शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

    सोशल मीडिया पर अपने राजनीतिक विरोधियों और असहमत लोगों को गंदी-गंदी गालियों देने के मामले में रोज-रोज नया रिकाॅर्ड कायम हो रहा है।

   इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।

  क्या चुनाव आयोग या शासन तंत्र में ऐसा कोई है जो इस अपसंस्कृति वालों पर 

नकेल कस सके ?

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 ........सुरेंद्र किशोर--9 अक्तूबर 20 


शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

  मामला पी.एफ.के पैसे के ट्रांसफर का

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मेरी एक चिट्ठी के जवाब में पासवान जी 

ने मुझे लिखी थीं 6 चिट्ठियां

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उनसे पहले के श्रम मंत्री ने तो मेरी गुजारिश पर

कोई ध्यान ही नहीं दिया था

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  --सुरेंद्र किशोर-- 

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पहली बार मैंने सन 1969 में राम विलास पासवान का नाम सुना था।

सिर्फ इसलिए नहीं कि वे संसोपा के विधायक बनकर पटना आए थे।

बल्कि इसलिए कि आते -आते वे संसोपा विधायक दल के नेता पद के उम्मीदवार बन गए थे।

1969 में बिहार विधान सभा का मध्यावधि चुनाव हुआ था।

उसमें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के  50 से अधिक विधायक चुन कर आए थे।

 संसोपा विधायक दल के नेता पद का चुनाव हो रहा था।

 रामानंद तिवारी और धनिकलाल मंडल के अलावा राम विलास पासवान भी उम्मीदवार थे।

  आश्चर्य हुआ।

उस दल में तब नेताओं के वरीयता व कृतित्व पर अधिक ध्यान दिया जाता था।

स्वाभाविक ही था, पासवान जी बुरी तरह हारे।

तिवारी जी जीत गए।

पर पासवान जी लोगों की नजरों में जरूर आ गए।

  1977 में लोकसभा में शून्य काल का बेहतर इस्तेमाल करके जिस तरह देश भर की नजरों में पासवान जी आ गए,उससे पहले 1969 में नेता पद का चुनाव लड़कर  बिहार संसोपा  की नजरों में आ गए थे।

  1972 में उनके विधान सभा चुनाव हारने तक मैं उनसे नहीं मिला था।

पर 1972 वे खुद मेरे पास आए।

तब मैं एक राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था। 

  मैं कर्पूरी जी के पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित बंगले में ही रहता भी था।

वहां मेरा एक छोटा कमरा था।

राम विलास जी अक्सर मेरे पास आकर घंटांे बैठते थे।

उनकी दो बातें मुझे याद हैं।

एक तो वे गीत गाते थे।

दूसरी बात अधिक महत्वपूर्ण थी।

उन्होंने दक्षिण भारत के दलित नेता रामास्वामी नायकर की बातें खूब बताते थे।

  वे नायकर से प्रभावित लगे।

शालीन व्यवहार के धनी रामविलास जी दोस्तपरस्त व्यक्ति थे।

वे चाहते थे कि मैं अपने खास दोस्तों को क्या दे दूं !

 जब वे सांसद व केंद्र में मंत्री होने लगे तो उनसे मेरा संपर्क नहीं रहा।

तब तक यानी 1977 में मैं मुख्य धारा की पत्रकारिता में आ चुका था।

  वी.पी.सिंह मंत्रिमंडल के श्रम मंत्री के रूप में उनसे मुझे अपना एक काम कराना था।

दैनिक ‘आज’ से जब मैं 

जनसत्ता में गया तो पी.एफ.का मेरा पैसा नए खाते में लाख कोशिश के बावजूद ट्रांसफर नहीं हो रहा था।

पहले के श्रम मंत्री ने तो मुझे घास तक नहीं डाली।

जबकि मैं देश के एक ‘‘बोखार छोड़ाऊ’’

अखबार ‘जनसत्ता’ का बिहार संवाददाता था।वह मंत्री भी बिहार से ही थे।

नए श्रम मंत्री राम विलास पासवान को मैंने अपने पी.एफ.के संबंध में एक पत्र मामूली डाक से भेज दिया।

मैं इस द्विविधा में था कि शायद पत्र उन तक पहुंचे या नहीं पहुंचे !

