रविवार, 14 जुलाई 2019

गत 9 अप्रैल 2015 को लालू प्रसाद ने कहा था कि 
मेरा बेटा ही मेरा उत्तराधिकारी बनेगा।
  पर, इसी 13 जुलाई 2019 को लालू प्रसाद ने रांची जेल में चर्चित पत्रकार नलिन वर्मा को बताया कि जनता मेरा उत्तराधिकारी चुन लेगी।
 करीब 4 साल के भीतर लालू प्रसाद में ऐसा परिवत्र्तन क्यों और कैसे आया ?
 राजनीतिक पंडितों के लिए यह शोध का विषय है।


वोहरा रपट से धूल झाड़ने का अवसर सुरेंद्र किशोर


आज से बेहतर अवसर  कोई और हो ही नहीं हो सकता था।
माफिया-नेता अफसर गठजोड के खिलाफ कार्रवाई
के लिए यह सर्वोत्तम अवसर है। 
यह अवसर वोहरा कमेटी की  धूल खा रही रपट को गृह मंत्रालय की आलमारी से निकालने का है।रपट 1993 में सरकार को समर्पित की गई।
  रपट में माफिया-नेता- अफसर गठजोड¬ के खिलाफ कार्रवाई के उपायों का विवरण है।नोडल एजेंसी बनाने की जरूरत बताई गई है।
 रपट में देश की जिन खतरनाक स्थितियों का विवरण है,उनसेे निपटने के साहस वाली सरकार केंद्र में एक बार  फिर बन चुकी है।
  और अधिक मजबूती के साथ। 
आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय लाॅबियों,तस्कर गिरोहों ,माफिया तत्वों के साथ नेताओं और अफसरों के बने गंठबंधन  को  तोड़ने के ठोस उपाय वोहरा रपट में मौजद हैं।
  रपट  इतनी सनसनीखेज है कि उसे तत्कालीन सरकार ने अपनी ओर से जाहिर तक नहीं की।
रपट की तीन ही प्रतियां तैयार की गई थीं।
 पिछले पांच वर्षों में पहली बार उन माफिया तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की शुरूआत हुई  जिनकी चर्चा वोहरा रपट में है।
 पर अभी उन तत्वों पर निर्णायक हमला अभी बाकी  है।
देश के लिए यह अच्छी बात है कि मौजूदा सरकार में उन तत्वों की रक्षा करने वाले कोई मौजूद नहीं है।बल्कि हमले का हौसला रखने वाले अब शीर्ष पर हैं।
   इन्हीं तत्वों और उनके लगुए-भगुए ने पिछले पांच साल में मोदी सरकार को तरह -तरह से परेशान किया।
पर इस चुनाव में मतदाताओं ने उन्हें और उनके संरक्षकों को परोक्ष रूप से चेतावनी दे दी है।
   मूल माफियाओं की जड़ें अभी बाकी हैं।उनमें मट्ठा डालने की ऐतिहासिक जरूरत है।
 1993 में यदि वोहरा रपट पर कार्रवाई हुई होती तो दस साल पहले चर्चा में आए नाडिया टेप की कहानी के पात्र पहले ही जमीन्दोज हो चुके होते।
   पर लगता है कि अब उस सफाए का श्रेय मोदी-शाह की जोड़ी को मिलना है।
गुजरात में  ऐसे माफियाओं से भिड़कर उन्हें पराजित करने का अनुभव इनके पास हैं।
 मुम्बई में 1993 में हुए भीषण बम विस्फोटों की पृष्ठभ्ज्ञूमि में वोहरा कमेटी कव गठन किया गया था।वोहरा तब गृह सचिव थे।
   वोहरा समिति ने 1993 के ही अक्तूबर में अपनी सिफारिश केंद्र सरकार को दे दी थी।सिफारिश आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय लाॅबियों,तस्कर गिरोहों ,माफिया तत्वों के साथ नेताओं और अफसरों के बने गंठबंधन  को  तोड़ने के ठोस उपाय बताए गए।

  पांच दिसंबर, 1993 को तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव  एन.एन.वोहरा ने अपनी सनसनीखेज रपट गृह मंत्री को सौंपी थी।
  गोपनीयता बनाए रखने के लिए रपट की तीन ही प्रतियां तैयार की गई थीं।
रपट में कहा गया  कि ‘ इस देश में अपराधी गिरोहों ,हथियारबंद सेनाओं, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले माफिया गिरोहों,तस्कर गिरोहों,आर्थिक क्षेत्रों में सक्रिय लाॅबियों का तेजी से प्रसार हुआ है।
 इन लोगों ने विगत कुछ वर्षों के दौरान स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों, सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों, राजनेताओं,मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा गैर सरकारी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ व्यापक संपर्क विकसित किये हैं।इनमें से कुछ सिंडिकेटों की विदेशी आसूचना एजेंसियों के साथ- साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय सबंध भी हैं।’

 संभवतः  रपट की सनसनीखेज बातों को देखते हुए ही केंद्र  सरकार ने उसे सार्वजनिक नहीं किया।
  इस रपट को एक बार फिर पढ़ने से साफ लगता है कि वोहरा ने नाडिया टेप मामले का पूर्वाभास पहले ही करा दिया था। इसका भी पूर्वाभास था कि एक दिन बड़े आर्थिक अपराधियों को  देश से भगा देने का रास्ता बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग ही साफ कर देंगेे।  
     रपट में यह भी कहा गया  कि इस देश के कुछ बड़े प्रदेशों  में इन गिरोहों को स्थानीय स्तर पर  राजनीतिक दलों के नेताओं और सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों का संरक्षण हासिल है।कुछ राजनीतिक नेतागण इन गिरोहों, हथियारबंद सेनाओं के नेता बन जाते हैं तथा कुछ ही वर्षों में स्थानीय निकायोंं, राज्य की विधान सभाओं तथा संसद के लिए निर्वाचित हो जाते हैं।इसके परिणामस्वरूप इन तत्वों ने अत्यधिक राजनैतिक प्रभाव प्राप्त कर लिया है जिसके कारण प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने तथा आम आदमी के जानमाल की हिफाजत करने की दिशा में गंभीर बाधा उत्पन्न हो जाती है।’
  अब यह देखना है कि  इस मामले में 1993 और 2019 के बीच कितना फर्क आया है ? जितना भी सकारात्मक फर्क आया है,उसके लिए शासन को धन्यवाद।किन्तु जितना नहीं आया है उसके लिए कौन -कौन लोग जिम्मेदार हैं ? 
 अन्य महत्वपूर्ण अफसरों के साथ -साथ सी.बी.आई.और आई.बी.निदेशक भी उच्चस्तरीय  वोहरा समिति के सदस्य थे। वोहरा समिति ने  यह भी कह दिया  
था कि ‘तस्करों के बड़े -बड़े सिंडिकेट देश के भीतर छा गये हैं और उन्होंने हवाला लेन देनों ,काला धन के परिसंचरण सहित विभिन्न आर्थिक कार्यकलापों को प्रदूषित कर दिया है।उनके द्वारा भ्रष्ट समानांतर अर्थ व्यवस्था चलाये जाने के कारण देश की आर्थिक संरचना को गंभीर क्षति पहुंची है।इन सिंडिकेटों ने  सरकारी तंत्र को सभी स्तरों पर सफलतापूर्वक भ्रष्ट किया हुआ है।इन तत्वों ने जांच -पड़ताल तथा अभियोजन अभिकरणों को इस तरह प्रभावित किया हुआ है कि उन्हें अपना काम चलाने में अत्यंत कठिनाइयों को सामना करना पड़ रहा है।’
  रपट में यह भी कहा गया  कि ‘कुछ माफिया तत्व नारकोटिक्स,ड्रग्स और हथियारों की तस्करी में संलिप्त हैं और उन्होंने विशेष कर जम्मू और कश्मीर,पंजाब,गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अपना एक नारको-आतंक का तंत्र स्थापित कर लिया है।चुनाव लड़ने जैसे कार्यों में खर्च की जाने वाली राशि के मददेनजर राजनीतिज्ञ भी इन तत्वों के चंगुल में आ गये हैं।रोकथाम और खोजी तंत्र से इन माफियाओं ने गंभीर संबंध बना लिया है।यह वायरस देश के लगभग सभी केंद्रों में तटवर्ती स्थानों पर फैल गया है।
  सीमावर्ती क्षेत्र इससे विशेष रूप से पीडि़त  हैं।समिति की बैठक में आई.बी.के निदेशक ने साफ- साफ कहा था कि माफिया तंत्र ने वास्तव में एक समानांतर सरकार चला कर राज्य तंत्र को एक विसंगति में धकेल दिया है।इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि इस प्रकार के संकट से प्रभावी रूप से निपटने के लिए एक संस्थान स्थापित किया जाए।’  
    पर, देश को गर्त में जाने से  बचाने के लिए गत 26  साल में इस दिशा में भरपूर प्रयास हुए होते तो स्थिति और नहीं  बिगड़ती  ।इस बीच इस देश के संसाधनों को लूटने वालों ने अपनी कार्य शैली व रणनीति में भी समय के साथ बदलाव कर लिया है। 
   वोहरा समिति ने ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्वों को सजा दिलाने का प्रबंध करने की भी सलाह दी थी।पर उन सलाहों को नजरअंदाज कर दिया गया। 
   सवाल मंशा का है । इस देश के अधिकतर  नेताओं की मंशा सही नहीं है।यदि किसी की सही है भी तो वे भ्रष्ट तत्वों के सामने लाचार नजर आ रहे हंै ।इसलिए तरह -तरह के भ्रष्टों पर निर्णायक हमला नहीं हो पा रहा है।
   समिति ने यह सलाह दी है कि गृह मंत्रालय के तहत एक  नोडल एजेंसी  तैयार हो जो देश मेंे जो भी गलत काम हो रहे हैं,जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी  है ,उसकी सूचना वह एजेंसी एकत्र करे।ऐसी व्यवस्था की जाए ताकि सूचनाएं लीक नहीं हों।क्योंकि सूचनाएं लीक होने से राजनीतिक दबाव पड़ने लगता है और ताकतवर लोगों के खिलाफ कार्रवाई खतरे में पड़ जाती है।यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नोडल एजेंसी 
पर किसी तरह का दबाव नहीं पड़ सके और वह सूचनाओं को लेकर मामले को तार्किक परिणति तक पहुंचा सके।
  वोहरा समिति ने अपनी रपट में बार -बार इस बात का उल्लेख किया है कि राजनीतिक संरक्षण से ही इस देश में तरह -तरह के गोरख धंधे हो रहे हैं।रपट में यह साफ -साफ लिखा गया है कि ‘यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि आपराधिक सिंडिकेटों के राज्यों व केंद्र के वरिष्ठ सरकारी अफसरों या राजनीतिक नेताओं के साथ साठगांठ के  बारे में सूचना के किसी प्रकार के लीकेज का सरकार के काम काज पर अस्थिरकारी  प्रभाव हो सकता है।’
 क्या  ऐसी कारगर नोडल एजेंसी अब भी नहीं बन सकती ? क्या अब भी  माफिया-नेता-अफसर गठजोड़ को तोड़ा नहीं जा सकता ?
क्यों नहीं  ?
मोदी है तो यह भी मुमकिन है।


  

शनिवार, 13 जुलाई 2019

--खुद अपनी मानहानि कराते राहुल-- --सुरेंद्र किशोर


पटना की अदालत से मानहानि के मामले में जमानत पा लेने के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि ‘ मैं संविधान बचाने की लड़ाई लड़ रहा हूं।’
क्या किसी पर मानहानि का मुकदमा करना संविधान के खिलाफ बात है ?
इससे पहले  मुम्बई की  एक अदालत ने भी मानहानि के ही एक अन्य मुकदमे में उन्हें हाल में जमानत दे दी है।
पटना के इस दूसरे केस में जमानत मिलने के बाद इसी 6 जुलाई को  राहुल गांधी ने कहा कि ‘भाजपा और संघ के लोग मुझे तंग कर रहे हैं।’आप किसी की मानहानि करें और पीडि़त केस कर दे तो आपको तंग किया जा रहा है ?
यह क्या बात हुई ?कहावत है कि आप किसी की पिटाई भी कर दें,पर उसे रोने का भी अधिकार नहीं !
 मानहानि के ऐसे मुकदमों में होता यह है कि या तो आप अपने आरोपों को अदालत में सिद्ध कर देंं या फिर प्रार्थी  से  माफी मांग कर समझौता कर लें।
अदालतें समझौते की अनुमति आसानी से दे देती है।
उससे आम तौर पर मामला सलट जाता है।
पर माफी मांगने की जगह राहुल गांधी खुद को पीडि़त बताते रहे हैं।अभी वे समझौते की  मुद्रा में नहीं लगते हैं।
संभवतः वे उसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं।उन्होंने कहा भी है कि जो लोग नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़े होते हैं,उन्हें फंसाया जाता है।राजनीतिक कारणों से मुझ पर मुकदमे किए जा रहे हैं।पर मैं गरीब लोगों किसानों मजदूरों के साथ खड़ा हूं।
किसी बड़े नेता के लिए इस बात में कौन सी होशियारी है कि किसी पर निराधार आरोप लगा कर आप देश की कचहरियों के चक्कर काटते रहें और अन्य महत्वपूर्ण कामों से खुद को वंचित रखें ?
  पर बात दूसरी हो तो फिर क्या कहने !
यानी, क्या राहुल गांधी देश में आपातकाल -1975-77- की तरह की कानूनी व्यवस्था  की उम्मीद कर रहे हैं या इच्छा रखते हैं या अभ्यस्त हो गए हैं जिसके तहत वे किसी के खिलाफ कुछ भी आरोप लगा कर वे बच जाना चाहते हैं ?
  कांग्रेस में ऐसी प्रवृति आपातकाल में साफ -साफ देखी गई थी ।
 अपनी गद्दी बचाने के लिए तब देश में आपातकाल लगा दिया गया।जयप्रकाश नारायण सहित एक लाख से अधिक राजनीतिक नेताओं और कार्यकत्र्ताओं को विभिन्न जेलों में ठूंस दिया गया।उन्हें अदालत जाने से वंचित कर दिया गया।प्रेस का मुंह बंद कर दिया।साथ ही, यह कानूनी-प्रशासनिक प्रबंध भी कर दिया कि कहीं से न तो कोई लोकतांत्रिक आवाज उठे और न ही किसी अखबार में सरकार की हल्की आलोचना भी छपे। 
इतना ही नहीं,तब इंदिरा गांधी  सरकार ने 10 अगस्त 1975 को संसद से संविधान में 39 वां  संशोधन पास करवा दिया।
उसके तहत राष्ट्रपति,उप राष्ट्रपति ,प्रधान मंत्री और स्पीकर के खिलाफ चुनाव याचिका की सुनवाई से अदालतों को वंचित कर दिया गया था।यह बिलकुल असामान्य बात थी।
याद रहे कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी की राय बरेली
से लोकसभा चुनाव को रद कर दिया था।वह 1971 में वहां से विजयी हुई थीं।
राजनारायण की चुनाव याचिका पर सुनवाई के बाद उन पर चुनाव में भ्रष्ट तरीका अपनाने का आरोप साबित हो गया था।  गनीमत रही कि बाद की मोरारजी देसाई सरकार ने इस संशोधन को संसद से बाद में समाप्त करवा दिया।
इमरजेंसी में चुपके- चुपके एक और संवैधानिक संशोधन का मसविदा तैयार हो रहा था।
उसके तहत यह प्रावधान किया जाने वाला था कि राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री जैसी कुछ बड़ी हस्तियों पर किसी भी तरह के मुकदमे नहीं चलाए जा सकेंगे।
पर,  बाद में इंदिरा सरकार ने वैसा विचार त्याग दिया।
  यानी यही आपातकालीन मानसिकता है कि किसी बड़ी हस्ती को कानून के दायरे से ऊपर कर दिया जाए।
यानी उस पर कोई कानून लागू ही नहीं हो।किसी की आप सार्वजनिक रूप से चाहे जितनी भी मानहानि कर दें ,पर आपके खिलाफ कानून का सहारा न लिया जाए।लिया जाएगा तो आप आरोप लगाएंगे कि मुझे  नाहक परेशान किया जा रहा है।क्या आप कानून से ऊपर हैं जिस तरह आपातकाल में खुद को इंदिरा गांधी ऊपर कर लिया था ? 
 पर,आज तो देश में लोकतंत्र है।कानून का शासन है।लोगों को अपनी जान और प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार है।
पर कुछ लोग है कि जो चाहते हैं कि वे सरे आम  किसी की इज्जत उतारते चलें और जिसका अपमान हो, वह अदालत भी न जा सके।क्या राहुल गांधी यही चाहते हैं ?
आपातकाल में भारत सरकार के एटाॅर्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि यदि शासन किसी की जान भी ले ले तो भी उसके खिलाफ किसी अदालत में सुनवाई नहीं हो सकती।
याद रहे कि किसी-किसी व्यक्ति को अपनी इज्जत अपनी जान से भी अधिक प्यारी होती है।
क्या राहुल गांधी का मौजूदा रुख इमर्जेंसी का ही हैंग ओवर है ?इसे 1975-77 की इमर्जेंसी वाली मानसिकता नहीं कहा जाएगा ?
  गौरी लंकेश की हत्या की चर्चा करते हुए  राहुल गांधी ने कहा था कि कोई जब भाजपा और आर.एस.एस.की विचारधारा के खिलाफ बोलता है तो उस पर दबाव डाला जाता है,उस पर हमला होता है।यहां तक कि उसकी हत्या भी हो जाती है।
इस आपत्तिजनक बयान के  बाद मुम्बई की अदालत में आर.एस.एस.कार्यकत्र्ता और वकील ध्रुतिमान जोशी ने सोनिया गांधी,राहुल गांधी और सीताराम येचुरी के खिलाफ 2017 में मानहानि का मुकदमा दायर किया। 
उसी के सिलसिले में राहुल गांधी और सीताराम येचुरी ने गत 4 जुलाई को मुम्बई की अदालत में हाजिर होकर जमानत  ली।
  गत 13 अप्रैल 2019 को कर्नाटका के कोलार की चुनाव सभा में राहुल गांधी ने कहा था कि ‘नीरव मोदी हो, ललित मोदी हो या नरेंद्र मोदी हो,सारे चोरों का नाम मोदी ही क्यों होता है ?’  
जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मेादी ने खुद को चैकीदार कहा तो   राहुल गांधी पूरे चुनाव प्रचार के दौरान लगातार यह कहते रहे,‘चैकीदार चोर है।’यही बात वे श्रोताओं से भी बोलवाते रहे।
 यह गनीमत है कि खुद प्रधान मंत्री ने उन पर मानहानि का मुकदमा नहीं किया।हां,देश के अधिकतर मतदाताओं ने राहुल गांधी के इस आरोप पर विश्वास नहीं किया।
  पर बिहार सरकार के उप मुख्य मंत्री और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने पटना की अदालत में जरूर राहुल गांधी पर मानहानि का मुकदमा कर दिया है। 
  अब उसकी सुनवाई चलेगी।
  सुशील मोदी के अनुसार ‘चुनाव जीतने के लिए राहुल गांधी ने सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया।ईमानदार प्रधान मंत्री को चोर कहा।
माफी मांगने के बदले खुद को पीडि़त बता रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा उन्हें परेशान कर रही है।’
  अब राहुल गांधी के समक्ष  विकल्प सीमित हंै।
या तो वे मोदी नाम धारी सारे लोगों को अदालती सुनवाई के दौरान चोर साबित कर दें जो एक असंभव बात है । या फिर प्रार्थी मोदी से माफी मांग लें।
 यदि ऐसा वे नहीं करते तो अदालती फैसले का इंतजार करें।
क्योंकि संकेत हैं कि माफी के बिना प्रार्थी मुकदमा वापस लेने को तैयार ही नहीं हैं।
 इस मुकदमे के साथ एक बड़ा मुद्दा भी जुड़ा हुआ है।
  आज सार्वजनिक संवाद और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों का स्तर काफी नीचे गिर गया है।
खास कर चुनाव प्रचारों के दिनों में तो बड़े -बड़े नेता भी आए दिन मर्यादाएं लांघ जाते रहे हैं।
 कई साल पहले के एक चुनाव के बाद एक बड़े नेता ने यह कह कर शालीन लोगों का रोष शांत करने के लिए कहा था कि चुनाव प्रचार के दौरान के अशालीन आरोप-प्रत्यारोपों को होली की गाली मान कर भुला दिया जाना चाहिए।
  पर,लगता है कि 2019 के लोक सभा चुनाव प्रचार के संवाद का स्तर उस सीमा रेखा को भी लांघ गया।
मानहानि के मुकदमे के प्रार्थी का रुख देख कर तो यही लगता है।अच्छा होगा,यदि मौजूदा मुकदमा सार्वजनिक जीवन
में बोली की मर्यादा कायम करने में मदद करे।
@मेरे इस लेख का संपादित अंश 10 जुलाई 2019 के दैनिक जागरण में प्रकाशित@  

