वास देखने लायक था।

साथ ही धर्म निरपेक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता भी। 

  तब सांप्रदायिक माहौल आज जैसा बिगड़ा हुआ भी नहीं था।

तब समाजवादी आंदोलन के नेता यह चाहते थे कि राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं की पत्नियां नौकरी वाली हों ताकि परिवार चलाने के लिए पैसे की तंगी नहीं हो।

 देश के कई समाजवादी नेताओं की पत्नियां ऐसी थीं भी।

 आज तो राजनीति में इतना पैसा है कि किसी को इसकी न तो चिंता है नहीं जरूरत।

कुल मिलाकर मैं राजनारायण जी को एक निःस्वार्थ, निर्भीक  और जुझारू नेता के रूप मंे याद करता हूं।

 वह अपने साथियों और कार्यकत्र्ताआंे का बड़ा ध्यान रखते थे।

सन 1969 में समाजवादी आंदोलन के सिलसिले में दिल्ली के संसद भवन के पास  हुए प्रदर्शन में मैं भी था।

गिरफ्तारियां हो गयीं।

अनेक नेताओं और कार्यकत्र्ताओं के साथ मैं भी तिहाड़ जेल पहुंच गया।

उस समय जेल जाने वालों में मधु लिमये,राजनारायण ,जनेश्वर मिश्र, किशन पटनायक ,शिवानंद तिवारी ,राजनीति प्रसाद, राम नरेश शर्मा, देवेंद्र कुमार सिंह सहित अनेक छोटे- बड़े नेता-कार्यकत्र्ता  थे।

कुछ समय तक जेल में रहना पड़ा।

कड़ाके की जाड़ा थी।

वह भी दिल्ली की जाड़ा।

फिर भी कंबल ओढ़े नेताजी सुबह-सवेरे सभी बंदियों के पास जाते थे।

सबका हाल चाल पूछते थे।

किसे चाय मिली या नहीं, इसका बड़ा ध्यान रखते थे।

मैंने महसूस किया कि व्यक्तिगत रूप से कार्यकत्र्ताओं का ध्यान रखने में राजनारायण जी अन्य बड़े नेताओं से थोड़ा अलग थे।

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रविवार, 19 नवंबर 2023

 साठ-सत्तर के दशकों में अध्ययनशील,जुझारू और खबरखोजी संसद सदस्य सदन में अपने भाषणों के जरिए तथा अन्य तरह से आम तौर पर ‘स्टोरी ब्रेक’ करते थे।

 अखबार उसे बाद में लोगों तक पहुंचाते थे।अपवाद तब भी था।

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बाद के वर्षों में मीडिया खास कर अखबार स्टोरी ब्रेक करने लगे और सांसद उसे सदन में उठाने लगे।

अपवाद तब भी था।

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हाल के वर्षों में सदनों और मीडिया जगत में क्या हो रहा र्है और कितना हो रहा है ?

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सुरेंद्र किशोर

19 नवंबर 23


शनिवार, 18 नवंबर 2023

 हर फिक्र को धुएं में मत उड़ाइए,नेता जी !!

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सुरेंद्र किशोर

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‘‘मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया,

हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।

बर्बादियों का शोक मनाना फिजूल था,

बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया।

जो मिल गया,उसे ही मुकद्दर समझ लिया

जो खो गया, उसको भुलाता चला गया।

आदि आदि 

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फिल्म ‘‘हम दोनों’’ -1961

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डा.राम मनोहर लोहिया,जवाहरलाल नेहरू और जिन्ना 

सहित न जाने कितने नेता सिगरेट के गुलाम थे।

डा.लोहिया ने महात्मा गांधी के कहने पर सिगरेट एक बार छोड़ दी थी।

पता नहीं, गांधी जी ने नेहरू से सिगरेट क्यों नहीं छुड़वाई ?

