बुधवार, 21 जनवरी 2009

कोसी की धार में भारत-नेपाल की बंधी तकदीर


चाहे दोनों देशों की ‘राजनीति’ की अलग-अलग जो भी तात्कालिक मांग हो, पर कोसी की धार के धागे ने भारत और नेपाल की तकदीरों को आपस में मजबूती से बांध दिया है। संभवतः इसी को ध्यान में रखते हुए अन्य संधियों के साथ-साथ पचास के दशक में इस नदी के बारे में भी भारत और नेपाल के बीच संधि हुई थी और कोसी योजना की नींव रखी गई थी। तब 1950 में नेपाल में 104 साल पुरानी राणाशाही की समाप्ति हुई थी और महाराजा ने गद्दी संभाली थी। भारत से महाराजा का संबंध अच्छा था और दोनों देशों के बीच आपसी हित में कई तरह की संधियां हुईं।इसकी पृष्ठभूमि बताते हुए पूर्व सांसद डाॅ गौरीशंकर राजहंस लिखते हैं कि वर्षों से कोसी नदी नेपाल और उत्तर बिहार में प्रलय मचा रही थी। आजादी के ठीक बाद कोसी क्षेत्र के नेता ललित नारायण मिश्र ने गुलजारी लाल नंदा केे साथ तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू से मुलाकात की। ललित नारायण मिश्र ने पंडित नेहरू से कहा था कि कोसी को बांधने का यदि उपाय नहीं होगा, तो नेपाल और बिहार धीरे -धीरे पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे। वहां की उपजाऊ जमीन में केवल बालू ही रह जाएगा। उन दिनों नेपाल के महाराजा महेंद्र भारत के प्रति अत्यंत मित्रता का रूख रखते थे। पंडित नेहरू और महाराजा महेंद्र ने सम्मिलित रूप से कोसी योजना की नींव रखी। ’इस समझौते के तहत कोसी नदी पर भारत व नेपाल के हिस्सों में तटबंध बने और वीरपुर में बराज बना। याद रहे कि सन् 1954 में कोसी नदी में भीषण बाढ़ आई थी, जिससे नेपाल व भारत में भारी तबाही हुई थी। इस बार भी जब कोसी का तटबंध कुशहा के पास टूटा, तो नेपाल के भी एक बड़े क्षेत्र में तबाही और बर्बादी हुई है। यह बात और है कि नेपाल के कुछ लोग इस बर्बादी के लिए भारत सरकार से मुआवजा की मांग कर रहे हैं, जबकि बिहार सरकार कह रही है कि कुशहा के पास कोसी तटबंध की मरम्मत के काम में नेपाल सरकार ने सहयोग दिया होता, तो तटबंध नहीं टूटता। नेपाली मीडिया के एक हिस्से ने भी यह बात लिखी है कि नेपाल सरकार से सहयोग नहीं मिलने के कारण ही तटबंध टूटा। हालांकि बिहार सरकार कह रही है कि तब नेपाल में राजनीतिक माहौल ऐसा था कि सहयोग नहीं मिल सका। पर बाद में यह भी खबर आई कि जैसे ही नए प्रधान मंत्री प्रचंड को खबर मिली कि कोसी तटबंध पर खतरा है, तो उन्होंने तुरंत उसकी मरममत में सहयोग के लिए प्रशासन को लगा दिया। हालांकि तब तक देर हो चुकी थी और तटबंध को टूटने से नहीं बचाया जा सका। नेपाल में यह बात कहने वाले लोग भी हैं कि भारत-नेपाल कोसी समझौता एक भूल थी, पर सरजमीन की स्थिति यह बताती है कि कोसी नदी से होने वाले नुकसानों से यदि दोनों देशों को बचना है, तो दोनों को मिलजुल कर इसका उपाय खोजना और उसे कार्यरूप देना होगा। यदि पुराने समझौते में कोई कमी रह गई है, तो उसमें संशोधन तो किया ही जा सकता है। पर कोसी को एक बड़ी आबादी के लिए अभिशाप तो नहीं रहने दिया जा सकता है। यह बात भी पक्की है कि बांध विरोधियों के तर्कों को मान कर कोसी पर निर्मित बांधों को अब तोड़ा भी नहीं जा सकता। हां, इस अभिशाप को वरदान में बदलने का उपाय जरूर किया जा सकता है। कोसी नदी पर नेपाल क्षेत्र में ऊंचे डैम और बड़े जलाशय के निर्माण की जरूरत महसूस की जाती रही है। अधिकतर नेताओं व विशेषज्ञों ने इसके पक्ष में ही राय दी है। हां, कुछ विशेषज्ञ कुछ कारणवश ऊंचे डैम के विरोधी रहे हैं। हालांकि डैम और जलाशय के समर्थक इसे बिजली उत्पादन व सिंचाई जल की उपलब्धता के लिए जरूरी बताते हैं। नेपाल को भी जल मार्ग मिल जाएगा। वर्षों बाद नेपाल में एक मजबूत और निर्णयकारी सरकार के सत्ता में आने के बाद यह उम्मीद की जानी चाहिए कि पुराने नेपाल-भारत समझौते में यदि जरूरत हो, तो समुचित संशोधन करके कोसी की बाढ़ से साल-दर-साल हो रही बर्बादी-तबाही से मुक्ति दिलाने का काम अब हो जाएगा। भारत -नेपाल के बीच कुछ अन्य तरह के पुराने समझौतों पर भी नेपाल की नई सरकार एक नई नजर डालना चाहती है, पर बिहार और नेपाल के बाढ़पीडि़त लोग दोनों देशों की सरकारों से यह उम्मीद करेंगे कि सबसे पहले वे बाढ़ की समस्या का ही कोई हल निकालें। यह अच्छी खबर है कि प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने कहा है कि नेपाल के प्रधान मंत्री प्रचंड जब दिल्ली आएंगे, तो उनसे कोसी की समस्या पर बातचीत करेंगे। वे जल्दी ही आने वाले हैं। इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार रेल मंत्री लालू प्रसाद प्रचंड से मिलने के लिए नेपाल जाना चाहते थे, पर भारत सरकार को यह आशंका थी कि शायद नेपाल की धरती पर भी लालू प्रसाद कोसी की बाढ़ के लिए बिहार सरकार को दोषी ठहरा दें, फिर तो नेपाल सरकार को भी यह अवसर मिल जाएगा कि वह द्विपक्षीय बातचीत में यह मसला उठाए कि भारतीय पक्ष की कुव्यवस्था के कारण ही कुशहा में तटबंध टूटा। इसलिए भारत सरकार ने लालू प्रसाद की प्रस्तावित यात्रा को टाल दिया है। हालांकि लालू प्रसाद तथा भारत के कुछ दूसरे नेता लगातार मीडिया के माध्यम से यह आरोप लगाते रहे हैं कि कुशहा में तटबंध बिहार सरकार की कुव्यवस्था के कारण ही टूटा। इन बयानों को आधार बना कर नेपाल में भारत से 250 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति की मांग भी शुरू हो चुकी है। जो भी हो, यह उम्मीद की जा रही है कि नेपाल के प्रधान मंत्री पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ की अगली भारत यात्रा में कोसी को लेकर जल्दी ही कोई रास्ता निकल आएगा और इस विपदा पर समय -समय पर होने वाली ‘राजनीति’ का अंत हो जाएगा।

पब्लिक एजेंडा (09-09-2008)