  
  

           


अपनी जड़ों की ओर लौटने की मजबूरी
    --सुरेंद्र किशोर--
इस देश में सक्रिय समाजवादी पृष्ठभूमि वाले  राजनीतिक दल इन दिनों दोराहे पर हैं।
इस साल के लोक सभा चुनाव मंे भारी पराजय के बाद वे किंकत्र्तव्य विमूढ़ नजर आ रहे हैं।आखिर अब वे किधर जाएं ?
उन में से कुछ नेता कह रहे हैं कि हम जनता के बीच जाएंगे।
पर, क्या लेकर उसके पास जाएंगे ?जब कुछ देने के लिए आपके पास सरकार थीं तो जिसको जो कुछ दिया ,या नहीं दिया,उसका परिणाम तो इस चुनाव में मिल गया। 
राहुल गांधी भी ग्रामीण महिला कलावती के पास गए थे ?
उसका क्या असर हुआ ?
दरअसल जब आप सत्ता में होते हैं तो आपके पास देने के लिए एक सरकार होती है।
पर उस समय जब आप अंधे की रेवड़ी की तरह अपनों को ही बांटने में लगे रहे तो अब आपके पास व्यापक जनता का विश्वास पाने के क्या उपाय हैं ?

 अभी तो स्थिति यह है कि सीमित वोट बैंक के सहारे आपका कुछ नहीं हो सकता।अब तो उन स्थिति पर आपको विचार करना होगा कि आप व्यापक जनता से सिमट कर सीमित वोट बैंक तक क्यों सिमट गए।
यदि ऐसा ही बना रहा तो आपका भी देर -सवेर वही हाल होगा जो हाल कुछ राजनीतिक दलों का इस देश में हो चुका है।  
सी.राज गोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी और राजा कमाख्या नारायण सिंह के जन क्रांति दल की तरह कई दल समय के साथ विलुप्त हो गए।
  सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आपकी मौजूदा कार्य नीति-रणनीति के सहारे आपके पुराने दिन लौट सकते हैं ?
लगता तो नहीं है।क्योंकि इस राह में कांटे ही कांटे हैं।
राजग खास कर भाजपा ने उनकी राह में अनेक कांटे बो दिए हैं।बो भी रहे हैं।
अब आपको यानी समाजवादी धारा के दलों को राजग खासकर भाजपा से मुकाबला कर उससे वह वोट छीनना है जो कभी आपका ही था,अब उनके पास चला गया है।
इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी शैली बदलें।क्योंकि मौजूदा शैली के रहते ही आपके वोट आपके हाथों से निकल गए।
 समाजवादी धारा की राजनीति को पहले समझना होगा।
स्वात्रंत्तोतर समाजवादी राजनीति को तीन कालावधियों में बांटा जा सकता है।
आजादी के तत्काल बाद की समाजवादी राजनीति मुख्यतः आचार्य नरेंद्र देव ,जय प्रकाश नारायण डा.राम मनोहर लोहिया की आदर्शवादी राजनीति थी।
  आजादी के बाद उसी अवधि में समाजवादी कार्यकत्र्ताओं का सबसे अधिक निर्माण हुआ।
  1967 में डा.लोहिया के निधन के बाद राज नारायण,कर्पूरी ठाकुर और मधु लिमये की कालावधि की समाजवादी राजनीति रही।
  इस अवधि में समाजवादियों में कर्म व  नैतिकता की कसावट आचार्य नरेंद्र देव-जेपी-लोहिया युग जैसी तो नहीं रही,पर सत्ताधारी कांग्रेसियों से वे साफ-साफ अलग व बेहतर नजर आते थे।
 पर कर्पूरी ठाकुर के 1988 में निधन के बाद बिहार में समाजवादी राजनीति की शैली ही पूरी तरह बदल गई।
उत्तर प्रदेश में राजनारायण के बाद मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी राजनीति की कमान संभाल ली।
मुलायम-लालू की राजनीति कमोवेश एक समान रही है।
  1990 का मंडल आरक्षण का जमाना था।मंदिर आंदोलन भी उसी दौरान चला।वह भावनाओं का भी दौर था।
आरक्षण विरोधियों के आंदोलन का बिहार में मुख्य मंत्री के रूप में लालू प्रसाद ने बहादुरी से मुकाबला किया ।
वह सामाजिक न्याय का आंदोलन था जिसमें सफलता का लाभ लालू प्रसाद को सबसे अधिक मिला।इससे लालू प्रसाद सभी पिछड़ों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए।
  मुलायम सिंह यादव को भी उस दौर का लाभ मिला जिसमंें मंदिर आंदोलन का भी दौर शामिल था।
लालू प्रसाद की सरकार ने लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को  रोका और उन्हें समस्ती पुर में गिरफ्तार करवाया ।
  इसका लाभ भी  मिला।
1991 के लोक सभा चुनाव और 1995 के बिहार विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले दल को भारी सफलता मिली।
  पर उसी सफलता के साथ भटकाव भी शुरू हो गया।
 समय के साथ भटकाव बढ़ता ही चला गया।
यादव और मुस्लिम मतदाता तो फिर भी लालू प्रसाद के साथ बने रहे,पर अन्य वोटर धीरे-धीरे  कटने लगे।
 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव के समय तो जदयू से चुनावी तालमेल का लाभ राजद को बिहार में मिल गया,पर इस बार उसकी अनुपस्थिति में लोक सभा चुनाव में राजद जीरो पर आउट हो गया।
इससे पहले राजद ने एक अन्य विवादास्पद कदम उठा लिया।
राजद ने  सामान्य वर्ग के आरक्षण के लिए संसद में पेश विधेयक का  विरोध कर दिया।इसका नुकसान राजद को होना ही था।
  इन विषम राजनीतिक परिस्थितियों से समाजवादी धारा वाले इस दल को कठिन मार्ग से गुजर कर अपने लिए रास्ता बनाना है।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की भी आगे की राह कठिन है।
देखना है कि वह उसे कैसे पार करती है।
 पर बिहार आंदोलनों की भूमि रहा है।यहां राजद में भी जन आंदोलन का हौसला रखने वाले नेता -कार्यकत्र्ता मौजूद हैं।भले उसकी कमी जरूर हुई है।
  अब तो  रास्ता जन आंदोलन का ही बचा है। आंदोलन के जरिए ही जनता से जुड़ने का विकल्प बचता  है।
  हालांकि उल्लेखनीय  है कि नरेंद्र मोदी और नीतीश सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में आम लोगों के कल्याण और विकास के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं।
 उसके मुकाबले लालू प्रसाद के दल के पास एक ही बड़ी पूंजी है।
वह है 1990 में मंडल आरक्षण के बचाव में किया गया जोरदार आंदोलन।
  बालाकोट अभियान के अलावा राजग सरकार ने अपने विकास व कल्याण के कामों के जरिए भी मतदाताओं को अपनी ओर खींचा है।अपवादों को छोड़ दें तो ऐसे सम्यक विकास कार्यों से समाजवादी धारा की राजनीति को कम ही मतलब रहा है।
राजग शासन काल में बिजलीकरण का भारी विस्तार हुआ है।
 किसान सम्मान योजना ने बहुत बड़ी आबादी को मोहित किया है।
आयुष्मान भारत योजना,उज्ज्वला योजना,शौचालय योजना  और अब घर -घर नल जल योजना।
इनके अलावा भी कई  योजनाएं चली हैं।
