रविवार, 15 दिसंबर 2019

नेहरू पर मथाई की चर्चित पुस्तक अमेजन पर
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जवाहरलाल नेहरू के 13 साल-- तक निजी सचिव रहे 
एम.ओ.मथाई ने दो संस्मरणात्मक पुस्तकें लिखी हैं।
आजादी के बाद का वे भारत और यहां के प्रमुख नेताओं का सच्चा इतिहास है।
वैसी किताब लिखने के लिए बहुत साहस चाहिए।
जब छपकर आई थी तो खुशवंत सिंह ने कहा था कि ‘‘मथाई को चैराहे पर कोड़े लगाए जाने चाहिए।’’
इस संबंध में दो राय हैं कि निजी सचिव को अपने बाॅस की भीतरी बातें लिख देनी चाहिए या नहीं ?क्या लिखना विश्वास भंग है ?
अरूण शौरी ने अस्सी के दशक में कर्नाटका के तत्कालीन मुख्य मंत्री गुंडूराव से हुई निजी बातचीत को अंग्रेजी साप्ताहिक संडे में इंटरव्यू के रूप में छपवा दिया था।
गुंडूराव ने कहा कि यह धोखा है।
शौरी ने जवाब दिया  कि वे मेरे रिश्तेदार तो थे नहीं जो वे मुझसे निजी बातें कर रहे थे !
दूसरी ओर, मथाई ने कहा कि नेहरू के यहां मैं नौकरी मांगने नहीं गया था।सन 1946 में उन्होंने मुझे बुलाकर रखा था।
मथाई कहना चाहता था कि नेहरू देश के साथ क्या अच्छा -बुरा कर रहे थे ,यह लोगों को बताना नागरिक के रूप में मेरा कत्र्तव्य है। 
स्वाभाविक है कि मथाई की किताब प्रतिबंधित हो जाए।
वे भारत में हो भी चुकी हैं।
इसलिए कि नंगी सच्चाई कोई भी शासक बर्दाश्त नहीं कर सकता।
  भारत में प्रतिबंधित है,किन्तु लगता है कि विदेश में छप रही हैं।
खबर है कि एमेजन उसकी मार्केटिंग कर रहा है।
पुस्तकों के नाम हैं-
1-नेहरू युग-जानी अनजानी बातें और
 2-नेहरू के साथ तेरह वर्ष।
किताब मूलतः अंग्रेजी में लिखी गईं।
देश की अधिकतर भाषाओं में अनुदित हुईं।
1978 में जब मैंने खरीदी थीं तो उनकी कीमत बहुत कम थी।
अब 400 रुपए है।
पर, एक पाठक के अनुसार अमेजन ने एक किताब के लिए 3 हजार रुपए लिए।
वह भी किताब की फोटोकाॅपी है।
  मेरी समझ से अपने देश की दुर्दशा के असली कारणों को जिन्हें जानना हो,वे मथाई की उन किताबों को जरूर पढ़ें।
मिल जाए तो फोटोकाॅपी ही सही।
महंगा नहीं पड़ेगा।
  असली कारण नहीं जानिएगा तो उन कारणों को मिटाने की कोशिश कैसे करिएगा ?
हां,जो लोग खुले दिमाग के हैं,सिर्फ वही पढ़ें।
भक्त लोगों को निराशा होगी।
 हालांकि मथाई ने पुस्तकों में नेहरू की सिर्फ आलोचना ही नहीं की है।
उनके बहुत से महान व विरल गुणों की भी चर्चा की है।
  बात तब की है जब मथाई जीवित था।
तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जार्ज फर्नांडिस ने नेहरू की आलोचना में एक बयान दिया था।
 उस पर मथाई ने गुस्से में आकर कहा कि ‘‘नेहरू के जूते के फीते बांधने की नौकरी करने की योग्यता भी फर्नांडिस में नहीं है।वह क्या नेहरू की आलोचना करेगा ?’’
