शुक्रवार, 9 अगस्त 2024

     आसान प्रतियोगिता !

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भ्रष्टों के बीच प्रतियोगिता बहुत ही कड़ी है।

क्योंकि उस क्षेत्र में प्रतिभागियों की संख्या अपार है।

इसलिए वहां ‘‘ओलम्पिक मेडल’’मिलना यानी शीर्ष पर 

पहुंचना बहुत ही मुश्किल है।

दूसरी ओर, ईमानदारों के बीच की प्रतियोगिता बहुत ही कम और आसान है।

क्योंकि इस क्षेत्र में उम्मीदवार बहुत ही कम है।

जहां रहिए, शीर्ष पर रहिए !!

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इसलिए आसान प्रतियोगिता में शामिल होइए।

इस क्षेत्र में प्रतियोगिता जीत कर 

शीर्ष पर पहुंचना अपेक्षाकृत 

बहुत ही आसान है।

आसान रास्ता उपलब्ध है ही तो 

कठिन राह क्यों चुनना ??

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----सुरंेद्र किशोर

    9 अगस्त 24


गुरुवार, 8 अगस्त 2024

 मैं एक ऐसी मांग कर रहा हूं 

जो पूरी नहीं होने वाली 

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मांग 

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बैंक लोन-बिजली -पानी फ्री करने की जगह देश भर 

के सरकारी दफ्तरों को ‘‘रिश्वत-फ्री’’ करो

(अपवाद के तौर पर कुछ दफ्तरों में,कुछ 

ही दफ्तरों में अब भी घूस नहींे ली जाती)

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पर,इसके लिए सांसद-विधायक फंड 

को पहले बंद करना होगा

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यदि ऐसा हुआ तो आम जनता अधिक खुश 

होगी और जो ऐसा करेगा ,उसके वोट बढ़ेंगे

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सुरेंद्र किशोर

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बैंक लोन-बिजली-पानी फ्री करने की जगह 

सरकारी आॅफिसेज को ‘‘रिश्वत-फ्री’’ करो

कहोगे कि यह कैसे होगा ?

बड़ा मुश्किल काम है।

कोई मुश्मिकल नहीं।

जिससे रिश्वत ली जाती है,उसे बहुधा परेशान 

और अपमानित भी किया जाता है।

यानी,रिश्वत बंद माने अपमान-परेशानी भी बंद

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मंत्री और आफिसर मलाईदार पदों पर अफसरों की 

पोस्टिंग फ्री मंे करे।

(हालांकि कुछ मामलों मंे अब भी फ्री होती है पोस्ट्रिग)

अंचल तथा अन्य कार्यालयों की ऊपरी आय से नेतागण कट-मनी न लें।

इसके बावजूद यदि रिश्वतखो री हो तो राज्य और केंद्र सरकार अपने -अपने यहां एक ‘‘स्टिंग आपरेशन विभाग’’ स्थापित करें।उनमें कुछ निजी तो कुछ गैर पेशेवर सरकारी सेवक हों।

आज तो आम तौर पर रिश्वतखोर जब मीडिया या अन्य के प्रायवेट स्टिंग आॅपरेशन में पकड़ाते हैं तो सजा से नहीं बचते।ं 

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भारतीय संसद ने सन 2005 में कोबरापोस्ट.काॅम(चैनल -आजतक) के ‘‘आॅपरेशन दुर्योधन’’ में रिश्वत लेेते उजागर लोक सभा के 10 सांसदों और राज्य सभा के एक सदस्य को बरखास्त करके इतिहास रच दिया था।

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8 अगस्त 24




 बिहार में डायल-112 पुलिस 

इमर्जेंसी सेवा से सकारात्मक 

फर्क आ रहा है

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सुरेंद्र किशोर

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बिना नजराना-शुकराना के पुलिस

तत्क्षण पीड़ित की सहायता में पहुंच जाए तो

इसे क्या कहेंगे ?

