रविवार, 13 दिसंबर 2020

 भूली-बिसरी याद

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5 दिसंबर, 1980

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15 पुलिस अफसरों के निलंबन के खिलाफ 

भागलपुर पूर्ण बंद रहा।

32 कथित अपराधियों का हुआ था अंधाकरण।

आरोप था कि कुछ की आंखों में क्रुद्ध जनता ने

‘गंगा जल’ (तेजाब) डाला तो बाकी काम पुलिस ने किया।  

आपराधिक न्याय -व्यवस्था पर सवाल !

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--सुरेंद्र किशोर--

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चालीस साल पहले।

आज ही के दिन।

भागलपुर पूर्ण बंद रहा।

बंद का आह्वान व्यापारियों तथा शांतिप्रिय  नागरिक समाज ने किया था।

बंद का कारण भी असामान्य था।

लोगबाग 32 कथित अपराधियों के अंधाकरण के आरोप में 15 पुलिस अफसरों के निलंबन के खिलाफ रोष प्रकट कर रहे थे।

तब मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अंधों के पक्ष व पुलिस अफसरों के खिलाफ अभियान चला रहा था।

  मानवाधिकार संगठन तथा अदालत की सहानुभूति भी अंधों के पक्ष में थी।

किंतु खूंखार अपराधियों के अंधाकरण के आरोप में 15 पुलिस अफसरों के निलंबन के पक्ष में भागलुपर के लोग उद्वंलित थे।

आपराधिक न्यायिक व्यवस्था की विफलता का यह जीता-जागता सबूत था।

   लोगबाग कह रहे थे कि बलात्कार का विरोध करने पर स्तन काट लेने वाले इन खूंखार अपराधियों के साथ किसी की  सहानुभूति आखिर क्यों ?

ये अपराधी अपराध करके जेल जाते हैं।

थोड़े ही दिनों में जमानत पर छूट कर फिर जघन्य अपराधों में लग जाते हैं।

आपराधिक न्याय व्यवस्था ठीक करने की जवाबदेही आखिर किसकी है ?  

याद रहे कि वही वक्त था जब बिहार में राजनीति के अपराधीकरण का बोलबाला बढ़ने लगा था।

1980 तक लगभग सारे प्रमुख दल बारी -बारी से सत्ता में आ चुके थे।

  अपवादों को छोेड़कर चुनावी राजनीति से नैतिकता का लोप होने लगा था।

बड़े अपराधियों की छांह तले छोटे अपराधी पलने लगे थे ।

 उन्हें अनेक छोटे -बड़े राजनेता संरक्षण दे रहे थे ताकि उनसे बूथ कब्जा करवा कर चुनाव जीता जा सके। 

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--5 दिसंबर 20

 


   भारतीय संसद पर 2001 के

 आतंकी हमले को याद रखें

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साथ ही अंतध्र्वंसकों -भितरघातियों को पहचानें

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  --सुरेंद्र किशोर--

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13 दिसंबर, 2001 को जेहादियों-आतंकियों ने 

भारतीय संसद भवन पर जोरदार हमला किया था।

संसद सत्र में थी।

  आतंकवादियों से संसद को बचाने के लिए 5 सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जानें दे दीं।

एक माली और एक नागरिक भी शहीद हुए ।

 इस क्रम में पांच आत्मघाती आतंकी मारे गए।

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कल्पना कीजिए कि तब सुरक्षाकर्मी विफल हो गए होते तो क्या होता ?

अनेक तथाकथित सेक्युलर और गैर सेक्युलर सांसद भी मारे जाते।

  पर, उस तरह की घटना को लेकर भी हमारे देश के कई वोटलोलुप तथाकथित सेक्युलर नेताओं ने कैसा 

रवैया अपनाया ?