  यह और बात है कि मथाई जार्ज को पूरा नहीं जानता था।
मैं फर्नांडिस के गुण-अवगुण कुछ अधिक जानता हूं।
कुल मिलाकर जार्ज अपने अनेक समकालीन नेताओं की अपेक्षा अधिक ईमानदार,साहसी और देशभक्त था।
  जार्ज फर्नांडिस पर मुम्बई के मशहूर पत्रकार नीलू दामले  प्रामाणिक किताब लिख रहे हंै।
उनके साथ काम भी कर चुके हैं।
उस किताब की तैयारी के लिए नीलू बिहार भी आए थे।
संभवतः वह किताब तैयार हो गई होगी।
पर अफसोस है कि वह किताब अभी सिर्फ मराठी में है।
कोई हिन्दी -अंग्रेजी प्रकाशक चाहे तो वह नीलू दामले से संपर्क कर सकता है।गैर मराठी पाठकों का कल्याण होगा।
  

शनिवार, 14 दिसंबर 2019

बाहुबलियों के प्रभाव वाले इलाके मेंं बेहतर कानून-व्यवस्था की जरूरत--सुरेंद्र किशोर



बिहार के कई बाहुबली इन दिनों विभिन्न जेलों में हैं।
उनमें से कुछ के निकट भविष्य में जेल से बाहर आने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है।
  वे समय -समय पर जन प्रतिनिधि भी रहे हैं।
लोक सभा या विधान सभा के चुनाव में उनके विजयी होने के कई कारण थे ।
पर, उनमें से एक महत्वपूर्ण कारण की यहां चर्चा मौजूं है।
चुनावों मेंे उनकी जीत के पीछे सिर्फ उनका बाहुबल ही कारगर नहीं होता था।
बल्कि उनमें से कुछ की शैली ‘‘रोबिनहुड’’ वाली भी थी।
यानी मतदाताओं का एक हिस्सा उन्हें खुशी -खुशी भी वोट दे देता था।
क्योंकि उसे ‘नेता जी’ से वैसी  मदद मिलती थी जैसी मदद शासन नहीं दे पाता था। 
बिहार में जहां -जहां और जब -जब पुलिस-प्रशासन एकतरफा या निकम्मा होता गया,वहां-वहां  समानान्तर निजी सेनाएं  उभर कर सामने आती रही ।सत्तर के दशक से ही यह होता रहा।
वैसे आजकल सेनाओं का प्रभाव घटा है।
पर बाहुबली नेताओं के
प्रभाव का अवशेष बचा हुआ है।
  ऐसी जमात का नेतृत्व वे बाहुबली नेता करते रहे जो अभी वहां से अनुपस्थित हंै।वे कम से कम एक पक्ष की मदद तो करते  रहे।अब उस पक्ष की मदद कौन कर रहा है ?
  क्या इस बीच उन इलाकों में पुलिस -प्रशासन की कार्य कुशलता बढ़ी है ?
यदि नहीं तो बढ़नी चाहिए।
यदि वैसे खास इलाकों में शासन -प्रशासन में सिर्फ एक ही पक्ष या समाज के एक हिस्से की ही सुनवाई होगी तो दूसरा पक्ष वहां अपने बीच से कोई अन्य बाहुबली पैदा कर लेेगा।
 याद रहे कि वैसे  इलाके बाहुबलियों के लिए उर्वर भूमि रही  है।
  कोई अन्य बाहुबली पैदा न हो,इसलिए जरूरी है कि वहां कानून के शासन की जरूरत पर अन्य जगहों की अपेक्षा कुछ अधिक ही सतर्कता बरती जाए।
 -- ऐसे पैदा होते हैं रोबिनहुड--
बात थोड़ी पुरानी है।
बिहार के एक खास इलाके में खेतिहर मजदूरों का कुछ अधिक ही शोषण हुआ।
वहां ‘नक्सल गोत्र’ के कम्युनिस्ट सक्रिय हो गए।
उन्होंने मजदूरों को एक हद तक न्याय दिलवाया।
  पर उस सिलसिले में वहां हिंसा भी हुई।कम्युनिस्टों की ओर से हुई  हिंसा के जवाब में भूमिपतियों ने भी हिंसा की।
 भूमिपतियों की अघोषित सेना का ‘लीडर’ कुछ अधिक ही ‘कारगर’ साबित हुआ।
वह बाहुबली बनकर चुनाव लड़ गया।जीत भी गया।अब वह अपने चुनाव क्षेत्र से दूर है।
 सवाल है कि जो काम वहां वह बाहुबली करता था,उसकी कमी कौन दूर करेगा ?
