सोमवार, 2 जून 2025

   घोषित इमरजेंसी बनाम ‘अघोषित इमरजेंसी’ !

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       सुरेंद्र किशोर

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प्रमुख कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने हाल ही में कहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले 11 साल से देश में ‘अघोषित इमरजेंसी’ लगा रखी है।

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अब आपको सन 1975-77 की इंदिरा सरकार द्वारा घोषित इमरजेंसी 

की एक छोटी झलक यहां दिखा रहा हूं।

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अब आप ही फैसला कर लीजिए कि सन 2025 और 

सन 1975 में कितना फर्क रहा।

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आज विभिन्न क्षेत्रों के अनेक राजनीतिक रूप से बेईमान या बौद्धिक रूप से अनजान लोग आए दिन यह कहते रहते हैं कि आपातकाल में जो कुछ हुआ था,वही सब या उससे से भी बुरा आज देश में हो रहा है।

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  क्या यह बात सही है ?

इस संबंध में, मैं पक्की जानकारियों के आधार पर इमरजेंसी (1975-77)की कुछ अनर्थकारी बातें व घटनाएं बताता हूं।

फैसला आपको करना है।

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1.-इमरजेंसी में (भारत सरकार के वकील) एटार्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट को साफ-साफ यह कह दिया था कि देश में लोगों के  ंमौलिक अधिकारों को, जिनमें जीने का अधिकार भी शामिल है,स्थगित कर दिया गया है।

 डे ने कोर्ट से यह भी कहा कि यदि हमारी पुलिस किसी की जान भी ले ले तो भी उस हत्या के खिलाफ आज अदालत की शरण नहीं ली जा सकती।

नीरेड डे की बात को उचित मानकर ‘‘ केंद्र सरकार से आतंकित’’ तब के सुप्रीम कोर्ट ने उस पर अपनी मुहर लगा दी।

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1.-देश में इमरजेंसी से पहले या बाद में क्या ऐसा कुछ कभी हुआ या हो रहा है ?

क्या अंग्रेजों के राज में भी ऐसा हुआ था कि लोगों के जीने का अधिकार तक छीन लिया गया हो ?

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2.-इमरजेंसी (1975-77) में मीडिया पर पूर्ण सेंसरशिप लागू कर दिया गया था।

तब अखबारों के संपादकीय विभागों में जो खबर,लेख, रिपोर्ट आदि छपने के लिए तैयार होते थे,उन्हें लेकर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति पहले प्रेस इंफोरमेशन ब्यूरो (भारत सरकार)के स्थानीय आॅफिस में जाते थे।

पी.आई.बी.के अफसर को उसे दिखाकर प्रकाशनार्थ सामग्री की काॅपी पर उससे मुहर लगवाते थे,तभी अखबारों में वह सामग्री छप पाती थीं।

कई सामग्री पी.आई.बी.छपने लायक नहीं समझता था तो उस पर मुहर नहीं लगाता था।

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2.-क्या इमरजेंसी से पहले या बाद में ऐसा कुछ हुआ ?

या हो रहा है ?

प्रतिपक्षी नेताओं के बयान कौन कहे, 1975-77 की उस ‘काल’ अवधि में उनके नाम तक अखबारों में नहीं छपते थे।

बीमारी के कारण इमरजेंसी में ही जेपी जब जेेल छूट

कर आए तो केंद्र सरकार ने मीडिया को निदेश दिया कि जेपी की किसी गतिविधि की खबर न छपे।यानी, उनके कहीं आने-जाने की खबर भी न छपे। वैसा हुआ भी।कुछ नहीं छपा। 

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3.-जयप्रकाश नारायण सहित एक लाख से अधिक प्रतिपक्षी राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को अनिश्चित काल तक के लिए जेलों में ठूंस दिया गया था।देश के 250 पत्रकारों को भी जेलोें में बंद कर दिया गया।

(खुद इन पंक्तियों का लेखक मेघालय में जाकर भूमिगत हो गया था।मेघालय में उन दिनों कांग्रेस की सरकार नहीं थी ।इसलिए वहां ‘इमरजेंसी के अत्याचार’ नहीं थे।)

असली इमरजेंसी में जिन्हें गिरफ्तार किया गया था,उन्हें अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ अदालत में अपील करने से भी रोक दिया गया था।

जब उन गिरफ्तारियों के खिलाफ देश भर में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण के कई मामले हाईकोटर््स होते हुए सुप्रीम कोर्ट गये तो सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया था कि 

