Wednesday, January 21, 2009

विश्वनाथ प्रताप सिंह यानी एक सार्थक राजनीतिक जीवन


बोफर्स घोटाले के खिलाफ अभियान चला कर जिस राजा मांडा ने प्रधान मंत्री की कुर्सी पाई,उसी वी.पी. सिंह ने न जाने क्यों अपने जीवन के आखिरी दिनों में यह कह दिया कि उन्होंने तो बोफर्स घोटाले को लेकर राजीव गांधी पर कोई आरोप ही नहीं लगाया था। इससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा। साथ ही, इस देश की राजनीति की साख को भी थोड़ा और बट्टा लगा। पर, यदि इस एक प्रकरण को नजरअंदाज कर दिया जाए तो वी.पी. सिंह के बारे में यह कहा जा सकता है कि वे इस गरीब देश के लिए सही नेता थे।राजा नहीं, फकीर थे वे।वे पिछड़ों के हमदर्द थे। उनमें व्यक्तिगत ईमानदारी व त्याग इतना अधिक था कि उनके नाम पर कसमें खाई जा सकती हैं। यह इस देश का दुर्भाग्य रहा कि वे कम ही दिनों तक प्रधान मंत्री रहेे। इस देश की मुख्य समस्या हर स्तर पर सरकारी भ्रष्टाचार ही है। बाकी अधिकतर समस्याएं तो भ्रष्टाचार के कारण ही पैदा होती रहती हैं। वी.पी.सिंह भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर व्यक्ति यदि आज भी प्रधान मंत्री की कुर्सी पर बैठ जाए तो देश का आधा सरकारी भ्रष्टाचार वैसे ही खत्म हो जाएगा।मन मोहन सिंह खुद तो ईमानदार हैं,पर भ्रष्टाचार के खिलाफ तनिक भी कठोर नहीं हैं। पहले बोफर्स घोटाले पर उनकी भूमिका की चर्चा कर ली जाए। अस्सी के दशक में राजीव गांधी मंत्रिमंडल से हटने के बाद वी.पी.सिंह जन मोर्चा बना कर देश भर में राजीव सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उसी सिलसिले में वे पटना आए थे।वे बेली रोड के हड़ताली मोड के पास एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे।जनसत्ता के संवाददाता के रूप में इन पंक्तियों का लेखक भी उस सभा में मौजूद था।वी.पी.सिंह ने पहली बार उसी सभा में विदेशी बैंक के उस खाते का नंबर बताया जिसमें बोफर्स दलाली के पैसे जमा किए गए थे।खाता लोटस के नाम से था और उसका नंबर कई अंकों का था।वी.पी.सिंह ने खाते का नंबर सभा में बताते हुए श्रोताओं से पूछा भी, ‘आप जानते हैं न कि लोटस का अर्थ क्या होता है ?’ भीड़ से एक आवाज आई ‘राजीव।’ वी.पी.सिंह ने इस अनुवाद का खंडन नहीं किया।उनके चेहरे पर यह भाव था कि श्रोता ने सही अनुवाद बता दिया।यह बात सही है कि वी.पी.सिंह ने खुद अपने मुंह से राजीव गांधी का नाम नहीं लिया।पर पटना की उस सभा में वे जनता को जो सूचना देना चाहते थे,वह क्या था ? इससे पहले जब राजीव गांधी सरकार से विद्रोह करके पहली बार पटना आए थे तो वे एक प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए।उसमें इन पंक्तियों के लेखक ने ही यह सवाल किया था कि क्या आप प्रधान मंत्री से इस्तीफे की मांग करते हैं ? उन्होंने जवाब दिया, ‘कोई सिरियस सवाल कीजिए।’ यानी वी.पी.सिंह अपने पूरे अभियान में राजीव गांधी का नाम लेने से बचते रहे।पर वे अपनी बातों से भीड़ को यह विश्वास दिलाते रहे कि बोफर्स घोटाले मंे राजीव गांधी भी शामिल हैं।इसी विश्वास के कारण जनता ने सन् 1989 के लोक सभा चुनाव मेंं राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया।यदि आरोप राजीव गांधी के अलावा किसी और पर होता तो शायद कांग्रेस की चुनाव में उतनी बुरी हालत नहीं होती। पर, बोफर्स घोटाले के खिलाफ अभियान चला कर सत्ता हासिल करने वाले वी.पी.सिंह को बाद में यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि उन्होंने राजीव गांधी पर इस संबंध में आरोप नहीं लगाया था ? जबकि, बोफर्स मुकदमे के चार्ज शीट के कालम -दो में राजीव गांधी का नाम आ ही गया ।याद रहे कि अभियुक्त की मृत्यु हो जाने पर उसका नाम कालम - 2 में लिख दिया जाता है। पर किसी एक फिसलन को आधार बना कर किसी नेता के पूरे व्यक्तित्व का आकलन नहीं किया जा सकता। वी.पी.सिंह के राजनीतिक जीवन में जो दो महत्वपूर्ण मुकाम आए,वे देश के लिए भी काफी निर्णायक रहे।उन्होंने सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता को गोलबंद किया और जनता को यह विश्वास दिलाया कि सत्ता में आने के बाद वे भ्रष्टाचार पर काबू पाने की कोशिश करेंगे। वे इस पर खरा उतरे।प्रधान मंत्री के रूप में भी उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा। सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ चुनाव लड़ने और जीतने का इस देश में वह आखिरी मौका था।उसके बाद तो चुनाव धर्म और जाति के नाम पर लड़े गए।या फिर विकास या अविकास पर।सामाजिक न्याय को राष्ट्रीय राजनीति का एक मुख्य मुद्दा बनाने का श्रेय भी वी.पी.सिंह को ही जाता है।उन्होंने सन् 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके देश की राजनीति का एजेंडा ही बदल दिया।यदि मंडल नहीं होता तो मंदिर आंदोलन भी नहीं होता।यह बात भी सही है।हालांकि मंडल आरक्षण लागू नहीं होता तो इस देश में नक्सलियों का विकास और भी तेजी से होता। इस आरोप में दम नहीं है कि जनता दल के भीतर अपने सहयोगी चैधरी देवी लाल के विद्रोह को दबाने के लिए ही वी.पी.सिंह ने मंडल कार्ड खेला।यह एक ऐसा कार्ड था जिसके खेलने में गद्दी पर खतरे ही खतरे थे। देवी लाल का खतरा तो टल भी सकता था,पर मंडल आरक्षण से उत्पन्न खतरे में तो गद्दी जानी तय थी।इतनी राजनीतिक समझ तो चतुर सुजान वी.पी.सिंह में रही ही होगी। उन्होंने बाद में कहा भी कि मैंने गोल कर दिया भले इस कारण मेरी टांग टूट गई।पर एक गद्दी से उतर कर वी.पी.सिंह कमजोर वर्ग के दिलों की गद्दी पर जरूर स्थायी रूप से बैठ गए। किसी राजनीतिक जीवन की इससे बड़ी सार्थकता और क्या हो सकती है ? बी.पी.मंडल के नेतृत्व में 1977 में गठित मंडल आयोग की रपट केंद्र सरकार को 1980 में ही मिल चुकी थी।पर उस रपट पर तीन -तीन बार संसद में चर्चा हुई थी। तत्कालीन कांग्रेसी गृह मंत्री आर.बेंकट रमण ने संसद में बहस का जवाब देते हुए साफ -साफ कह दिया था कि सरकार इसे लागू नहीं करेगी।यानी तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी इसे लागू नहीं कर सके।पर जनता दल ने तो अपने चुनाव घोषणा पत्र में भी इसे शामिल कर लिया है। वी.पी.सिंह के निधन के बाद प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ में ठीक ही लिखा है कि ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने होने की शत्र्त पूरी की।