पूरा नहीं हुआ अम्बेडकर - लोहिया - एका का सपना

डा।राम मनोहर लोहिया ने लिखा था कि ‘ मेरी बराबर आकांक्षा थी कि वे (डा.बी.आर.अम्बेडकर) हमारे साथ आएं, केवल संगठन में ही नहीं, बल्कि पूरी तौर से सिद्धांत में भी, और वह मौका करीब मालूम होता था।’ डा.अम्बेडकर के निधन के बाद डा.लोहिया ने मधु लिमये को 1 जुलाई 1957 को हैदराबाद से लिखा कि ‘ तुम समझ सकते हो कि डा.अम्बेडकर की अचानक मौत का दुःख मेरे लिए थोड़ा व्यक्तिगत रहा है, और अब भी है। मेरे लिए अम्बेडकर हिंदुस्तान की राजनीति के महान आदमी थे और गांधी को छोड़कर , बड़े से बड़े सवर्ण हिंदुओं के बराबर। इससे मुझे बराबर संतोष और विश्वास मिला है कि हिंदू धर्म की जाति प्रथा एक न एक दिन खतम की जा सकती है। ’ लोहिया ने अम्बेेडकर के बारे में और क्या कहा, उसे जानने से पहले यह जान लेना ठीक रहेगा कि खुद अम्बेडकर ने लोहिया के बारे में क्या कहा था।यह बात लिखी है, बुद्धप्रिय मौर्य ने । मौर्य न सिर्फ केंद्रीय मंत्री थे बल्कि एक चर्चित दलित नेता भी थे।मौर्य ने लिखा कि ‘ सन् 1951 में अम्बेडकर ने पूछा कि तुम डा.राम मनोहर लोहिया को जानते हो ? मैंने डा.लोहिया का नाम तो सुना था लेकिन जानने का मतलब है नजदीक से जानना, इसलिए मैं चुप रहा। बाबा साहेब ने कहा कि तुम क्या खाक पालिटिक्स करोगे, जब तुम डा.लोहिया को नहीं जानते। हिंदुओं के एक ही तो नेता हैं जो ईमानदारी से जात-पांत तोड़कर जातिविहीन समाज की स्थापना करना चाहते हैं। बाबा साहेब कभी किसी की प्रशंसा नहीं करते थे। इस मामले में वे बड़े कंजूस थे।जब उन्होंने डा.लोहिया की प्रशंसा की तो मैंने सोचा कि उनसे मिलना चाहिए।’ अब अम्बेडकर के बारे में डा.लोहिया की कुछ बातें। डा.लोहिया ने लिखा है कि ‘ मैं बराबर कोशिश करता रहा हूं कि हिंदुस्तान के हरिजनों के सामने एक विचार रखूं। मेरे लिए यह बुनियादी बात है। हिंदुस्तान के आधुनिक हरिजनों के दो प्रकार हैं,एक डा.अम्बेडकर और दूसरे जग जीवन राम।डा.अम्बेडकर विद्वान थे,उनमें स्थिरता,साहस और स्वतंत्रता थी।वे बाहरी दुनिया को हिंदुस्तान की मजबूती के प्रतीक के रूप में दिखाए जा सकते थे।लेकिन उनमें कटुता थी और वे अलग रहना चाहते थे।गैर हरिजनों के नेता बनने से उन्होंने इनकार किया।पिछले पांच हजार बरस की तकलीफ और हरिजनों पर उसका असर मैं भली प्रकार समझ सकता हूं।लेकिन वास्तव में तो यही बात थी।मुझे आशा थी कि डा.अम्बेडकर जैसे महान भारतीय किसी दिन इससे उपर उठ सकेंगे।लेकिन इस बीच मौत आ गई।श्री जग जीवन राम उपरी तौर पर हर हिंदुस्तानी और हिंदू के लिए सद्भावना रखते हैं। हालांकि सवर्ण हिंदुओं से बातचीत में उनकी तारीफ और चापलूसी करते हैं।पर यह कहा जाता है कि केवल हरिजनों की सभाओं में घृणा की कटु ध्वनि फैलाते रहते हैं।इस बुनियाद पर न तो हरिजन और न हिंदुस्तान उठ सकता है।लेकिन डा.अम्बेडकर जैसे लोगों में भी सुधार की जरूरत है।’ ‘परिगणित जाति संघ को चलाने वालों को मैं अब नहीं जानता।लेकिन मैं चाहता हूं कि हिंदुस्तान की परिगणित जाति के लोग देश की पिछले चालीस साल की राजनीति के बारे में विवेक से सोचें।मैं चाहूंगा कि श्रद्वा और सीख के लिए वे डा.अम्बेडकर को प्रतीक मानें,डा.अम्बेडकर की कटुता को छोड़कर उनकी स्वतंत्रता को लें।एक ऐसे अम्बेडकर को देखें जो केवल हरिजनों के नहीं ,बल्कि पूरे हिंदुस्तान के नेता बनें।’ इससे पहले 24 सितंबर 1956 को डा.बी.आर.अम्बेडकर ने डा.लोहिया को लिखा कि ‘ आपके दो मित्र मुझसे मिलने आए थे।मैंने उनसे काफी देर तक बातचीत की।हालांकि हमलोगों में आपके चुनाव कार्यक्रम के बारे में कोई बात नहीं हुई। अखिल भारतीय परिगणित जाति संघ की कार्य समिति की बैठक 30 सितंबर 1956 को होगी और मैं समिति के सामने आपके मित्रों का प्रस्ताव रख दूंगा।कार्य समिति की बैठक के बाद मैं चाहूंगा कि आपकी पार्टी के प्रमुख लोगों से बातचीत हो ताकि हमलोग अंतिम रूप से तय कर सकें कि साथ होने के लिए हमलोग क्या कर सकते हैं। मुझे बहुत खुशी होगी अगर आप दिल्ली में मंगलवार 2 अक्तूबर 1956 को मेरे यहां आ सकें।अगर आप आ रहे हों तो कृपया तार से सूचित करें ताकि मैं कार्य समिति के कुछ लोगों को भी आपसे मिलने के लिए रोक लूंं। ’ इस पत्र के जवाब में 1 अक्तूबर 1956 को लोहिया ने अम्बेडकर को लिखा कि ‘आपके 24 सितंबर के कृपापत्र के लिए बहुत धन्यवाद। हैदराबाद लौटने पर मैंने आज आपका पत्र पढ़ा और इसलिए आपके सुझाए समय पर दिल्ली पहुंच सकने में बिलकुल असमर्थ हूं। फिर भी जल्दी से जल्दी आपसे मिलना चाहूंगा। मैं उत्तर प्रदेश में अक्तूबर के बीच में रहूंगा और आपसे दिल्ली में 19 या 20 अक्तूबर को मिल सकूंगा ।अगर आप 29 अक्तूबर को बम्बई में हों तो वहां आपसे मिल सकता हंू।कृपया मुझे तार से सूचित करंे कि इन दो तारीखों में कौन सी आपको ठीक रहेगी।’ ‘ अन्य मित्रों से आपकी सेहत के बारे में जानकर चिंता हुई। आशा है कि आप आवश्यक सावधानी बरत रहे होंगे। मैं अलग से मैनकाइंड के तीन अंक आपको भिजवा रहा हूं। विषय का सुझाव देने का मेरा विचार हो रहा था लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा। ‘मैनकाइंड’ (पत्रिका) के तीन अंक आपको विषय चुनने में मदद करेंगे। मैं केवल इतना ही कहूंगा कि हमारे देश में बौद्धिकता निढाल हो चुकी है।मैं आशा करता हूं कि यह वक्ती है।इसलिए आप जैसे लोगों का बिना रोक के बोलना बहुत जरूरी है।’ इससे पहले डा.लोहिया ने 10 दिसंबर 1955 को डा.अम्बेडकर को लिखा था कि ‘मैनकाइंड’ पूरे मन से जाति-समस्या को अपनी संपूर्णता में खोल कर रखने का प्रयास करेगा।इसलिए यदि आप कोई अपना लेख भेज सकें तो प्रसन्नता होगी। लेख 2500 और 4000 शब्दों के बीच हो तो अच्छा।आप जिस विषय पर चाहिए, लिखिए।हमारे देश में प्रचलित जाति प्रथा के किसी पहलू पर अगर आप लिखना पसंंद करें तो मैं चाहूंगा कि आप कुछ ऐसा लिखें कि हिंदुस्तान की जनता न सिर्फ क्रोधित हो,बल्कि आश्चर्य भी करे।मैं नहीं जानता कि मध्य प्रदेश के लोक सभा के चुनाव भाषणों में आपके बारे में मैंने जो कहा, उसे आपके अनुयायी ने जो मेरे साथ रहा, आपको बतलाया या नहीं।