  अब शासन की जिम्मेवारी है कि वह बाहुबली का  आतंक भी रोके और नक्सलियों के उपद्रव को भी। 
  --दलों के भीतर से बेसुरा राग-- 
 बेसुरा राग अलापने वाले कई दलों में नेता लोग मौजूद हैं।
बड़ी पार्टी है,इसलिए कांग्रेस में ऐसे लोग अपेक्षाकृत अधिक पाए जाते हैं।भाजपा मेंं तो कुछ नेता यदाकदा पार्टी की परेशानी के कारण बन जाते हैं।इधर जदयू में भी स्वर उभरने लगे हैं। 
बेसुरा राग यानी दलीय नेतृत्व की जो राजनीतिक लाइन है,उससे अलग हट कर बयान देना।
  बेसुरा राग अलापने वालों में कुछ तो अपनी आदत से लाचार हैं।
कुछ से तो शीर्ष नेतृत्व ही अंटशंट बोलवाता है।
कुछ बड़े नेता जो बात खुद नहंीं बोलना चाहते ,वे बातें अपने दल के किसी अन्य नेता से बोलवा देते हैं।कुछ मामलों में पद -वंचित नेता भी अपना महत्व बढ़ाने या नेतृत्व का भयादोहन करने के लिए पार्टी की लाइन के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर बोल देते हैं।
  पर कुल मिलाकर इसका असर आम कार्यकत्र्ताओं व मझोले दर्जे के नेताओं पर अच्छा नहीं पड़ता।
  यदि किसी दल में अधिक बेसुरे राग आने लगें तो यह धारणा बनती है कि शीर्ष नेतृत्व की पार्टी पर पकड़ ढीली पड़ने लगी है।ऐसी धरणा किसी भी दल के लिए ठीक नहीं।
इसलिए आदतन बेसुरों पर अंकुश लगाना दल हित में उठाया गया कदम ही माना जाएगा।    
  --कार्य कुशलता बढ़ाए बिना
 लोक उपक्रमों का भविष्य नहीं-- 
सामरिक महत्व के क्षेत्रों में विदेशी निवेश को भारत सरकार बढ़ावा नहीं देगी।
यह बहुत अच्छी बात है।
पर, सामरिक महत्व के दूर संचार और निर्माण क्षेत्रों मेें व्याप्त भ्रष्टाचार पर कड़ाई से रोक लगाने 
का भी उपाय केंद्र सरकार को करना चाहिए।
इससे लोगों का उन उपक्रमों पर विश्वास बढ़ेगा।
पब्लिक सेक्टर के अनेक प्रतिष्ठानों की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण काहिली और भ्रष्टाचार ही रहे हैं। 
हालांकि कुछ लोक उपक्रम अच्छा काम भी कर रहे हैं।
 --अश्लीलता पर काबू  
के लिए कड़ी सेंसरशिप जरूरी-- 
बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के लिए अश्लीलता का प्रचार-प्रसार भी जिम्मेवार है।
 ऐसे में भारत सरकार यह सुनिश्चित करे कि सभी भाषाओं की फिल्मों पर कठोरता से सेंसरशिप नियम लागू किए जाएं।
सेंसर बोर्ड के  विभिन्न पदों पर ठीकठाक लोगों को बैठाया जाए।
अभी सेंसरशिप बिलकुल लागू नहीं है।इस  बात में जिन्हें शक हो वे सेंसरशिप नियमों को पढ़ें और फिर आज की फिल्मों को उस कसौटी पर कसें। 
इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया पर भी गहराई से नजर रखी जाए।
--और अंत में--
 सन 2003 में राज्य सभा में कांग्रेस दल के नेता व पूर्व वित्त मंत्री मन मोहन सिंह ने कहा था कि बंगला देश के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए हमें उदार होना चाहिए।
  पर अब पूर्व प्रधान मंत्री श्री सिंह और कांग्रेस ने नागरिकता के सवाल पर अपनी राय बदल ली है।
समय -समय पर अपनी राय बदलने वाले नेताओं की इस देश में भरमार है।
ऐसे नेता  सिर्फ किसी एक दल में नहीं हैं।
  ऐसे लोगों के  लिए भोजपुर इलाकांे में एक कहावत है-
‘‘जब जइसन,तब तइसन,
ना करे सो मरद कइसन !’’