   इस कांड को लेकर अफजल गुरु को 2013 में ही फांसी दी जा सकी,

यानी लंबी सुनवाई के बाद।

इस देश में अफजल गुरु की कुछ लोग बरखी मनाते हैं और भारत तेरे टुकड़े होंगे,जैसे नारे भी लगाते हैं।

उन तत्वों के साथ हमारे देश के कौन -कौन नेता खुलेआम एकजुटता दिखाते हैं,यह सबको मालूम है।

  वैसों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने की अनुमति इस देश के एक राज्य का मुख्यमंत्री जल्दी नहीं देता।

काफी दबाव में बाद ही देने को बाध्य होता है।

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   संसद पर उस हमले के बाद भारत और पाक के बीच तब भारी तनाव पैदा हो गया था।

दोनों देशों की सेनाएं सीमा पर पहुंच गई थीं।

  हालांकि युद्ध नहीं हुआ।

  बाद में इस देश के एक बड़े नामी वोटलोलुप सेक्युलर नेता ने बयान दिया कि पाकिस्तान को अपनी सेनाओं को भारतीय सीमा पर पहुंचाने में जो खर्च आया है,उसकी भरपाई,भारत सरकार  करे ।

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ऐसा तो जयचंद ने भी नहीं कहा था कि पृथ्वीराज चैहान को हराने में मुहम्मद गोरी की सेना को जो खर्च करना पड़ा था, उसकी भरपाई होनी चाहिए।

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आज के कुछ नेताओं की हरकतों को देखकर लगता है कि बेचारा जयचंद तो नाहक बदनाम हो गया !

बाद में गोरी के हाथों उसकी भी जान गई।

(आधुनिक जयचंद इसे खास तौर पर याद रखें।)

जयचंद का आखिर कसूर क्या था ?

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किसी की बहन-बेटी को कोई उठा ले जाएगा तो वह अपहरणकत्र्ता की मदद करना छोड़ देगा,यह स्वाभाविक है।

कम से कम इतना तो वह करेगा ही।

पहले जयचंद, चैहान की मदद करता था।

उस कारण मुहम्मद गोरी, 

चैहान से बार -बार हारता रहा।

अपहरण की घटना के बाद जयचंद ने मदद करनी छोड़ दी।

चैहान हार गया।

जयचंद ने युद्ध में गोरी का साथ नहीं दिया था।

गोरी की ओर से  नहीं लड़ा था।

दूसरी ओर अकबर की सेना में शामिल होकर मान सिंह (जयपुर)राणा प्रताप के खिलाफ लड़ा था। 

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किंतु आधुनिक भारत में हमारे यहां के कुछ वोटलोलुप नेता व बुद्धिजीवी लगातार क्या-क्या  करते जा रहे हैं ?

लगातार हमलावरों-जेहादियों का साथ दे रहे हैं।

मन -वचन - कर्म से !

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इस अवसर पर ‘जागृति’ फिल्म का यह गाना याद आता है

--हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के !

इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के !!

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अब तो कुछ ‘तत्व’ जागृति जैसी फिल्में भी नहीं बनने देते।

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--सुरेंद्र किशोर--13 दिसंबर 20


शनिवार, 12 दिसंबर 2020

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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  अपराध कम होने से राजनीति के अपराधीकरण पर भी लगेगी लगाम 

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 मुख्य मंत्री नीतीश कुमार अपराध पर काबू पाने के लिए सख्त कदम उठा रहे हैं।

  कानून -व्यवस्था पर उच्चस्तरीय बैठक में उन्होंने निदेश दिया कि पेशेवर अपराधियों पर नकेल कसी जाए ।

उन्होंने यह भी कहा कि जहां अपराध बढ़ रहे हैं,वहां के पुलिस अफसरों पर सख्त कार्रवाई होगी।

   मुख्य मंत्री ने सही कदम उठाया है। 

हालांकि इस सख्ती के निदेश को कार्यान्वित भी करना होगा।

काम कठिन है।पर असंभव नहीं।

क्योंकि यही सरकार 2005 से 2010 तक सुशासन लाने का काम कर चुकी है। 

याद रखना होगा कि 

अपराध में बाहर-भीतर के बड़े -बड़े लोगों के निहितस्वार्थ है।

अपराध पर काबू पाने से राजनीति के अपराधीकरण

पर भी काबू पाया जा सकेगा।

   आपराधिक न्याय व्यवस्था में   

 कमजोरी आ जाने से ही जहां -तहां राबिनहुड सरीखे डाॅन मजबूत होते जाते हैं।

 बाद में वे चुनाव भी जीत जाते हैं।

आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहली कड़ी पुलिस है।

पुलिस थाना चाहे तो अपराध पर काबू रहेगा।

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    लाॅटरी के आधार पर 

   हो दारोगा की तैनाती  

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‘पक्षपात’ के बिना ही थानेदार की तैनाती अब जरूरी है।