अब भी मैं बहुत चाहता हूं कि क्रोध के साथ दया भी जोड़नी चाहिए और आप न सिर्फ अनुसूचित जातियों के नेता बनें,बल्कि पूरी हिंदुस्तानी जनता के भी नेता बनें।’ लोहिया ने लिखा कि ‘ हमारे क्षेत्रीय शिक्षण शिविर में यदि आप आ सके तो हमें बड़ी खुशी होगी।आप अपने भाषण का सार पहले भेज दें तो बाद में उसे प्रकाशित करना अच्छा होगा।हम चाहते हैं कि एक घंटे के भाषण के बाद उस पर एक घंटे तक चर्चा भी हो। मैं नहीं जानता कि समाजवादी दल के स्थापना सम्मेलन में आपको कोई दिलचस्पी होगी या नहीं।आप सम्मेलन में विशेष आमंत्रित होकर आ सकते हैं।अन्य विषयों के अलावा सम्मेलन में खेत मजदूरों, कारीगरों, औरतों और संसदीय काम से संबंधित समस्याओं पर भी विचार होगा और इनमें से किसी एक पर आपको कुछ महत्वपूर्ण बात कहनी ही है।किसी बात को बतलाने के लिए यदि आप सम्मेलन की कार्यवाही में हिस्सा लेना चाहें तो मैं समझता हूं कि सम्मेलन और विशेष रूप से अनुमति देगा।’ इस संबंध में कान पुर के विमल मेहरोत्रा और धर्मवीर गोस्वामी ने 27 सितंबर 1956 को डा.लोहिया को लिखा कि ‘ एक दोस्त के जरिए हमलोगों को दिल्ली जाकर डा.अम्बेडकर से मिलने का न्योता मिला।हमलोग दिल्ली जाकर उनसे मिले और 75 मिनट तक बातचीत हुई।यह साफ कर दिया गया था कि हमलोग बिलकुल व्यक्तिगत रूप में आए हैं।’ मेहरोत्रा और गोस्वामी डा.लोहिया के मित्र थे। इन लोगों ने लोहिया को लिखा कि ‘जब आप दिल्ली में हों तो डा.अम्बेडकर आपसे जरूर मिलना चाहेंगे।वे बूढ़े हैं और उनकी तबीयत ठीक नहीं है। वे सहारा लेकर चलते फिरते हैं।वे पार्टी का पूरा साहित्य चाहते हैं और मैनकाइंड के सभी अंक।वे इसका पैसा देंगे।वे हमारी राय से सहमत थे कि श्री नेहरू हर एक दल को तोड़ना चाहते हैं और कि विरोधी पक्ष को मजबूत होना चाहिए।वे मजबूत जड़ों वाले एक नए राजनीतिक दल के पक्ष में हैं।वे नहीं समझते कि माक्र्सवादी ढंग का साम्यवाद या समाजवाद हिंदुस्तान के लिए लाभदायक होगा।लेकिन जब हमलोगों ने अपना दृष्टिकोण रखा तो उनकी दिलचस्पी बढ़ी।’ ‘ हमलोगों ने उन्हें कान पुर के आम क्षेत्र से लोक सभा का चुनाव लड़ने का न्योता दिया।इस ख्याल को उन्होंने नापंसद नहीं किया,लेकिन कहा कि वे आपसे पूरे हिंदुस्तान के पैमाने पर बात करना चाहते हैं।हमलोगों ने यह साफ कर दिया कि हमलोग अपनी नीति के कारण कोई समझौता नहीं कर सकते।ऐसा लगा कि वे अनुसूचित जाति संघ से बहुत मोह नहीं रखते।कार्य कारिणी की बैठक दिल्ली में 30 को हो रही है।श्री नेहरू के बारे में जानकारी करने पर उन्हें बहुत दिलचस्पी थी। (सिनेमा आउटफिट आदि की मैनकाइंड वाली चर्चा) उन्होंने कहा कि इन बातों का यथेष्ट प्रचार होना चाहिए।वे दिल्ली से एक अंग्रेजी दैनिक भी निकालना चाहते हैं।’ ‘ वे हम लोगों के दृष्टिकोण को बहुत सहानुभूति,तबियत और उत्सुकता के साथ पूरे विस्तार में समझना चाहते थे। उन्होंने थोड़े विस्तार में इंगलैंड की प्रजातांत्रिक प्रणाली की चर्चा की जिससे उम्मीदवार चुने जाते हैं और लगता है कि जनतंत्र में उनका दृढ़ विश्वास है। यह सार है। हमलोग खुद नहीं आ सके क्योंकि यह पता नहीं था कि आप कहां हैं और हमारे पास पैसा नहीं था। 23 सितंबर 1956 को हैदरा बाद दफ्तर में टेलीफोन से बात करने की कोशिश की, कोई जवाब नहीं मिला,क्योंकि वहां पर किसी ने टेलीफोन नहीं उठाया। डा.अम्बेडकर का पता ः 26 अली पुर रोड, नई दिल्ली।’ इस पत्र के जवाब में लोहिया ने 1 अक्तूबर 1956 को विमल और धर्मवीर को हैदरा बाद से लिखा कि ‘ तुम्हारी चिट्ठी मिली। मैं चाहूंगा कि तुम लोग डा.अम्बेडकर से बातचीत जारी रखो लेकिन याद रखना कि जिस दिशा का तुम लोगों ने खुद अपनी चिट्ठी में उल्लेख किया है,उससे इधर- उधर नहीं होना।डा.अम्बेडकर की सबसे बड़ी दिक्कत रही है कि वे सिद्धांत में अटलांटिक गुट से नजदीक महसूस करते हैं। मैं नहीं समझता कि इस निकटता के पीछे सिद्धांत के अलावा और भी कोई बात है।लेकिन इसमें हम लोगों को बहुत सतर्क रहना चाहिए।मैं चाहता हूं कि डा.अम्बेडकर समान दूरी के खेमे की स्थिति में आ जाएं।तुम लोग अपने मित्र के जरिए सिद्धांत की थोड़ी बहुत बहस भी चलाओ।’ ‘ डा.अम्बेडकर की लिखी चिट्ठी की एक नकल भिजवा रहा हूं। अगर वे चाहते हैं कि मैं उनसे दिल्ली में मिलूं,तो तुम लोग भी वहां रह सकते हो।‘ विमल मेहरोत्ऱा ने 15 अक्तूबर 1956 को डा.अम्बेडकर को लिखा कि ‘ पिछले महीने मैं और मेरे मित्र श्री धर्मवीर गोस्वामी आपसे दिल्ली में मिले थे।उसके बाद अपनी बातचीत की खबर हमने डा.लोहिया को दी।मैंने बहुत ध्यान से परिगणित जाति संघ की कार्य समिति के फैसलों का अध्ययन किया है।उसमें से देश की जनता के लिए विशेष दिलचस्पी की तीन चीजें निकलती हैं।़........मुझ जैसे आदमी का आपको कोई सलाह देना धृष्टता होगी,लेकिन देश के लिए अच्छा होता कि देश के मौजूदा राजनीतिक दलों के नीति और कार्यक्रम को आप देख लेते और इनकी कथनी और करनी के बारे में अपनी राय देते।’ ‘ चुनाव समझौते के बारे में।हमलोग अपने को लगभग तीन हजार क्षेत्रों से अलग रखेंगे।पांच सौ या छह सौ क्षेत्रों से चुनाव लड़ेंगे।इसलिए चुनाव समझौते का रास्ता निकल आता है।सोशलिस्ट पार्टी ने अपनी नीति में तय किया है कि वहीं से चुनाव लड़ेंगे जहां कुल मतदाताओं के एक प्रतिशत पार्टी सदस्य हैं और एक तिहाई मतदान केंद्रों में फैले हों।’ ‘स्वेज के बारे में आपकी समिति का प्रस्ताव राष्ट्रीय स्वार्थ की दृष्टि से भले सोचा गया हो,लेकिन मुझे बहुत शक है कि दूर की दृष्टि से यह हिंदुस्तान के लोगों के सचमुच स्वार्थ में होगा।इसका मतलब यह होगा कि हिंदुस्तान में लगी विदेशी पूंजी का राष्ट्रीयकरण बिना उन देशोें की सहमति के नहीं किया जाएगा जिनके पूंजीपतियों का पैसा लगा हो।मैं अनुरोध करूंगा कि परिगणित जाति संघ के दफ्तर को कृपया इन प्रस्तावों को हमें भेजने के लिए कहें।मुझे पता चला है कि डा.लोहिया आपसे मिलने वाले हैं।लेकिन मैं समझता हूं कि निकट भविष्य में उनके लिए यह संभव नहीं होगा।अगर आप अपना कुछ कीमती समय दे सकें तो मैं आकर आपसे सारी बातें कर सकूं।’ पब्लिक एजेंडा (31-10-2008)

मात्र 12 हजार होते तो नहीं जाती लोहिया की जान


क्या 12 हजार रुपए का इंतजाम नहीं होने के कारण डा.राम मनोहर लोहिया को बचाया नहीं जा सका ? मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी विचारक डा.राम मनोहर लोहिया का पौरूष ग्रंथि के आपरेशन के बाद अस्पताल की बदइंतजामी के कारण 12 अक्तूबर 1967 को दिल्ली के विलिंग्टन अस्पताल में उनका निधन हो गया। उस अस्पताल का नाम अब डा.राम मनोहर लोहिया अस्पताल है। डा.लोहिया के एक करीबी सहकर्मी व नेता ने कुछ साल पहले इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि डा.लोहिया आपरेशन के लिए विदेश जाना चाहते थे।पर उसके लिए उन्हें बारह हजार रुपए की जरूरत थी।उन्होंने बंबई के एक मजदूर नेता से जो लोहिया के दल के ही थे, डाक्टर साहब ने कहा था कि वह रुपए का इंतजाम कर दे।पर वह मजदूर नेता समय पर पैसे का बंदोबस्त नहीं कर सका।इस कारण जल्दीबाजी में दिल्ली के ही विलिग्टन अस्पताल में उन्हें भर्ती कराना पड़ा।डा.एल.आर.पाठक ने 30 सितंबर को उनका आपरेशन किया,पर डाक्टर व अस्पताल की लापारवाही के कारण डा.लोहिया की मौत हो गई। आपरेशन और बाद की देखभाल में लापारवाही को लेकर लंबे समय तक विवाद चलता रहा।पर इसमें यह बात तय थी कि विदेश के किसी अच्छे अस्पताल में यदि आपरेशन हुआ होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आई।आज जब मामूली -मामूली नेता व अफसर भी सरकारी खर्चे पर विदेश में अच्छी से अच्छी चिकित्सा करवा रहे हैं,वहीं लोक सभा के सदस्य डा.लोहिया बेहतर इलाज के बिना कम ही उम्र में चल बसे।जब उनका निधन हुआ,तब तक वे अपने साठ साल भी पूरा नहीं कर पाए थे।पर उतनी ही उम्र में उन्होंने भारतीय राजनीति व समाज में युगांतरकरी परिवत्र्तन के नेता बन चुके थे। जब उनका निधन हुआ तो वे ऐसी पार्टी यानी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के एकछत्र नेता थे जिसके दो दर्जन सदस्य लोक सभा में थे।उस समय एक दर्जन प्रदेशों में ऐसी गैर सरकारी सरकारें बन चुकी थीं जिनमें लोहिया के दल के मंत्री थे।बिहार में तो उस दल के कर्पूरी ठाकुर तो उप मुख्य मंत्री भी थे।डा.लोहिया के गैर कांग्रेस वाद के नारे के कारण ही कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी थीं।पर डा.लोहिया आज के अधिकतर नेताओं की तरह नहीं थे जो सरकार के धन को अपना ही माल समझते हैं।डा.लोहिया ने अपने दल द्वारा शासित प्रदेशों के अपने दल के नेताओं से कह रखा था कि वे मेरे इलाज के लिए कोई चंदा वसूली का काम नहीं करें।इसमें सरकारी पद के दुरूपयोग का खतरा है। मेरे इलाज के लिए बंबई के मजदूर चंदा देंगे जो आम भारतीय मजदूरों व किसानों की अपेक्षा थोड़े बेहतर आर्थिक स्थिति में हैं।पर इस काम में उस मजदूर नेता ने लोहिया की मदद नहीं की।लोहिया चाहते थे तो इस देश का कोई भी पूंजीपति उन्हें अपने खर्चे से विदेश भेज कर उनका समुचित इलाज करवा सकता था।उन दिनों संसद में लोहिया की तूती बोलती थी।जब वे बोलने को खड़े होते थे तो सरकार सहम जाती थी।पर लोहिया अपने उसूलों के पक्के थे।वे कहते थे कि काले धन का उपयोग करने वाला नेता गरीबों का भला नहीं कर सकता।वे यह भी कहा करते थे कि यह मत देखो ंकि कोई नेता संसद में क्या बोलता है।बल्कि इसे देखो कि वह संसद में बोलने के बाद खुद शाम में कहां उठता बैठता है। यह इस देश की विडंबना ही रही कि उसी लोहिया का नाम लेकर बाद में इस देश व प्रदेश में राजनीति करने वाले अधिकतर नेता सत्ता में आने के बाद इतने भ्रष्ट हो गए कि उनको देखकर लगने लगा कि भ्रष्टाचार के मामले में तो कांग्रेसी बच्चे है। लोहिया के इलाज की चर्चा के क्रम में यह याद दिलाना जरूरी है कि नब्बे के दशक में बिहार का एक भ्रष्ट पशुपालन अफसर जब अपने इलाज के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा था तो वह अपनी तिमारदारी में अपने खर्चे से 75 लोगों को अपने साथ ले गया। पब्लिक एजेंडा (22-09-2008)

विश्वनाथ प्रताप सिंह यानी एक सार्थक राजनीतिक जीवन


बोफर्स घोटाले के खिलाफ अभियान चला कर जिस राजा मांडा ने प्रधान मंत्री की कुर्सी पाई,उसी वी.पी. सिंह ने न जाने क्यों अपने जीवन के आखिरी दिनों में यह कह दिया कि उन्होंने तो बोफर्स घोटाले को लेकर राजीव गांधी पर कोई आरोप ही नहीं लगाया था। इससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा। साथ ही, इस देश की राजनीति की साख को भी थोड़ा और बट्टा लगा। पर, यदि इस एक प्रकरण को नजरअंदाज कर दिया जाए तो वी.पी. सिंह के बारे में यह कहा जा सकता है कि वे इस गरीब देश के लिए सही नेता थे।राजा नहीं, फकीर थे वे।वे पिछड़ों के हमदर्द थे। उनमें व्यक्तिगत ईमानदारी व त्याग इतना अधिक था कि उनके नाम पर कसमें खाई जा सकती हैं। यह इस देश का दुर्भाग्य रहा कि वे कम ही दिनों तक प्रधान मंत्री रहेे। इस देश की मुख्य समस्या हर स्तर पर सरकारी भ्रष्टाचार ही है। बाकी अधिकतर समस्याएं तो भ्रष्टाचार के कारण ही पैदा होती रहती हैं। वी.पी.सिंह भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर व्यक्ति यदि आज भी प्रधान मंत्री की कुर्सी पर बैठ जाए तो देश का आधा सरकारी भ्रष्टाचार वैसे ही खत्म हो जाएगा।मन मोहन सिंह खुद तो ईमानदार हैं,पर भ्रष्टाचार के खिलाफ तनिक भी कठोर नहीं हैं। पहले बोफर्स घोटाले पर उनकी भूमिका की चर्चा कर ली जाए। अस्सी के दशक में राजीव गांधी मंत्रिमंडल से हटने के बाद वी.पी.सिंह जन मोर्चा बना कर देश भर में राजीव सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उसी सिलसिले में वे पटना आए थे।वे बेली रोड के हड़ताली मोड के पास एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे।जनसत्ता के संवाददाता के रूप में इन पंक्तियों का लेखक भी उस सभा में मौजूद था।वी.पी.सिंह ने पहली बार उसी सभा में विदेशी बैंक के उस खाते का नंबर बताया जिसमें बोफर्स दलाली के पैसे जमा किए गए थे।खाता लोटस के नाम से था और उसका नंबर कई अंकों का था।वी.पी.सिंह ने खाते का नंबर सभा में बताते हुए श्रोताओं से पूछा भी, ‘आप जानते हैं न कि लोटस का अर्थ क्या होता है ?’ भीड़ से एक आवाज आई ‘राजीव।’ वी.पी.सिंह ने इस अनुवाद का खंडन नहीं किया।उनके चेहरे पर यह भाव था कि श्रोता ने सही अनुवाद बता दिया।यह बात सही है कि वी.पी.सिंह ने खुद अपने मुंह से राजीव गांधी का नाम नहीं लिया।पर पटना की उस सभा में वे जनता को जो सूचना देना चाहते थे,वह क्या था ? इससे पहले जब राजीव गांधी सरकार से विद्रोह करके पहली बार पटना आए थे तो वे एक प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए।उसमें इन पंक्तियों के लेखक ने ही यह सवाल किया था कि क्या आप प्रधान मंत्री से इस्तीफे की मांग करते हैं ? उन्होंने जवाब दिया, ‘कोई सिरियस सवाल कीजिए।’ यानी वी.पी.सिंह अपने पूरे अभियान में राजीव गांधी का नाम लेने से बचते रहे।पर वे अपनी बातों से भीड़ को यह विश्वास दिलाते रहे कि बोफर्स घोटाले मंे राजीव गांधी भी शामिल हैं।इसी विश्वास के कारण जनता ने सन् 1989 के लोक सभा चुनाव मेंं राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया।यदि आरोप राजीव गांधी के अलावा किसी और पर होता तो शायद कांग्रेस की चुनाव में उतनी बुरी हालत नहीं होती। पर, बोफर्स घोटाले के खिलाफ अभियान चला कर सत्ता हासिल करने वाले वी.पी.सिंह को बाद में यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि उन्होंने राजीव गांधी पर इस संबंध में आरोप नहीं लगाया था ? जबकि, बोफर्स मुकदमे के चार्ज शीट के कालम -दो में राजीव गांधी का नाम आ ही गया ।याद रहे कि अभियुक्त की मृत्यु हो जाने पर उसका नाम कालम - 2 में लिख दिया जाता है। पर किसी एक फिसलन को आधार बना कर किसी नेता के पूरे व्यक्तित्व का आकलन नहीं किया जा सकता। वी.पी.सिंह के राजनीतिक जीवन में जो दो महत्वपूर्ण मुकाम आए,वे देश के लिए भी काफी निर्णायक रहे।उन्होंने सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता को गोलबंद किया और जनता को यह विश्वास दिलाया कि सत्ता में आने के बाद वे भ्रष्टाचार पर काबू पाने की कोशिश करेंगे। वे इस पर खरा उतरे।प्रधान मंत्री के रूप में भी उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा। सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ चुनाव लड़ने और जीतने का इस देश में वह आखिरी मौका था।उसके बाद तो चुनाव धर्म और जाति के नाम पर लड़े गए।या फिर विकास या अविकास पर।सामाजिक न्याय को राष्ट्रीय राजनीति का एक मुख्य मुद्दा बनाने का श्रेय भी वी.पी.सिंह को ही जाता है।उन्होंने सन् 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके देश की राजनीति का एजेंडा ही बदल दिया।यदि मंडल नहीं होता तो मंदिर आंदोलन भी नहीं होता।यह बात भी सही है।हालांकि मंडल आरक्षण लागू नहीं होता तो इस देश में नक्सलियों का विकास और भी तेजी से होता। इस आरोप में दम नहीं है कि जनता दल के भीतर अपने सहयोगी चैधरी देवी लाल के विद्रोह को दबाने के लिए ही वी.पी.सिंह ने मंडल कार्ड खेला।यह एक ऐसा कार्ड था जिसके खेलने में गद्दी पर खतरे ही खतरे थे। देवी लाल का खतरा तो टल भी सकता था,पर मंडल आरक्षण से उत्पन्न खतरे में तो गद्दी जानी तय थी।इतनी राजनीतिक समझ तो चतुर सुजान वी.पी.सिंह में रही ही होगी। उन्होंने बाद में कहा भी कि मैंने गोल कर दिया भले इस कारण मेरी टांग टूट गई।पर एक गद्दी से उतर कर वी.पी.सिंह कमजोर वर्ग के दिलों की गद्दी पर जरूर स्थायी रूप से बैठ गए। किसी राजनीतिक जीवन की इससे बड़ी सार्थकता और क्या हो सकती है ? बी.पी.मंडल के नेतृत्व में 1977 में गठित मंडल आयोग की रपट केंद्र सरकार को 1980 में ही मिल चुकी थी।पर उस रपट पर तीन -तीन बार संसद में चर्चा हुई थी। तत्कालीन कांग्रेसी गृह मंत्री आर.बेंकट रमण ने संसद में बहस का जवाब देते हुए साफ -साफ कह दिया था कि सरकार इसे लागू नहीं करेगी।यानी तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी इसे लागू नहीं कर सके।पर जनता दल ने तो अपने चुनाव घोषणा पत्र में भी इसे शामिल कर लिया है। वी.पी.सिंह के निधन के बाद प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ में ठीक ही लिखा है कि ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने होने की शत्र्त पूरी की।मंडल लागू करवाने के कारण जो समझते हैं कि उनने अपने होने से धोखा किया, वे क्षात्र धर्म को नहीं जानते।’ दरअसल वी.पी.सिंह को भारतीय समाज की संरचना और राजनीति में उसके महत्व की अच्छी जानकारी थी। वे जानते थे कि पिछड़ों को सत्ता और नौकरियों में जगह देना कितना जरूरी है। न तो वी.पी. पर जातिवाद का आरोप था और न ही गद्दी के लिए अनैतिक समझौते का दाग था। वे अस्सी के दशक में भी उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके थे जबकि ऐसा करने की उनकी कोई मजबूरी नहीं थी।इस पृष्ठभूमि वाले नेता को जनहित में कोई निर्णय लेने से पहले उसके परिणामों की परवाह नहीं हुआ करती। वी.पी.सिंह के जीवन पर एक अच्छी पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने लिखी है।पुस्तक का नाम है ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह ः मंजिल से ज्यादा सफर।’यह नाम ही बहुत कुछ कह देता है।यह पुस्तक उनसे बातचीत पर आधारित है।इस बातचीत की खूबी यह है कि वी.पी.सिंह यह मान कर चल रहे हैं कि उन्हें अब आगे कोई पद नहीं लेना है।ऐसे में वे बेबाक बातें करते हैं।उस पुस्तक से वी.पी.सिंह के ही शब्दों में कुछ प्रकरण यहां प्रस्तुत है।‘सवाल ः कांग्रेस में क्या जाति आधारित गुटबाजी का चलन था ?जवाब ः पूरी तरह जातिवादी गुट नहीं बने हुए थे। एक हद तक ही उन्हें जातिवादी गुट कहा जा सकता है।कुछ नेता हर जाति में अपना प्रभाव रखते थे।हेमवतीनंदन बहुगुणा उन्हीें नेताओं में थे।कमलापति त्रिपाठी के इर्दगिर्द ब्राह्मण अधिक होते थे।लेकिन पं.कमलापति त्रिपाठी को जातिवादी नहीं कहा जा सकता।जाति की तरफ उनका झुकाव था लेकिन हेमवती नंदन बहुगुणा में वह भी नहीं था।सवाल ः जाति से परे जाकर देखें तो कांग्रेस में जो टकराव उस समय थे,उनकी जड़ें कहां कहां थीं ?जवाबःएक टकराव आर्थिक माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश में आजादी की लड़ाई में ब्राह्मणों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। उनके पास जमीन जायदाद कम थी। वह राजपूतों के पास थी।ज्यादातर जमींदार वही थे।रियासतें भी उन्हीें के पास थी।उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण रियासतें सिर्फ दो ही रही हैं।जमींदारों की दिलचस्पी आजादी की लड़ाई में कम थी।उनको अपनी जमींदारी चले जाने का खतरा दिखता था।कांग्रेस में यह तबका बाद में आया।लेकिन साधारण राजपूत तो शुरू से ही कांग्रेस में थे।ऐसे ही आजादी की लड़ाई में दलितों की प्रमुख भूमिका थी।कांग्रेस में जो सामाजिक ध्रुवीकरण बना था उसमें ब्राह्मण और दलित एक साथ थे।दलित और किसान की हिमायत में ब्राह्मण खड़े होते थे।इस कारण कांग्रेस के नेतृत्व समूह में ब्राह्मणांे की प्रमुखता थी।उस समय जाति का बोलबाला वैसा नहीं था,वह बाद में आया। सवाल ः उत्तर प्रदेश कांग्रेस के जनाधार खिसकने के खास कारण आप क्या देखते हैं ?जवाब ः कांग्रेस का स्वाभाविक नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में था।दूसरे वर्ग दलित और मुस्लिम भी थे।जब स्वाभाविक नेतृत्व स्थापित हो जाता है तो वह चलता रहता है।उनका नए समूहों से कई बार टकराव भी होता है।नेतृत्व यह समझ नहीं पाता कि नए समूहों को किस तरह जगह दें और उनको शामिल करें।यही कठिनाई कांग्रेस की भी थी।जो जनाधार कांग्रेस का था उसे वापस लाने में कामयाब नहीं हो सके।सवाल ः पहले फेयर फैक्स,फिर पनडुब्बी और उसके बाद बोफर्स तोप सौदे में दलाली का सवाल उठा।उसकी जांच की मांग कैसे उठी ?जवाब ः अखबारों में दस्तावेज आदि छपने लगे।उस समय जांच की मांग उठी।उसी समय छपा कि अजिताभ बच्चन का स्विट्जर लैंड में बंगला है।वे एक टूरिस्ट के रूप में गए थे।फिर बंगला कैसे खरीद लिया ?उस समय फेरा सख्ती से लागू होता था।सवाल ः क्या इसे आपने कहीं उठाया ?जवाब ः मैं उस समय कांग्रेस में था।संसदीय पार्टी की बैठकों में जाता था।वहां इसे उठाया।मैंने कहा कि प्रधान मंत्री जी आपने कहा है कि सच्चाई सामने लाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।कृपया इस सच्चाई का पता करिए।इसकी जांच होनी चाहिए।अगर यह सही नहीं है तो उस अखबार के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।उन्होंने कहा कि जांच करवाएंगे।सवालःराजीव गांधी से सीधी भेंट उस समय आपकी कहां हुई ?जवाब ः उन्होंने दो बार बुलाया।उन्होंने मुझसे पूछा कि यह क्या हो रहा है ?उनके सवाल में यह छिपा हुआ था कि मैं विपक्ष से हाथ मिला रहा हूं।मैंने कहा कि यह बातचीत राजीव गांधी और विश्व नाथ प्रताप में हो रही है।इस भ्रम में मत रहिए कि हमारी बातचीत प्रधान मंत्री और मंत्री के बीच हो रही है।सीधी बात है कि अगर आप यह महसूस करते हैं कि मैं आपके साथ राजनीतिक खेल, खेल रहा हूं तो इस बातचीत का कोई फायदा नहीं है।ऐसे ही अगर मेरे मन में यह है कि आप मेरे साथ राजनीति कर रहे हैं तो इस बातचीत से हम कहीं नहीं पहुंचेंगे।हममंे यह विश्वास और भरोसा होना चाहिए कि राजनीति आड़े नहीं आएगी।अगली बात यह है कि के.के.तिवारी और कल्प नाथ राय मुझे सी.आई.ए. एजेंट कहते हैं। मैं जानता हूं कि ये लोग लाउड स्पीकर हैं। माइक इस कमरे में लगा है जहां हम हैं। यहां से जो बोला जाता है वही लाउड स्पीकर पर बाहर सुनाई पड़ता है।उनकी हिम्मत कहां है कि वे मुझे सी.आई.ए.एजेंट कहें।सवाल ः राजीव गांधी ने क्या सफाई दी ?जवाब ः उन्होंने कहा कि पार्टी आपसे बहुत नाराज है।वे लोग भी नाराज हैं।इसलिए बोल रहे हैं।मैं इनसे कहूंगाा कि कम बोलें।मैंने उनसे कहा कि वे दस गाली दे रहे थे,अब दो गाली देंगे।कोई भ्रम न रहे इसलिए साफ -साफ कहा कि जो लोग गाली दे रहे हैं वे मेरी देश भक्ति पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं।जब देशप्रेम का सवाल आता है और जब भी आता है तो लोग जान की बाजी लगा देते हैं। अपना सिर कटा देते हैं और मैं भी अपनी देश भक्ति के लिए अंतिम दम तक ऐंड़ी जमा कर लड़ूंगा। सवाल ः इस पर उन्होंने क्या कहा ?जवाब ः राजीव गांधी ने कहा कि मैं इन लोगों को समझाउंगा। मैंने उनसे कहा कि देखिए आपकी मां के साथ काम करते हुए कांग्रेस नामक मशीन को हमने चलाया है। इसका एक- एक नट- बोल्ट हम जानते हैं। मेरे जैसे सेकेंड रैंकर लोगों ने हेमवती नंदन बहुगुणा को भगा दिया क्योंकि वे यह चाहती थीं। वे नहीं बोलीं। हमलोगों ने ही यह काम किया।
पब्लिक एजेंडा (