गिरफ्तारियों के खिलाफ अदालतें सुनवाई नहीं कर सकतीं।

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3.-क्या इमरजेंसी से पहले और बाद में ऐसा कोई आदेश सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कभी आया ?(आज तो जेहादी आतंकी के लिए भी सुप्रीम कोर्ट आधी रात में भी खोल दी गयी थी।)

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 4.-1971 में रायबरेली लोक सभा क्षेत्र में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने संसोपा के राजनारायण को हराया।

राजनारायण ने चुनाव में भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोप सही पाते हुए प्रधान मंत्री की लोस की सदस्यता रद कर दी।

इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में चुनाव कानून की उन खास धाराओं को संसद से बदलवा दिया जिन धाराओं के तहत उन्हें अयोग्य करार दिया गया था।

इतना ही नहीं,उस संशोधन को पिछली तारीख से लागू करा दिया गया ताकि उसका लाभ इंदिरा गांधी को तुरंत मिल सके।

किसी कानून को पिछली तारीख से लागू करने की बात अजूबी थी।

आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट पिछली तारीख वाली बात को स्वीकार नहीं करता।पर,चूंकि मामला इंदिरा गांधी से संबंधित था,इसलिए डरे हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कोई एतराज नहीं किया था।

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4.-क्या इमरजेंसी से पहले या बाद में वैसा कुछ हुआ था ?

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जो लोग अब भी कहना चाहते हैं कि जो कुछ 1975-77 की इमरजेंसी में हुआ था,वह सब आज भी हो रहा है तो वे आज के ऐसे कोई उदाहरण दें।

कुछ अशिष्ट टी.वी.डिबेटरों की तरह इधर-उधर की बातें न करें।

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2 जून 25


मंगलवार, 27 मई 2025

      जब राजनीति में वैसे नेता थे !

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,     सुरेंद्र किशोर

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प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि 

‘‘राजनीतिक मतभेद अपनी जगह है।

लेकिन अगर मुझसे कोई यह पूछे मैं अपना वोट किसे दूंगा,तो मैं निश्चित रूप से यही कहूंगा कि मैं अपना कीमती वोट राममनोहर लोहिया को दूंगा।’’

  यह बात सन 1962 के आम चुनाव के समय की है जब  नेहरू और लोहिया एक दूसरे के खिलाफ फुलपुर

(उत्तर प्रदेश ) में लोक सभा चुनाव लड़ रहे थे।

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       एक प्रसंग बिहार का भी  

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सन 1957 में बिहार में कांगे्रस विधायक दल के नेता पद का चुनाव हो रहा था।

डा.श्रीकृष्ण सिंह और डा.अनुग्रह नारायण सिंह एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे।

कांटे का मुकाबला था।

फिर भी श्रीबाबू ने अपना वोट नहीं डाला।

किसी ने उनसे कारण पूछा तो 

उन्होंने कहा कि 

‘‘मैं वोट देता तो अनुग्रह बाबू को ही देता।’’

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      27 मई 25


 

    



सोमवार, 26 मई 2025

 जेहाद या सिंधु जल ?!

दोनों की सुविधा एक साथ नहीं मिलेगी।

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अच्छा अवसर है।

नये जमाने को देखते हुए पाकिस्तान को भी चाहिए कि वह 

सऊदी अरब की ही तरह खुद को बदले।

गैर मुस्लिमों के साथ मिल जुलकर रहिए।

हिन्दुओं का मन-मिजाज सर्व धर्म समभाव वाला है।उसका लाभ उठाइए।

आप अपने देश में भी भारत की तरह ही संपन्नता लाइए।इस 

काम में भारत से आपको मदद मिलेगी।

ऐसा युद्ध क्यों लड़ना जिसमें हार निश्चित है ?