  पर कमाल देखिए।

पत्र के पहुंचते ही पासवान जी ने मुझे तीन चिट्ठियां लिखीं।

सिर्फ यह सूचित करने के लिए कि आपका काम जल्द ही हो जाएगा।

एक पत्र मेरे पटना आॅफिस के पते पर।

दूसरा पत्र मेरे पटना आवास के पते पर।

तीसरा पत्र हमारे संपादक प्रभाष जोशी के केअर आॅफ में।

  काम तुरंत हो गया।

उसकी खबर व संदर्भ देते हुए फिर तीन पतों पर तीन चिट्ठियां उन्होंने भेजी।

उसी तरह पी.एफ.कार्यालय से भी मुझे उन्हीं तीन पतों पर अलग -अलग पत्र भिजवाए।

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ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं जनसत्ता मंें था।

श्रम मंत्री आम तौर अखबार वालों को बहुत भाव नहीं देते।

क्योंकि अनेक अखबार मालिक ही उनके कृपाकांक्षी होते हैं।

मैंने तब ही सुना था कि इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक अरूण शौरी ने प्रधान मंत्री वी.पी.सिंह से यह कहा था कि आपके श्रम मंत्री यानी पासवान जी तो मुझे एप्वांटमेंट ही नहीं दे रहे हैं। 

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पासवान जी जब रेल मंत्री बने तो उन्होंने मुझे मेरी पूर्व सहमति के बिना रेलवे की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य बना दिया।

मैंने भारी मन से उन्हें अपना इस्तीफा भेज दिया।

  आभार प्रकट करते हुए उन्हें मैंने लिखा कि 1977 में मुख्य धारा की पत्रकारिता में आने के बाद ही मैंने यह तय कर लिया  कि जब तक पत्रकारिता में रहूंगा,कोई सरकारी समिति,पद या उपहार आदि स्वीकार नहीं करूंगा।

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राम विलास पासवान की ‘राजनीति’ तथा उनकी उपलब्धियों-विफलताओं की चर्चा करने का अवसर बाद में आएगा।

अभी इतना ही कहूंगा कि राजनीति में जो लोग हैं या आते रहते हैं,वे पासवान जी से शालीनता,विनम्रता सीखें,यदि उनमें इन गुणों की कमी है।

वे ऐसी सामाजिक पृष्ठभूमि से आते थे,जिसके सदस्य में उत्पीड़क लोगों के लिए गुस्सा स्वाभाविक है।

पर, मैंने देखा कि 1972 में जिसके मन में रामास्वामी नायकर

के प्रति आदर का भाव था,उस पासवान जी में बाद के वर्षों में किसी अन्य समुदाय के प्रति जलन-गुस्सा  का कोई भाव नहीं देखा गया। 

  साथ ही, नए लोग सदस्य बनने पर वे संसद या विधान सभा के ‘जीरो आॅवर’ और ‘आधे घंटे के डिबेट’ की सुविधाओं  का बेहतर इस्तेमाल करना सीखें।

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सुरेंद्र किशोर-9 अक्तूबर 20


 


 जब मामलों को तार्किक अंजाम तक पहुंचने 

ही नहीं दिया जाएगा तो कैसे कहा जा 

सकता है कि किसी घोटाले में क्या मिला ?

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घोटाले से जुड़े सवालों का इंतजार

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  --सुरेंद्र किशोर--

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 आखिर 2 जी घोटाले में क्या मिला ?

लंबे इंतजार के बाद इस सवाल का जवाब मिलने की उम्मीद है।

क्योंकि बीते दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2 जी स्पैक्ट्रम आबंटन घोटाला मामले में पूर्व दूर संचार मंत्री ए.राजा और अन्य को बरी किए जाने के खिलाफ सी.बी.आई.और इडी की अपीलों पर दैनिक आधार पर सुनवाई करने का आदेश दिया।

( 5 अक्तूबर 2020 से सुनवाई शुरू भी हो चुकी है।)

  2- जी घोटाला केस में दिल्ली हाईकोर्ट को इस आरोप की जांच करनी है कि क्या सी.बी.आई.की विशेष अदालत ने दस्तावेजी सबूतों को नजरअंदाज किया और मौखिक गवाही पर भरोसा किया ?

   विशेष अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-165 में  मिली शक्ति का उपयोग क्यों नहीं किया ?