पर,जब गांधी की हत्या हुई तो उसके बाद लोहिया ने फिर सिगरेट शुरू कर दिया था।

नतीजा यह हुआ कि लोहिया को सिगरेट पीते देख देश भर के युवा लोहियावादी सिगरेट पी-पी कर अपना स्वास्थ्य गंवाने लगे।

सामाजवादियों के अभिभावक नुमा नेता मामा बालेश्वर दयाल ने डा.लोहिया को लिखा कि आप सिगरेट पीना छोड़ दो।

  क्योंकि आपकी देखा-देखी समाजवादी नौजवान सिगरेट पीने लगे हैं।उससे उनके स्वास्थ्य को हानि पहुंच रही है।

इस पत्र पर डा.लोहिया ने सिगरेट छोड़ दी।

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नेहरू के निजी सचिव एम.ओ.मथाई ने, जो सन 1946 से 1959 तक उनके साथ रहे थे,अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक  में  लिखा है कि रात के भोजन के बाद अपने बेडरूम में जाकर नेहरू सिगरेट पीते थे।

 उनके विश्वस्त सहायक उपाध्याय नेहरू की सेवा में रहता था।

यानी, 1959 तक तो नेहरू सिगरेट पीते ही थे।

बाद में भी पीते होंगे !

पता नहीं।

क्योंकि जब गांधी उन्हें नहीं रोक सके तो बाद में भला कौन रोकता।

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मेरी चिंता सिर्फ एक बात को लेकर रही है।

इस तरह के बड़े -बड़े नेताओं को गलत-खान पान करके अपने शरीर को बर्बाद नहीं करना चाहिए।

क्योंकि उनके लाखों-करोड़ों  प्रशंसक होते हैं

जो उनकी ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं।

नेता के न रहने पर उन्हें भारी निराशा होती है। 

दरअसल ऐसे नेताओं के जीवन के साथ -साथ उनके शरीर पर भी जनता का अघोषित अधिकार होता है।

बिहार के भी कुछ प्र्रमुख नेताओं ने अपने प्रशंसकांें-समर्थकों  को इस मामले में निराश किया है।

गलत खानपान आदि के कारण इनका भी शरीर 

धीरे- धीरे इनका साथ छोड़ रहा है।

गलत खानपान में अति भोजन,

कुभोजन,

मांस,

मदिरा,

गांजा,

भांग,

सिगरेट आदि शामिल हैं। 

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17 नवंबर 23


मंगलवार, 14 नवंबर 2023

 नेहरू के जन्म दिन पर

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नेहरू के निधन के बाद डा.राममनोहर लोहिया ने 

कहा था कि ‘1947 के पहले के नेहरू को मेरा सलाम !’  

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डा.लोहिया ने ठीक ही कहा था।मैं भी आज यही कहूंगा।

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1947 के बाद के नेहरू पर हम लोग अन्य अवसरों पर ‘‘बातचीत’’ व लेखन करते रहते हैं।

बाद की उनकी भूमिका विवादास्पद रही।

पर, 1919 के नेहरू को याद करना आज के माहौल में 

बहुत ही प्रासंगिक है।

क्योंकि आज कोई युवा अपना सुखमय जीवन छोड़कर देश के लिए राजनीति में नहीं कूद रहा है।

कोई कूद भी रहा है तो अपना और अपने परिजन का जीवन

और भी सुखमय बनाने के लिए।

उधर सन 1919 में नेहरू ने खुद को अनिश्चितता के भंवर में डाल दिया था।

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‘जालियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को हुए भीषण नर संहार से क्षुब्ध होकर जवाहरलाल नेहरू आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये।

जवाहर लाल जी की बहन कृष्णा हठी सिंह ने लिखा है कि 

‘‘उस घटना ने नेहरू परिवार के जीवन प्रवाह को ही बदल दिया था।

इसी दर्दनाक घटना के बाद आजादी की लड़ाई में शामिल होने को लेकर परिवार की दुविधा समाप्त हो गई थी।’

  हठी सिंह के अनुसार ‘‘उससे पहले जवाहर तो आजादी की लड़ाई में शामिल होने को बेताब थे।

पर मोतीलाल नेहरू का मानना था कि मुट्ठी भर लोगों के जेल चले जाने से देश गुलामी से मुक्त नहीं हो सकता।’

एक नरंसहार के कारण  जवाहर लाल नेहरू जैसा शानदार और जानदार नेता आजादी की लड़ाई के लिए मिल गया।