इसलिए भारत में भी अशांति मत फैलाइए।

जेहाद का लक्ष्य छोड़िए।अब मध्य युग नहीं है।

पहले परमाणु बम की धमकी दे रहे थे।

कारगर नहीं हुआ।अब सांस रोकने की धमकी दे रहे हैं।

वह भी कामयाब नहीं होगा।

इस बार एक मोदी से आपको पाला पड़ा है।

वह तौल कर कीमत वसूलेगा।

यदि आप जेहाद पर अड़े रहेंगे तो आपको सिंधु जल कभी नहीं मिलेगा।

जो होना होगा, इस बार होकर रहेगा।

टुकड़ों में तो आप सांस रोकते ही रहे हैं।

26 की सांस पहलगाम में आपने हाल में ही रोका।

1947 से अब तक जेहादी हिंसा में करीब 20 हजार भारतीयों की जानें आप ले चुके हैं।

अब भारतीयों को भी टुकड़ों में मरना मंजूर नहीं।

भारत अब न तो 1947 वाला है,न 1965 वाला और न ही 2008 वाला।

मोदी सरकार ने सेना को भी काफी मजबूत कर रखा है।

भारत सरकार के फंड अब बड़े -बड़े घोटालों में नहीं जा रहे हैं।

विकास और सुरक्षा में लग रहे हैं।

भारत की अधिकतर जनता भी उसके साथ है।

आपरेशन सिन्दूर के बाद मोदी का समर्थन बढ़ा है।

कोई सर्वे करवा सकता है।

भारतीय सेना ढाई मोरचों पर

भी एक साथ लड़ सकती है।

यदि नहीं मानिएगा तो अंतिम फैसला इस बार हो ही जाएगा।

वैसे शांति सबके लिए सही मंत्र है।

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24 मई 25


 फेसबुक वाॅल पर किसी मित्र के साथ बतकुचन करके संबंध खराब कर लेने से बेहतर है कि अनफं्रेड कर दिया जाये ताकि कहीं मुलाकात हो झेंपना न पड़े।

किसी ने ठीक ही कहा है--‘‘बहस हार जाना बेहतर है, मित्र हारने की अपेक्षा।’’ 


 याद है ‘शोले’ फिल्म वाले ठाकुर 

साहेब का राम गढ़ ?

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सुरेंद्र किशोर 

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जिस काल्पनिक गांव राम गढ़ में शोले फिल्म की शूटिंग हुई थी,उसके बगल में है वास्तविक रामनगर।

 रामनगर पहले दक्षिण बंगलोर जिले में पड़ता था।

2007 की गैर कांग्रेसी कर्नाटका सरकार ने दक्षिण बंगलोर जिले का नाम बदल कर रामनगर रख दिया।

  अब की मौजूदा कांग्रेसी सिद्धारमैया सरकार ने केंद्र की मोदी सरकार के विरोध के बावजूद रामनगर जिले का नाम फिर से बंगलुरू दक्षिण कर दिया है।

कहते हैं कि यह काम कांग्रेस के ‘‘ताकतवर मुस्लिम वोट बैंक’’ के दबाव में आकर किया गया।

 उस वोट बेंक को राम का नाम बर्दास्त नहीं था ! याद रहे कि

पिछले कर्नाटका विधान सभा चुनाव में देवगौड़ा की पार्टी को भी पूरी तरह छोड़कर कर्नाटका के मुसलमानों ने अपना एकमुश्त वोट कांग्रेस को दे दिया था।स्वाभाविक है कि वे उसकी कीमत वसूल रहे हैं।

इससे पहले कर्नाटका सरकार के ठेके में 4 प्रतिशत मुसलमानों का हिस्सा रिजर्व कर दिया गया है।

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इधर जयपुर (राजस्थान) में जिन मिठाइयों के नाम के साथ ‘पाक’ शब्द जुड़ा हुआ था,उसे बदल कर यानी पाक की जगह ‘श्री’ शब्द जोड़ दिया गया।कहा गया कि पहलगाम में जेहादी हमले के बाद भारतीयों में बढ़े आक्रोश की मार मिठाई को झेलनी पड़ी है।

स्वामी रामदेव का भी एक लोकप्रिय प्रोडक्ट है--बादाम पाक-एक फूड सप्लीमेंट।

मैं उसका सेवन करता हूं।क्या राम देव जी भी बादाम से पाक को डिलिंक करेंगे ?

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भूली बिसरी याद उस ‘राम गढ’़ की

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  आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस के बुलावे पर देश भर के हम कुछ चुने हुए समाजवादी कार्यकर्ता और नेता बंगलोर (उस समय तक वह बंगलुरू नहीं हुआ था।)गये थे।

बंगलोर के होटल में कई दिनों तक रहे।

शाम के अंधेरे में जार्ज के साथ हम एक ‘‘खास तरह की टंे्रनिंग’’लेने के लिए उसी पहाड़ी पर जाते थे, जिस पर गब्बर सिंह यानी अमजद खान बैठा करता था।

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वहां हमें बताया गया कि धर्मेंद्र -अमिताभ आदि कलाकार बंगलोर के होटल में रहते थे और शूटिंग के लिए हर सुबह आॅटो रिक्शे से 50 किलोमीटर दूर रामगढ़ जाते थे।(उस समय तक उनमें कार लायक संपन्नता नहीं आई थी।)

तब वहां यह जानना और देखना रोमांचक काम लगा था।वैसे हमलोग भी रोमांचक काम के लिए ही वहां रात मंे जाते थे।

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जिले का नाम बदलने का अधिकार किसे हैं ?