असंभव सी लगने जैसी इस बात को

बिहार जैसे लगभग अराजक राज्य में 

मिनी क्रांति ही तो कहेंगे।

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पटना में तो यह कमाल घटित हो रहा है।

पिछले दिनोें मैंने देखा कि फुलवारीशरीफ थाना क्षेत्र 

के एक पीड़ित व्यक्ति को डायल -112 पुलिस इमर्जेंसी सेवा ने भारी राहत दी।

आज के दैनिक प्रभात खबर में पटना कोतवाली इलाके की ऐसी ही एक खबर छपी है।

पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता कासिम युसुफ को डायल --112 सेवा ने तत्काल मदद पहुंचाई।वे सपेरों की दुष्टता और मुद्रामोचन से परेशान थे।

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गत साल दिसंबर में बिहार पुलिस के एक बड़े अफसर ने 

मीडिया को बताया था कि डायल-112 सेवा अगले साल यानी 2024 में राज्य के गांवों में भी उपलब्ध हो जाएगी।

मुझे पता नहीं कि उपलब्ध हुई या नहीं।

यदि हो जाए तब तो उसे ‘‘मिनी राम राज्य’’ ही कहेंगे।

यदि गांवों के कमजोर व पीड़ित लोगों को यह भरोसा हो जाए कि 112 पर डायल कर देने से ही पुलिस (मुफ्त में) उसकी मदद में तुरंत पहुंच जाएगी तब तो उससे ग्रामीण जीवन पर काफी फर्क पड़ेगा।

गांवों से पलायन रुकेगा।

लोग निर्भीक होकर अपने गांवों में ही छोटे-मोटे रोजगार करके रोजी-रोटी कमा लेंगे। 

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8 अगस्त 24

 


बुधवार, 7 अगस्त 2024


कुल आबादी के करीब 2 प्रतिशत लोग ही 
इस देश में आय कर देते हैं।
क्या इतने ही लोगों की वास्तविक 
आय कर के योग्य है ?
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सुरेंद्र किशोर
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आंतरिक सुरक्षा को लेकर इस देश के समक्ष
9 प्रमुख चुनौतियां हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व डी.जी.पी.प्रकाश सिंह का लेख 4 जुलाई 24 के इंडियन एक्सप्रेस में छपा है।
उसमें उन्होंने आंतरिक चुनौतियों की चर्चा की है।ं  
बाहरी चुनौतियां कैसी हैं,उसकी झलक बांग्ला देश की ताजा घटनाएं हमेें भी दिखा-बता रही हंै।चेता भी रही हैं,यदि हम चेतना चाहें तो।
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सभी तरह की चुनौतियों के मुकाबले के लिए सरकारों के पास पर्याप्त धन चाहिए।साथ ही, उस धन को हैंडिल करने वाले ईमानदार हाथ भी चाहिए।
इस देश के अधिकतर लोग जब तक कर वंचना करते रहेंगे तो धन कहां से आएगा ?
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करीब दो साल पहले मैंने अपनी कुछ जमीन बेची।
 पत्रकार को मिलने वाली पेंशन राशि नाम मात्र(मुझे 1231 रुपए की राशि हर माह पी.एफ.पेंशन के रूप में मिलती है।) 
की होती है,इसलिए मुझे वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ी।
जमीन बिक्री से मिले पैसों से मैंने एफ.डी.करवाई।
ताकि, रोज-ब-रोज के जरूरी खर्चे के लिए मुझे किसी के समक्ष हाथ नहीं पसारना पड़े।
पर,इसके साथ ही एक असामान्य बात भी हुई।(हालांकि मेरे लिए वह असामान्य नहीं थी।)
 जमीन के खरीदार से मैंने पूरे पैसे व्हाइट में लिये यानी बैंक खाते के जरिए।
उस पर पूरा आयकर भी दिया।ऐसा मैंने अपने कुछ शुभचिंतको की ‘‘नेक सलाह’’ को नजरअंदाज करके किया।
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यह बात मैंने यहां इसलिए लिखी ताकि मैं जब किसी से यह कहंू कि पूरा टैक्स भुगतान करिए तो मुझमें वैसा कहने का नैतिक बल भी हो।
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केंद्र सरकार के कुल कर राजस्व का 27 प्रतिशत हिस्सा आयकर से मिलता है।
सन 2013-14 वित्तीय वर्ष में केंद्र सरकार को विभिन्न करों से जितने पैसे मिले थे,उसकी अपेक्षा आज तिगुनी राशि मिल रही है।
  क्योंकि भ्रष्टाचार थोड़ा कम हुआ है।
  थोड़ा ही कम ही हुआ है।
भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ है।
  यदि कुछ और कम हो जाएगा तो सरकार के पास और भी अधिक धनराशि आएगी।
उससे न सिर्फ देश का सर्वांगीण विकास होगा बल्कि आंतरिक और बाह्य खतरों से मुकाबला करने के लिए सरकार के पास पर्याप्त मानव संसाधन और जरूरी हथियार उपलब्ध होंगे।
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इसलिए जो लोग अपनी आगे की पीढ़ियों के लिए भी इस देश को सुरक्षित स्थान बनाये रखने की कामना करते हैं,कम से कम वे लोग तो टैक्स चोरी के लोभ पर काबू पाएं।
अन्यथा आगे भारी खतरा है।खतरनाक मोड़ हैं।
यदि अधिक विस्तार से लिखूंगा तो मेरा फेसबुक एकाउंट बन्द हो सकता है।पहले ही चेतावनी मिल चुकी है।
इसलिए थोड़ा कहना,पर,अधिक समझना !!
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7 अगस्त 24 ं 

