रविवार, 3 फ़रवरी 2019

बिहार के सारण जिले के एक किसान परिवार को जानता हूं जिसके घर के एक व्यक्ति को
1976 में 125 रुपए महीने पर सरकारी शिक्षक की नौकरी मिली थी।उस परिवार के लिए बाहरी आय का वह पहला जरिया था।
उस मध्यम किसान के घर कुछ अनाज तो थे,पर नकदी नहीं।
फलस्वरूप  125 रुपए की मासिक आय रेगिस्तान में वर्षा की फुहार की तरह साबित हुई थी। 
क्योंकि  नमक, तेल, दियासलाई, लेमचूस तथा इस तरह के छोटे -मोटे सामान के लिए अनाज लेकर दुकान पर जाना बंद हो गया था।
आज भी उस किसान की हालत यह है कि उसकी सारी जमीन में फसल नहीं लगायी जाती ।क्योंकि अधिक ‘खेती’ यानी अधिक घाटा।
दरअसल आजादी के बाद से ही सरकारों ने अधिकतर किसानों को अपने पैरों पर खड़ा होने ही नहीं दिया।
आज सीमांत किसान के  लिए  6000 रुपए सालाना का कितना महत्व है,यह बात इस देश के अधिकतर नेता व बुद्धिजीवी -विश्लेषक नहीं समझ पाते क्योंकि वे सरजमीन से कटे हुए हैं या पूर्वाग्रहग्रस्त हैं।
छह हजार तो  शुरूआत है।इसे समय के साथ बढ़ना ही है।
यदि सरकार कठोर  ईमानदारी से टैक्स वसूले तो किसानों तथा समाज के दूसरे कमजोर वर्ग को राहत देने के लिए पैसों की कमी नहीं रहेगी।
पहले से स्थिति सुधरी है,फिर आज भी
टैक्स चोरी खूब हो रही है।
यदि सरकार देश के बाजारों में अपने आर्थिक खुफिया दस्ता भेजे तो भारी  टैक्स चोरी का उद्भेदन किया जा सकता है।
खैर इस बीच कांग्रेस कह रही है कि हम सत्ता में आएंगे तो अपनी न्यूनत्तम आय योजना के तहत हर साल 3 लाख करोड़ रुपए खर्च करेंगे।
 यदि कांग्रेस अगली बार सत्ता में आए तो फुहारों की जगह राहत की बरसात कर दे।लोग  खुशी से झूम उठेंगे।
पर उसके लिए उसे टूजी,कोल घोटाला,काॅमनवेल्थ तथा इस तरह के अन्य घोटालों को रोक कर ईमानदारी से टैक्स वसूलने और सरकारी खजाने की रक्षा का काम करना होगा।
  फिलहाल मौजूदा सरकार के ‘वोट बटोरू बजट’ देख कर 
जलने की जगह वह आत्म मंथन करे।उधर  मोदी सरकार कह रही है कि अगले महीने के अंत तक  सीमांत किसानों के खातों में 2000 रुपए चले जाएंगे।
 ऐसी सरकारी राहतों से किस तरह गरीब लोग खुश होते हैं,उसका एक उदाहरण 2010 में बेगूसराय से मिला मिला था।
 बिहार विधान सभा का चुनाव होने वाला था।
नीतीश कुमार के गत पांच साल के काम कसौटी पर थे।
बेगूसराय के एक पत्रकार ने मुझे एक दिलचस्प प्रकरण सुनाया।
लालू प्रसाद के वोट बैंक के दायरे के एक परिवार की महिला एक दिन रो रही थी।
पत्रकार ने कारण पूछा।महिला ने बताया कि मेरे पति ने पंजाब से फोन किया है कि तुम लालू जी की पार्टी को ही वोट देना।
मैंने उनसे  कहा कि इस सरकार ने हमारे बच्चों को साइकिल,पोशाक छात्रवृत्ति दी है।लालू जी की सरकार ने तो हमारे बच्चे को एक टाॅफी भी नहीं दी थी।
  इस पर पति ने डांटते हुए कहा कि लालू जी ने हमें सीना तान कर चलना सिखाया।सम्मान से जीने का रास्ता बताया और उन्हें वोट नहीं दोगी ?
इस पर पत्नी चुप हो गयी।
पर वह द्विविधा में थी।उसने पत्रकार से कहा कि हमारी आत्मा हमें माफ नहीं करेगी यदि हम लालू जी को वोट देंगे।पर पति की बात भी माननी है।
  यह है छोटी सी भौतिक उपलब्धि का असर !
याद रहे कि राजग 2010 में भी बिहार में विजयी रहा था।
  यदि कांग्रेस कभी केंद्र में सत्ता में आए और  3 लाख करोड़ रुपए वाली योजना को लागू करे तो उसे आगे के चुनाव में उसका भारी लाभ मिलेगा।पर अभी तो उसे तमाशा ही देखना पड़ेगा !!!


शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

 बम्बई के टैक्सी चालकों पर जार्ज फर्नांडिस का कितना असर था,उसका नमूना मुझे सत्तर के दशक में मिला।
तब मैं बिहार के समाजवादी नेता कपिलदेव सिंह के साथ बम्बई गया था।
 वी.टी.से हमलोग प्रसाद बिल्डिंग गए जहां समाजवादी नेता डा.जी.जी.पारीख का फ्लैट है।हमें वहीं रुकना था।
टैक्सी में हमलोग जार्ज के बारे में बातें कर रहे थे।
टैक्सी से उतरने के बाद मैंने असावधानीवश अपना सूटकेस गाड़ी में ही छोड़ दिया।
 फ्लैट में पहुंचने के बाद जब यह एहसास हुआ तो मैं बहुत चिंता में पड़ गया।बंबई से हमलोगों को आगे भी जाना था।
इस बीच घंटी बजी और गार्ड के साथ एक टैक्सी वाला मेरा बैग लेकर हाजिर था।
मैंने जब उसे धन्यवाद दिया तो उसने कहा कि इसमें धन्यवाद की क्या बात है  ?
तुम लोग गाड़ी में जार्ज के बारे में बात कर रहे थे,इसलिए लगा कि तुम उसके प्रशंसक हो, इसलिए तुम्हारा सामान मैं इधर- उधर कैसे होने देता ?