सबसे बड़ी बात है कि केंद्र सरकार के मंत्रियों की छवि पर इस बीच कोई आंच नहीं आई।यह सब राजग को  अन्य दलों से अलग करता है। 
फिर भी राजद तथा अन्य गैर राजग दलों के लिए जनता से जुड़ने की राह बाकी  है।
  डबल इंजन की सरकार के कार्यकाल में  
लोगों के  बैंक खातों में सीधे सरकारी मद के पैसे जा रहे हैं।
पर इसमें भी कमीशनखोरी की खबरें आती रहती हैं।
 अन्य सरकारी योजनाओं में भी बिचैलिए हावी  हैं।उसमें संबंधित सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत है।
थानों और अंचल कार्यालयों में शायद ही कोई काम पैसों के बिना हो रहा है।गरीब परेशान हैं।
  साठ-सत्तर के दशक में  सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट दलों  के कार्यकत्र्ता गण सरकारी लूट और अत्याचारों के खिलाफ आंदोलन करते थे।जेल जाते थे।
  परचे छपवा कर बांटते थे।जिला-जिला धरना देते थे।अन्य तरह से भी लोगों की मदद में शामिल रहते थे।
साठ के दशक में सोशलिस्ट कार्यकत्र्ता के रूप में मैं भी अपने इलाकों के भूमिहीन लोगों को अंचल कार्यालय से बासगीत का परचा दिलवाता था।बिना किसी रिश्वत के।
तब संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी इस बात का ध्याान नहीं रखती थी कि यह तो सरकार का काम है,हम क्यों करें ?
 पर आज कुछ राजनीतिक कार्यकत्र्ता यह कह सकते हैं कि सरकार अपने कामों में विफल होगी तो उसका  चुनावी लाभ खुद ब खुद हमें मिल ही जाएगा।
पर यह आलसी कार्यकत्र्ताओं का तर्क है।बासगीत का परचा पाने वालों लोगों के वंशज आज भी उसे याद करते हैं।
  दरअसल समाजवादी पृष्ठभूमि वाले दलों को अपने बीच से निःस्वार्थी व कर्मठ कार्यकत्र्ताओं की जमात तैयार करनी होगी।
हालांकि आज की पंच सितारा संस्कृति वाली राजनीति में यह काम कठिन है,पर असंभव भी नहीं।मरता क्या न करता !
उन्हें स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाना होगा।
तब शायद धीरे -धीरे समाजवादी धारा के दल अपनी  पिछली ताकत हासिल करने की शुरूआत कर सकें।
पर समस्या यह है कि जिन दलों में टिकट,ठेकेदारी तथा अन्य तरह के लाभ के लिए ही अधिकतर कार्यकत्र्ता व नेता जुड़ते रहे हैं,उस दल से आंदोलन की उम्मीद कैसे पूरी हो सकेगी,यह देखना दिलचस्प होगा।
   प्रतिपक्षी दलों के एक हिस्से को यह गलतफहमी हो सकती है कि  नरेंद्र मोदी-नीतीश कुमार सरकार के अलोकप्रिय होने का बस हमें इंतजार करना चाहिए।
तब तक कुछ औपचारिक काम करते रहना चाहिए। कभी न कभी उसका चुनावी लाभ हमें मिल ही जाएगा ।इसलिए  हमें अपनी आरामदायक शैली वाली राजनीति को बदलने की  जरूरत नहीं है।
यदि ऐसी सोच है तो उसके लिए उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ सकता है ।क्योंकि लोक लुभावन काम करने में राजग सरकार की डबल इंजन वाली सरकारों की बराबरी में  अभी कोई अन्य दल  नहीं है। संकेत तो यह बताते हैं कि उसकी लोकप्रियता बढ़ते जाने की ही संभावना अधिक है। 
@ इस लेख का संपादित अंश आज के ‘प्रभात खबर’ में प्रकाशित@
    