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13 दिसंंबर, 2019 के प्रभात खबर-पटना-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से।

हेडमास्टर ने सिलेबस ही बदल डाला !
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शिव सेना नेता संजय राउत ने भाजपा की ओर इशारा करते हुए हाल में कहा कि तुम जिस स्कूल में पढ़ते हो,उसके हम हेड मास्टर हैं।
संजय जी, 
आप हेडमास्टर जरूर हैं।
पर, आप तो सिलेबस ही बदल रहे हैं।
परिवत्र्तित सिलेबस वाले स्कूल में कौन विद्यार्थी 
पढ़ने जाएगा ?
अपना स्कूल ही बदल लेगा। 
एक नमूना पेश है--
‘उद्धव सरकार ने संघ से जुड़े संस्थान की स्टांप शुल्क छूट रद की।’
---दैनिक जागरण--6 दिसंबर 2019
इतना ही नहीं,
उद्धव ठाकरे सरकार ने भीमा कोरेगांव केस के आरोपियों को बिना ट्रायल रिहाई का वादा कर दिया।
खबर यह भी है कि महाराष्ट्र में अवैध धर्मांतरण गिरोह एक बार फिर सक्रिय हो गया है।
ऐसे और भी काम शिवसेना सरकार अपने ‘सेक्युलर’ साथियों खासकर कांग्रेस के निदेश पर कर रही है।
अपनी शैली छोड़कर कांग्रेस शैली के काम और भी करने वाली है।
करने पड़ेंगे।
जैसे, नागरिक संशोधन बिल पर शिवसेना की राज्य सभा से अनुपस्थिति।
जबकि, लोक सभा में इस विधेयक के पक्ष में शिव सेना ने मत दिया था।
लगता है कि शिवसेना मुख्य मंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए आने वाले दिनों में खुद को इतना बदल लेगी कि यह पहचानना मुश्किल हो जाएगा कि बाल ठाकरे वाला दल कहां है ? 
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महाराष्ट्र की राजनीतिक प्रयोगशाला में जो कुछ हो रहा है, कांग्रेस सहित अन्य गैर भाजपा दलों ने यह साफ संकेत दे दिया है कि यदि 2024 में देश की सत्ता मिली तो हम फिर वही सब काम करेंगे जो कुछ मनमोहन राज में हो रहा था।
वैसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ‘महाराष्ट्र प्रयोगशाला’ को देखते हुए मतदाता 2024 में क्या करेंगे !!  

जो जहर पीएगा,वह जहर ही तो उगलेगा !!
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पहले आपने उनसे सत्ता छीनी !
उसके बाद उनकी अपार संपत्ति के पीछे जांच 
एजेंसियों को लगा दिया।
अब आप चाहते हैं कि उनकी लोक सभा की सदस्यता भी चली जाए ! ?
ऐसे में उनकी जुबान से जहर टपकेगा या शहद की 
वर्षा होगी ?
   वैसे भी उनकी मां ने करीब 7 साल पहले ही उनसे यह कह दिया था कि ‘‘सत्ता जहर है।’’
गाना तो फिल्मी है,पर राजनीति के बहुत सारे नेतागण मन ही मन गुनगुनाते रहते हैं,उस पर अमल भी करते हैं भले उसका नतीजा जो हो !
‘‘दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा,
जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा।’’
  फिर क्या पूछना ?
जो जहर पीएगा,वह जहर ही तो उगलेगा !!!

आज ये चार मुख्य समस्याएं हैं 
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1.-भ्रष्टाचार,
2.-जेहादी आतंकवाद,
3.-अवैध घुसपैठ 
और 4.-बिगड़ता पर्यावरण संतुलन।
वैसे, समस्याएं और भी हैं
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चीन इन समस्याओं से कैसे निपट रहा है ?
