शनिवार, 17 अगस्त 2019

    
पिछले जमाने के फिल्म अभिनेता राजेंद्र कुमार को 
‘जुबली कुमार’ भी कहा जाता था।
क्योंकि जिस फिल्म में वे आते थे,वह जुबली मनाती थी।
उन्होंने अपने पुत्र कुमार गौरव को भी हीरो बनाना चाहा।
नहीं चले।
गौरव किनारे हो लिए।
उसी तरह राजनीति में कुछ नेता पुत्र नहीं चल पा रहे हैं।
उनके कारण पार्टियां कमजोर होती जा रही हैं।
पर उन्हें ही नया सुप्रीमो बनाए रखने की जिद जारी है।
  निर्माताओं -निवेशकों ने तो कुमार गौरव जैसे प्रतिभा विहीन अभिनेताओं पर अपनी पूंजी डुबोने से मना कर दिया था।
पर उसके विपरीत कुछ जमी -जमाई राजनीतिक पार्टियां 
नेता पुत्रों-पुत्रियों  पर अपनी राजनीतिक पूंजी गंवाने पर अमादा है।  
  याद रहे कि मैं किसी ‘नेता पुत्र’ के राजनीति में आने के खिलाफ नहीं हूं।
लेकिन यदि वे किसी खास पद के योग्य नहीं हैं तो उन्हें किसी दूसरे काम मंे लगाइए।
योग्य हैं तो जरूर पूरा अवसर दीजिए।
  सिंधिया परिवार की ‘ताजी फसल’ जैसों को और अधिक मौका मिले तो भी कोई हर्ज नहीं।


राजनीति के अवांछित तत्वों से मुक्ति पाने का अवसर !
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स्वतंत्रता दिवस पर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि ‘क्राइम, कम्युनलिज्म और करप्शन से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा।’
 किसी राज्य या देश का मुखिया यदि ऐसा कहता है तो शांतिप्रिय लोगों को राहत मिलती है।
उम्मीद है कि नीतीश कुमार अपनी इस उक्ति को कार्य रूप भी देंगे।
  पर, इसके अलावा एक और बुराई है जिससे दूर रहना चाहिए।
राजनीति में अब भी मौजूद भले लोगों को वैसे नेताओं से भी दूर रहना चाहिए जो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक के ठेकेदार रहे हैं।
हालांकि अब उनका जमाना पूरी तरह गुजर जाने वाला है,ऐसे संकेत मिल रहे हैं।
गुजरना शुरू भी हो चुका है।
  केंद्र की राजग सरकार ऐसे -ऐसे काम कर रही है और करने वाली है जिनसे कुछ अपवादों को छोड़कर देश भर में राजग उम्मीदवारों पर वोट बरसेंगे।
   क्राइम,कम्युनलिज्म और करप्शन का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।
वोटों के ठेकदार भी इतिहास की चीज बन जाएंगे।
  हां, बिहार में राजग को 2005 में ऐसे तत्वों से मदद लेने की शायद मजबूरी थी।
क्योंकि तब यह कहा गया था कि लोहे को लोहा ही काटता है।
पर 2010 के बिहार विधान सभा चुनाव नतीजे ने बता दिया था कि अब कत्तई जरूरत नहीं है।फिर राजग उन तत्वों को ढोता रहा।
अब राजग के भीतर के अवांछित तत्वों से मुक्ति पाने का बहुत अच्छा अवसर आ गया है।अवसर हाथ से निकलने मत दीजिए।  
क्योंकि पता नहीं आगे क्या होगा !
राजनीति कब कैसी करवट बदलती है,कहा नहीं जा सकता।
किसी की एक गलती किसी को कहां से कहां पहुंचा देती है ! 

‘बीमारू’ प्रदेशों में कितने सरकारी स्कूल हैं जिनसे पढ़कर मैट्रिक पास हुए विद्यार्थियों को शुद्ध हिन्दी और अंग्रेजी लिखना-पढ़ना सिखा दिया गया होता है ?
  मैं सिर्फ भाषा की बात कर रहा हूं, विषयों के ज्ञान की नहीं।
  

शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

कश्मीरियों को जितने अधिकार अन्य प्रांतों में मिले हैं,
उतने अन्य प्रदेश के लोगों को कश्मीर में क्यों नहीं उपलब्ध ?
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केंद्र सरकार का यह कत्र्तव्य है कि वह  यह सुनिश्चित करे  कि कश्मीरियों को जितने अधिकार भारत के अन्य प्रांतों में हासिल हैं,उतनेे अधिकार जम्मू -कश्मीर में भारतीयों को दिलाए।यदि ऐसा करेगी तो वह डा.आम्बेडकर की इच्छा पूरी करेगी। 
याद रहे कि डा.आम्बेडकर ने लिखा है कि जब सन 1949 में संविधान की धाराओं का ड्राफ्ट तैयार हो रहा था ,तब शेख अब्दुला मेरे पास आए।
बोले कि नेहरू ने मुझे आपके पास यह कह कर भेजा है कि आप आम्बेडकर से कश्मीर के बारे में अपनी इच्छा के अनुसार ड्राफ्ट बनवा लीजिए जिसे संविधान में जोड़ा जा सके।
 डा.आम्बेडकर ने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘मैंने शेख अब्दुल्ला की बातें ध्यान से सुनीं।उनसे कहा कि एक तरफ तो आप चाहते हो कि भारत कश्मीर की रक्षा करे।
कश्मीरियों को खिलाए-पिलाए।
उनके विकास के लिए प्रयास करे।
कश्मीरियों को भारत के सभी प्रांतों में सुविधाएं और अधिकार दिए जाएं।
किंतु भारत के अन्य प्रांतों के लोगों को कश्मीर में वैसी ही सुविधाओं और अधिकारों से वंचित रखा जाए।
आपकी बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि आप भारत के अन्य प्रांत के लोगों को कश्मीर में समान अधिकार देने के खिलाफ हैं।’
यह कह कर आम्बेडकर ने शेख से कहा कि ‘मैं कानून मंत्री हूं।
मैं अपने देश के साथ गद्दारी नहीं कर सकता।
   जब आम्बेडकर ने शेख अब्दुल्ला से संविधान में उसके अनुसार ड्राफ्ट जोड़ने से यह कह कर साफ मना कर दिया कि मैं देश के साथ विश्वासघात नहीं कर सकता,तब नेहरू ने गोपालस्वामी अयंगार को बुलवाया।
वे संविधान सभा के सदस्य थे और कश्मीर के राजा हरि सिंह के दीवान रह चुके थे।
प्रधान मंत्री के तौर पर नेहरू ने अयंगार को आदेश दिया कि शेख साहब जो भी चाहते हैं,संविधान की धारा 370 में वैसा ही ड्राफ्ट बना दिया जाए।
  ---डा.आम्बेडकर की उपर्युक्त टिप्पणी 27 जुलाई 2019 के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित। 
कुमार समीर के लेख का अंश। 

  