  ध्यान रहे कि 2 जी स्पैट्रम घोटाले में दिल्ली स्थित सी.बी.आई.की विशेष अदालत ने 2017 में आरोपितों को जब दोषमुक्त कर दिया था, तो इस पर बहुत हैरानी जताई गई थी।

  क्योंकि इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया घोटाला मान कर 122 लाइसेंस रद कर दिए थे

  और जुर्माना भी लागाया था।

  किसी केस के बारे में सुप्रीम कोर्ट

और लोअर कोर्ट की समझ में इतना बड़ा फर्क क्यों आया ?

2 जी स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमे में ए.राजा और कनिमोझी को दोषमुक्त करते हुए  विशेष सी.बी.आई.अदालत ने 2017 में कहा था, कलाइनगर टी.वी.को कथित रिश्वत के रूप में शाहिद बलवा की कंपनी डी बी ग्रूप द्वारा 200 करोड़ रुपए देने के मामले में अभियोजन पक्ष ने किसी गवाह से जिरह तक नहीं की।

   कोई सवाल तक नहीं किया।

  याद रहे कि उस टी.वी.कंपनी का मालिकाना हक करूणानिधि परिवार से जुड़ा है।

   माना कि अभियोजन द्वारा कोई सवाल नहीं किया गया क्योंकि शायद मनमोहन सरकार के कार्यकाल में सी.बी.आई.के वकील को ऐसा करने की अनुमति नहीं रही होगी।

   पर अदालत के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम में ऐसे ही मौकों के लिए धारा-165 का प्रावधान किया गया है।

आखिर इस शक्ति का उपयोग क्यों नहीं किया गया ?

जबकि यह सूचना उपलब्ध थी कि इस घोटाले में 200 करोड़ रुपए की रिश्वत देने का आरोप लगा है।

  इस केस का यह सबसे प्रमुख सवाल है।

   उक्त धारा के अनुसार ‘‘न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों का पता लगाने के लिए या उनका उचित सबूत प्राप्त करने के लिए किसी भी रूप में किसी भी समय किसी भी साक्षी या पक्षकार से किसी भी सुसंगत या विसंगत तथ्य के बारे में कोई भी प्रश्न जो वह चाहे पूछ सकेगा।

तथा किसी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दे सकेगा।

 न तो पक्षकार और न उनके अभिकत्र्ता हकदार होंगे कि वे किसी भी ऐसे प्रश्न या आदेश के प्रति कोई आक्षेप करें।

  वे ऐसे किसी भी प्रश्न के प्रत्युत्तर में दिए गए किसी भी उत्तर पर किसी भी साक्षी की न्यायालय की इजाजत के बिना प्रति -परीक्षा करने के भी हकदार नहीं होंगे।’’

  2 -जी स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमे में ए .राजा और कनिमोझी को दोषमुक्त करते हुए विशेष जज की ओर से यह भी कहा गया था कि मैं पिछले सात साल से पूरी तन्मयता के साथ कोर्ट में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बैठा रहा।

और इंतजार करता रहा कि सी.बी.आई. कोई ठोस सबूत लेकर आएगी।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं मिला जो आरोपितों के अपराध को साबित करता हो।

फिर चाहे वह ‘कट आॅफ डेट’ को फिक्स करने की बात हो या ‘‘पहले आओ, पहले पाओ नीति’’ के विरूपण का मामला हो।

ऐसी टिप्पणियों के बाद ही यह कहना शुरू किया गया कि इस मामले में तो कुछ था नहीं।

  इसी तरह बोफोर्स घोटाले के बारे में भी कांग्रेस के कई बड़े -छोटे नेताओं ने लगातार यही कहा कि बोफोर्स घोटाला मीडिया की उपज था।

आम तौर पर ऐसी बातें अधूरी जानकारी के आधार पर की जाती है,क्योंकि जब मामले को उनकी तार्किक परिणति तक पहंुचने ही नहीं दिया तो कैसे कहा जाए कि घोटाले में क्या मिला ?

  कम ही लोगों को मालूम है कि बोफोर्स मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

मामला विचाराधीन है।

  याद रहे कि 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट ने  जब बोफोर्स कांड के आरोपितों को दोषमुक्त करार दे दिया तो तत्कालीन मनमोहन सरकार ने उस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील तक नहीं की।

   प्रणव मुखर्जी ने तो यह तक कह दिया था कि चूंकि किसी अदालत ने इसे घोटाला नहीं कहा है,इसीलिए इसे आधिकारिक तौर पर घोटाला नहीं कहा जा सकता है।

  पर वकील अजय अग्रवाल की लोकहित याचिका पर जब कभी सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा तो उसके सामने एक महत्वपूर्ण तथ्य आएगा।

उस पर उसे अपनी राय बनानी होगी। 

    दरअसल जिस मामले को निराधार मानकर दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया था,उसी घोटाले में 

मिले दलाली के पैसों पर भारत सरकार के आयकर महकमे ने आयकर वसूले।

 याद रहे कि भारत सरकार के आयकर न्यायाधीकरण ने कहा था कि आक्तावियो क्वात्रोचि और विन चडढा को बोफोर्स की दलाली के 41 करोड़ रुपए मिले थे।

(याद रहे कि भारत सरकार ने दलाली पर काननून प्रतिबंध लगा रखा था।)

  दलाली के ये पैसे भारत सरकार के खजाने से ही दिए गए थे।

लिहाजा ऐसी आय पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।

आयकर विभाग ने गत साल दक्षिण मुम्बई स्थित विन चड्ढा के फ्लैट को 12 करोड़ 2 लाख रुपए में नीलाम कर दिया ।

दूसरे दलाल क्वात्रोचि को तो दलाली के पैसे स्विस बैंक की लंदन शाखा से निकाल लेने की सुविधा तत्कालीन मन मोहन सरकार ने प्रदान की थी।

   जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने यह प्रश्न होगा कि जिस बोफोर्स सौदे में दलाली का आरोप प्रमाणित है,उसके आरोपितांे को दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषमुक्त कैसे कर दिया ?

उम्मीद की जानी चाहिए कि ये दोनों मामले जल्द ही अपने अंजाम तक पहुंचेंगे और लोगों को इनसे जुड़े सवालों के जवाब मिल सकेंगे।

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8 दिसंबर 2020 के दैनिक जागरण में प्रकाशित    



    सीमावत्र्ती प्रदेश होने के कारण बिहार 

   के मतदाताओं की खास जिम्मेदारी

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    --सुरेंद्र किशोर-- 

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 बिहार जैसे संवेदनशील प्रदेश में चुनाव हो रहा है जो नेपाल की सीमा पर बसा है।

सीमा खुली हुई है।

   सीमावर्ती इलाकों के मतदाताओें को कुछ खास सावधानी बरतनी चाहिए।

या यूं कहिए कि अगली पीढ़ी की रक्षा के लिए बरतनी पड़ेगी।

   ऐसा न हो कि बिहार विधान सभा के लिए ऐसे-ऐसे  उम्मीदवार विजयी हो जाएं जो टुकड़े -टुकड़े गिरोह के मददगार हांे या उनसे सहानुभूति रखने वाले हों।

 या फिर निष्क्रिय रहने वाले हों।

 याद रहे कि कोरोना संकट से निकलने के बाद जब केंद्र सरकार सी.ए.ए. और एन.आर.सी.आदि पर काम करने लगेगी तो टुकड़े -टुकड़े गिरोह व उनके समर्थकगण एक बार फिर  सक्रिय हो जाएंगे। 

   भारत नेपाल सीमा से समय -समय पर ऐसे -ऐसे लोग ‘गुजरते’ रहे हैं जो इस देश की एकता-अखंडता के दुश्मन रहे हैं।

  1986 में खालिस्तानी नेता एस.एस.मान को बिहार-नेपाल सीमा पर गिरफ्तार किया गया था।

वह भारत छोड़ने की कोशिश कर रहा था।

  नब्बे के दशक में पुरूलिया आम्र्स ड्राॅप्स मामले के आरोपी को एक बिहारी नेता ने ही अपनी कार में नेपाल सीमा पार करा कर भगवा दिया था।

   2013 में इंडियन मुजाहिद्दीन के सह संयोजक यासिन भटकल को नेपाल सीमा पर ही पकड़ा गया था।

जब 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लग गया तो सिमी के लोगांे ने ही इंडियन मुजाहिद्दीन,पी.एफ.आई. आदि का गठन किया।

सिमी का घोषित उद्येश्य हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करना है।

  भारत को नुकसान पहुंचाने वाली जितनी देसी-विदेशी शक्तियां आज इस देश में सक्रिय हैं,उतनी पहले कभी नहीं थीं।