बुधवार, 30 जनवरी 2019



ज्योतिषी नवीन खन्ना ने 2004 में भविष्यवाणी की थी कि 47 साल की उम्र में प्रियंका गांधी प्रधान मंत्री बनेंगी।
जब प्रियंका को ठीक 47 साल की उम्र में कांग्रेस का महा सचिव बनाया गया तो उस खन्ना की भविष्यवाणी याद आई।
याद रहे कि खन्ना ने नरेंद्र मोदी के उत्थान की भविष्यवाणी 2009 में ही कर दी थी।
  क्या यह मात्र संयोग है कि कुछ ही महीने बाद लोक सभा का चुनाव होने वाला है ? या कुछ और बात है ?
याद रहे कि तमिलनाडु के ज्योतिषी यागवा ने तो 1993 में ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि प्रियंका गांधी प्रधान मंत्री बनेगी।वह खबर 18 नवंबर 1993 के अखबार में छपी थी।
वैसे पिछले अनुभव बताते हैं कि आम तौर पर ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां सही साबित नहीं होतीं।
पर कुछ की भविष्यवाणियां सही भी साबित हो जाती हैं।क्या नवीन खन्ना उन्हीें थोड़े से ज्योतिषियों में एक हैं ?
15 मार्च 2004 के इंडिया टूडे में  प्रकाशित नवीन खन्ना की भविष्यवाण्यिों में यह भी कहा गया था कि सोनिया गांधी कभी प्रधान मंत्री नहीं बनेंगी,बल्कि पी.वी.नरसिंह राव मंत्रिमंडल में रहा व्यक्ति प्रधान मंत्री होगा।
यह बात तब सही साबित हो गयी  जब मन मोहन सिंह 2004 में प्रधान मंत्री बने।
हालांकि पत्रिका के उसी अंक में छपी नवीन खन्ना की कुछ अन्य भविष्यवाणियां सही साबित नहीं हुईं।
मई, 2009 में ही नवीन खन्ना ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि 2012 में गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी का उत्थान होगा।@टाइम्स आॅफ इंडिया-11 मई 2009@
यह सच साबित हुआ।
 बोफर्स तोप सौदा घोटाला विवाद की पृष्ठभूमि में सन 1989 में लोक सभा चुनाव हुआ था।तब राजीव गांधी प्रधान मंत्री थे।
चुनाव से ठीक पहले देश के दस प्रमुख ज्योतिषियों की भविष्यवाण्यिां ‘इलेस्टेटेेड वीकली आॅफ इंडिया’ ने छापी थी।
दस में से सिर्फ एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि वी.पी.सिंह प्रधान मंत्री बनेंगे।
अन्य नौ ज्योतिषी राजीव गांधी के दुबारा सत्ता में आने की भविष्यवाणी कर रहे थे।
याद रहे कि चुनाव के बाद वी.पी.सिंह प्रधान मंत्री बने थे।
 तब इन ज्योतिषियों के विपरीत अधिकतर चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में कांग्रेस की हार का अनुमान लगाया गया था।
  यानी, ओपिनियन पोल के काम में लगे लोगों का पूर्वानुमान 
ज्योषियों की अपेक्षा अधिक सटीक होता रहा है।
फिर भी अधिकतर छोटे -बड़े नेतागण चुनाव से ठीक पहले ज्योतिषियों के यहां चक्कर लगाने लगते हैं।
  आम लोगों में भी ज्योतिषियों के प्रति आकर्षण देखा जाता है।ऐसे में जब किसी ज्योतिषी की कोई एक भविष्यवाणी भी सही हो जाती है तो उसकी ओर लोगों की उत्सुकता भी काफी बढ जा़ती है।
 याद रहे कि नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह के बारे में नवीन खन्ना की भविष्यवाणी सही साबित हो चुकी है।
 अब जरा कुछ दूसरे ज्योतिषियों द्वारा  2004 में की गई भविष्यवाणियों पर भी गौर कर लें।
दिल्ली के मशहूर ज्योतिषी  एल.डी.मदान ने 2004 के चुनाव से पहले यह भविष्यवाणी की थी कि अटल बिहारी वाजपेयी फिर प्रधान मंत्री बनेंगे।पर वे नहीं बने।
 यानी मदान जी गलत साबित हुए।
मुम्बई की ज्योतिषी वसुधा वाघ ने कहा कि 2004 के लोक सभा चुनाव के बाद कांग्रेस के समर्थन से तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी।
पर कांग्रेस के मन मोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी।यानी वाघ की भविष्यवाणी आंशिक रूप से ही सही साबित हुई।
कोलकाता की ज्योतिषी कुसुम भंडारी की सिर्फ यह भविष्यवाणी सही साबित हुई कि चंद्र बाबू नायडु के दुबारा सत्ता में आने की संभावना नहीं है।उनकी बाकी अधिकतर भविष्यवाणियां गलत साबित हुईं।
बंगलूर की ज्योतिषी गायत्री देवी वासुदेव की यह भविष्यवाणी सही साबित हुई कि ‘चूंकि भाजपा अष्टम शनि में है, इसलिए पार्टी एक महत्वपूर्ण शक्ति गंवा देगी।’
याद रहे कि अटल सरकार 2004 में सत्ता गंगवा बैठी।
पेनामल संजीवन नेहरू नामक ज्योतिषी ने तो 2004 में यह हास्यास्पद भविष्यवाणी कर दी थी कि ‘भाजपा अध्यक्ष एम.वेंकैया नायडु प्रधान मंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी की जगह लेंगे।’
उन्हीं दिनों तंत्र विद्या की अध्येता मां प्रेम उषा ने भविष्यवाणी की थी कि अटल बिहारी वाजपेयी दोबारा प्रधान मंत्री बनेंगे और उनकी सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी।’
पर ऐसा नहीं हो सका।
यानी मां प्रेम उषा की तंत्र विद्या ने उनका साथ नहीं दिया।
अहमदाबाद के ज्योतिषी सनत कुमार दयाशंकर शास्त्री ने कहा था कि ‘अगले साल जुलाई या अगस्त में अटल बिहारी वाजपेयी लालकृष्ण आडवाणी के लिए रास्ता बनाएंगे और आडवाणी को जबरदस्त राजनीतिक शक्ति मिलेगी।’
यह भी न हो सका।
अब जरा 2013 की कुछ भविष्यवाणियों पर नजर डालें।
नवंबर, 2013 में पंडित देवेंद्र भट्ट ने कहा कि ‘आगामी चुनाव के बाद देश को अस्थिर सरकार मिलेगी।’
पर ऐसा नहीं हुआ।यानी भट्ट साहब फेल हुए।
पर, बेजान दारूवाला ने कहा कि मेरे ज्योतिषी पुत्र नस्तूर दारूवाला का दृढ विश्वास है कि ‘भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ही होंगे।’यानी दारूवाला पास हुए।
अब सवाल है कि ज्योतिष विद्या और तंत्रशास्त्र पर कितना विश्वास किया जाए ?
क्या यह किसी अंधे द्वारा तीर चलाए जाने जैसी बात है।पता नहीं।पर मेरा अपना अनुभव यह है कि नाड़ी ज्योतिषी अपेक्षाकृत  कुछ अधिक सटीक  भविष्यवाणियां करते हैं।
 @फस्र्टपोस्ट हिन्दी में प्रकाशित@


सुदर्शन के नाम से था रिजर्वेशन ,पटना स्टेशन पर लुंगी और लाल गमछे में पहुंचे थे जार्ज--सुरेंद्र किशोर