स्वतंत्रता दिवस पर एक स्वतंत्रता सेनानी की सदिच्छा !
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जनता-प्रतिनिधि-सरकार सहकार के पक्षधर थे जेपी
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 ‘ मुझे लगता है कि जनतंत्र को मजबूत बनाने और उसका सफलतापूर्वक संचालन करने के लिए यह जरूरी है कि केवल चुने हुए प्रतिनिधियों 
और प्रशासनिक तंत्र पर ही आधार न रखकर उत्तरोत्तर अधिक से अधिक लोगों को इस सारी प्रक्रिया में शरीक किया जाए।
 जनतंत्र को इस प्रकार लोक सम्मति और लोक सहकार का व्यापक आधार देना जरूरी है।इसीलिए गांधी जी ने आजादी के बाद सबसे ज्यादा जोर व्यापक लोक शिक्षण के द्वारा सामान्य नागरिक की चेतना को जागृत करने और लोक शक्ति को संगठित 
करने पर दिया था।
इसके बिना लोकतंत्र की जड़ें मजबूत नहीं हो सकतीं।’
   उपर्युक्त बातें सन् 1978 में जय प्रकाश नारायण ने तत्कालीन जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्र शेखर को लिखे पत्र में कही थीं।
  जनता पार्टी के एक साल के शासन के बाद ही जेपी ने लिखा था कि सन 1977 में लोक सभा चुनावों के समय जनता में जो अभूतपूर्व उत्साह और आशा का संचार हुआ था,वह कुल मिलाकर ठंडा पड़ गया है।जनता मेें निराशा की भावना बढ़ रही है।
इसके कारणों में हमें जाना चहिए।जेपी के पत्र से अलग एक बात याद रखने की है। मोरारजी देसाई के शासन काल में चीजों के दाम स्थिर थे।कोई बड़ा सरकारी घोटाला भी नहीं हुआ था।उन दिनों के अधिकतर नेतागण आज के अधिकतर नेताओं के अपेक्षा अधिक ईमानदार और कर्मठ थे।इसके बावजूद वह सरकार जेपी की कसौटी पर खड़ी उतर नहीं रही थी।
   जेपी ने अपने लंबे पत्र में मोरारजी की सरकार के कुछ कामों की सराहना की ,पर कुछ अन्य मामलों में उन्होंने लिखा कि जनता की कुछ अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पा रही हैं।जेपी  सरकार चलाने में जनता का सहकार चाहते थे।
  जेपी ने तब चंद्र शेखर को यह  भी लिखा था कि जनता,शासन और जन प्रतिनिधि के बीच सहकार बढ़ाने के रास्ते में यदि पुराना प्रशासनिक दष्टिकोण,नियम या कार्य पद्धति आड़े आ रहे हों तो उन्हें हमें बदल देना  चाहिए।जनता पर भरोसा करना चाहिए।
    भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए जेपी ने लिखा था कि विकास और निर्माण की योजनाएं तो पिछले वर्षों में बहुत बनीं, पर ंभ्रष्टाचार उनकी सफलता में सबसे बड़ी बाधा बन गया है।हमारी मौजूदा प्रशासनिक पद्धति और तंत्र भी भ्रष्टाचार के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है।भ्रष्टाचार कम करने के लिए यह आवश्यक है कि अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही मौजूदा शासन पद्धति और नियमों में ,विकास और निर्माण के लक्ष्य की पूत्र्ति को सामने रख कर आवश्यक परिर्वतन किया जाए।
राजनीतिक रीति नीति और चुनाव की मौजूदा प्रणाली के कारण भी भ्रष्टाचार बढ़ गया है।
भ्रष्टाचार के इन विभिन्न रूपों पर ध्यान देकर उनका निराकरण करना जरूरी है।
   बिहार आंदोलन की याद दिलाते हुए जेपी ने  लिखा था कि आपको यह ध्यान दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि 1974-75 में जो जन आंदोलन खड़ा हुआ था,उसका लक्ष्य केवल कुछ बातोें में सुधार करने का नहीं था।
  बल्कि उसका लक्ष्य भारत के सार्वजनिक जीवन को,संकुचित अर्थ में राजनीति नहीं,बल्कि पौलिटी के व्यापक अर्थ में देश की अपनी संस्कति ,परंपरा और प्रतिभा के अनुकूल मोड़ देने का था।
   1977 में जनता में जो अभूतपूर्व उत्साह प्रकट हुआ था,वह भी केवल सत्ता परिवत्र्तन के लिए नहीं था।बल्कि एक नये समाज के निर्माण की आकांक्षा का दयोतक था।दुर्भाग्य से अभी तक हम उस अवसर को पकड़ नहीं पाये।अब भी इस बारे में गहराई से चिंतन शुरू होना चाहिए और भारत के पुनर्निर्माण के लिए जनता की जो आकांंक्षा जागृत हुई थी,उसका समुचित उपयोग होना चाहिए।
   राजनीतिक इच्छाशक्ति की चर्चा करते हुए जेपी ने लिखा कि ऊपर मैंने जो बातें गिनाई हैं,वे केवल उदाहरण के रूप में नहीं ,बल्कि मेरी दृष्टि से वे 
राष्ट्र की प्रगति और विकास के लिए आवश्यक है।
   इसलिए प्राथमिकताओं के रूप में मैंने उनका जिक्र किया है।
पर इन कामों को सफल बनाने के लिए जो चीज आवश्यक है,वह है राष्ट्र की सम्मिलित संकल्प शक्ति या पोलिटिकल विल।
 आज केंद्र के अलावा कई राज्यों में जनता पार्टी की सरकारें हैं।पर कई अन्य प्रदेशों में अलग- अलग दलों की सरकारें भी हैं।देश के निर्माण के लिए इन सबकी आम सहमति या कानसेंसस विकसित होना आवश्यक है। 
  