  इस देश को बर्बाद करने के लिए बाहर से अरबों रुपए आते रहे हैं।

  नेपाल की खुली सीमा ऐसे तत्वों के लिए बहुत अनुकूल पड़ती है।

इसलिए सीमा पर न सिर्फ ईमानदार अफसर तैनात हों बल्कि वहां जनता के भी ऐसे प्रतिनिधि चुने जाएं जो देशद्रोहियों की गतिविधियों को उजागर करंे न कि छिपाएं।या फिर ऐसी समस्या की ओर से आंखें न फेर लें।

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    --सुरेंद्र किशोर--8 अक्तूबर 20

  

 


गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

 अखबारों में छप रही कुछ गलतियां

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चुनाव के समय पिछले चुनावी आंकड़े

व विजयी-पराजित नेताओं के नाम छापने की परंपरा रही है।

पाठकों को यह सब जानने में रूचि भी रहती है।

इस सिलसिले में तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए।

शंका होने पर मूल स्त्रोत पर जाना चाहिए।

वह काम कम ही हो रहा है।

श्रमसाध्य जो है !

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बिहार विधान सभा के पूर्व स्पीकर दिवंगत राधानंदन झा ने एक बहुत 

अच्छा काम किया है।

उन्होंने ‘‘ओरिजिन एंड डेवलपमेंट आॅफ बिहार लेजिस्जेचर’’

नाम से एक पुस्तक संपादित की।

उसमें बहुत सारी सूचनाएं हैं।

उसकी काॅपी अब उपलब्ध नहीं है।

पत्रकारों को चाहिए कि वे अगले स्पीकर साहब से आग्रह करके 

उसका संशोधित संस्करण छपवाएं।

वह जानकारी का एक मूल स्त्रोत है।

अत्यंत थोड़ी सी गलतियां उसमें भी है।

जिन्हें अगले संस्करण में सुधारा जा सकता है।

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 हाल में बिहार के एकाधिक अखबारों ने यह लिख दिया कि सन 1972 में एक भी महिला बिहार विधान सभा चुनाव नहीं जीत सकीं।

जबकि 12 आम चुनाव में व एक उप चुनाव में विजयी हुई थीं।

मुझे लगा कि इस मामले में एक अखबार की गलती दूसरे ने उतार ली।

पहले ने तो भूल सुधार भी छापा।

पर दूसरे ने ? 

पता नहीं । 

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एक अखबार ने लिखा कि सत्येंद्र नारायण सिंह ने नबी नगर से विधान सभा का उप चुनाव जीता  था।

जबकि सच यह है कि उन्होंने गोपाल गंज से विधान सभा का उप चुनाव 1961 मंें जीता था।

डा.अनुग्रह नारायण सिंह के निधन से जो नबीनगर सीट खाली हुई थी,उसके उप चुनाव में 1957 में पी.एन.सिंह विजयी हुए थे।

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हाल की गलती

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1967 में गोपाल गंज से हरिशंकर सिंह विधायक बने थे न कि सिया बिहारी शरण।

शरण साहब उसी साल मीरगंज से विजयी हुए थे।

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ऐसी गलतियां इसलिए होती हंै क्योंकि हमारे अधिकतर अखबारों के पास कोई संदर्भालय नहीं है।

अनेक लेखक और पत्रकार भी सुनी -सुनाई बातों पर ही अधिक भरोसा करने लगे हैं।

जो व्यक्ति आपको बता रहा है,उसकी स्मरण शक्ति पर तो भरोसा कीजिए ही नहीं,अपनी पर भी नहीं।

मैं भी नहीं करता।

इसीलिए मैंने पिछले 50 साल से तिनका -तिनका जोड़कर 

अपना निजी पुस्तकालय-सह संदर्भालय बनाया है।

एक ने हाल में मुझे फोन किया।

कहा कि आपके पास तो बहुत अच्छा संदर्भालय है।

मैं उसका इस्तेमाल करना चाहता हूं।

मैंने उन्हें विनम्र्रतापूर्वक कहा कि वह तो है,पर मैं लाइब्रेरियन नहीं हूं।

 मैं खुद चीजें खोज-खोज कर देने लगूंगा तो अपना काम कब और कैसे कर पाऊंगा ?