नेहरू ने अपना सुखमय जीवन छोड़कर अनिश्चितता के भंवर में खुद को डाल दिया था।

वे युवकांे के हृदय सम्राट थे।मैंने 1962 में उन्हें छपरा की विशाल जन सभा में सुना और करीब से देखा भी था।

उनसे प्रेरणा लेकर न जाने कितने नौजवान आजादी की लड़ाई में शामिल हुए होंगे।उनके निधन के समय मैं एक बारात में था।

रेडियो पर शोक गीत सुन -सुन कर मैं भी खूब रोया था।

काश ! नेहरू की जैसी शानदार-जानदार भूमिका स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में थी,वैसी ही शानदार भूमिका आजादी के बाद देश को बनाने में रही होती ।

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अब 1919 से आज की तुलना करते हैं।

आज कितने नौजवान अपना सुखमय जीवन त्याग कर देश के लिए राजनीति में आ रहे हैं ?

लोगों को शंका होती है कि आ भी रहे हैं तो अरविंद केजरीवाल जमात जैसी ‘‘भूमिका’’ निभाने के लिए ???

अपवादों की बात और है।

पर,अपवादों से देश नहीं चलता।

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1919 में देश को विदेशियों से आजाद कराने की चुनौती थी।

आज देश को ‘‘देशियों -विदेशियों’’ से बचाने की जरूरत है जो देश को नये ढंग से गुलाम बनाने की गंभीर कोशिश में लगे हुए हैं।

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14 नवंबर 23

    


 


 


सोमवार, 13 नवंबर 2023

 नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियां

सही या गलत ?

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सुरेंद्र किशोर

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तीसरे विश्व युद्ध के बाद क्या भारत एक महा शक्ति के रूप में उभरेगा ?

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तीसरा विश्व युद्ध कितना दूर, कितना पास ?

क्या उससे संसार के बड़े-बड़े देश तबाह हो जाएंगे ?

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इन दिनों भारत के मीडिया में नास्त्रेदमस (सन 1503-सन 1566)की भविष्यवाणियों की खूब चर्चा हो रही है।

फ्रांस के प्रख्यात भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस पर प्रकाशित पुस्तक में दर्ज सिर्फ भारत से संबंधित भविष्यवाणी को यहां उधृत कर रहा हूं।

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नमूना-1

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‘‘तीनों सागरों की श्रृंखला में स्थित ,विश्व के पूरब में एक ऐसा प्राणी जन्म लेगा जो बृहस्पति को अपना गुरु मानकर उसकी उपासना करेगा।

वह प्राणी इतना महान और शक्तिशाली होगा कि वह तूफान की भांति पूरे विश्व पर छा जाएगा।’’

(पेज-58)

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    नमूना-2

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 ‘‘भारत में नई शक्ति का उदय होगा।’’

(पेज-36)

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नरेंद्र शर्मा द्वारा हिन्दी में प्रस्तुत नास्त्रेदमस की पुस्तक से।

नास्त्रेदमस की मूल पुस्तक फ्रंेच में लिखी गयी।

पर,उसका अनुवाद दुनिया के लगभग हर भाषा में हो चुका है।

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13 नवंबर 23

 


 दीपावली के अवसर पर पैसे वाले अपने पैसों का 

हिसाब-किताब करते हैं।

मैं अपने जीवन में मिली संतुष्टि का हिसाब बताता हूं।

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पहले कबीर को याद कर लूं--

‘‘....,जब आवे संतोष धन,सब धन धूली समान !

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आज मैं एक अत्यंत संतुष्ट व्यक्ति हूं।

मुझे ऐसी संतुष्टि उपलब्ध कराने में मेरे परिवार,रिश्तेदार,

मित्र,सहकर्मी तथा समाज के अन्य अनेक लोगों का 

योगदान रहा है।सबके प्रति आभारी हूं।

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अब एक ही इच्छा है--अंत समय तक कुछ 

लिखता और कुछ अधिक पढ़ता रहूं।

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सुरेंद्र किशोर

12 नवंबर, 23




रविवार, 12 नवंबर 2023

 आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं