गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

 स्वहित,परिवार हित और जाति हित की परवाह किए बिना आबकारी मंत्री जगलाल चैधरी ने कभी लागू कर दिया था बिहार में पूर्ण नशाबंदी  

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सुरेंद्र किशोर

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आजादी के बाद की बिहार सरकार में जगलाल चैधरी आबकारी मंत्री थे।

  वैसे तो वे सन 1937 में गठित राज्य मंत्रिमंडल में भी चार मंत्रियों में एक मंत्री थे।

अन्य तीन थे-डा.श्रीकृष्ण सिंह (प्रीमियर),डा.अनुग्रह नारायण सिंह और डा.सैयद महमूद।

जगजीवन राम उस सरकार के संसदीय सचिवों में से एक थे। 

  चैधरी जी पासी जाति से आते थे।

खुद उनका परिवार ताड़ी के व्यवसाय पर निर्भर था।

 इसके बावजूद आबकारी मंत्री के रूप में जगलाल चैधरी ने नशाबंदी लागू कर दी।

उनका परिवार ताड़ी की आय से ही चैधरी जी को कलकता मेडिकल काॅलेज में डाॅक्टरी पढ़ा रहा था।

फिर भी चैधरी जी ने न तो अपने परिवार की आय की परवाह की और न अपनी जाति के आर्थिक हित की।

 बाद में खुद उन्हें नशाबंदी की भारी कीमत चुकानी पड़ी।

कांग्रेस हाईकमान ने चैधरी जी को बाद में कभी 

 मंत्री नहीं बनने दिया।

  दरअसल चैधरी जी कट्टर गांधीवादी थे।

(इस राजनीतिक घटना से भी इस आरोप के बल मिलता है कि आजादी के तत्काल बाद की कांग्रेस व उसकी सरकारों को गांधीवाद से कम ही मतलब रह गया था।) 

दरअसल चैधरी जी नशाखोरी से होने वाले नुकसान को जानते थे।गांधी जी ने उन्हें सिखाया था।

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   आबकारी मंत्री चैधरी ने कहा था कि ‘‘जब मैं अपने बजट को देखता हूं तो मालूम होता है कि इस साल हम पंद्रह करोड़ रुपए खर्च करेंगे।इसमें हम पांच करोड़ रुपए तो गरीबों के पाॅकेट से उन्हें शराब पिला कर लेंगे।’’

(याद रहे कि गांधी ने कहा था कि यदि सरकारी स्कूल का खर्च आबकारी आय से चलता हो तो वैसे स्कूलों का न चलना ही बेहतर है।)

कट्टर गांधीवादी जगलाल चैधरी के नशाबंदी आदेश से सबसे अधिक नुकसान उनकी अपनी ही पासी जाति को हुआ था।पर इस बारे में वे कहते थे कि 

‘‘यह समाज कोई और रोजगार करे।

गरीब -दलित यदि शराब का व्यापार और शराब पीना छोड़ देंगे तो उनकी प्रतिष्ठा भी समाज में बढ़ेगी और उनकी गरीबी भी कम होगी।’’

पर, उनके मंत्री नहीं रहने पर नशाबंदी का आदेश बिखर गया था।

 बाद के मंत्रिमंडल में जब उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया तो राजनीतिक हलकों में यह आम चर्चा थी कि शराबबंदी के पक्ष में  उनके विशेष आग्रह के कारण ही ऐसा हुआ।

 चैधरी जी पर कांग्रेस हाईकमान भी नाराज हो गया था। 

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याद रहे कि गांधी जी से प्रभावित होकर जगलाल चैधरी ने जब आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए पढ़ाई छोड़ दी तब वे कलकत्ता में मेडिकल छात्र थे।

उनका चैथा साल था।

पर , उन्होंने कहा कि अब मेरे लिए इस पढ़ाई का कोई मतलब नहंीं रहा। 

  संयोग से वे उस चुनाव क्षेत्र (गड़खा,सारण)से लड़ते थे जहां मेरा पुश्तैनी गांव है।

उन्हें मैंेने अपने गांव में बचपन में देखा था।

सादगी की प्रतिमूत्र्ति थे।

वे लोगों से कहा करते  थे कि आपलोग अंग्रेजी दवाओं से भरसक दूर रहें।

खेतों में रासायनिक खादों के बदले जैविक खाद डालें।भूजल स्त्रोतों की रक्षा करें।यानी, कम से कम ट्यूब वेल लगवाएं।

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  एक और प्रकरण और !

चैधरी जी की बेटी की जब शादी थी,तब वे बिहार में मंत्री थे।

उनकी सरकार ने हाल ही में विधायिका से गेस्ट कंट्रोल एक्ट पास करवाया था।

शायद उसके अनुसार अत्यंत सीमित संख्या --तीस या पैंतीस --में ही अतिथियों को बुलाने का नियम बनाया गया।

बारात आई।उतने ही लोगों का खाना बना था।

पर,बिना बुलाए कई अतिथि आ गए।

नतीजतन खुद चैधरी जी के परिवार को उस रात भोजन नहीं मिला।

चैधरी जी ने अतिरिक्त भोजन नहीं बनने दिया था।

शादी को सम्मेलन बनाने वाले नेताओं के आज के दौर में 

जगलाल चैधरी याद आते हैं।

हालांकि गेस्ट कंट्रोल एक्ट आज भी लागू है ,पर सिर्फ कागज पर। 

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एक जगलाल चैधरी थे,और दूसरी ओर आज के अनेक नेता हैं जो बिहार में जारी शराबबंदी को फिर से चालू करवाना चाहते हैं।

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1 दिसंबर 22


 मेरे बारे में आलोक तोमर के तीन वाक्य  

 किसी पुरस्कार से कम नहीं

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सुरेंद्र किशोर

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पत्रकारीय जीवन (1977-अब तक )में कोई भी पद,पुरस्कार,सम्मान या उपहार आदि मेरे नाम दर्ज नहीं है।

या तो मिला नहीं या लिया नहीं !

इस बारे में जिन्हें जो समझना हो,समझ सकते हैं।

हां, एक बात जरूर जहां-तहां दर्ज है।

वह है कि मेरे लेखन के प्रति कुल मिलाकर सराहना के शब्द।

मैंने शुरू से ही यह मानता रहा कि वही मेरे लिए बड़ा से बड़ा पुरस्कार होगा।

बाकी पुरस्कारों में से अधिकतर के पीछे ‘‘कुछ-कुछ होता रहता है।’’

हां,सबके पीछे नहीं।

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 कुछ वैसे ही शब्दों के साथ हिन्दी के चर्चित व अद्भुत पत्रकार आलोक तोमर को मैं आज याद कर रहा हूं।

बात तब की है कि जब आलोक तोमर ग्वालियर में दैनिक ‘स्वदेश’ में काम कर रहे थे।

सन 1983 से पहले की बात है।

मैं पटना में दैनिक ‘आज’ में सेवारत था।

साथ-साथ, अनेक पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ ‘नईदुनिया’ के लिए भी बिहार से खूब लिखता था।

उन दिनों इन्दौर से प्रकाशित दैनिक नईदुनिया देश का सर्वश्रेष्ठ हिन्दी अखबार माना जाता था।राजेंद्र माथुर उसके संपादक थे।वह मध्य प्रदेश का तब सर्वाधिक प्रसार वाला अखबार था।

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आलोक ने मुझे ग्वालियर से लिखा,

‘‘आपका नाम इस इलाके में नईदुनिया के चलते काफी लोकप्रिय है।

एकाध ने तो भरोसा ही नहीं किया कि मैं जो पत्र दिखा रहा हूं ,वह वास्तव में आपका ही है।

 आपके प्रभामंडल का शिकार हो गया मैं।’’

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याद रहे कि बिहार के मूल वासी अंग्रेजी पत्रकार हेमेंद्र नारायण मध्यप्रदेश में तैनात थे और उन्होंने आलोक के बारे में मुझे बताया था।

उस पर मैंने आलोक को एक चिट्ठी थी।

उसी की चिट्ठी की चर्चा कर रहे थे आलोक।

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बाद में आलोक ने नई दिल्ली

में ‘यूनीवार्ता’ ज्वाइन की।

उसके बाद ‘जनसत्ता’।

प्रभाष जोशी के अत्यंत प्रियपात्र रहे आलोक ने ‘जनसत्ता’