सन 1977 में मुजफ्फर पुर से सांसद बनने से पहले से ही जार्ज फर्नांडिस का बिहार से विशेष लगाव था।
इसके कई कारण थे।
वे सोशलिस्ट पार्टी के साथ -साथ  आॅल इंडिया रेलवेमेन्स फेडरेशन के भी अध्यक्ष थे।
 बिहार और उत्तर प्रदेश में समाजवादियों का पहले से ही जनाधार रहा ।इस कारण भी जार्ज की यहां सक्रियता थी।
जार्ज फर्नांडिस नई दिल्ली से प्रकाशित चर्चित  साप्ताहिक पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ के प्रधान संपादक थे जो बिहार में भी खूब पढ़ा जाता था।
 प्रतिपक्ष को आप ‘दिनमान’ और ‘ब्लिट्ज’ का मिश्रण कह सकते हैं। वह पार्टी का पत्र नहीं था भले जार्ज उसके प्रधान संपादक थे।वह पत्रिका गैर समाजवादी बुद्धिजीवियों में भी प्रचलित थी।
 उस पत्रिका के सिलसिले में जार्ज फर्नांडिस से मेरी मुलाकात 1972 में राजनीति प्रसाद ने कराई थी।
राजनीति ने उनसे कहा कि सुरेंदर  अच्छा लिखता है,आप इसे संवाददाता रख लीजिए।उन्होंने रख लिया।
  तब से 1977 तक मैंने जार्ज के बिहार से लगाव को करीब से  देखा।बाद में तो मैं मुख्य धारा की पत्रकारिता में आ गया और जार्ज से भी वैसा ही संबंध रह गया  जैसा एक पत्रकार का एक नेता से रहता है।
खैर, आपातकाल के भूमिगत आंदोलन में जार्ज के निदेश पर बिहार में बहुत जोरदार काम हुए थे।डा.विनयन और उनके साथियों ने उसे अंजाम दिया था।
1977 में जब लोक सभा चुनाव की घोषणा हुई तो उस समय जार्ज तिहाड़ जेल में थे।
उनके दो दर्जन साथियों के साथ उन पर बड़ौदा डायनामाइट षड्यंत्र केस के सिलसिले में देशद्रोह का मुकदमा चल रहा था।
उन्होंने जेल से ही नामांकन पत्र भरा और वे भारी मतों से जीते।
1980 तथा बाद में भी बिहार से सांसद बनते रहे।
   जब 25 जून, 1975 को जब देश में आपातकाल लगा तो उस समय जार्ज फर्नांडीस ओडिशा में थे। अपनी पोशाक बदल कर 5 जुलाई में जार्ज  पटना आये और तत्कालीन समाजवादी विधान पार्षद रेवतीकांत सिंहा के पटना के आर.ब्लाक स्थित सरकारी आवास में टिके ।
  बिहार के कई समाजवादी नेता उनसे मिले।
उनके पटना छोड़ते समय की कहानी सनसनीखेज किंतु रोचक है।याद रहे कि पुलिस उन्हें बेचैनी से खोज रही थी और वे भूमिगत हो गए थे।
उससे पहले जार्ज  देशव्यापी  रेलवे हड़ताल के जरिए केंद्र सरकार की नींद उड़ा चुके थे,इसलिए भी जार्ज पर सरकार की विशेष नजर थी।उसे लगता था कि जार्ज कोई गड़बड़ न कर दे।
शाम की गाड़ी से जार्ज को पटना से इलाहाबाद जाना था।
रेलवे यूनियन के स्थानीय नेता गण उनकी मदद में तैनात थे।
सुदर्शन नाम से ऊपरी बर्थ पर रिजर्वेशन हुआ।
 मैंने जार्ज को पटना स्टेशन जंक्शन पहुंचाया।
जार्ज लुंगी और खादी का कुत्र्ता पहने थे और लाल गमछा लिए हुए थे।
हाथ में जूट का थैला था जिसमें कागज थे।
स्टेशन पहुंच कर जार्ज प्लेटफाॅर्म की फर्श पर बैठ गए।बेंच पर नहीं बैठे।वे दिखाना चाहते थे कि वे कोर्ट- कचहरी के काम से पटना आए किसान थे।
  स्टेशन में जब गाड़ी प्रवेश कर रही थी तब अचानक पूरे स्टेशन की बिजली काट दी गयी।
अंधेरे में ही जार्ज ट्रेन में सवार हुए।ऊपर की अपनी सीट पर जाकर लेट गए।उन्होंने मुझसे कहा कि ‘मुझे उतरने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि मैं छह -सात घंटे तक पेशाब रोक सकता हूं।ंं’
उतरने पर पहचान लिए जाने का खतरा जो था।जब गाड़ी खुलकर आगे बढ़ गई तभी स्टेशन की बिजली आॅन की गयी।बाद में  रेलवे यूनियन के एक नेता ने बताया कि यह पहले से तय था।
  खैर जार्ज जनता पार्टी से होते हुए जनता पार्टी एस ,जनता दल और समता पार्टी में रहे।
 समता पार्टी के प्रारंभिक दिनों में इसे खड़ा करने में नीतीश कुमार के साथ -साथ जार्ज की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
 जार्ज ने केंद्रीय मंत्री रहते हुए अन्य स्थानों के साथ- साथ अपने चुनाव क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण कार्य करवाए।
जार्ज तो राष्ट्रीय नेता थे,पर बिहार में भी उन्होंने अपने समर्थकों और साथियों को एक  बड़ा समूह  तैयार किया था।उनमें सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे अपने समर्थकों की बातें ध्यान से सुनते थे।इससे कार्यकत्र्ताओं को संतोष मिलता था।
@--प्रभात खबर -बिहार संस्करण-30 जनवरी 2019@

जॉर्ज फर्नांडिस : जान हथेली पर लेकर इमरजेंसी का मुकाबला किया था


इमरजेंसी में ‘न्यूजविक’ ने भारत पर एक स्टोरी की थी। उस स्टोरी के साथ जयप्रकाश नारायण और जॉर्ज फर्नांडिस की तस्वीरें थीं। पत्रिका के अनुसार भारत में दो तरह से आपातकाल के खिलाफ संघर्ष हो रहा है। जेपी का अहिंसक तरीका है और जॉर्ज फर्नांडिस का डाइनामाइटी।

शब्द भले डायनामाइटी न था, पर आशय गैर अहिंसक होने का था। जेपी, जॉर्ज के तरीके से असहमत थे। आपातकाल में जॉर्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट षड्यंत्र केस चला।
जेल में उन्हें व उनके साथियों को यातनाएं दी गयी थीं। मुकदमा तब उठा जब 1977 में मोरारजी की सरकार बनी।

25 जून, 1975 को जब देश में आपातकाल लगा तो उस समय जॉर्ज फर्नांडीस ओडिशा में थे। अपनी पोशाक बदलकर 5 जुलाई को जॉर्ज पटना आये और तत्कालीन समाजवादी विधान पार्षद रेवतीकांत सिन्हा के पटना के आर. ब्लॉक स्थित सरकारी आवास में टिके।


इन पंक्तियों का लेखक भी उनसे मिला जो उन दिनों जॉर्ज द्वारा संपादित चर्चित साप्ताहिक पत्रिका 
‘प्रतिपक्ष’ का बिहार संवाददाता था। जॉर्ज दो—तीन दिन पटना रहकर इलाहाबाद चले गये।

बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेता लाड़ली मोहन निगम को इस संदेश के साथ पटना भेजा कि वे मुझे और शिवानंद तिवारी को जल्द विमान से बंगलुरू लेकर आयें। शिवानंद जी तो उपलब्ध नहीं हुए। पर मैं निगम जी के साथ मुम्बई होते हुए बंगलुरू पहुंचा। वहां जॉर्ज के साथ तय योजना के अनुसार रामबहादुर सिंह, शिवानंद तिवारी, विनोदानंद सिंह, राम अवधेश सिंह और डॉ. विनयन को लेकर मुझे कोलकाता पहुंचना था।

पटना लौटने पर मैंने उपर्युक्त नेताओं की तलाश की। पर इनमें से कुछ जेल जा चुके थे या फिर गहरे भूमिगत हो चुके थे। सिर्फ डॉ. विनयन उपलब्ध थे। उनके साथ मैं धनबाद गया।

याद रहे कि आपातकाल में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक नेताओं-कार्यकर्ताओं पर सरकार भारी आतंक ढा रही थी। राजनीतिककर्मियों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना तक कठिन था।भूमिगत जीवन जेल जीवन की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद था।

धनबाद में समाजवादी लाल साहेब सिंह से पता चला कि राम अवधेश तो कोलकाता में ही हैं तो फिर हम कोलकाता गये। वहां जॉर्ज से हमारी मुलाकात हुई। पर वह मुलाकात सनसनीखेज थी।

जॉर्ज ने दक्षिण भारत के ही एक गैरराजनीतिक व्यक्ति का पता दिया था। उस व्यक्ति का नाम तीन अक्षरों का था। जॉर्ज ने कहा था कि इन तीन अक्षरों को कागज के तीन टुकड़ों पर अलग -अलग लिखकर तीन पाॅकेट में रख लीजिए ताकि गिरफ्तार होने की स्थिति में पुलिस को यह पता नहीं चल सके कि किससे मिलने कहां जा रहे हो। यही किया गया। पार्क स्ट्रीट के एक बंगले में मुलाकात हुई। दक्षिण भारतीय सज्जन ने कह दिया था कि बंगले के मालिक के कमरे में जब भी बैठिए, उनसे हिन्दी में बात नहीं कीजिए। अन्यथा उन्हें शक हो जाएगा कि आप मेरे अतिथि हैं भी या नहीं।


मनमोहन रेड्डी नामक उस दक्षिण भारतीय सज्जन ने हमें जॉर्ज से मुलाकात करा दी। हम एक बड़े चर्च के अहाते में गये। जॉर्ज उस समय पादरी की पोशाक में थे। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। चश्मा बदला हुआ था और हाथ में एक विदेशी लेखक की मोटी अंग्रेजी किताब थी। जॉर्ज,  विनयन और मुझसे देर तक बातचीत करते रहे। फिर हम राम अवधेश की तलाश में उल्टा डांगा मुहल्ले की ओर चल दिये। वहीं की एक झोपड़ी में हम टिके भी थे। फुटपाथ पर स्थित नल पर नहाते थे और बगल की जलेबी-चाय दुकान में खाते-पीते थे।

उल्टा डांगा का वह पूरा इलाका बिहार के लोगों से भरा हुआ था। जॉर्ज के साथ टैक्सी में हमलोग वहां पहुंचे थे। मैंने जॉर्ज को उस चाय की दुकान पर ही छोड़ दिया और राम अवधेश की तलाश में उस झोपड़ी की ओर बढ़े। पर पता चला कि राम अवधेश जी भूमिगत कर्पूरी ठाकुर के साथ कोलकाता में ही कहीं और हैं।

चाय की दुकान पर बैठे जॉर्ज ने इस बीच चाय पी थी। जब हम लौटे और जॉर्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। उसने कहा, ‘हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे।’ इस पर जॉर्ज थोड़ा घबरा गये। उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये। अब गिरफ्तारी में देर नहीं होगी। जॉर्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया, पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी। मैंने कहा कि जॉर्ज साहब, चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा। मैं यहीं टिका हुआ हूं।

फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी। फिर हमें बीच कहीं छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जॉर्ज कहीं और चले गये।

आपातकाल में जॉर्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट षडयंत्र केस को लेकर मुकदमा चला। सी.बी.आई. का आरोप था कि पटना में जुलाई 1975 मेें जॉर्ज फर्नाडीस, रेवतीकांत सिंह, महेंद्र नारायण वाजपेयी और इन पंक्तियों के लेखक यानी चार लोगों ने मिलकर एक राष्ट्रद्रोही षड्यंत्र किया। षड्यंत्र यह रचा गया कि डायनामाइट से देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को उड़ा देना है और देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर देनी है।

सन 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनने पर यह केस उठा लिया गया।  

@--फस्र्टपोस्टहिन्दी-29 जनवरी 2019@



      

इमरजेंसी विरोधी चेहरा -सुरेंद्र किशोर


 जार्ज फर्नांडिस का सर्वाधिक चमकीला चेहरा आपातकाल में ही उभर कर सामने आया था।तब  वे अपनी जान हथेली पर लेकर  तानाशाही से लड़ रहे थे।यदि आपातकाल नहीं हटता तो राष्ट्रद्रोह के आरोप में उन्हें फांसी की भी सजा हो सकती थी।ऐसा ही मुकदमा हुआ था उनपर।
उनके द्वारा तैयार एक अंडरग्राउंड बुलेटिन के यह  अंश का आज पढ़ना दिलचस्प होगा।
 ‘जब 26 जून 1975 को मैडम ने तानाशाही अख्तियार की,  
तब उनके सेंसर कानूनों ने कुछ ऐसा चमत्कार किया ,जो बड़े से बड़े भारत विरोधी अंग्रेज शासक ने ब्रिटिश राज के दिनों में करने का साहस नहीं किया था।
नागरिक स्वाधीनता पर ,प्रेस की स्वतंत्रता पर फासिज्म पर नेहरू जी ने जो कहा था,उस पर तो प्रतिबंध लग ही गया,महात्मा गांधी के कथनों पर भी रोक लग गयी।
हालांकि इन दोनों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया था,पर उनके विचारों पर रोक कभी नहीं लगाई थी।
पर एक व्यक्ति था जिसे न उन्होंने कभी गिरफ्तार किया ,न उसके शब्दों पर रोक लगाई ।वे थे गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर।
गुरुदेव ठाकुर को अपनी मृत्यु के बाद 35 साल तक प्रतीक्षा करनी पड़ी ,जब मैडम यानी इंदिरा गांधी ने 26 जून को उनकी पंक्तियों पर भी सेंसर लगा दिया।
गीतांजलि में उन्होंने लिखा था,
‘जहां ज्ञान मुक्त है,
जहां शब्द सत्य की गहराई से आते हैं
...................................
उस स्वाधीनता के दिव्यलोक में ,
मेरे प्रभु मेरा यह देश जागे !’ 
जार्ज फर्नांडिस की इस मनःस्थिति को समझते हुए आपातकाल में उनकी भूमिका को समझा जा सकता है जो  उन्होंने आपातकाल में अपनी जान हथेली पर रखकर अपनाई थी।
 उन पर और उनके करीब दो दर्जन साथियों पर बड़ौदा डाइनामाइट षड्यंत्र मुकदमा चला था।
यह देशद्रोह का मुकदमा था जिसके तहत यह आरोप लगा था कि वे हथियार के बल पर राज सत्ता पलटना चाहते थे।
पूछताछ के दौरान इन्हें प्रताडि़त किया गया।कुछ खास बातें सी.बी.आई.जार्ज से कहलवाना चाहती थी।
पर जार्ज ने साफ मना कर दिया।हिरासत में रात-रात  भर उन्हें तेज रोशनी में रखा जाता  था ताकि वे सो भी न सकें।
 पर,जार्ज ने सी.बी.आई. से कह दिया था कि चाहे मार दो,पर मैं नहीं बताऊंगा कि क्या किया।यह बात मुझे जार्ज ने बाद में बताई थी।
जार्ज फर्नांडिस तो सिर्फ शांत तालाब में कंकड़ फेंक कर हलचल पैदा करना चाहते थे जिस तरह भगत सिंह ने सेंट्रल एसेंबली में बम फेंका था-बहरी सरकार  को सुनाने के लिए।
  दरअसल जून 1975 में एक लाख से भी अधिक नेताओं -कार्यकत्र्ताओं की गिरफ्तारी व सारी प्रतिपक्षी राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर प्रतिबंध के बाद देश में प्रतिपक्षी राजनीति की दृष्टि से श्मशान की शांति छा गयी थी।अखबारों पर लगे कठोर सेंसरशिप ने वातावरण को और भी दम घोटूं बना दिया था।
बंबई के मजदूर नेता के रूप में भी जार्ज फर्नांडिस का जीवन भी जुझारू व उथल पुथल वाला रहा था।पर आपातकाल की तो बात ही कुछ और थी।
सन 1963 में जार्ज का नाम पूरे देश में गूंजा था जब वे पूरी 
बंबई बंद कराने में सफल रहे थे।
बसों,टैक्सियों व नगर निगम के कर्मचारियों में उनकी मजबूत यूनियन थी।
सन 1967 में तो उन्होंने मुम्बई के बेताज बादशाह व तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एस.के.पाटील को लोक सभा चुनाव में पराजित कर दिया था।
इस कारण वे जाइंट कीलर कहलाए थे।
 जब 1975 में आपात काल लगा तो जार्ज का और भी क्रांतिकारी स्वरूप सामने आया।
25 जून को वे ओडिशा में थे।ओडि़शा में उनकी पत्नी लैला कबीर की ननिहाल है।
आपातकाल लगते ही उन्होंने तय किया कि वे गिरफ्तारी नही देंगे।वे  भूमिगत होकर संघर्ष करेंगे।
लंबी व थकाऊ बस यात्रा करके वे ओडि़शा से कोलकाता पहुंचे।
वहां उन्होंने  समाजवादी साथी व नेता विद्या बाबू से मुलाकात की ।उनसे कुछ पैसे लिए और टैक्सी से पटना रवाना हो गए।
कुुछ दूर तक तो टैक्सी ड्रायवर ने गाड़ी चलाई।पर जब वह आगे बढ़ने को तैयार नहीं हुआ तो आधे रास्ते से जार्ज खुद टैक्सी ड्राइव कर पटना पहुंचे।
पटना में दो तीन दिन रुक कर साथियों को गोलबंद किया।
 फिर तो व देश भर घूमते रहे।आपातकाल विरोधी गतिविधियां देश भर में चलाते रहे।
 वे निश्चिंत तभी हुए जब 1977 के चुनाव के बाद देश में मोरारजी देसाई की सरकार बनी।उन्होंने पहले संचार मंत्री और बाद में उद्योग मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।वे मोरारजी के करीबी भी थे।
जार्ज के अंडरग्राउंड जीवन के दो प्रकरण पढ़ना रोमांचकारी होगा जिसका मैं गवाह व सहभागी रहा।
   आपातकाल में हम भूमिगत साथी जार्ज से मिलने कोलकाता गए थे।
उल्टा डांगा में एक चाय दुकान पर बिठाकर हम बगल की झोपड़ी में एक अन्य साथी को खोजने निकले।दुकान पर बैठे जार्ज ने इस बीच चाय पी थी।
जब हम लौटे और जार्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया।उसने  कहा, ‘हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे।’ इस पर जार्ज थोड़ा घबरा गये।उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये।अब गिरफ्तारी में देर नहीं होगी।जार्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया,पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी।मैंने कहा कि जार्ज साहब,चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा।मैं यहीं पास की झोपड़ी में टिका हुआ हूं।
फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी।फिर हमें बीच कहीं  छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जार्ज कहीं और चले गये।
    तब जार्ज पादरी की पोशाक में थे और हाथ में एक अंग्रेजी किताब थी।
 दूसरा प्रकरण बंगलुरू का है।
पिछले कर्नाटका विधान सभा  चुनाव को लेकर कर्नाटका  के कई स्थानों
की चर्चा मीडिया में हो रही थी।
उसमें एक नाम राम गढ़  का भी है।वहीं राम गढ़  जहां ‘शोले’ फिल्म की शूटिंग हुई थी।बंगलुरू-मैसूर मार्ग पर बंगलुरू से 50 किलोमीटर दूर है रामनगरम उर्फ राम गढ़।
 इमरजंेंसी में मैं  बंगलोर गया था  - लाड़ली मोहन निगम के साथ।करीब एक सप्ताह तक एक होटल में टिके थे।एक ही कमरे में तीन जन-
जे.एच.पटेल, लाड़ली मोहन निगम और मैं।पटेल बाद में वहां के मुख्य मंत्री बने और निगम राज्य सभा सदस्य।
  खैर,उन दिनों बंगलोर की आबोहवा  इतनी अच्छी थी कि वातानुकूलित सिनेमा हाॅल से निकलने के बाद बाहर ही अच्छा लगता था।
   गहरे भूमिगत जार्ज फर्नांडिस के साथ हर रात हम राम गढ़ की पहाड़ी के पास जाते थे।
क्या करने जाते थे,यह बताना यहां जरूरी नहीं।
आपातकाल विरोधी काम का ही वह हिस्सा था। 
तब वहां जाने व एक  खास काम करने में बड़ा रोमांच और संतोष था।
 वहीं सुना था कि शोले की शूटिंग के समय धमेंद्र ,अमिताभ तथा  अन्य कलाकार बंगलोर में रहते थे और रोज राम गढ़  जाते थे।वहां सिप्पी साहब ने शूटिंग के लिए ही एक गांव बसा दिया था जो फिल्म में दिखाई पड़ता है। वह राम गढ़  अब जिला बन गया है।
  एक प्रकरण आपातकाल से पहले का।
किसी पत्रिका  में छपी किसी तथाकथित आपत्तिजनक सामग्री पर संसद में लगातार पांच दिनों तक गरमागरम चर्चा हो,ऐसा जार्ज के कारण ही हुआ।
वह पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ थी जिसके प्रधान संपादक जार्ज फर्नांडिस थे।सामग्री ऐसी थी कि संसद कोई कार्रवाई नहीं कर सकी थी।
@-राष्ट्रीय सहारा -30 जनवरी, 2019@