मंगलवार, 6 अगस्त 2024

 सुनिश्चित हो परीक्षाओं की शुचिता

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भर्ती परीक्षाओं के साथ-साथ स्कूल-कालेज की परीक्षाओं

में भी कदाचार रोकने की दिशा में ठोस कदम जरूरी है

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सुरेंद्र किशोर

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प्रश्न पत्र लीक होने के सिलसिले को रोकने के लिए केंद्र सरकार के साथ आठ राज्य सरकारों ने भी इससे संबंधित कानून बनाए हैं।

हाल में बिहार सरकार ने भी बिहार लोक परीक्षा(अनुचित साधन निवारण)विधेयक पारित किया है।

यह सराहनीय और समयानुकूल है।

सामान्य और भर्ती परीक्षाओं में कदाचार की समस्या देशव्यापी है।

यह जरूरी था कि केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारें भी इसे रोकने की दिशा में ठोस कदम उठातीं।

भर्ती परीक्षाओं के अलावा सामान्य परीक्षाओं में भी कदाचार रोकने की दिशा में ठोस काम होना चाहिए,तभी नये कानून कारगर हो पाएंगे।

यह संयोग नहीं है कि नीट में प्रश्न पत्र 

लीक के केंद्र हजारीबाग और पटना रहे।

 बिहार के प्रश्न पत्र लीक रोधी कानून में भी दस साल तक की सजा और एक करोड़ रुपए के जुर्माने का प्रविधान किया गया है।

इससे कानून का उलंघन करने वालों में अधिक भय पैदा होगा।

 इससे पहले बिहार में 1981 में नकल विरोधी कानून बना था।

उसके तहत छह महीने की जेल और दो हजार रुपए के जुर्माने का प्रविधान था।

वह कानून तनिक भी कारगर साबित नहीं हुआ।

बिहार ने जो नया कानून बनाया है,उसके तहत दायर मुकदमों की जांच डी.एस.पी.स्तर के अधिकारी करेंगे।

पुराने कानून में ऐसा प्रविधान नहीं था।

बिहार सरकार पेपर लीक कांड की जांच बिहार पुलिस के अलावा किसी अन्य एजेंसी से करा सकेगी।

बिहार का यह कानून जिन संस्थाओं की प्रतियोगी परीक्षाओं पर लागू होगा,उनमें बिहार लोक सेवा आयोग,बिहार राज्य विश्व विद्यालय सेवा आयोग ,बिहार कर्मचारी चयन आयोग ,बिहार

पुलिस अवर सेवा आयोग, केंद्रीय सिपाही चयन परिषद ,बिहार तकनीकी सेवा आयोग शामिल हंै।

यह सब ठीक है, लेकिन प्रश्न है कि क्या स्कूल-कालेज और विश्व विद्यालय स्तर की परीक्षाओं को कदाचारमुक्त किए बिना भर्ती परीक्षाओं में जारी कदाचार को पूर्णतः रोका जा सकता है ?