केंद्र को या राज्य सरकार को।

इस बार के परिवर्तन के बाद शायद यह विवाद आगे बढ़ सकता है।

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25 मई 25

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और अंत मंे

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 क्या आपने ध्यान दिया ?

राजस्थान के किसी जिला मुख्यालय का नाम इलाहाबाद,मुजफ्फर पुर ,अली गढ़ ,आजम गढ,़ फतेहपुर या गाजीपुर जैसा नहीं है ?

शुक्र है कि कर्नाटका की सरकार ने दंक्षिण बंगलुरू की जगह टीपू सुल्तान नगर नहीं रखा।उसे इस बात के लिए तो धन्यवाद दे ही दीजिए। 



शुक्रवार, 23 मई 2025

 


1962 में चीन के हाथों पराजय के बाद 

नेहरू की कैनेडी के समक्ष निरीहता-दयनीयता

 सामने आ गई थी।

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 ट्रम्प के समक्ष मोदी को भी निरीह-

दयनीय दिखाने की कहानी कांग्रेस गढ़ रही है 

ताकि तब की अपेक्षा आज की विदेश नीति को 

बेहतर न माना जाये।

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सुरेंद्र किशोर

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15 मई 25 को ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कह दिया था कि ‘‘मैंने पाकिस्तान और भारत के बीच मध्यस्थता नहीं कराई।बस मदद की है।’’

    विदेश मंत्री एस.जय शंकर ने 22 मई, 25 को कहा कि यद्यपि अमेकिन नेता दोनों देशों के संपर्क में थे।किंतु सैनिक कार्रवाई को रोकने के लिए नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच सीधी बातचीत हुई थी।

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    जवाहरलाल नेहरू की दयनीयता

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 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया तो सोवियत संघ ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया कि एक मित्र और एक भाई के बीच के झगड़े में हम नहीं पड़ेंगे।

  (वैसे ए.जी.नूरानी के रिसर्च से बाद में यह पता चल गया था कि सोवियत संघ की पूर्व सहमति व उकसावे के बाद ही चीन ने भारत पर हमला किया था।)

 चीन के हाथों मिल रही पराजय की पृष्ठभूमि  में हतप्रभ  नेहरू ने मदद के लिए अमेरिका की ओर रुख किया था।

   उन दिनों बी.के.नेहरू अमेरिका में भारत के राजदूत थे।

  नेहरू ने अमरीकी राष्ट्रपति जाॅन एफ.कैनेडी को लगातार कई पत्र लिखे।

    नेहरू ने 19 नवंबर 1962 को कैनेडी को लिखा था कि ‘‘न सिर्फ हम लोकतंत्र की रक्षा के लिए बल्कि इस देश के ही अस्तित्व की रक्षा के लिए भी चीन से हारता हुआ युद्ध लड़ रहे हैं जिसमें आपकी तत्काल सैन्य मदद की हमें सख्त जरूरत है।’’ 

   इससे पहले जवाहर लाल नेहरू ने अपनी अदूरदर्शी व  अव्यावहारिक नीति के तहत चीन को भाई और सोवियत संघ को मित्र करार दे रखा  था।(जबकि नेहरू को यह समझना चाहिए था कि साम्यवादी विस्तारवादी देश और इस्लामिक जेहादी देश भारत का वास्तविक मित्र नहीं बन सकता था।भारत का मित्र बनने लायक तो तब भी इजरायल ही था।पर,मुस्लिम वोट बैंक के प्रभाव में  कांग्रेसी सरकारों ने दशकों तक इजरायल को राजनयिक मान्यता तक नहीं दी थी।)

 कैनेडी से नेहरू की एक पिछली मुलाकात के बारे में खुद कैनेडी ने एक बार कहा था कि ‘‘नेहरू का व्यवहार काफी ठंडा रहा।’’

  पर जब चीन ने 20 अक्तूबर 1962 को भारत पर हमला करके हमारी हजारों-हजार  वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया तो नेहरू ने अमेरिका को त्राहिमाम संदेश दिया।

    19 नवंबर 1962 को जवाहर लाल नेहरू ने भारी तनाव,चिंता और डरावनी स्थिति के बीच  कैनेडी को कुछ ही घंटे के बीच  दो -दो चिट्ठियां लिख दीं।

इन चिट्ठियों को वर्षों तक गुप्त ही रखा गया था ताकि नेहरू की दयनीयता देश के सामने न आ पाये।