में ऐसी रिपोर्टिंग की जो सब लेखन शैली का उदाहरण बन गया।

  आलोक अपने समय के स्टार रिपोर्टर थे।

11 साल पहले उनका निधन हो गया।

उन्होंने जब मुझे चिट्ठी लिखी थी,तब वे अपने पत्रकारीय जीवन के निर्माण काल में थे।

पर,उस समय भी चीजों पर उनकी पकड़ पैनी और मजबूत थी।

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लगता है कि ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को समय से पहले ही ईश्वर अपने पास बुला लेते हैं।

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30 नवंबर 22


बुधवार, 30 नवंबर 2022

    वैद्य मेलबोर्न में

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     सुरेंद्र किशोर

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राॅयल कालेज आॅफ सर्जन, मेलबाॅर्न, आॅस्ट्रेलिया के परिसर में प्राचीन भारतीय शल्य चिकित्सक सुश्रुत की दिव्य मूर्ति आज भी विराजमान है।

ईसा से 800 साल पहले सुश्रुत का जन्म वाराणसी में हुआ था।

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इस तथ्य को लेकर यदि आपको शक हो तो गुगुल गुरु से पूछ लीजिएगा।

वहां सचित्र सबूत मौजूद है।

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जब इस देश के तक्षशिला और नालंदा विश्व विद्यालयों में दुनिया भर से छात्र आकर पढ़ते थे, कहते हैं कि यूरोप में तब अधिकतर लोग जंगलों में रहते थे।

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हमारी प्राचीन सभ्यता कैसी थी ?

उन सभ्यताओं को किन आक्रांताओं ने समय- समय पर नष्ट किया ?

किन स्वेदशी योद्धाओं ने बहादुरी से उनका भरसक मुकाबला किया ?

 किन आक्रांताओं ने यहां मेकाॅलेवाद लागू किया ?

इन सब के बारे में यदि नई पीढ़ी को पढाया जाए तो क्या उसे इतिहास को बदलना कहा जाएगा ?

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इंडोनेशिया की जल सेना का ध्येय 

वाक्य है--‘‘ जलेष्वेव जयामहे’’

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कोलंबो विश्वविद्यालय,श्रीलंका का ध्येय वाक्य है-

बुद्धिःसर्वत्र भ्राजते

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पुनश्चः-

न तो प्राचीन काल की सारी बातें अच्छी हैं और न सारी बातें गलत हैं।

अर्वाचीन की न तो सारी बातंे अच्छी हैं और न ही सारी

बातें गलत हैं।

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बल्कि, समय की शिला पर पटका-झटका खाकर जो

तथ्य खरे सोने की तरह उभरे-चमके हैं,वे ही सही हैं।

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30 नवंबर 22


 पहले केरल में कम्युनिस्ट सरकार के मंत्री

 और बाद में सुप्रीम कोर्ट के जज

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      सुरेंद्र किशोर

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वी.आर. कृष्णा अय्यर सन 1957-59 में सी.पी.आई.नेता नम्बूदरीपाद मंत्रिमंडल के सदस्य थे।

अय्यर साहब साठ के दशक मेें केरल हाई कोर्ट के जज हुए।

1973 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने।

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बहरूल इस्लाम सन 1962 और 1968 मंे कांग्रेस के टिकट पर राज्य सभा के सदस्य बने। 

सन 1972 में हाईकोर्ट जज बने।

1980 में सुप्रीम कोर्ट जज बने।

1983 में जज पद से इस्तीफा देकर कांग्रेस के टिकट पर फिर राज्य सभा के सदस्य बन गए।

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इन दिनों जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच तनातनी जारी है।

इसी संदर्भ में मैंने उपयुक्त तथ्यों से आपको अवगत कराया।

वैसे इस तरह के अन्य उदाहरण भी आपको मिल सकते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

29 नवंबर 22 


मंगलवार, 29 नवंबर 2022

 चुनावी तथा राजनीतिक खर्चे

कम करके नेता और राजनीतिक दल आदर्श उपस्थित करंे

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अन्यथा, सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचारों पर 

काबू पाने की प्रधान मंत्री तथा अन्य की कोशिश

कत्तई सफल नहीं होगी

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सुरेंद्र किशोर 

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कई दशक पहले की बात है।

पटना के सालिमपुर अहरा स्थित पार्टी आॅफिस में पीलू मोदी 

एक ‘इजी चेयर’ पर पसरे हुए थे।

उनके अगल-बगल कर्पूरी ठाकुर और मैं था।

उन दिनों कर्पूरी ठाकुर और पीलू मोदी 

एक ही दल यानी संभवतः भारतीय लोक दल में थे।

कर्पूरी जी ने पीलू साहब से विनम्रता से कहा,

‘‘मोदी जी,यदि हमारी बिहार पार्टी के लिए आप एक हेलिकाॅप्टर का प्रबंध कर दें तो हम बिहार में विधान सभा की आधी सीटें जीत जाएंगे।’’

  उस पर हंसोड़ पीलू ने कहा,

‘‘मिस्टर कर्पूरी, मैं दो हेलिकाॅप्टर का प्रबंध कर देता हंू,सारी सीटें जीत जाओ।अरे भई,हेलिकाॅप्टर से चुनाव नहीं जीता जाता।’’

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खुद कर्पूरी ठाकुर किसी हेलिकाॅप्टर की मदद के बिना बिहार में दो बार मुख्य मंत्री बन गए।एक बार उप मुख्य मंत्री बने थे।

उन दिनों के किसी दल के नेता का चुनावी खर्च आज जैसा नहीं था।

पीलू मोदी गुजरात के गोधरा से एम.पी.हुआ करते थे।

किंतु पिछले अनुभवों के विपरीत आज के गुजरात के चुनाव में हो रहे खर्चे का एक नमूना 

यहां पेश है।

कल के दैनिक भास्कर में छपी एक खबर के अनुसार इस बार गुजरात में भाजपा,कांगे्रस और आप के नेता सिर्फ भाड़े के विमानों पर करीब 100 करोड़ रुपए खर्च करेंगे।बुकिंग हो चुकी है।यह सिर्फ विमानों का खर्च है।अन्य खर्चों की कल्पना कर लीजिए।

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उधर सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी परेशान व चिंतित रहते हैं।

उन्होंने जांच एजेंसियों को सख्त निदेश दिया है कि वे नाजायज ढंग से पैसे कमाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें।

  इन दिनों ऐसी सख्त कार्रवाइयां हो रही हैं जैसी इस देश में इससे पहले कभी नहीं हुई थी।इससे आम जनता खुश है।

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किंतु भाजपा,कांग्रेस तथा अन्य दलों को चाहिए कि राजनीतिक व चुनावी खर्चे कम करके आदर्श उपस्थित करें।

इससे मौजूदा व अगली पीढ़ियों में नाजायज धनोपार्जन की लालसा आज जैसी तीव्र नहीं रहेगी।

ऐसा नहीं करने से सरकारों तथा अन्य जगहों के भ्रष्टाचार पर काबू पाने में मोदी सरकार को दिक्कतें आएंगी।

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14 नवंबर 22 


   सन्नाटा बनाम भारी भीड़

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 जिस दौड़ में भीड़ कम,प्रतिस्पर्धी कम,

    वहां जीत का चांस बेहतर !

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    --सुरेंद्र किशोर

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किसी ने ठीक ही कहा है कि

यदि आप शीर्ष पर पहुंचना चाहते हो,तो ऐसी दौड़ में 

ही शामिल होओ जिसमें भीड़-भाड़ यानी प्रतिस्पर्धी यानी होड़ बहुत ही कम हों।

  भ्रष्टाचारियों की बड़ी जमात में से हर व्यक्ति एक दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है।

वहां भीड़ बेशुमार है।

नाजायज तरीके से अधिक से अधिक धनोपार्जन की आपसी गलाकाट होड़ है।

यानी, धन-दौलत की लूट है,लूट सके सो लूट !!