ऐसा होने लगे तो 

वैसे थानेदारों से कत्र्तव्यनिष्ठा की उम्मीद की ही जा सकती है।

इसके लिए जरुरी है कि राज्य स्तर पर लाॅटरी निकाल कर पूरे राज्य में थानेदारों की तैनाती हो हो।

लाॅटरी से निकले थानेदारों की सूची में से अधिकत्तम दस प्रतिशत थानेदारों के नामों में फेरबदल करने की छूट एस.पी.को दी जा सकती है।

  इस तरह तैनात किए गए थानेदारों की रोज -ब-रोज की भौतिक जरूरतों को पूरा किया जाना भी जरूरी है।

कहीं -कहीं तो पेट्रोलिंग करने के लिए थानों के पास पर्याप्त साधन ही नहीं होते।

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    पुनर्वास के लोभ में बढ़ता है अतिक्रमण 

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 कल्पना कीजिए कि किसी बड़े नगर के बड़े अस्पताल 

तक जाने के लिए 30 फीट चैड़ी सड़क निर्मित  है।

 उस सड़क के दोनों किनारों पर 10-10 फीट जगह घेर कर अतिक्रमणकारी काबिज हैं।

    जाहिर है कि उस सड़क पर अक्सर जाम की मारक समस्या रहेगी।

 अब जरा उस सड़क से गुजरने वाले मरीजों की गाड़ियांे का

अंदाज लगाइए।

क्या होगा यदि किसी दिन गंभीर मरीज लिए दो एम्बुलेंस बारी -बारी से उस जाम में फंस जाएं।

 घंटों तक फंसे रहें।

दुर्भाग्यवश मरीजों की मौत हो जाए !

फिर बताइए कि उस मौत की सजा किसे मिलनी चाहिए ?

 दूसरी ओर, आज अतिक्रमणकारियों के साथ कैसा सलूक किया जाता है ?

  एक तो अतिक्रमण हटता नहीं ।

हटता भी है तो अतिक्रमणकारियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था सरकार करती है।

  वैकल्पिक व्यवस्था के लोभ में अतिक्रमण बढ़ता रहता है।

  संभवतः इन्हीं सब बातों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी, 2006 में सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण को लेकर एक जजमेंट दिया था।

न्यायमूत्र्ति एस.बी.सिन्हा और पी.क.बाला सुब्रह्मण्यन के पीठ ने कहा कि ‘‘अतिक्रमणकारियों को किसी तरह का यह अधिकार नहीं है कि वे सरकार से अपने पुनर्वास की मांग करें।’’

    दूसरी ओर, सरकारें फुटपाथ दुकानदारों की गरीबी से अक्सर द्रवित रहती है।

रहना भी चाहिए।

पर दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए ?

ताकि जाम में फंसकर किसी की जान न जाए।

साथ ही, फुटपाथी दुकानदारों की रोजी-रोटी की व्यवस्था भी हो ! 

ध्यान रहे कि यह समस्या पूरे बिहार की है।

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  ‘हल्ला गाड़ी’ की जरूरत

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पटना के आयुक्त ने निदेश दिया है कि जहां से अतिक्रमण हटा दिया जाता है,वहां सतत निगरानी होनी चाहिए।

ऐसा करने से दुबारा अतिक्रमण नहीं होगा।

पुलिस,नगर निगम और जिला प्रशासन की टीम प्रतिदिन 

निगरानी करंे।

पर ऐसे आदेश-निदेश पहले भी दिए जाते रहे हैं।

कोई असर नहीं हुआ।

इस देश के कुछ नगरों में ‘हल्ला गाड़ी’ यानी अतिक्रमण निरोधक मोबाइल दस्ते सड़कों पर दौड़ते रहते हैं।

वहां ‘हल्ला गाड़ी’ की आहट सुनते अतिक्रमणकारी अपने सामान समेट कर भागने लगते हैं।

क्योंकि हल्ला गाड़ी किसी के प्रति नरमी नहीं बरतती।

पटना व बिहार के अन्य नगरों में भी  ‘कत्र्तव्यनिष्ठ कर्मचारियों के नेतृत्व में ‘हल्ला गाड़ियां’ चलाई जानी चाहिए।

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   कैसे बढ़े मतदान का प्रतिशत !