यह सवाल बिहार के सामने ही नहीं,सभी राज्यों के समक्ष है।

आखिर आज देश के कितने राज्यों के विद्यालयों और विश्व विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा -परीक्षा हो पा रही है ?

शिक्षा-परीक्षा को सुधारे बिना भर्ती परीक्षाओं के लिए कितने सुशिक्षित उम्मीदवार मिल पाएंगे ?

इसलिए अगले कदम के तहत राज्य सरकारों को वहां जारी गंदगी की भी सफाई के लिए कारगर कदम उठाने होंगे।

इस दिशा में अब तक जो भी कदम उठाए गए, वे विफल ही रहे हैं।समय -समय पर अनेक राज्यों में सच्ची परीक्षा और सच्ची पढ़ाई की कोशिशें र्हुइं।,लेकिन निहित स्वार्थी ने उन्हें विफल कर दिया।

वे तत्व आज भी कमजोर नहीं हुए हैं।

 यह उम्मीद की जाती है कि सरकारें हर स्तर की परीक्षाओं को कदाचार से मुक्ति के लिए अपनी कठोर इच्छा शक्ति का इस्तेमाल करें।

   उत्तर भारत के कई राज्यों और खासकर बिहार की शिक्षा-परीक्षा में गिरावट की शुरूआत पहले ही हो चुकी थी,लेकिन 1995 तक बिहार में उसकी हालत ऐसी दयनीय हो चुकी थी कि कई राज्य सरकारों ने (सरकारी संस्था) बिहार इंटर काउंसिल द्वारा जारी प्रमाण पत्रों को मानने से ही इन्कार कर दिया था।

कई मामलों में जाली अंक पत्र और प्रमाण पत्र भी जारी होने लगे थे।

उस स्थिति से ऊबकर पटना हाईकोर्ट में लोकहित याचिका दायर की गई।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि जिलाधिकारी और प्रमंडलीय आयुक्त कदाचारमुक्त परीक्षाएं आयोेजित कराने के लिए जिम्मेदार होंगे।

 इसके चलते 1996 में बिहार में मैट्रिक और इंटर की कदाचारमुक्त परीक्षाएं हुईं।

1996 की इंटर साइंस की परीक्षा में सिर्फ 15 प्रतिशत परीक्षार्थी उतीर्ण हो सके थे।पटना जिले में मैट्रिक परीक्षा में सिर्फ 16 प्रतिशत परीक्षार्थी ही सफल हो सके।

कमोबेश ऐसा ही परिणाम अन्य जिलों में रहा।

नतीजतन कालेजों में एडमिशन के लिए विद्यार्थियों का अकाल सा हो गया।

शिक्षा माफिया के पांव उखाड़ना इतना आसान काम नहीं था।उन्हें शासन से अघोषित रूप से यह आश्वासन मिल गया कि अब आगे की परीक्षाओं में कड़ाई नहीं होगी।

इस मोर्चे पर शिक्षा माफिया ही अंततः जीत गया और दोगुने उत्साह से परीक्षाओं में कदाचार करने लगा।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज बिहार में शिक्षा-परीक्षा का हाल वैसा ही हो गया है जैसा 1995 में था।

 होना तो यह चाहिए था कि परीक्षा में कड़ाई जारी रहती,शिक्षा-परीक्षा में सुधार के लिए यह जरूरी था।पर,जिन्हें एक समय शिक्षा मंत्री ने शिक्षा माफिया करार दिया था,उन्हीं लोगों ने ऐसी जुगत भिड़ाई कि दोबारा कदाचार शुरू हो गया।