1.-चीन में भ्रष्टों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है।
2.- जेहाद की मानसिकता वाले चीन के 30 लाख उइगर मुस्लिम नजरबंद हैं।
उन्हें देशभक्ति का पाठ चीन सरकार सिखा रही है।
3.-चीन सरकार ने अपने सुरक्षाकर्मियों कोे यह सख्त आदेश दे रखा है कि चीन की सीमा में अवैध ढंग से प्रवेश करने की कोशिश करते लोगों को तत्काल गोली मार दी जाए।
उसी तर्ज पर चीनपंथी सी.पी.एम. की पश्चिम बंगाल सरकार की पुलिस व पार्टी काॅडर ने 1979 में बंगला देश से पश्चिम बंगाल की सीमा में आए 1700 हिन्दू शरणार्थियों के काम तमाम कर दिए थे।
4.-चीन ने कोयला पर आधारित बिजली उत्पादन केंद्रों को बंद करने जैसे अनेक कड़े कदम उठाए हैं।
और अन्य कदम भी चीन उठा रहा है।
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दूसरी ओर, इन अत्यंत गंभीर समस्याओं के समाधान की दिशा में हम क्या कर रहे हैं ?
कितना कर रहे हैं ?
कितने सफल हो रहे हैं ?
जितना कर रहे हैं,उसका कैसे -कैसे लोग विरोध और समर्थन कर रहे हैं ?
उनके विरोध के पीछे मंशा क्या है ?
क्या किसी दिन यह मान लिया जाएगा कि ढीली -ढाली कानून -व्यवस्था वाले हमारे लचर लोकतंत्र में ऐसी जानलेवा  समस्याओं का समाधान संभव ही नहीं है ?

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019


 आरक्षण पर हलचल मचाने वाली रपट की केंद्र को है प्रतीक्षा----
केंद्र सरकार ने मंडल आरक्षण कोटे के भीतर  कोटे के लिए एक आयोग का गठन गत साल  किया। संविधान के अनुच्छेद -340 के तहत इस आयोग का गठन हुआ है।
कोटे में कोटा यानी 27 प्रतिशत मंडल आरक्षण का दो या तीन हिस्सो में  विभाजन।
आयोग की अध्यक्ष दिल्ली हाई कोर्ट की रिटायर जज जी.रोहिणी हैं। इस आयोग को  तीन महीने में अपनी रपट देनी है।
वह अवधि पूरी होने ही वाली  है।रपट किसी भी समय आ सकती है।
  राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने इस संबंध में पहले ही सिफारिश कर रखी है।आयोग के अनुसार 27 प्रतिशत आरक्षण को तीन भागों में बांट दिया जाना चाहिए।
 उससे पिछड़े वर्ग की सभी जातियों को आरक्षण का लाभ समरूप ढंग से मिल सकेगा।
 अभी पिछड़ा वर्ग की कुछ खास मजबूत जातियां ही आरक्षण का अधिक लाभ उठा लेती हैं।अत्यंत पिछड़ों को इसका समुचित लाभ नहीं मिलता।
  याद रहे कि  अति पिछड़ों के लिए बिहार तथा कुछ अन्य राज्यों में अलग से आरक्षण का कोटा निर्धारित है।
 उससे आरक्षण का लाभ नीचे तक मिल पाता है।
राज्यों का आरक्षण राज्य सरकारों की सेवाएं के लिए है।मंडल आरक्षण की सुविधा केंद्र सरकार की नौकरियों में मिलती है।
  मन मोहन सरकार के कार्यकाल में ही राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की संबंधित सिफारिश सरकार को मिल चुकी थी।पर उस सरकार ने
उस सिफारिश को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
  नरेंद्र मोदी सरकार ने उस रपट की समीक्षा के लिए आयोग गठित कर दिया।जस्टिस रोहिणी आयोग कोटे में कोटा संबंधित सिफारिश की समीक्षा करेगा।
  जानकार सूत्रों के अनुसार रोहिणी आयोग इस बात की जांच करेगा कि विभिन्न जातियों व समुदायों के बीच आरक्षण के लाभ का समान वितरण हो पा रहा है या नहीं।
आयोग ओ.बी.सी.में उप वर्गीकरण के लिए वैज्ञानिक तरीके से मानक, शत्र्त व तंत्र के बारे में विचार करेगा।
साथ ही जातियों व समुदायों को विभिन्न उप वर्गों में शामिल करने का भी काम करेगा।
  ऐसे कदम  राजनीति पर असर डालेंगे।
 पिछले चुनावों में यह देखा गया है कि मजबूत पिछड़ा समुदाय जहां आम तौर पर कांग्रेस गठबंधन या उसके सहयोगी दलों के साथ रहा है,वहीं अति पिछड़ों का झुकाव राजग की तरफ रहा।
 यदि सचमुच 27 प्रतिशत आरक्षण को दो या तीन हिस्सों में बांट देने का काम हो गया तो उससे राजनीतिक हलचल भी शुरू हो सकती है।मजबूत पिछड़ों के नेता इसका विरोध कर सकते हैं।
आरक्षण को लेकर कोई भी  विवाद राजनीतिक गर्मी पैदा करता है।
      बासी दही की खपत --
पिछले साल संक्रांति के दस दिन बाद मैंने एक रिटेलर से
डिब्बा बंद दही खरीदा।
घर जाकर उस डिब्बे पर तारीख देखी।
तारीख 12 दिन पहले की थी।
अब बताइए, 12 दिन पहले का दही कैसा रहा होगा ?