कैसे हो आतंकियों के खिलाफ त्वरित कमांडो कार्रवाई

क्या किसी आतंकी हमले की स्थिति में तत्काल कमांडो दस्ते को घटनास्थल पर भेजने में हमारी सरकार अगली बार सफल हो पायेगी ? कई कारणों से अब तक तो विफल ही रही है। 1999 के कंधार विमान अपहरण कांड और 2008 के मुंबई हमले के कटु अनुभव देश के सामने हैं। सरकार ने कंधार कांड में विफलता से नहीं सीखा और गत साल वही गलती दुहराई गई। कंधार कांड में केंद्र सरकार कंधार में नहीं, बल्कि अमृतसर में विफल हुई थी। विमान को कंधार जाने से पहले तब अमृतसर में ही रोका जा सकता था। केंद्र सरकार नेशनल सिक्युरिटी गार्ड को देश के तीन और स्थानों में स्टेशन करने की व्यवस्था करने जा रही है। इस कदम से तो त्वरित कार्रवाई के लिए सरकारी मंशा जाहिर होती है। साथ ही यह पिछली घटनाओं में त्वरित कमांडो कार्रवाई में विफलता की भी परोक्ष स्वीकृति भी है, पर क्या इतना ही काफी है ? याद रहे कि अभी एनएसजी के दस्ते दिल्ली के पास मनेसर (गुड़गांव) में तैनात हैं। कंधार विमान अपहरण कांड और मुंबई ताज हमले के समय हुई कुछ अन्य गलतियों से भी सबक लेने की जरूरत जान पड़ती है। किसी आतंकी हमले की स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उच्चतम स्तर पर तत्क्षण जवाबी हमले का फैसला लेने की जरूरत पड़ती है। कंधार और मुंबई हादसे के समय सरकारों ने इस दिशा में काफी सुस्ती दिखाई। कांग्रेस के नेतागण यदा-कदा यह कह कर भाजपा को चिढ़ाते रहते हैं कि जसवंत सिंह आतंकी मसूद अजहर को अपने साथ ले जाकर कंधार छोड़ आये थे। आतंकवाद पर वे क्या बात करेंगे ? 24 दिसंबर, 1999 को अपहरणकर्ता इंडियन एयरलाइंस के काठमांडु-दिल्ली विमान -814 को लखनऊ और अमृसर होते हुए कंधार ले गये थे। उस विमान पर करीब पौने दो सौ यात्री सवार थे। कंधार में विमान पहुंचने के बाद तब की भारत सरकार और उसके विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने जो कुछ किया, उस कृत्य को तब के लगभग पूरे प्रतिपक्ष का समर्थन हासिल था। केंद्र सरकार को उस विमान के अपहरण की सूचना उस दिन शाम में 4 बजकर 56 मिनट पर मिल चुकी थी, तब वह लखनऊ के ऊपर उड़ रहा था। तब से करीब तीन घंटों तक भारतीय सीमा में विमान चक्कर लगाता रहा। जब वह विमान अमृतसर से उड़ा, तो सात बजकर 49 मिनट हो चुके थे। इस बीच अमृतसर हवाई अड्डे पर वह विमान 40 मिनट तक रुका भी रहा, पर तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली से बाहर थे और वे अपने विशेष विमान से दिल्ली लौट रहे थे। जिस विमान से प्रधानमंत्री यात्रा कर रहे थे, उसमें सेटेलाइट फोन की व्यवस्था नहीं थी। इसलिए ऐसी आपात स्थिति में भी उन्हें सूचित करके उनसे उचित निदेश प्राप्त नहीं किया जा सका। प्रधानमंत्री के उनके दिल्ली आवास पहुंचने पर ही इस संबंध में उच्चस्तरीय बैठकों का दौर शुरू हुआ। सवाल है कि प्रधानमंत्री जिस विमान में यात्रा कर रहे हों, उसमें सेटलाइट फोन नहीं हो, सरकार के ऐसे आपराधिक निकम्मेपन के लिए एनडीए सरकार को जम कर कोसा जाना चाहिए था। यदि किसी कारण प्रधानमंत्री से संपर्क नहीं हो सका, तो दूसरे मंत्री और अफसर ऐसी आपात स्थिति में हाथ-पर-हाथ रख कर बैठे रहेंगे ? समय पर एनएसजी कमांडो को अमृतसर क्यों नहीं भेजा जा सका ? इंधन भरने के लिए अपहरणकर्ता विमान को अमृतसर उतरवाने को बाध्य हो गये थे और इस बात की पूर्व सूचना कें्रद सरकार को थी। एनएसजी से संबद्ध एक अधिकारी ने 25 दिसंबर, 1999 को मीडिया से कहा था कि ‘विमान से अमृतसर से उड़ान भरने के बाद भारतीय सीमा क्षेत्र से बाहर जाने से पहले तक एनएसजी कमांडो दस्ते के पास विमान को अपहर्ताओं से मुक्त करा लेने के पर्याप्त अवसर थे, लेकिन ऊपर के स्तर पर भ्रम होने के कारण कमांडो का उपयोग नहीं किया जा सका। ऐसी ही स्थितियों से निबटने के लिए बनाये गये विशेष प्रबंधन ग्रूप के अधिकारियों को पता ही नहीं था कि उन्हें क्या करना है, जबकि इसके लिए दिशा-निर्देश स्पष्ट हैं।’ यदि विमान अमृतसर में ही रोक लिया गया होता, तो अपहर्ताओं से वार्ता चलाने पर भारत सरकार का पलड़ा भारी होता, पर विमान के कंधार चले जाने के बाद तो भारत सरकार असहाय हो गयी, क्योंकि वहां तब तालिबान की सरकार थी और उससे भारत का कोई राजनयिक रिश्ता था ही नहीं। तालिबानी अपहरणकर्ताओं से मिले हुए थे। अमृतसर में भारत सरकार की विफलता के लिए किसी-न-किसी को सजा मिल गयी होती, तो इस बार गत माह कमांडो को मनेसर से मुंबई भेजने में साढ़े नौ घंटे नहीं लग जाते। यदि गत नवंबर में समय पर कमांडो मुंबई पहुंच गये होते, तो वहां मृतकों और घायलों की संख्या काफी कम हो सकती थी। इस बार तो कमांडो को दिल्ली से मुंबई पहुंचाने के लिए विमान ही समय पर उपलब्ध नहीं हो सका। तब एनएसजी के लिए आरक्षित वह विमान पता नहीं क्यों चंडीगढ़ में था ! जबकि, उसे इंधन भरी टंकी के साथ दिल्ली हवाई अड्डे पर हरदम तैनात रहना चाहिए था। अब देखना यह होगा कि कमांडो के लिए आरक्षित विमान का किसी वीवीआइपी के लिए घटना के समय ही इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है ! कंधार में खड़े किये गये विमान के यात्रियों को किसी-न-किसी कीमत पर छुडा लाने के लिए 27 दिसंबर, 1999 को दिल्ली में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वदलीय बैठक बुलानी पड़ी थी। बैठक के बारे में दूसरे दिन के अखबार में यह खबर छपी, ‘देश के प्रमुख राजनीतिक दलों ने इंडियन एयरलाइंस के अपहृत विमान के यात्रियों और चालक दल की सकुशल रिहाई के लिए आवश्यक कदम उठाने का सरकार को सुझाव दिया है। इन दलों के नेताओं ने कहा कि संकट की इस घड़ी में वे सब एक हैं। मगर पल- पल बदलते घटनाक्रम के मद्देनजर जरूरी कदम उठाने का फैसला तो सरकार ही ले सकती है। बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, माकपा के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजित, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जे चितरंजन सहित कई प्रमुख नेताओं ने भाग लिया।’ यानी जब अमृतसर में उस विमान को नहीं रोका जा कसा, तो पूरा देश लाचार हो गया। यह और बात है कि राजनीतिक कारणों से अब मसूद अजहर को छोड़ देने के लिए एक दल दूसरे दल को दोषी ठहरा रहा है। हालांकि तब प्रतिपक्ष ने केंद्र सरकार से साफ- साफ कहा था कि यात्रियों और चालक दल की वह सकुशल रिहाई कराये। किसी ने बैठक में यह नहीं कहा कि भले यात्रियों की जान ही क्यों न चली जाये, पर मसूद अजहर या किसी आतंकी को नहीं छोड़ना है। अब जरा ताजा मुंबई के समय सरकारी सुस्ती का एक नमूना देखिए। 26 नवंबर, 2008 की रात नौ बज कर 30 मिनट पर आतंकियों ने मुंबई में गोलियां चलानी शुरू कर दीं। मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को सूचना दी गयी। उन्होंने 11 बजे रात में केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटील को फोन पर कहा कि उन्हें एनएसजी कमांडो चाहिए। पाटील ने एनएसजी प्रमुख जेके दत्ता को निदेश दिया कि 200 कमांडो मुंबई भेजें। जिस विमान से उन्हें मुंबई भेजना था, वह उस समय चंडीगढ़ में था। उसे दिल्ली हवाई अड्डा लाकर उसमें इंधन भरते काफी देर हो गयी। धीमी गति वाला विमान मुंबई पहुंचा और कमांडो 27 नवंबर की सुबह सात बजे ही अपनी कार्रवाई शुरू कर सके। अब सवाल है कि क्या ऐसे मौकों के लिए तेज गति वाला विमान नहीं रहना चाहिए ? क्यों कमांडो को घटना स्थल पर भेजने में साढ़े नौ घंटे लगे ? क्यों कंधार कंाड के समय प्रधानमंत्री के विमान में सेटेलाइट फोन की सुविधा नहीं थी ? यदि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री मुख्यालय में नहीं हैं, तो आपात स्थिति में तत्क्षण निर्णय लेने के लिए अन्य मंत्री या अफसर अधिकृत क्यों नहीं हैं ? इन और इस तरह के सवालों का माकूल जवाब ही अगले किसी खतरे से हमें बचा पायेगा।
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समाजवादी एकता और टूट की एक अलग कहानी