   


   



शुक्रवार, 12 जुलाई 2019


क्या कफन में भी होती हंै जेबें ?! 
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खनन घोटाले के सिलसिले में सी.बी.आई.ने उत्तर
 प्रदेश के एक चर्चित पूर्व मंत्री और चार आई.ए.एस.
अफसरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है।
इस मामले में एक पूर्व मुख्य मंत्री भी देर-सवेर जांच के 
लपेटे में आ सकते हैं।
 हाल के दशकों में सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार और घोटालों के सिलसिले में कई नेता,अफसर और व्यापारी
 जेल गए।
कुछ जेल यात्रा के कारण ही मरे भी।
कुछ अन्य अब भी मुकदमों का सामना कर रहे हैं ।
कुछ अन्य जेल में सड़ रहे हैं।
भ्रष्टाचार व अपराध के कारणों से कुछ दल व राजनीतिक परिवार बर्बाद भी हो रहे हैं।
संकेत साफ हंै कि अगले चार-पांच साल के भीतर इस देश की अन्य अनेक बड़ी राजनीतिक व गैरराजनीतिक हस्तियां जेल की हवा खाने वाली हैं।
आखिर कब तक बेल पर रह पाएंगे वे ?
इसके बावजूद अनेक प्रभावशाली लोगों में अपार धन की हवस कम ही नहीं हो रही है।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ? 
क्या भ्रष्टाचार निरोधक कानून नाकाफी हैं ?
 या, सजा की दर कम है ? 
या फिर वे समझते हैं कि कफन में भी जेबें हुआ करती हैं ? 

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

क्या कांग्रेस का पुनरुद्धार संभव है ?
पूरे देश में इन दिनों अनेक नेता, राजनीतिक विश्लेषक,पत्रकार व बुद्धिजीवी लोग इसी चर्चा में
व्यस्त हैं।
होगा भी या नहीं ?
पर, इस संबंध में मेरी भी एक राय है।
 2014 के लोक सभा चुनाव में अभूतपूर्व हार के बाद ए.के.एंटोनी ने लिखित रूप में हार के कुछ ठोस कारण बताए थे।
सोनिया गांधी ने उनसे पूछा था।
 क्या उन कारणों को दूर किए बिना पुनरुद्धार असंभव है ?
उनमें से दो कारण प्रमुख हैं।
एक अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और दूसरा भ्रष्टाचार।
  यहां सामान्य अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण में कोई  समस्या नहीं है।उनके भले के लिए तो हर दल को काम करना ही चाहिए।
पर,कांग्रेस के साथ समस्या है कि वह अल्पसंख्यकों के बीच के अतिवादियों यहां तक कि देशद्रोहियों तक का भी तुष्टिकरण व समर्थन करती रही है।
भ्रष्टाचार का मतलब सामान्य भ्रष्टाचार नहीं बल्कि घोटाला दर घोटाला।कभी- कभी महा घोटाला।
दाल में नमक के बराबर भ्रष्टाचार को तो आज कम ही लोग बुरा मानते हैं।
क्या कांग्रेस इन दो गंभीर बुराइयों को खुद से दूर कर 
सकती है ?
चाहे तो कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अतिवादी तुष्टिकरण से तोबा  कर सकती है।
घोटालों-महा घोटालों  से दूर हो जाने की गंभीर कोशिश कांग्रेस की राज्य सरकारें तो कर ही सकती हैं ।
यदि ये दो बातें हो जाएं तो पुनरुद्धार की शुरुआत हो सकती है।नरेंद्र मोदी का मुकाबला तो फिर भी उनके लिए मुश्किल काम होगा।
कांग्रेस को ऐसा ठोस राजनीतिक विरोधी आज तक मिला ही नहीं था।
लेकिन मुझे तो लगता है कि वे ऐसा कोई सुधार करने की क्षमता अब खो चुके हैं।
क्योंकि कंबल से रोएं को अलग नहीं किया जा सकता है। 

बुधवार, 10 जुलाई 2019

कुछ संगठनों के स्थापना वर्ष

मुस्लिम लीग -- 1906

हिन्दू महासभा -- 1914

आर.एस.एस -- 1925

रामराज्य परिषद -- 1948

बजरंग दल - 1984

शिवसेना - 1966

सिमी - 1977

पोपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया - 2006