फेंक देना पड़ा।
पर रिटेलर ने मेरी असावधानी का फायदा उठा लिया।
मुझे खरीदते समय ही तारीख देख लेनी चाहिए थी।
पर कई  उपभोक्ता तो और भी लापारवाह होते हैं।
दरअसल उपभोक्ताओं का ऐसा शोषण संक्रांति के समय अधिक होता है।
  कई रिटेलर थोक बिक्रेता के यहां से जरूरत से अधिक  बड़ी मात्रा में दही उठा लेते हंै।सब तो संक्रांति के अवसर पर बिक नहीं पाता।
बचा माल वे अगले कई दिनों तक खपाते रहते हंै।
थोक बिक्रेताओं को चाहिए कि वे जन स्वास्थ्य का ध्यान रखें और बचे हुए माल को रिटेलर के यहां से वापस मंगवा लंे।
      कैसे काबू में आए अपराध---
 उत्तर प्रदेश में पिछले 10 महीनों में पुलिस की  अपराधियों के साथ 921 मुठभेड़ें हो चुकी हैं।उनमें 33 अपराधी मारे गए हैं।
तीन पुलिकर्मी भी मरे और 210 घायल हुए।
इतने कम समय में इतनी संख्या में मुठभेड़ों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सक्रिय हो गया है।
दरअसल ऐसे मामलों में लगभग पूरे देश में पुलिस के सामने
मजबूरी रहती है।
  एक तरह के शासक कहते हैं कि पुलिस नरमी बरते।जब दूसरे शासक आतेे हैं तो वे कड़ाई बरतते हैंं।इस बीच अपराधी निडर हो जाते हैं।सिर्फ गिरफ्तारी से जब अपराध नहीं रुकता तो मुंठभेड़ों की नौबत आती है।मुंठभेड़ों के बाद कई बार मानवाधिकार आयोग  पुलिसकर्मियों की परेशानी बढ़ा देते हैं।
 इस देश के हुक्मरानों और नीतियां बनाने वालों को इस समस्या पर खास तौर पर विचार करना चाहिए।इस बात पर कि किस तरह अपराध भी कम हांे और ऐसा करते समय पुलिसकर्मियों को भी कोई परेशानी न हो।
   एक भूली बिसरी याद---
सन् 1983 की बात है।यह कहानी पशु पालन घोटाले की ही है।
तब वाई.बी.प्रसाद बिहार सरकार के सहाय्य और पुनर्वास विभाग में संयुक्त सचिव थे।
पशुपालन विभाग का एक मामला परीक्षण के लिए उनके सामने आया था।
उस मामले में पशु पालन  विभाग के क्षेत्रीय अपर निदेशक डा.पी.लकड़ा निलम्बित हुए थे।
अपने एक संस्मरणात्मक लेख में वाई.बी.प्रसाद ने बाद में लिखा था कि ‘ पी. लकड़ा ने कहा कि पटना सचिवालय में तैनात कुछ कर्मचारी पशु पालन विभाग के 15 लाख रुपए के आबंटन आदेश लेकर खुद रांची आए।
उनके साथ पशु दवाओं के तीन सप्लायर भी थे।
ऊपरी आदेश के कारण विषय -वस्तु की छानबीन नहीं की जा सकी।
 उसी दिन बिल कोषागार को भेजा गया।
और संभवतः दूसरे ही दिन पूरी निकासी कर ली गयी।’
 अब पशु पालन घोटाले से संबंधित एक दूसरी कहानी पढि़ए जो नब्बे के दशक की है। 
17 दिसंबर, 1993 को बिहार सरकार के कोषागार निदेशक एस.एस.शर्मा ने अपने पत्र में लिखा कि पशु पालन विभाग के पैसों की निकासी पर रोक हटा ली जा रही है।
 याद रहे कि डोरंडा कोषागार के अधिकारी ने पशुपालन विभाग के बकाया बिलों का भुगतान रोक दिया था।