सन् 1952 के आम चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी को मिला कर प्रजा समाजवादी पार्टी का गठन कर दिया गया था।पर तीन साल के भीतर ही समाजवादियों का यह दल टूट गया। हालांकि इस विलयन और टूट के पीछे कुर्सी की होड़ तब नहीं थी जिस तरह की होड़ बाद के वर्षों में समाजवादियों में देखी गई।तब दो दलों का विलयन इस कारण हुआ था ताकि देश में कांग्रेस का एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत किया जा सके। टूट भी इसलिए हुई क्योंकि नई संयुक्त पार्टी यानी प्रसपा अपनी ही पुरानी बात से मुकर रही थी। सन् 1950 में जब मध्य भारत में पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चला कर कुछ लोगों की जान ले ली थी तो समाजवादी पार्टी ने उस सरकार से इस्तीफे की मांग की थी।पर जब त्रावन कोर कोचिन की प्रसपा सरकार की पुलिस ने सन् 1954 में भीड़ पर गोलियां चलार्इं तो राज्य मंत्रिमंडल ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। प्रसपा के महा सचिव डा.राम मनोहर लोहिया ने वहां के मुख्य मंत्री पट्टम थानु पिल्लई को तार भेज कर उन्हेंे इस्तीफा देने को कह दिया।पर प्रसपा के अध्यक्ष जे.बी.कृपलानी चाहते थे कि पहले गोली कांड के लिए दोषी कौन है ,इस बात का पता लगाया जाए।फिर जरूरत पड़ने पर कानून व्यवस्था का महकमा जिसके पास है,उससे इस्तीफा मांग लिया जाए।मुख्य मंत्री से नहीं। डा.लोहिया का तर्क यह था कि सिर्फ देश के खिलाफ बगावत की स्थिति में ही गालियां चलनी चाहिए।इस मसले पर प्रसपा के भीतर आंतरिक कलह इतना बढ़ा कि डा.लोहिया को 1955 में अलग सोशलिस्ट पार्टी बनानी पड़ी।डा.लोहिया कथनी और करनी में एकरूपता के पक्षधर थे। उधर जब सन् 1952 में सोशलिस्ट पार्टी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी का विलयन हुआ तो यह कहा गया कि इससे देश में कांग्रेस का एक मजबूत विकल्प बनेगा और कांग्रेस सत्ता के मद में मनमानी नहीं कर पाएगी।तब सोशलिस्ट पार्टी के नेता आचार्य नरेंद्र देव और के.एम.पी.पी.के नेता आचार्य जे.बी.कृपलानी थे। सन् 1952 के आम चुनाव में देश में कांग्रेस को कुल चार करोड़ 40 लाख वोट मिले थे।तब वोट हासिल करने के लिहाज से सोशलिस्ट पार्टी और के.एम.पी.पी.भारत की दूसरी और तीसरी बड़ी पार्टियां थीं।इन दोनों दलों को मिला दें तो पहले आम चुनाव में देश भर में इन्हें एक करोड़ 74 लाख मत मिले थे।इन दलों के विलयन से जय प्रकाश और अशोक मेहता जैसे नेता बडे़ उत्साहित थे।पर बाद में कई कारणों से जेपी सर्वाेदय में चले गए और अशोक मेहता कांग्रेस में। दो दलों के विलयन के फैसले पर अशोक मेहता ने कहा था कि ‘सोशलिस्ट पार्टी तथा के.एम.पी.पी.के प्रस्तावित विलय से मैं अत्यधिक खुश हूं, भावविह्वल हूं।मैं मानता हूं कि यह न केवल आम चुनाव के बाद बल्कि आजादी प्राप्त होने के बाद की एक बड़ी राजनीतिक घटना है।’ ‘ हम यह याद करें कि महात्त्मा जी की हत्या के बाद हम समाजवादी कांग्रेस से इसलिए अलग हुए थे कि हमारा निश्चित मत था कि तीव्र सामाजिक परिवत्र्तन के बिना आजादी बरकरार नहीं रखी जा सकती है।पर उस परिवत्र्तन के लिए कांग्रेस में न तो इच्छा शक्ति है और न ही क्षमता।जिन 4.40 करोड़ मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट दिया है ,उनका धीरे धीरे मोहभंग होगा और वे वहां से हटकर नए राजनीतिक केंद्र की ओर आना चाहेंगे।हमारी पार्टी मानती है कि समान दृष्टि वाली सभी छोटी-बड़ी पार्टियों के साथ आने से राजनीतिक विकास की यह प्रक्रिया आगे बढेगी। जय प्रकाश नारायण ने इस विलय पर कहा था कि ‘ आम चुनाव के विदारक अनुभव के बाद हम सब हतप्रभ थे।हमें यह समझ में आया कि जब तक राजनीतिक समेकन नहीं होता और समान विचार वाली पार्टियां एक साथ नहीं मिलतीं , एक ओर प्रक्रियावादी शक्तियों के लिए और दूसरी ओर अराजक तत्वों के लिए द्वार खुलेगा,जो देश को विनाश की ओर ले जाएगा। जेपी ने यह भी कहा कि ‘सवाल उठाया गया है कि क्या के.एम.पी.पी.माक्र्सवाद में विश्वास करता है ? मैं साथियों से प्रार्थना करूंगा कि वे माक्र्सवाद को दूसरा धर्म न बनने दें और सार को छोड़ कर रूपों में न उलझ जाएं।इस मुद्दे पर पंचमढी सम्मेलन में काफी अच्छी बहस हुई और लोहिया के स्मरणीय उत्तर के बाद इसे पुनः उठाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी।हम यह न भूलें कि न केवल विभिन्न समयों एवं स्थानों पर बल्कि समान स्थिति में भी माक्र्सवाद की विभिन्न परस्पर विरोधी व्याख्याएं हैं।फिर इतिहास, भारत के इतिहास सहित ,इस बात का गवाह है कि जो लोग अपने को माक्र्सवादी कहने पर जोर डालते रहे, वे गलत साबित हुए और उन्होंने ऐतिहासिक गलतियां की।’ प्रभात खबर (09-०१-2009)