वामपंथी इतिहासकार शमसुल इस्लाम ने 1942 के आंदोलन
के साथ ‘शर्मनाक विश्वासघात’ करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तो जम कर खिंचाई की है,
 पर,डा.आम्बेडकर और सी.राज गोपालाचारी के ‘विश्वासघात’ की चर्चा तक नहीं की।
जिन्ना का नाम भी क्यों लेते !
इससे गंगाधर अधिकारी की आत्मा को चोट पहुंच सकती थी जिस कम्युनिस्ट नेता ने द्विराष्ट्र के सिद्धांत का समर्थन किया था।
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उन्हीं की थ्योरी थी।
   इतना ही नहीं, विद्वान शमसुल साहब ने इन ‘पापियों के पाप धोने वाल’े जवाहरलाल नेहरू का जिक्र तक नहीं किया जिन्होंने अपने पहले मंत्रिमंडल में ही इन तीनों ‘पापियो’ं को शामिल करके इनके ‘पाप’ को पहले ही ‘धो डाला’ था।
 इन तीन में से एक ‘पापी’ राज गोपालाचारी को तो नेहरू राष्ट्रपति बनवाना चाहते थे।
पर जब पटेल आड़े आने लगे तो नेहरू ने प्रधान मंत्री पद से इस्तीफा दे देने की भी धमकी दे डाली थी।
पर व्यापक विरोध देख कर नेहरू इस्तीफे से पीछे हट गए।कांग्रेस के दिग्गजों ने नेहरू से यही कहा था कि 1942 के आंदोलन का विरोध करने वाले को हम और यह देश राष्ट्रपति कैसे मान लेंगे ?
 शमसुल साहब जैसे इतिहासकार ने इस रहस्य को खोजने की कोशिश तक नहीं की कि स्वतंत्र व्यापार यानी खुले बाजार  यानी लेसेज फेयर के कट्टर समर्थक राजा जी को नेहरू राष्ट्रपति क्यों बनवाना चाहते थे ।
राजा जी से उनके कौन से विचार मिलते थे ?
कौन सी समानता दोनों के बीच  थी ?
   जब कतिपय बुद्धिजीवियों के अर्ध देवता नेहरू ने ही इन तीनों ‘पापियो’ं को सम्मानित कर दिया तो आम जनता ने भी इनके उत्तराधिकारियों को कालांतर में आज देश की लगभग पूरी सत्ता सौंप दी।
  शमसुल साहब ने इसकी खोज तो कर ली कि सी.पी.आई.के कई नेताओं ने 1942  की लड़ाई में हिस्सा लिया था,भले सी.पी.आई.ने नहीं लिया।अच्छा किया।यह बात सही भी है।
पर आर.एस.एस.और हिन्दू महा सभा के किन- किन लोगों ने आजादी की लड़ाई में भाग लिया ,उसका पता लगाने को काम दिल्ली विश्व विद्यालय के अध्यापक राकेश सिन्हा पर छोड़ दिया।
  यदि सब कुछ शमसुल साहब ही लिख देते तो उन महान वामपंथी इतिहासकार के निदेश का क्या होता कि --‘राणा प्रताप और शिवाजी के शौर्य का गुणगान मत करना अन्यथा देश में हिन्दू सांप्रदायिकता बढ़ेगी।’

  

इतिहास के पन्नों से 
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   इमरजेंसी लगाने का निर्णय सिर्फ इंदिरा गांधी का था
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शाह आयोग ने कहा था कि देश में इमरजेंसी लगाने का निर्णय केवल प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी का था।
  आपातकाल--1975-77-- में ज्यादतियों की जांच के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने मई, 1977 में जे.सी.शाह के नेतृत्व में आयोग बनाया था।
शाह सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे।
 आयोग ने 1978 में पेश अपनी अंतरिम रपट में कहा था कि
‘वैसे गृह मंत्री ब्रह्मानंद रेड्डी से भी कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया।
राष्ट्रपति को इमरजेंसी लगाने का परामर्श भेजने से पहले रेड्डी को सिर्फ सूचना दे दी गई थी।
रेड्डी का सहयोग उनसे सिर्फ पत्र को प्राप्त करने के लिए लिया गया क्योंकि उद्घोषणा के मसविदे को औपचारिक रूप से राष्ट्रपति को गृह मंत्रालय ही भेज सकता था।’ 
  --अंतरिम रपट पेज संख्या-37
इस संबंध में प्रधान मंत्री के संयुक्त सचिव बिशन टंडन ने 26 जून 1975 को अपनी डायरी में लिखा,
‘कल रात दस बजे प्रधान मंत्री ने प्रो.धर और शारदा को अपने निवास स्थान पर बुलाया।वहां बरूआ और सिद्धार्थ पहले से उपस्थित थे।
‘जब प्रो.धर और शारदा पहुंचे तो प्रधान मंत्री ने कहा कि ‘आई हैव डिसाइडेड टु डिक्लेयर इमर्जेंसी।
प्रेजीडेंट हैज एग्रीड।
आई विल इन्फार्म द कैबिनेट टुमारो।’
यह कहते हुए आपातकाल की घोषणा का प्रारूप प्रो.धर के हाथ में रख दिया।’