जीवन छोटा है,काम अधिक।

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यह भी कहा कि आप रोज जो अखबार मंगाते हैं,उसमें से जो सामग्री विश्वसनीय लगे,उसकी कटिंग करके विषयवार लिफाफे में रखते  जाइए।

कुछ साल के बाद आपको कुछ बातें तो किसी से पूछनी ही नहीं पड़ेंगी।

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 यह सब मेरे लिखने का आशय यह है कि अनेक इतिहास लेखक भी ऐसे ही अखबारों से सूचनाएं उठाते हैं।

वे कई बार धोखा खा जाते हैं।

इस तरह वे अनजाने में अगली पीढियों को भी गलत इतिहास पढ़ाते हैं।

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--सुरेंद्र किशोर-7 अक्तूबर 20

 



रविवार, 4 अक्टूबर 2020

    दोहरा मापदंड

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हाथरस बलात्कार- सह-हत्याकांड के खिलाफ राहुल गांधी-प्रियंका वाड्रा के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने जोरदार प्रदर्शन किया।

अच्छा किया।हाथरस कांड जघन्य है।

  हालांकि यू.पी.पुलिस कह रही है कि बलात्कार का सबूत नहीं है।

पर, क्या हत्या कम जघन्य अपराध है ?

पर,राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के ही बलरामपुर दलित बलात्कार- सह -हत्याकांड पर

कोई प्रदर्शन नहीं किया।

क्या कोई बयान भी दिया ?

पता नहीं।

ऐसा दोहरा मादंड क्यों ?

राहुल गांधी के राजनीतिक विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि ‘‘क्योंकि बलरामपुर बलात्कार सह हत्याकांड कांड के आरोपी ऐसे समूह के सदस्य हैं जहां से कांग्रेस को वोट मिलने की उम्मीद रहती है।

याद रहे कि हाथरस कांड के आरोपी भाजपा के वोट बैंक समूह से आते हंै।

  क्या यह आरोप सच है ? 

हालांकि तथाकथित सेक्युलर दलों व बुद्धिजीवियों पर ऐसा आरोप पहली बार नहीं लग रहा है।

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--सुरेंद्र किशोर-2 अक्तूबर 20 


 


 मतदान केंद्रों पर इस बार कम मतदाता जुटने की आशंका निराधार--सुरेंद्र किशोर

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बिहार के विभिन्न हिस्सों से मिल रही सूचनाओं के अनुसार 

सड़कों,बाजारों तथा अन्य जगहों में अब भारी भीड़ देखी जा रही है।

 ऐसे में यह आशंका निर्मूल लग रही है कि मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की इस बार कमी रहेगी।

हां, कुछ दलों ने चुनाव आयोग से यह मांग की है कि वह मतदाताओं को अधिक से अधिक संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचाने का उपाय करे।

अधिक उम्मीद इसी बात की है कि  आयेाग अपनी वह भूमिका इस बार अधिक गंभीरता से  निभाएगा ।

किंतु राजनीतिक दलों के कार्यकत्र्ताओं की भी जिम्मेदारी इस बार बढ़ी हुई है।वे मतदाताआंे को मतदान केंद्रों तक जाने के लिए प्रेरित करें। 

 संकेत मिल रहे हैं कि जो मतदातागण इस चुनाव को ऐतिहासिक और निर्णायक मानते हैं,वे पहले की तरह इस बार भी मतदान करेंगे ही।

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  कमजोर पंखों से ऊंची उड़ान ?

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कमजोर पंखों से ऊंची उड़ान करने की जिद करने वाले कुछ नेतागण चुनावी मैदान में आए दिन धराशायी होते रहते हैं।

गत लोक सभा चुनाव में बिहार के वैसे ही कुछ नेताओं को हास्यास्पद पराजय का तीखा स्वाद चखना पड़ा था।

लगता है कि अब भी वे उस सदमे से उबर नहीं पाए है।

वैसे ही कुछ अन्य अति महत्वाकांक्षी नेतागण बिहार विधान सभा के इस चुनाव में मुंह की खाएंगे,राजनीतिक प्रेक्षक ऐसा अनुमान लगा रहे हंै।

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   मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार !

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कई साल पहले की बात है।

एक पूर्व केंद्रीय मंत्री से मैंने पूछा कि ‘क्या आप

बिहार में मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार हैं ?’

उन्होंने कहा कि ‘कत्तई नहीं।’

‘फिर आपकी पार्टी ऐसा प्रचार क्यों कर रही है ?’

