मंगलवार, 7 जुलाई 2020

    मुकुल रोहतगी और सिंघवी को सलाम !!
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भारत के पूर्व अटाॅर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और मशहूर वकील व कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने 
कह दिया है कि वे टिक टाॅक या किसी चीनी एप्स के लिए अदालत में खड़े नहीं होंगे।
याद रहे कि भारत सरकार ने 59 चीनी एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया है।
  देश पर बाहरी खतरों के मद्देनजर इन वकीलों का कदम सराहनीय है।
उन्हें सलाम !!
चीनी एप्स उन्हें भारी फीस दे सकते थे।
पर,उन लोगों ने देशहित में उसका लोभ संवरण किया।
यह उन वकीलों के लिए भी संदेश है जो फीस के लोभ
 में देसी -विदेशी विवादास्पद लोगों की वकालत करते हैं। 
   इस पृष्ठभूमि में कांग्रेस नेता व वकील सलमान खुर्शीद के कृत्य को याद करें।
उन्होंने इस्लामिक आतंकवादी संगठन ‘सिमी’ के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में वकालत की थी।
सिमी पर सन 2001 में जब प्रतिबंध लगा तो सिमी ने उसके खिलाफ अदालत की शरण ली।
  पर जब वहां भी राहत नहीं मिली तो सिमी के  लोगों ने इंडियन मुजाहिद्दीन और पी.एफ.आई.जैसे संगठन बनाए।
हाल के दिल्ली दंगे में पी.एफ.आई.की संलिप्तता के ठोस सबूत दिल्ली पुलिस ने एकत्र  किए हैं।
  कांग्रेस कहा करती है कि नरेंद्र मोदी ने भावना भड़का कर चुनाव जीत लिया।
पर, सच यह है कि भाजपा को सत्ता में लाने में सलमान खुर्शीद जैसे नेताओं का भी हाथ रहा है।
खुर्शीद जैसे नेताओं के कृत्यों के जरिए कांग्रेस ने अनेक मतदाताओं को भाजपा की ओर ढकेल दिया।
कांग्रेस में ‘खुर्शीद’ अकेले नहीं हैं।
 याद रहे कि सिमी ने अपने दस्तावजों के जरिए  और अखबारों में बयान देकर भी लगातार यह घोषणा की थी कि ‘हमारा लक्ष्य हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करना है।’
इसके बावजूद खुर्शीद ने उस खतरनाक संगठन की वकालत की।
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सुरेंद्र किशोर--6 जुलाई 20


चीन के समक्ष भारत तन कर खड़ा हो गया।
नतीजा सामने है।
इससे पहले इस देश के बाहरी और भीतरी दुश्मनों 
व स्वार्थी तत्वों को यह उम्मीद थी कि चीन इस बार भारत का मान 
मर्दन कर देगा।
उससे उन देशद्रोहियों व स्वार्थी तत्वों की राह भी आसान हो जाएगी।
पर, ऐसा कुछ नहीं हो सका।
होगा भी नहीं।
इसलिए वे अब समझ लें कि आने वाले दिन उनके लिए कैसे होंगे !
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कुछ लोग हथियारों के बल पर
एक खास विचारधारा का शासन इस देश पर कायम करना चाहते हैं।
कुछ अन्य लोग हिंसक तरीके से एक खास धर्म का शासन इस देश में
कायम करने की कोशिश में लगे हैं।
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उन्हें अब यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि जिस तरह मोदी सरकार
परिणामों की परवाह किए बिना अपने हक के लिए चीन के सामने तन कर खड़ी है,उसी तरह उनके सामने भी खड़ी मिलेगी।
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  यह कम ही लोगों को मालूम है कि गत मार्च में ही केंद्र सरकार ने 
सुप्रीम कोर्ट से कह दिया कि इस देश के लिए एन.आर.सी.यानी नागरिकांे का नेशनल रजिस्टर जरूरी है। 
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---सुरेंद्र किशोर--24 जून 20