सोमवार, 28 जनवरी 2019

जो कुछ अरनब गोस्वामी में है, वह अरनब गोस्वामी में ही है !
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अरनब गोस्वामी का ‘रिपब्लिक भारत’ जल्द दस्तक देने जा रहा है।
 मुझे तो उसका बेचैनी से इंतजार है।
मेरा मानना है कि जो बात अरनब गोस्वामी में है, वह अरनब गोस्वामी में ही है !
अरनब में जो कुछ है, मैं उसका फैन हूं।
पर,एक बात को छोड़कर।
वह एक बात यह है।
अरनब गोस्वामी जब अपने ‘टाॅक शो’ में एक साथ आधा दर्जन मुंहजोड़ अतिथियों को बोलने-चिल्लाने  देते हैं तो मुझे उन पर बड़ा गुस्सा आता है।पर, मैं करूं तो क्या करूं !  
न तो मैं अपना टी.वी.सेट फोड़ सकता हूं और न ही अपना सिर ! सिर्फ चैनल बदल सकता हूं।
इसीलिए जब मैंने अपने पसंदीदा एंकर अमिताभ अग्निहोत्री को बड़बोले अतिथियों का माइक डाउन करते देखा तो मैं उनकी तारीफ में लिखने  से खुद को नहीं रोक नहीं सका।
 खैर, इसके बाद भी कुछ लोगों की एक और शिकायत अदमनीय अरनब गोस्वामी से है।वह यह कि अरनब लगभग एकरफा हैं।
हालांकि वैसा ही एकतरफापन कुछ दूसरे चैनल का भी है तो उन लोगों की उनसे कोई  शिकायत नहीं है !
खैर, यह सब उनकी समस्याएं हैं।
मुझे तो किसी के एकतरफापन से कोई शिकायत नहीं है।
 इस देश के कुछ लोग एक विचार के साथ में मगन हैं तो दूसरे लोग कुछ दूसरे विचार के साथ।उन्हें मगन रहने दीजिए।कुछ विचार देश के लिए सही हैं तो कुछ अन्य .......।
  मेरी शिकायत सिर्फ इस बात से होती है जब कोई मीडिया  गलत तथ्य पेश करता है या फिर तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करता है।
  तथ्य तो पवित्र है, अपने विश्लेषण के लिए आप जरूर स्वतंत्र हैं।सारे तथ्य बाहर आने दीजिए ।चाहे वह किसी के पक्ष में जाता हो या विरोध में।
हर सरकार के कार्यकाल में कुछ अच्छा होता है तो कुछ गलत भी।किसी में ज्यादा अच्छा तो किसी अन्य के कार्यकाल में ज्यादा बुरा।
 यदि आप एकतरफापन की शिकायत करेंगे तो यह भी बता दीजिए कि मीडिया में एकतरफापन कब नहीं रहा है ? अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर।
 मैं तो नेहरू काल से अखबार पढ़ रहा हूं और मीडिया के बारे में जान-समझ-पढ़ रहा हूं।
मैं बंबई के साप्ताहिक ब्लिट्ज और करंट दोनों पढ़ता था।
एक घोर वामपंथी  तो दूसरा घनघोर दक्षिणपंथी।
नीर क्षीर विवेक के साथ उसे ग्रहण कर लेता था।आप भी ग्रहण कीजिए।सबकी सुनिए, अपनी करिए !