 उसे लगा था कि बजट प्रावधानोंं से काफी अधिक पैसों की निकासी हो रही है।
बिल भी पहली नजर में जाली लगे।
निकासी रुक जाने के बाद बिहार सरकार के  वित्त विभाग के संयुक्त सचिव एस.एन.माथुर ने  कोषागार पदाधिकारी को पत्र लिखा। पत्र में आदेश दिया गया कि निकासी पर से रोक हटा ली जाए।यह पत्र घोटालेबाजों के फायदे मेें रहा।
 बेशुमार निकासी का एक नमूना यहां  पेश है।
वित्तीय वर्ष 1994-95 में पशुपालन विभाग का बजट मात्र 65 करोड़ 47 लाख रुपए का था।
पर उस कालावधि में मुख्यतः जाली बिलों के आधार पर राज्य के सरकारी कोषागारों से  237 करोड़ 85 लाख रुपए निकाल  लिए गए।
  इसी तरह के अन्य अनेक सनसनी खेज प्रकरणों से सी.बी.आई.और अदालतों का सामना हुआ था।
अब ऐसे में कोई अदालत कैसा निर्णय करती ?
 लोकहित याचिका पर सी.बी.आई.की जांच का आदेश देते समय 1996 के मार्च में पटना हाई कोर्ट ने कहा था कि ‘उच्चस्तरीय साजिश के बिना ऐसा घोटाला हो ही नहीं सकता था।’
        और अंत में ---
 जब लालू प्रसाद सत्ता में नहीं आए थे, तब भी
 पशुपालन माफिया बिहार में  सक्रिय थे।हालांकि वे तब उतने अधिक ताकतवर नहीं थे जितने 1990 के बाद हुए।
  हालांकि 1990 से बहुत पहले की एक  पुरानी घटना भी कम चैकाने वाली नहीं थी।
एक बार के.बी.सक्सेना  पशुपालन विभाग के सचिव बना दिए गए थे।
कत्र्तव्यनिष्ठ आई.ए.एस. अफसर सक्सेना ने पशुपालन माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी।नतीजतन तीन महीने के भीतर ही सक्सेना साहब उस पद से हटा दिए गए।
बाद में सक्सेना ने एक अन्य आई.ए.एस अफसर आभाष चटर्जी से कहा कि मैं जानता था कि वे लोग @यानी पशुपालन माफिया@ बहुत ताकतवर हैं।पर यह पता नहीं था कि पूरी सरकार उनकी जेब में है।
  अवकाश ग्रहण करने के बाद आभाष चटर्जी ने एक अखबार में लेख लिख कर यह रहस्योद्घाटन किया था।
@12 जनवरी, 2018 को प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे ‘कानोंकान’ काॅलम से @



दलीय आधार पर हो पंचायतों के चुनाव
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बिहार में अब दलीय आधार पर नगर निकायों के 
चुनाव कराए जाने पर राज्य सरकार विचार कर रही है।
संकेत है कि यह निर्णय हो ही जाएगा।
राज्य में नगर निकायों की संख्या 143 है।
  इसके साथ ही ग्राम पंचायतों के चुनाव भी दलीय आधार पर होने चाहिए।वह अधिक जरूरी है।
 इससे मुखिया लोगों में एक भय रहेगा कि बहुत गलत करने पर पार्टी उन्हें संगठन से निकाल सकती है।
 बहुत अच्छा करने पर संभवतः विधान सभा का टिकट मिल जाए !
बिहार के ऐसे एकाधिक  सांसद-विधायकों को मैं जानता हूंं जो पहले मुखिया थे।
  अभी तो अधिकतर मुखिया बेलगाम हो चुके हैं।
उनके बारे में कम कहना, अधिक समझना।
हालांकि मुखियों में आज भी कुछ अच्छे व सेवा भावी  भी हैं।