संदर्भ - फरार गैंगेस्टर विकास दुबे
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बचपन में मैंने सुना था कि
 ‘‘कुत्ते और क्रिमिनल का आयु 10 से 15 साल ही होती है।’’
  पर जब से क्रिमिनलों को  मजबूत राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा,
तब से उनकी आयु बढ़ती चली गई।
  किंतु जो  क्रिमिनल  पुलिसकर्मियों की हत्या करता है,वह 
असली या नकली मुंठभेड़ों में बाद में मारा ही जाता है।
अपवादों की बात और है।
हां, कोई क्रिमिनल इस देश के किसी राज्य के मुख्य मंत्री का दुलरूआ हुआ, तब तो पता चलने पर शासक पुलिस मुठभेड़ को बीच में ही रुकवा कर भी उसे बचा लेता  है।
पर ऐसा कम ही हुआ है।
  जो नहीं बच पाता ,उसके लिए कुछ खास तरह के नेता सार्वजनिक रूप से भी अफसोस जाहिर करने से खुद को नहीं रोक पाते।
1982 में उत्तर प्रदेश का एक दुर्दांत डाकू पुलिस मुंठभेड़ में मारा गया था।
इंडिया टूडे के अनुसार, उस डाकू ने कई किस्तों में 24 पुलिकर्मियों को मारा था।
उस पर करीब 100 डकैतियों का आरोप था।
   असली या नकली पुलिस मुंठभेड़ में उस डाकू के मारे जाने के तत्काल बाद संयोगवश  राष्ट्रीय स्तर के एक नेता  पटना में थे।
तब प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि  चंबल में जब ऊंची जातियों के डाकू  हुआ करते थे तो वे दसियों साल तक राज करते थे।
पर जब पिछड़ी जाति के डाकू होने लगे तो पांच साल, छह साल में मार दिए जाते हैं।
तब मैं दैनिक आज का संवाददाता था।
मैं उस प्रेस कांफ्रेंस में गया था।
उस नेता का बयान ‘आज’ में तब छपा भी था।
अब देखना है कि विकास दुबे का क्या हश्र होता है !
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सुरेंद्र किशोर--6 जुलाई 20
  

रविवार, 5 जुलाई 2020

     अगर आठ अपराधी किसी एनकाउंटर में मारे गए होते
तो मीडिया का एक गुट, मानवाधिकार के तथाकथित रखवाले और सिविल सोसायटी का झंडा उठाने वाले लोग अब तक आसमान सिर पर उठा लेते।
    अपराधियों के परिवार के सदस्यों का रोते हुए वीडियो 
वायरल हो रहा होता।
    मुठभेड़ को फर्जी बताकर योगी सरकार का इस्तीफा मांगा जाता।
     --पंकज झा,
    दैनिक जागरण
      5 जुलाई, 20 

   पति -पत्नी सरकारी सेवकों में से जब एक ही को  
  आवास भत्ता, तो सांसद दम्पत्ति को दो मकान क्यों ?  
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    ---सुरेंद्र किशोर--
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बिहार सरकार के नियम के अनुसार यदि पति-पत्नी दोनों 
सरकारी सेवा में हैं,एक ही शहर में पदस्थापित हैं और उन्हें सरकारी आवास उपलब्ध नहीं हैं तो 
उनमें से किसी एक को ही  आवास भत्ता मिलता है।
यही नियम है।
   संभवतः केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर भी ऐसा ही नियम लागू होगा।
   पर, यदि पति पत्नी दोनों सांसद हैं तो उन्हें अलग -अलग दो सरकारी आवास मिल जाते हैं ।
  ऐसी विसंगति क्यों ?
 इसे बदला जाना चाहिए।
या तो पहली सुविधा  को बदलो या दूसरी सुविधा को। 
इतना ही नहीं,
यदि किसी अविभाजित परिवार के दो सदस्य एक साथ सांसद हो जाएं तो उनके लिए एक ही मकान या बंगले का प्रावधान होना चाहिए।
इसके लिए संबंधित नियम में बदलाव किया जाना चाहिए।
वह बदलाव भारतीय संस्कृति के अनुकूल भी होगा।
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--सुरेंद्र किशोर--4 जुलाई 20 

शनिवार, 4 जुलाई 2020

बिहार के शहीद-2
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अगस्त क्रांति, 1942
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बिहार के शहीदों की सूची पर
एक नजर डालने से ही यह लग 
जाता है 
कि आजादी की लड़ाई में 
लगभग सभी सामाजिक समूहों के लोगों 
ने हिस्सा लिया,कष्ट सहे और बलिदान
दिया था।
हां, नेतृत्व वर्ग में आम तौर पर वही समूह 
आगे रहे जिनमें पढ़ने -लिखने
की पहले से परंपरा थी।
अपवादों की बात और है।
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अविभाजित गया जिला
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गया शहर
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जगन्नाथ मिश्र
भुई राम
कैलाश राम
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अरवल 
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राम कीरत सिंह
केशव राम
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कुर्था
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श्याम बिहारी लाल
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अविभाजित शाहाबाद जिला
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आरा
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कवि कैलाश
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कोइलवर
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कपिलदेव पासवान
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लसाढ़ी
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सभापति यादव
जगन्नाथ यादव
महादेव यादव
गिरिवर सिंह
वासुदेव सिंह
श्रीमती गोपाल जी
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नरही चांदी
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शीतल सिंह
शीतल लोहार
केशव सिंह 
रामदेव
केश्वर
रामधारी पांडेय
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सासाराम
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जयराम सिंह
जगदीश प्रसाद
महंगू पासी
जगन्नाथ पनहेरी
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जगदीश पुर
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श्रीमती फुल कुमारी देवी
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डुमरांव 
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कपिल मुनी
रामदास सोनार
रामदास लोहार
गोपाल कहार
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जमीरा
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नक्कू साधु
भलवा हलखोर
कीरत यादव
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नरवीर पुर
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सूर्यदेव कुमार
मिटठू महतो
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कायम नगर
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गुप्तेश्वर जी
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भभुआ
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अंतू राम 
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कुदरा
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राम जन्म
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 बिहिया
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शिवप्रसाद गिरि
सहदेव गिरि
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अहीर पुरवा
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मकुना सिंह
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पुसौली
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केशव कांदू
रघुवीर मुसहर
बांका जी
एक अज्ञात नौजवान
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आथार
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विश्वनाथ
शिवपूजन
तपेश्वर पांडेय
सुखारी
अज्ञात
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जोगनी
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सुखदेव द्विवेदी
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बलिगांव
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छुट्टन सिंह
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जोकरी
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जगदीश नारायण
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संझौली
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अज्ञात 
अज्ञात 
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कंटवा
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अज्ञात
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जारी--
कल--मुजफ्फर पुर जिला
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सुरेंद्र किशोर--4 जुलाई 20