1996 की कड़ाई के बाद के वर्षों में कदाचार की ऐसी छूट मिली कि एक दफा तो जो छात्र बिहार की बोर्ड़ परीक्षा में पूरे राज्य में प्रथम आया था,वह दिल्ली में ऊंची कक्षा में नामांकन के बाद एक सेमेस्टर भी पास तक नहीं कर सका।

  देश भर में शिक्षा क्षेत्र एक ऐसा उद्योग बन गया है जिसमें 

कोई घाटा नहीं होता।

इस उद्योग में सिर्फ आधुनिक तकनीक के साथ-साथ उच्च स्तर के जन संपर्क की आवश्यकता होती है।

इस उद्योग से जुड़े एक कारखाने का जिक्र अपनी पुस्तक ‘‘इंटर काउंसिल एक हकीकत’’ में दिवंगत प्रो. नागेश्वर प्रसाद शर्मा ने किया है।

उस अल्पज्ञात कारखाने यानी कालेज के इंटरमीडिएट के परीक्षाथियों का जब एक साल का रिजल्ट देखा गया तो पता चला कि उसके कुल 477 में से 461 परीक्षार्थियों ने प्रथम श्रेणी में परीक्षा पास की।

जब इस मामले की जांच हुई तो पाया गया कि वास्तव में सिर्फ तीन छात्रों को ही प्रथम श्रेणी मिली थी।

आज देश के तमाम शिक्षा संस्थान ऐसे हैं जो मात्र शिक्षा के कारखाने बनकर रह गए हैं और जो घटिया माल का ही अधिक उत्पादन करते हैं।

अपवाद को छोड़कर इनके संचालकों को उन तमाम लोगों का प्रत्यक्ष और परोक्ष संरक्षण हासिल होेेता है,जिन पर कदाचार मुक्त शिक्षा और परीक्षा उपलब्ध कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

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6 अगस्त 2024 के दैनिक जागरण में प्रकाशित

 


रविवार, 4 अगस्त 2024

 हिंसा-प्रतिहिंसा से पीड़ित ब्रिटेन

हिंसा किसी के हित में नहीं

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सुरेंद्र किशोर

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ब्रिटेन में पहले प्रवासियों,घुसपैठियों और शरणार्थियों की ओर से हिंसा हुई। 

ताजा हिंसा, मूल निवासियों की ओर हुई है।

हालांकि ताजा हिंसा एक फेक न्यूज के चलते हुई।

किंतु वैसे भी वहां बारुद बिछी हुई है।पता नहीं कब क्या हो जाये !

शांतिप्रिय लोग शांति की उम्मीद जरूर कर रहे हैं।

पर, शांति आएगी या नहीं,आएगी तो कब आएगी, वह अब अनिश्चित सा हो गया है।

समान कारणों से भारत में भी कमोबेश वैसी ही स्थिति तैयार हो रही है।यहां की भी समस्या गंभीर है।

भारत सरकार तथा प्रतिपक्ष को चाहिए कि वे ब्रिटेन की घटनाओं से सीख लेकर भारत में स्थिति को बिगड़ने से रोकें।

इसी में सबकी भलाई है।

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आज ब्रिटेन में जो कुछ हो रहा है,वह वहां के कुछ नेताओं,दलों और सरकारों की गलत व अदूरदर्शी नीतियों के कारण हो रहा है।

 भारत के भी अधिकतर नेतागण ऐसे मामलों में अदूरदर्शी ही साबित हुए हैं। 

सन 1947 में जब ब्रिटिशर्स भारत छोड़ रहे थे तो वहां के पूर्व प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि भारत के नेतागण आजाद भारत का संभाल नहीं सकेंगे।

बदली हुई परिस्थिति में चर्चिल परलोेक में अब सोच रहे होंगे कि मैं तो दूसरे देश के बारे में यह सब कह रहा था, पर, अब तो हमारे ही देश के कई नेतागण हमारे गौरवशाली देश को संभाल नहीं पा रहे हैं।