मंडल लागू करवाने के कारण जो समझते हैं कि उनने अपने होने से धोखा किया, वे क्षात्र धर्म को नहीं जानते।’ दरअसल वी.पी.सिंह को भारतीय समाज की संरचना और राजनीति में उसके महत्व की अच्छी जानकारी थी। वे जानते थे कि पिछड़ों को सत्ता और नौकरियों में जगह देना कितना जरूरी है। न तो वी.पी. पर जातिवाद का आरोप था और न ही गद्दी के लिए अनैतिक समझौते का दाग था। वे अस्सी के दशक में भी उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके थे जबकि ऐसा करने की उनकी कोई मजबूरी नहीं थी।इस पृष्ठभूमि वाले नेता को जनहित में कोई निर्णय लेने से पहले उसके परिणामों की परवाह नहीं हुआ करती। वी.पी.सिंह के जीवन पर एक अच्छी पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने लिखी है।पुस्तक का नाम है ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह ः मंजिल से ज्यादा सफर।’यह नाम ही बहुत कुछ कह देता है।यह पुस्तक उनसे बातचीत पर आधारित है।इस बातचीत की खूबी यह है कि वी.पी.सिंह यह मान कर चल रहे हैं कि उन्हें अब आगे कोई पद नहीं लेना है।ऐसे में वे बेबाक बातें करते हैं।उस पुस्तक से वी.पी.सिंह के ही शब्दों में कुछ प्रकरण यहां प्रस्तुत है।‘सवाल ः कांग्रेस में क्या जाति आधारित गुटबाजी का चलन था ?जवाब ः पूरी तरह जातिवादी गुट नहीं बने हुए थे। एक हद तक ही उन्हें जातिवादी गुट कहा जा सकता है।कुछ नेता हर जाति में अपना प्रभाव रखते थे।हेमवतीनंदन बहुगुणा उन्हीें नेताओं में थे।कमलापति त्रिपाठी के इर्दगिर्द ब्राह्मण अधिक होते थे।लेकिन पं.कमलापति त्रिपाठी को जातिवादी नहीं कहा जा सकता।जाति की तरफ उनका झुकाव था लेकिन हेमवती नंदन बहुगुणा में वह भी नहीं था।सवाल ः जाति से परे जाकर देखें तो कांग्रेस में जो टकराव उस समय थे,उनकी जड़ें कहां कहां थीं ?जवाबःएक टकराव आर्थिक माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश में आजादी की लड़ाई में ब्राह्मणों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। उनके पास जमीन जायदाद कम थी। वह राजपूतों के पास थी।ज्यादातर जमींदार वही थे।रियासतें भी उन्हीें के पास थी।उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण रियासतें सिर्फ दो ही रही हैं।जमींदारों की दिलचस्पी आजादी की लड़ाई में कम थी।उनको अपनी जमींदारी चले जाने का खतरा दिखता था।कांग्रेस में यह तबका बाद में आया।लेकिन साधारण राजपूत तो शुरू से ही कांग्रेस में थे।ऐसे ही आजादी की लड़ाई में दलितों की प्रमुख भूमिका थी।कांग्रेस में जो सामाजिक ध्रुवीकरण बना था उसमें ब्राह्मण और दलित एक साथ थे।दलित और किसान की हिमायत में ब्राह्मण खड़े होते थे।इस कारण कांग्रेस के नेतृत्व समूह में ब्राह्मणांे की प्रमुखता थी।उस समय जाति का बोलबाला वैसा नहीं था,वह बाद में आया। सवाल ः उत्तर प्रदेश कांग्रेस के जनाधार खिसकने के खास कारण आप क्या देखते हैं ?जवाब ः कांग्रेस का स्वाभाविक नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में था।दूसरे वर्ग दलित और मुस्लिम भी थे।जब स्वाभाविक नेतृत्व स्थापित हो जाता है तो वह चलता रहता है।उनका नए समूहों से कई बार टकराव भी होता है।नेतृत्व यह समझ नहीं पाता कि नए समूहों को किस तरह जगह दें और उनको शामिल करें।यही कठिनाई कांग्रेस की भी थी।जो जनाधार कांग्रेस का था उसे वापस लाने में कामयाब नहीं हो सके।सवाल ः पहले फेयर फैक्स,फिर पनडुब्बी और उसके बाद बोफर्स तोप सौदे में दलाली का सवाल उठा।उसकी जांच की मांग कैसे उठी ?जवाब ः अखबारों में दस्तावेज आदि छपने लगे।उस समय जांच की मांग उठी।उसी समय छपा कि अजिताभ बच्चन का स्विट्जर लैंड में बंगला है।वे एक टूरिस्ट के रूप में गए थे।फिर बंगला कैसे खरीद लिया ?उस समय फेरा सख्ती से लागू होता था।सवाल ः क्या इसे आपने कहीं उठाया ?जवाब ः मैं उस समय कांग्रेस में था।संसदीय पार्टी की बैठकों में जाता था।वहां इसे उठाया।मैंने कहा कि प्रधान मंत्री जी आपने कहा है कि सच्चाई सामने लाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।कृपया इस सच्चाई का पता करिए।इसकी जांच होनी चाहिए।अगर यह सही नहीं है तो उस अखबार के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।उन्होंने कहा कि जांच करवाएंगे।सवालःराजीव गांधी से सीधी भेंट उस समय आपकी कहां हुई ?जवाब ः उन्होंने दो बार बुलाया।उन्होंने मुझसे पूछा कि यह क्या हो रहा है ?उनके सवाल में यह छिपा हुआ था कि मैं विपक्ष से हाथ मिला रहा हूं।मैंने कहा कि यह बातचीत राजीव गांधी और विश्व नाथ प्रताप में हो रही है।इस भ्रम में मत रहिए कि हमारी बातचीत प्रधान मंत्री और मंत्री के बीच हो रही है।सीधी बात है कि अगर आप यह महसूस करते हैं कि मैं आपके साथ राजनीतिक खेल, खेल रहा हूं तो इस बातचीत का कोई फायदा नहीं है।ऐसे ही अगर मेरे मन में यह है कि आप मेरे साथ राजनीति कर रहे हैं तो इस बातचीत से हम कहीं नहीं पहुंचेंगे।हममंे यह विश्वास और भरोसा होना चाहिए कि राजनीति आड़े नहीं आएगी।अगली बात यह है कि के.के.तिवारी और कल्प नाथ राय मुझे सी.आई.ए. एजेंट कहते हैं। मैं जानता हूं कि ये लोग लाउड स्पीकर हैं। माइक इस कमरे में लगा है जहां हम हैं। यहां से जो बोला जाता है वही लाउड स्पीकर पर बाहर सुनाई पड़ता है।उनकी हिम्मत कहां है कि वे मुझे सी.आई.ए.एजेंट कहें।सवाल ः राजीव गांधी ने क्या सफाई दी ?जवाब ः उन्होंने कहा कि पार्टी आपसे बहुत नाराज है।वे लोग भी नाराज हैं।इसलिए बोल रहे हैं।मैं इनसे कहूंगाा कि कम बोलें।मैंने उनसे कहा कि वे दस गाली दे रहे थे,अब दो गाली देंगे।कोई भ्रम न रहे इसलिए साफ -साफ कहा कि जो लोग गाली दे रहे हैं वे मेरी देश भक्ति पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं।जब देशप्रेम का सवाल आता है और जब भी आता है तो लोग जान की बाजी लगा देते हैं। अपना सिर कटा देते हैं और मैं भी अपनी देश भक्ति के लिए अंतिम दम तक ऐंड़ी जमा कर लड़ूंगा। सवाल ः इस पर उन्होंने क्या कहा ?जवाब ः राजीव गांधी ने कहा कि मैं इन लोगों को समझाउंगा। मैंने उनसे कहा कि देखिए आपकी मां के साथ काम करते हुए कांग्रेस नामक मशीन को हमने चलाया है। इसका एक- एक नट- बोल्ट हम जानते हैं। मेरे जैसे सेकेंड रैंकर लोगों ने हेमवती नंदन बहुगुणा को भगा दिया क्योंकि वे यह चाहती थीं। वे नहीं बोलीं। हमलोगों ने ही यह काम किया।
पब्लिक एजेंडा (

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