बुधवार, 26 अगस्त 2026

 


याद आएंगे ‘‘विचारधारा के सेनापति’’ व आई.बी.के

 पूर्व अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह 

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सुरेंद्र किशोर

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 बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हरेन्द्र प्रताप और भाजपा नेता

सुधीर शर्मा के फेबुक पोस्ट से पता चला कि आई.बी.(भारत सरकार)के पूर्व 

अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह नहीं रहे।

पिछले दिनों जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत वामपंथी उग्रवाद से अब मुक्त है तो सहसा रामनरेश बाबू याद आ गए।

(अच्छी बात है--अब गृह मंत्री और प्रधान मंत्री को जेहादी उग्रवाद और दिमागी नक्सलियांे से भी देश को मुक्त करने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा।

एक अच्छा संकेत है ।वह यह कि इस देश के अधिकतर गैर राजग राजनीतिक दल वोट के लिए जब तक हिन्दुओं को गालियां देते रहेंगे और जेहादियों से साठगांठ जारी रखेंगे,तब तक उनके चुनाव जीतने का कोई चांस मुझे नजर नहीं आता--भले अस्थायी उतार-चढ़ाव किसी को नजर आए।)

  अमित शाह की घोषणा के बाद मुझे रामनरेश बाबू के साथ-साथ कभी जहानाबाद में डी.एम.रहे प्रत्यय अमृत की बातें भी याद आ गईं।

  जब बिहार में भी नक्सलियों का बोलबाला था तो मेरी राय हुआ करती थी कि 

विकास की कमी और समाज के कुछ समूहांे के प्रति व्यवस्थागत अन्याय के कारण 

नक्सली पनपे हैं।इन समस्याओं के हल के साथ ही नक्सल समस्या हल हो जाएगी।

इस समस्या पर रामनरेश बाबू से भी चर्चा होती रहती थी।

पर,वे मुझसे सहमत नहीं होते थे।

अंततः रामनरेश बाबू सही साबित हुए --प्रत्यय अमृत भी।

अस्सी के दशक में नक्सलियों द्वारा किए गए एक जन संहार की रिपोर्टिंग करने मैं जहानाबाद गया था।संयोग से घटनास्थल पर ही तत्कालीन जिलाधिकारी प्रत्यय अमृत सेे मुलाकात हो गयी।उनकी राय भी रामनरेश बाबू से मिलती -जुलती थी।हालांकि तब तक मेरा उनसे परिचय नहीं था।

मैं तब भी जिलाधिकारी महोदय से सहमत नहीं हुआ था।पर आज दोनों से सहमत हूं।रामनरेश बाबू ने कई पुस्तकें लिखी हैं ।उनकी अधिकतर पुस्तकें मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में हंै।उन पुस्तकों की एक -एक लाइन शोधपूर्ण व तथ्यपरक है।

   माननीय हरेंद्र प्रताप के अनुसार रामनरेश बाबू सचमुच विचारधारा के सेनापति थे।

आज उनकी कमी खल रही है जब भारत सहित पूरी दुनिया में ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ तेज हो गया है।    

नब्बे के दशक में अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुएल पी.हंटिंगटन 

की एक किताब आई थी।

उसका नाम है ‘‘सभ्यताओं का संघर्ष।’’

उस पुस्तक के जरिए लेखक ने यह कहा था कि 

‘‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान ही संघर्षों का मुख्य कारण होगी।’’

भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में वैसा संघर्ष इन दिनों जारी भी है जो भयानक रूप लेता जा रहा है।

हमारे देश की कुछ तथाकथित सेक्युलर और वोट लोलुप शक्तियों को छोड़कर पूरी दुनिया उस भयानकता को अच्छी तरह समझ रही है।

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26 अगस्त 26


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