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इस बार भी बिहार में जो विधान सभा गठित हुई है,उसके सदस्यों को औसतन 25 प्रतिशत वोट ही मिले हैं।

 करीब 57 प्रतिशत मतदान हुए।

   यदि किसी न किसी उपाय से कम से कम 75 प्रतिशत मतदाताओं को मतदान केंद्रों पर पहुंचाया जा सके तो  फर्क पड़ेगा।

विजयी उम्मीदवारों के वोट प्रतिशत बढ़ जाएंगे।

तब लगेगा कि वे अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इससे उनकी ही प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

  अब सवाल है कि अधिकतर मतदाताओं को वोट डालने के लिए आखिर कैसे प्रेरित किया जाए ?

  सरकार तत्संबंधी कानून बनाए या भौतिक प्रोत्साहन दे ?

कुछ तो करना ही चाहिए।

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और अंत में 

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  नीतीश सरकार ने पुलिस और सामान्य प्रशासन को बेहतर  और भ्रष्टाचारमुक्त बनाने की बड़ी पहल शुरू की है।

इसके साथ ही एक और काम की ओर उसे ध्यान देना चाहिए।

कहीं भीषण आग लगती है तभी अग्नि शामक सेवा की कमजोरियों की ओर शासन का ध्यान जाता है।

इस बार पहले से ही ध्यान जाए तो बेहतर होगा।

देखना होगा कि कहां -कहां अग्नि शमन नियमों का पालन हो रहा है ?

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11 दिसंबर 20-प्रभात खबर,पटना


शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

 भगवान श्रीराम ने कहा था कि 

‘‘मैं मृत्यु से नहीं डरता,डरता हूं 

तो लोकापमान से।’’

   इसीलिए तो वे मर्यादा पुरुषोत्तम थे !

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आज क्या स्थिति है ? !

ठीक उल्टी।

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त्रेता और कलियुग में फर्क तो होगा ही।

अपवाद तब भी थे।

अपवाद आज भी हैं।

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रावण के साथ रहकर भी विभीषण नहीं बिगड़े।

दशरथ के साथ रहकर भी कैकेयी नहीं सुधरी।

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छात्र जीवन में

शुकसागर पढ़ा था।

उसमें लिखा हुआ है--

कलियुग में राजा ही अपनी प्रजा को लूटेगा ।

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--सुरेंद्र किशोर-5 दिसंबर 20


सोमवार, 7 दिसंबर 2020

 सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव लड़ने 

पर केंद्र सरकार का रुख सही नहीं

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  केंद्र सरकार ने हाल में सुप्रीम कोर्ट से  कहा कि 

वह सजायाफ्ता नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध के हक में नहीं है।

यानी, सजा मिलने के बावजूद चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध नहीं लगेगा।

इस मामले में सरकारी कर्मचारियों की बात अलग है।

सजा पूरी होने के छह साल बाद वह चुनाव लड़ सकता है।

  मेरी समझ से केंद्र सरकार का यह रुख उसकी अदूरदर्शिता का परिचायक है।

उसे आने वाले समय में अपने इस स्टैंड पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

  जब ऐसे -ऐसे लोग भी इस देश में लोस-विस का चुनाव लड़ रहे हैं जो हथियारों के बल पर इस देश की सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं तो वे विधायिका में घुस कर किसी दिन उसे विस्फोटकों से उड़ा भी सकते हैं।

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कोई सजायाफ्ता व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं रह सकता।

किंतु इस देश में सजायाफ्ता नेता सजा पूरी होने के छह 

साल के बाद सांसद या विधायक बन सकता है।

  इसी विरोधाभास को समाप्त करने के लिए वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में लोकहित याचिका दायर की है।

  उस पर केंद्र सरकार का रुख मेरी समझ से सही नहीं है।

यदि इसी रुख पर कायम रहना है तो सरकारी कर्मचारियों को भी यही सुविधा मिले।

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--सुरेंद्र किशोर-

 7 दिसंबर 20


रविवार, 6 दिसंबर 2020

 सीधी-सादी समस्याओं का भी ‘जलेबीकरण’ जारी ?!!