मेरा दूसरा  सवाल था।

उन्हांेने कहा कि ‘‘मेरे बारे में जब यह प्रचार होगा कि मैं मुख्य मंत्री का उम्मीदवार हूं,तभी  मेरे ‘खास वोटर’ अधिक  उत्साह से हमारे उम्मीदवारों को वोट देंगे।’’

  बिहार विधान सभा के मौजूदा चुनाव में भी शायद इसी रणनीति के तहत कुछ नेता मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार बताए जा रहे हैं ।

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एक सलाह जो शायद ही मानी जाए !

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विधायिकाओं में पांच प्रतिशत सीटें ऐसे लोगों के लिए रिजर्व 

होनी चाहिए जिन्होंने इस देश का संविधान ध्यान से पढ़ा हो।

जिन्होंने  विधायिकाओं की कार्य संचालन नियमावली का अध्ययन किया हो।

जो  स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास जानते हांे।

जिन्होंने विभिन्न विचारधाराओं के राष्ट्रीय नेताओं की जीवनियां पढ़ी हों।

जिन्हें देश के मुख्य कानूनों का मोटा-मोटी ज्ञान हो।

ऐसा नहीं कि ऐसे जानकार लोग खोजने पर आज नहीं मिलेंगे।

हां,उनकी तलाश राजनीतिक क्षेत्र से बाहर भी करनी पड़ेगी।

यह सब मैं क्यों कह रहा हूं ,वह बात तो समझ में आ ही गई होगी।

  यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि संसद और विधान मंडलों में अभी ऐसे जानकार लोग नहीं हैं।

अब भी हैं।

पर उनकी संख्या बढ़नी चाहिए। 

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  सड़कों पर टहलना जानलेवा !

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गत सोमवार को कन्हैया पांडेय पटना के दीघा-एम्स एलिवेटेड रोड पर टहल रहे थे।

मोटर साइकिल पर स्टंट कर रहे युवकों ने उन्हें टक्कर मार दी।

वे बुरी तरह घायल हो गए।

अंततः वे बच नहीं सके।

कई साल पहले भागल पुर में बिहार विधान सभा के पूर्व

स्पीकर प्रो. शिवचंद्र झा भी इसी तरह उदंड मोटर साइकिल चालक के शिकार हो गए थे।

  वे सड़क पर टहल रहे थे।

इस तरह की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं।

  दरअसल नगरों और महा नगरों में टहलने की जगहों का नितांत अभाव होता जा रहा है।

  लोगबाग सड़कांे पर टहलने को मजबूर हैं।

पार्कों की संख्या सीमित हैं।

बड़े पार्क और मैदान हैं भी तो अधिकतर लोगों के आवासों से दूर हंै।

  पटना के आसपास अनेक बस्तियां विकसित हो रही हैं।

अपवादों को छोड़कर कोई ‘डेवलपर’ पार्क के लिए जगह नहीं छोड़ता।

अपने नक्शे में भले डेवलपर पार्क का स्थान ग्राहकों को दिखा देता है।

किंतु अंततः वे पार्क की जमीन भी बेच देते हैं।

   सरकारी एजेंसी यदि इस मामले में डेवलपर्स पर नकेल कसे तो भविष्य में कन्हैया पांडेय जैसे लोगों की जानें बचाई जा सकती हैं।

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भूली बिसरी याद

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सन 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान 

प्रमुख नेताओं की कुछ उक्तियां यहां प्रस्तुत हैं।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने दरभंगा में कहा कि आतंक के तार महा स्वार्थ बंधन के नेताओं के घर तक पहुंचने लगे थे।

प्रधान मंत्री पुणे-मुम्बई धमाकों के सिलसिलमें में दरभंगा माॅड्यूल का जिक्र कर रहे थे।   

कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि आपलोग मोदी जी से कहें कि जाएं और दिल्ली में काम देखें।

  राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने कहा कि बिहार में अगर जंगल राज है तो मोदी नहीं, लालू यहां का शेर है।

जंगल में एक ही शेर रहता है।मोदी को लालू के जंगल में नहीं आना चाहिए।

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि हमने तो 10 साल का हिसाब दे दिया है।मोदी जी 17 महीनों का हिसाब दें।

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     और अंत में

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 कुछ दलों व नेताओं को उम्मीदवारों से ‘चंदे’ की अच्छी-खासी राशि मिलती रही है।इस बार भी मिल रही है।

वह राशि राजनीतिक,चुनावी और गैर -राजनीतिक खर्चों के लिए इन दिनों कुछ अधिक ही उपयोगी साबित हो रही है।

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कानोंकान,प्रभात खबर,पटना,2 अक्तूबर 20