पर बाद में उनकी फोटोकाॅपी भारतीय अखबार में छप गई।

    पर, कल्पना कीजिए कि यदि अमेरिका ने 1962 में पाक को भारत के खिलाफ युद्ध शुरू करने से नहीं रोका होता तो क्या नतीजा होता ?(तब संभवतः अमेरिका को यह खबर मिल गई थी कि चीन के साथ-साथ पाक भी हमला करने वाला था।) 

संभवतः अमरीका के इसी कदम के बाद चीन ने तब एकतरफा युद्ध विराम कर दिया था।

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23 मई 25


बुधवार, 21 मई 2025

 


पत्रकारिता के ‘स्वर्ण शब्द’

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सुरेंद्र किशोर

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‘मेनचेस्टर गार्जियन’ के संपादक और ब्रिटिश 

सांसद सी.पी.स्काॅट ने करीब सौ साल पहले ही यह कह दिया था कि 

‘‘तथ्य पवित्र है, किंतु टिप्पणी के लिए आप स्वतंत्र हैं।’’

(नोट-यानी, कोई व्यक्ति किसी पत्रकार की तथ्यात्मक गलती पर तो सवाल उठा सकता है।किंतु उसके विश्लेषण या विचारों पर नहीं।अन्यथा,वह पत्रकारिता की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप माना जाएगा।) 

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 नब्बे के दशक में मैंने पटना के दैनिक अखबार ‘‘द इंडियन नेशन’’ में सिंगापुर डेटलाइन से बी.बी.सी. के उप प्रधान की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी पढ़ी थी।

उनसे पूछा गया था कि बी.बी.सी. की साख का राज 

क्या है ?

उन्होंने बताया कि 

  ‘‘यदि दुनिया के किसी देश में कम्युनिज्म आ रहा है तो हम यह सूचना लोगों को देते हैं कि आ रहा है।

उसे रोकने की कोशिश नहीं करते।

दूसरी ओर, यदि किसी देश से कम्युनिज्म जा रहा है तो हम रिपोर्ट करते हैं कि जा रहा है।

हम उसे बचाने की भी कोशिश नहीं करते।

यही हमारी साख का राज है।’’

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(नोट-आज का बी. बी. सी. नब्बे के दशक वाली अपनी नीति पर कायम है या नहीं, यह मुझे नहीं मालूम।)

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सन 1983 में एक मुलाकात में नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने एक खास संदर्भ में मुझसे कहा था,

‘‘ आप प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ जितनी भी कड़ी खबर लाइए,मैं उसे जरूर छापूंगा।

किंतु इंदिरा गांधी में कई गुण भी हैं।मैं उन्हें भी छापूंगा।’’

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(नोट-दरअसल जनसत्ता ज्वाइन करने के बाद मैं शिष्टाचार मुलाकात के लिए माथुर साहब के आॅफिस में गया था।उन्होंने मुझसे पहला सवाल यही किया--आपने नवभारत टाइम्स ज्वाइन क्यों नहीं किया ?मैंने उनसे कहा कि आपका अखबार दब्बू है।इंदिरा गांधी के खिलाफ नहीं लिख सकता।

उसके जवाब में रज्जू बाबू ने कहा --

‘‘नो, सुरेंद्र जी,यू आर मिस्टेकन।मेरा अखबार दब्बू नहीं है।पर, अभियानी भी नहीं है।’’उसके बाद उन्होंने वह बात कही जो मैं ऊपर लिख चुका हूं।)

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बात तब की है जब मैं ‘जनसत्ता’ का बिहार संवाददाता था।

चंद्र शेखर सिंह बिहार के मुख्य मंत्रंी थे।मेरे खिलाफ शिकायत करने जन संपर्क विभाग के निदेशक हमारे संपादक प्रभाष जोशी से मिलने दिल्ली गये।

उन्होंने कहा--आपके संवाददाता एकतरफा लिखते हैं।मुख्य मंत्री से नहीं मिलते।

प्रभाष जोशी--क्या गलत भी लिखते हैं ?

निदेशक -नहीं,गलत तो नहीं लिखते।किंतु पुरानी -पुरानी राजनीतिक कहानियां लिखते रहते हैं।

जोशी जी--आप ऐसे दल के मुख्य मंत्री की सिफारिश करने आये हैं,जिस दल की प्रधान मंत्री कहती हैं कि मैंने एन.टी.रामाराव सरकार की बर्खास्तगी की खबर टेलिप्रिंटर पर देखी।

उसके बाद दोनों के बीच का संवाद समाप्त हो गया।

(नोट-निदेशक महोदय पूरे पेज का सरकारी विज्ञापन लेकर गये थे।जोशी जी के आॅफिस से निकलते समय वह विज्ञापन भी उनके पास ही रहा जो पटना लौट आया।) 

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20 मई 25