सती होते देख मूर्छित हो गए थे इब्नबतूता

14वीं सदी में भारत की यात्रा पर आए इब्न बतूता एक स्त्री को सती होते देख मूर्छित हो गए थे। वे लिखते हैं, ‘मैं यह हृदय विदारक दृश्य देख कर मूर्छित हो घोड़े से गिरने को ही था कि मेरे मित्रों ने संभाल लिया और मेरा मुख पानी से धुलवाया।’ 

इब्न बतूता अरब देश से 22 साल की छोटी उम्र में विश्व भ्रमण का निकल पड़े थे। वे 30 साल तक घूमते रहे। इब्न बतूता ने अपनी यात्रा के वृतांत में भारत के उस सदी के शासकों, सामाजिक धार्मिक मान्यताओं, रीति रिवाजों आदि का रोमांचक आंखों देखा हाल वर्णित किया है। इब्न बतूता ने यह भी लिखा कि स्त्री को इस तरह जलाने की अनुमति सम्राट देते थे। क्रूर सती प्रथा का वर्णन इब्न बतूता ने विस्तार से किया है। याद रहे कि इस प्रथा के खिलाफ राजा राम मोहन राय ने बाद में अभियान चलाया और सन् 1829 में अंग्रेज शासक ने इस पर कानूनी रोक लगाई।

इससे पहले मुस्लिम शासक भी स्वेच्छा से सती होने के कृत्य पर रोक नहीं लगाते थे। वे इसे हिंदुओं का एक धार्मिक कृत्य मान कर हस्तक्षेप नहीं करते थे। पर अंग्रेज और मुस्लिम शासक इस बात का ध्यान जरूर रखते थे कि किसी महिला को कोई जबरन सती न बना दे। इस बात का जिक्र अबुल फजल ने भी ‘अकबरनामा’ में किया है। आज के युग में दहेज प्रथा, प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सती प्रथा की तरह ही मारक साबित हो रही है। आज का दहेज विरोधी कानून, दहेज पिपासुओं के खिलाफ बेअसर ही साबित हो रहा है।

सती प्रथा का 14वीं सदी में कैसा स्वरूप था, वह इब्न बतूता के शब्दों में पढि़ए, ‘एक बार मैंने भी एक हिंदू स्त्री को बनाव सिंगार किए घोड़े पर चढ़कर जाते हुए देखा था। हिंदू और मुसलमान इस स्त्री के पीछे चल रहे थे। आगे- आगे नौबत बजती जाती थी और ब्राह्मण साथ -साथ थे। घटना का स्थान सम्राट की राज्य सीमा के अंतर्गत होने के कारण बिना उनकी आज्ञा प्राप्त किए जलाना संभव नहीं था। आज्ञा मिलने पर यह स्त्री जलाई गई। हिंदुओं में प्रत्येक विधवा के लिए सती होना आवश्यक नहीं है। परंतु पति के साथ स्त्री के जल जाने पर वंश प्रतिष्ठित गिना जाता है और उसकी भी पतिव्रताओं में गणना होने लगती है। सती न होने पर विधवा को मोटे- मोटे वस्त्र पहन कर महाकष्टमय जीवन तो व्यतीत करना ही पड़ता है, साथ ही वह पति परायण भी नहीं समझी जाती।’

एक युद्ध में खेत रहे तीन जवानों की विधवाओं के सती होने का विवरण देते हुए इब्न बतूता ने लिखा कि ‘इन तीन स्त्रियों ने तीन दिनों तक खूब गाया बजाया और नाना प्रकार के भोजन किए। इनके पास चारों ओर की स्त्रियों का जमघट लगा रहता था। चौथे दिन इनके पास घोड़े लाए गए और ये तीनों बनाव सिंगार कर सुगंधि लगाकर उन पर सवार हो गईं। इनके दाहिने हाथ में एक नारियल था, जिसको ये बराबर उछाल रही थीं और बाएं हाथ में एक दर्पण था जिसमें ये अपना मुख देखती थीं। चारों ओर ब्राह्मणों और संबंधियों की भीड़ लगी थी। प्रत्येक हिंदू आकर अपने मृत माता, पिता, बहिन, भाई तथा अन्य संबंधी या मित्रों के लिए इनसे प्रणाम कहने को कह देता था और ये हां हां कहती और हंसती चली जाती थीं।

मैं भी मित्रों के साथ यह देखने को चल दिया कि ये किस प्रकार से जलती हैं। तीन कोस जाने के बाद हम एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां जल की बहुतायत थी और वृक्षों की सघनता के कारण अंधकार छाया हुआ था। यहां चार मंदिर बने हुए थे।’ ‘मंदिरों के निकट पहुंचने के बाद इन स्त्रियों ने उतर कर स्नान किया और कुंड में एक डुबकी लगाई। वस्त्र आभूषण उतार कर रख दिए और मोटी साडि़यां पहन लीं। कुंड के पास अग्नि दहकाई गई। सरसों का तेल डालने पर उसमें प्रचंड शिखाएं निकलने लगीं। पंद्रह पुरुषों के हाथों में लकड़ियों के बंधे हुए गट्ठे थे और दस पुरुष अपने हाथों में लकड़ी के बड़े-बड़े कुंदे लिए खड़े थे। नगाड़े, नौबत और शहनाई बजाने वाले स्त्रियों की प्रतीक्षा में खड़े थे। स्त्रियों की दृष्टि से बचाने के लिए लोगों ने अग्नि को एक रजाई की ओट में कर लिया था। परंतु इन में से एक स्त्री ने रजाई को बलपूर्वक खींच कर कहा कि क्या मैं जानती नहीं कि यह अग्नि है, मुझे क्यों डराते हो? इतना कह कर वह अग्नि को प्रणाम कर तुरंत उसमें कूद पड़ी।

नगाड़े, ढोल, शहनाई और नौबत बजने लगी। पुरुषों ने अपने हाथों की पतली लकड़ियां डालनी प्रारंभ कर दीं। और फिर बड़े- बड़े कुंदे भी डाल दिए गए जिससे स्त्री की गति बंद हो गई। उपस्थित जनता भी चिल्लाने लगी। मैं यह हृदय द्रावक दृश्य देख कर मूर्छित हो घोड़े से गिरने को ही था कि मेरे मित्रों ने संभाल लिया और मेरा मुख पानी से धुलवाया। संज्ञा लाभ कर मैं वहां से लौट आया।’


 प्रभात खबर (07-11-2008)