ब्रिटेन के पूर्व प्रधान मंत्री सुनक ने इस गंभीर (व ब्रिटिश निर्मित) समस्या के समाधान के लिए गंभीर कोशिश की थी।

पर निहितस्वार्थी तत्वों ने उन्हें फिर से सत्ता में नहीं आने दिया।

समान कारणों से देशी-विदेशी शक्तियों द्वारा भारत की सत्ताधारी जमात की सीटें हाल के लोक सभा चुनाव में कम करा दी गईं। 

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4 अगस्त 24


 


शनिवार, 3 अगस्त 2024

 


मोदी या शाह किसी को जेल नहीं भेज सकते।

जेल भेजती हैं अदालतें !

इन दिनों के राजनीतिक विमर्श में

यह तथ्य ओझल है।

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सुरेंद्र किशोर 

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4 अक्तूबर, 1977 को सी.बी.आई.ने गिरफ्तार पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को दिल्ली के एडीशनल चीफ मेट्रोपाॅलिटन मजिस्ट्रेट आर.दयाल की अदालत में पेश किया।

 कोर्ट ने अभियोजन पक्ष से पूछा --‘‘सबूत कहां है ?’’

सी.बी.आई. के वकील ने कहा --‘‘एकत्र किया जा रहा है।’’

आर.दयाल ने श्रीमती गांधी को तुरंत बिना शर्त रिहा कर देने का आदेश दे दिया।

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गिरफ्तार इंदिरा गांधी के खिलाफ जब सी.बी.आई.(पहली नजर में सही लगने लायक )कोई सबूत पेश नहीं कर सकी तो अदालत ने उन्हें तुरंत बिना शर्त रिहा कर देने का आदेश दे दिया था।

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यदि आपके खिलाफ भी कोई सबूत नहीं है तो अदालत 

आपको पहले ही दिन रिहा कर देगी जिस तरह इंदिरा गांधी को रिहा कर दिया था।

यहां मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इंदिरा गांधी निर्दोष थीं।उनके मामले में हुआ यह था कि ऊपरी निदेश पर सी.बी.आई.इंदिरा गांधी को जल्द से जल्द जेल भिजवाना चाहती थी। 

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इसके विपरीत आज जैसे ही किसी नेता को अदालत जेल भेजती है,

प्रतिपक्षी दल आरोप लगाने लगते हंै कि मोदी-शाह ने बदले की भावना से जेल भेज दिया।

जबकि इंदिरा गांधी वाला उदाहरण सामने है।

  अदालत भी तभी किसी को जेल भेजती है, जब अभियोजन प़क्ष यानी पुलिस,सी.बी.आई.,ई.डी.या कोई अन्य एजेंसी प्रथम द्रष्ट्वा कुछ सबूत आरोपी के साथ-साथ कोर्ट में तत्काल पेश कर देती है।

  यानी,जांच एजेंसी किसी को गिरफ्तार करके सिर्फ कोर्ट में पेश कर सकती हैं,पर खुद जेल नहीं भेज सकती भले ऊपरी आदेश हो।

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इस कानूनी प्रक्रिया की मौजूदगी के बावजूद यदि कोई नेता सार्वजनिक तौर पर यह आरोप लगाता है कि सरकार ने जांच एजेंसी का इस्तेमाल करके फलां नेता को गलत तरीके से बदले की भावना से जेल भेज दिया तो आप क्या कहेंगे ?

क्या वैसा कहना अदालत की अवमानना नहीं है ?

क्या अदालत की मंशा पर सवाल उठाना नहीं है ?

क्या यह कहा जा रहा है कि अदालत ने सरकार के साथ मिलकर गैरकानूनी तरीके से आरोपी के खिलाफ षड्यंत्र किया जबकि उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं थे ?

  इसको लेकर अदालत की मानहानि का मुकदमा चल सकता है या नहीं, इस बारे में कानून विद् यहां इस मंच पर अपनी राय दे सकते हैं।

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3 अगस्त 24