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किंतु ईमानदार लोगों की (अघोषित) आपसी प्रतिस्पर्धा में कोई खास भीड़-भाड़़ नहीं है।

कई क्षेत्रों में तो भारी सन्नाटा है।

जहां प्रतिस्पर्धी कम हों,वहां से उभर कर शीर्ष पर पहुंचने का चांस भी काफी बेहतर हैै।

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  27 नवंबर 22


    जन सेवा किशोर कुणाल (अवकाशप्राप्त 

    आई.पी.एस.)के स्वाभाव में है

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     सुरेंद्र किशोर-

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मैंने आज पत्नी से कहा कि 

कुणाल साहब के पुत्र की शादी के बाद का स्वागत-समारोह उसी वेटनरी काॅलेज के मैदान में होने जा रहा है,जहां कभी तुम्हारा स्कूल हुआ करता था।

पत्नी ने देर किए बिना कह दिया,

‘‘आपको वहां जरूर जाना चाहिए।’’

मैंने कहा कि तुम जानती हो कि मैं अभी अस्वस्थ हूं ।

 कहीं जा नहीं जा रहा हूं।फिर भी तुमने यह कैसे कह दिया !

उसने कहा--अरे हां !!

पर,उसका कारण उसने बताया।

नब्बे के दशक की बात है।

मेरी पत्नी हमारे एक रिश्तेदार मुखिया जी की पत्नी के साथ  बाबा धाम,देवघर गई थी।

लौटती में पटना रेलवे जंक्शन पर रात साढ़े नौ बज गए थे।

पत्नी ने बताया कि तब हमलोग मजिस्ट्रेट काॅलोनी में रहते थे।

उन दिनों पटना में रात-विरात चलने से लोग बचते थे।

 इसी सोच-विचार में मेरी पत्नी महावीर मंदिर की सीढ़ी पर बैठी हुई थी।

क्या किया जाए ?

स्टेशन प्लेटफार्म पर रुक जाया जाए,या आॅटो पकड़ा जाए ?

इसी बीच कुणाल साहब (यानी, किशोर कुणाल) वहां पहुंच गए।

उन्होंने दो महिलाओं को अकेला देखकर पूछा कि ‘‘आपलोग कहां से आई हैं और कहां जाना है ?’’

मेरी पत्नी ने कहा कि ‘‘हमलोग बाबा धाम से आ रहे हैं।

मजिस्ट्रेट काॅलोनी जाना है।’’

उसके बाद उसी सीढ़ी पर कुणाल साहब भी बगल में बैठ गए।

उन्होंने अपनी दोनांे तलहथियां सामने फैलाते हुए कहा कि प्रसाद दे दीजिए।

उन्हें प्रसाद दिया गया।

उसके बाद उन्होंने आॅटो रिक्शावाले को पास बुलाया।

कहा कि तुम अपना लाइसेंस मुझे दे दो।

उसने दे दिया।

कुणाल साहब ने कहा कि इन लोगों को मजिस्ट्रेट काॅलोनी पहुंचा कर यहां आ जाओ और अपना लाइसेंस मुझसे ले लेना।

आॅटो वाला जब पत्नी को लेकर गतव्य स्थान की ओर चला तो पूछा कि कुणाल साहब आपके कौन हैं ?

मेरी पत्नी ने कहा कि वे मेरे भाई हैं।

लगे हाथ यह भी बता दूं कि कुणाल साहब मुझे सन 1983 से ही जानते थे।

बाॅबी कांड को लेकर वे आम लोगों में भी लोकप्रिय हो चुके थे।

पर, जब महावीर मंदिर की सीढ़ी पर मेरी पत्नी से मुलाकात हुई तो मेरी पत्नी ने उन्हें मेरा नाम बता कर कोई परिचय नहीं दिया था।

कुणाल साहब ने भी महिलाओं से कोई परिचय नहीं पूछा।

बस वे यही समझ रहे थे कि रात में महिलाओं को रास्ते में कोई परेशानी न हो जाए,इसलिए ड्राइवर का लाइसेंस ले लेना जरूरी था।

याद रहे कि तब वहां कोई पे्रस संवाददाता भी मौजूद नहीं था जिसे वे अपना सेवा भाव का सबूत दे रहे थे।

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29 नवंबर 22