बिहार के शहीद-1
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शहीदों की याद में 
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जला अस्थियां बारी बारी,
चिटकाई जिनमें चिंगारी।
जो चढ़ गये पुण्य वेदी पर, 
लिए बिना गर्दन का मोल,
कलम, आज उनकी जय बोल।
-राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर
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   चाहे आजादी हासिल करनी हो या फिर उस आजादी को 
 बचाए रखने की समस्या सामने हो,
या फिर देश की सीमाएं खतरे में हांे,
तो उसके लिए समय -समय पर कुर्बानियां देनी ही पड़ती हैं।
आज भी जहां हमारी सीमाओं की रक्षा के लिए हमारी सेना 
कुर्बानियां दे रही हैं,वहीं भीतरी दुश्मनों से मुकाबले के 
सिलसिले में सुरक्षा बल के लोग भी कुर्बानियां दे रहे हैं।
बाहरी-भीतरी दुश्मनों के हम दात खट्टे कर रहे हैं।
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आज हम इतिहास के नाजुक मोड़ पर हैं।
हमें आज के शहीदों के साथ -साथ तब के शहीदों की भी याद आती है ।
तब के शहीदों ने 
अपनी कुर्बानियां देकर हमें ब्रिटिश हुकुमत से आजाद कराया।
उनका नारा था,
‘‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।’’
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अगस्त क्र्रांति के शहीदों की सूची यहां दी जा रही है।
यह सूची सिर्फ बिहार की है।
कल्पना कीजिए आजादी के लिए पूरे देश में कितने लोगों ने 
हमारे कल के लिए अपना वत्र्तमान न्योछावर कर दिया था !
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नोट-इस सूची में  कोई कमी या अशुद्धि नजर आए तो जरूर बताएं।
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पटना जिला में 1942 की अगस्त क्रांति के शहीद
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राम गोविंद सिंह
रामानन्द सिंह
राजेंद्र सिंह
सतीश प्रसाद झा
जगतपति कुमार 
उमाकांत प्रसाद सिन्हा 
देवी प्रसाद चैधरी
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पटना सिटी
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मंगल
सुमेर पंडित
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बख्तियार पुर
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नाथू प्रसाद
मोगल सिंह
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चंडी
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बिन्देश्वरी
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हिलसा
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भीमसेन महतो
फूलन राम 
शिबू राय
चरित्तर दुसाध
सुखरी चैधरी
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बाढ़
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श्रीनारायण साव
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बिहटा
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गोपाल साव
देवलाल साव
टीपन शर्मा
धरमू कुर्मी
कैलाश राउत
गंगा प्रसाद
गोपालजी प्रसाद
अर्जुन प्रसाद
उमैर अली
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बिक्रम
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रंग नाथ शर्मा
बुटाई राम
त्रिवेणी शर्मा
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नौबत पुर
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लक्ष्मण पासवान
अम्बिका सिंह
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मनेर
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मुहम्मद इस्माइल
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पुनपुन
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लाला प्रसाद यादव
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मसौढ़ी
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अज्ञात
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पालीगंज
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राम कृत सिंह
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मोकामा
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दुखी गोप
एक अज्ञात स्त्री
उसका बच्चा
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मोकामा घाट
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काशी मल्लाह
श्रीनारायण राम
स्वरूप कहार
रामा सिंह
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सरमेरा
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लक्ष्मण महतो 
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स्त्रोत-साप्ताहिक जनता,
पटना -18 अगस्त 1974
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सुरेंद्र किशोर 
3 जुलाई 20