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‘लव मैरेज’ और ‘लव जेहाद’ का फर्क आम लोग अच्छी तरह  समझ रहे हैं।

पर, निहित स्वार्थी तत्व देश को गुमराह करने की कोशिश में लगे हैं। 

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--सुरेंद्र किशोर--

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उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश विधि विरूद्ध धर्म संपरिवत्र्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020 जारी किया।

कुछ लोग उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए।

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वे कह रहे हैं कि यह कानून संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ है।

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अरे भई, यह कानून ‘लव मैरेज’ के खिलाफ नहीं है।

चाहे लव मैरेज दो धर्मां के बीच ही क्यों न हो !

यह कानून नाम बदल कर लव करने व फिर धर्म परिवत्र्तन के लिए बाध्य करने के खिलाफ है।

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शाहरूख खान और आमिर खान की जिस तरह हिन्दू लड़कियों से शादियां हुईं,उस तरह की शादियों पर यह कानून लागू नहीं होता ।

शाहरूख और आमिर ने अपना सही नाम बता कर ही उनसे प्रेम और विवाह किया था।

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यह कानून तारा शाहदेव-रकीबुल हसन (रांची-2014) और

निकिता तोमर-तौशिफ (फरीदाबाद-2020) जैसे मामलों पर लागू होगा।

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क्या भारत के संविधान का बुनियादी ढांचा यह कहता है कि कोई तौशिफ किसी निकिता से लव करे और उससे कहे कि तुम अपना धर्म बदल लो और मुझसे शादी कर लो ?

यदि लड़की धर्म नहीं बदले तो उसे तौशिफ सरेआम गोली मार दे ????

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जेपी आंदोलन के दौरान एक अल्पसंख्यक आंदोलनकारी ने 

एक बहुसंख्यक समुदाय की आंदोलनकारी लड़की से प्रेम किया।

बाद में दोनों की शादी हुई।

अल्पसंख्यक समुदाय का वह आंदोलनकारी बाद में बिहार में मंत्री बना।

पर उसके राजनीतिक विरोधियों ने भी यह आरोप

नहीं लगाया कि उसने ‘लव जेहाद’ किया।

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--सुरेंद्र किशोर-4 दिसंबर 20


शनिवार, 5 दिसंबर 2020

     51 साल बाद की नई परंपरा का 

     आशंकित राजनीतिक असर

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      --सुरेंद्र किशोर--

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मैं 1977 से 2001 तक संवाददाता के तौर पर बिहार विधान सभा की कार्यवाहियों की लगातार रिपोर्टिंग करता रहा।

 उस बीच कभी स्पीकर पद के लिए चुनाव होते नहीं देखा।

बाद के वर्षों में भी ऐसा नहीं हुआ।

1977 तक उपाध्यक्ष के पद पर भी सत्तारूढ़ दल के नेता ही बैठते थे।

पर 1977 में मोरारजी देसाई सरकार की पहल से फर्क आया।

फर्क लोक सभा से लेकर देश की विधान सभाओं तक पड़ा।

सदन में प्रतिपक्ष के नेता को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलने लगा।

  उससे पहले बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता को राज्य सरकार की तरफ से एक स्टेनो टाइपिंग और कुछ अखबार खरीदने के पैसे मात्र मिलते थे।

पर 1977 में उपाध्यक्ष का पद प्रतिपक्ष को मिलने लगा।

पहली बार प्रतिपक्ष की ओर से राधानंदन झा उपाध्यक्ष बने थे।

51 साल बाद इस बार बिहार में प्रतिपक्ष ने स्पीकर के पद का चुनाव लड़ा।क्योंकि सदन की कार्यवाही में भी शालीनता नहीं थी।

इससे राजनीतिक कटुता बढ़ी।

साथ ही ,

राजद ने एक भाजपा विधायक को प्रलोभन देकर तोड़ने की कोशिश की।

उससे और भी कटुता बढ़ी।

बात तो एक ही विधायक की सामने आई।

संभव है कि कुछ अन्य को भी प्रलोभन मिला हो।

क्योंकि मात्र एक विधायक के सदन से अनुपस्थित हो जाने  से प्रतिपक्ष का स्पीकर तो नहीं बन जाता ! 

अब आगे देखना है कि इस कटुता का राज्य की राजनीति और सदन की कार्यवाही पर कैसा असर पड़ता है।

यह भी कि उपाध्यक्ष प्रतिपक्ष का बनता है या नहीं !

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--सुरेंद्र किशोर-26 नवंबर 20