रविवार, 1 फ़रवरी 2009

स्वामी रामदेव और गंगा

गंगा नदी को साफ करने के लिए स्वामी रामदेव की गंभीर पहल स्तुत्य है। गंगा को उसकी पूरी लंबाई में साफ करके फिर से उसकी धारा को निर्मल व अविरल बनाने के लिए राम देव जी की कोशिश को देश भर के साधु संतों का समर्थन मिल रहा है।देश की शीर्ष धर्म सत्ता इस मुद्दे पर इन दिनों एक मंच पर है। स्वामी राम देव ने कहा है कि ‘हमारी मांग है कि केंद्र की सरकार गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करे और गंगा में गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ संज्ञेय अपराध की धाराओं के तहत कार्रवाई हो। इस मांग के समर्थन में संतों ने अभियान शुरू भी कर दिया है।’ सवाल है कि चुनाव सर पर है। केंद्र की कथित धर्मनिरपेक्ष सरकार गंगा के लिए कुछ करने से पहले संभवतः इस बात का आकलन करेगी कि इससे उसके वोट बैंक पर तो कोई विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा। यानी गंगा के लिए रामदेव जी की ‘लड़ाई’ लंबी होने वाली है। गंगा नदी की भी लम्बाई 2507 किलोमीटर है। संतों ने गंगा की पूरी लंबाई में जगह जगह शिविर लगाने का निर्णय किया है ताकि लोगों को ंगंगा की सफाई के प्रति जागरूक बनाया जा सके। गंंगा की सफाई का मसला देश के बिगड़ते पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। पर संतों को इस मामले में एक और तरह से इस दिशा में पहल करनी चाहिए।जो नगर और महा नगर गंगा के किनारे बसे हुए हैं, उनकी नालियों और नालों के जरिए अत्यंत ही प्रदूषित जल सीधे गंगा में बहाया जा रहा है।पटना में ऐसे 29 नाले हैं जो गंगा को रोज- रोज प्रदूषित कर रहे हैं। बाबा राम देव तथा इस देश के कई अन्य संतों के पास इन दिनों काफी पैसे हैं।यदि ये संत अपने कुछ पैसे खर्च करके जहां तहां कुछ ही संख्या में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगवा देते तो संबंधित सरकारों को थोड़ी शर्म आती। इससे इन संत लोगों को सरकारों से ऐसी ही मांग करने का कुछ और नैतिक अधिकार मिल जाता।एक बात और है। संबंधित सरकार के सहयोग से स्वामी राम देव या कोई अन्य संत कहीं वाटर ट्रीटमेंठ प्लांट लगाएंगे तो उस प्लांट की गुणवत्ता भी बेहतर होगी ।क्या राम देव जी को तुलसी दास की वह बात याद हैजिसमें उन्होंने कहा था,‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरही ते नर न घनेरे ।’राम देव जी महाराज जब मंच पर बैठ कर खुद आसन-प्राणयाम करके लोगों को सिखाते हैं तभी लोगांे ंपर उसका भारी असर होता है।

जामिया मिलिया की छवि दांव पर
दिल्ली में आतंकी गतिविधि में शामिल आरोपितों को जामिया मिलिया के वी।सी.मुशीरूल हसन ने जामिया मिलिया के खर्चे पर कानूनी सहायता देने का निर्णय किया है। भारत में हो रही आतंकवादी घटनाओं के बारे में मुशीरूल साहब क्या सोचते हैं,यह बात खुद उन्होंने गत 22 सितंबर 2008 को सार्वजनिक रूप से बताई है। उन्होंने एन.डी.टी.वी. के कार्यक्रम में कहा कि ऐसी आतंकवादी घटनाएं इसलिए हो रही हैं क्योंकि भारत का मुस्लिम समुदाय यहां खुद को अलग थलग महसूस कर रहा है।उन्होंने सच्चर कमेटी की रपट का जिक्र करते हुए कहा कि मसलमानों की आर्थिक दशा काफी खराब है। मुशीरूल हसन के इस तर्क से यह बात स्पष्ट होती है कि आतंकवादी गतिविधियों में शामिल आरोपित ‘अलग-थलग पड़े’ मुस्लिम समुदाय की ओर से हिंसक लड़ाई लड़ रहे हैं।जबकि इस देश में आतंकी कार्रवाइयों में लिप्त सिमी और इंडियन मुजाहिदीन के जेहादी बार बार लिख लिख कर और बयान दे देकर यह खुलेआम कह रहे हैं कि वे भारत में इस्लामी शासन कायम करने के लिए लड़ रहे हैं। वे खलीफा का राज चाहते हैं। अब इन बातों का यहां अधिक व्याख्या करना जरूरी नहीं है। पाठक खुद समझ लें कि अंततः कौन क्या चाहता है। हा, एक सवाल मुशीरूल हसन से पूछा जा सकता है।वह यह कि वे जिन आतंकवादियों को कानूनी सहायता दे रहे हैं, वे यदि अदालत से दोषी करार दे दिए गए तो फिर जामिया मिलिया की पूरी दुनिया में कैसी छवि बनेगी ? क्या उसकी वह छवि बनी रह पाएगी जैसी छवि की कल्पना उसके कभी के उसके एक कुलपति जाकिर हुसेन ने की थी ?

नक्सली और इंडियन मुजाहिदीन
दिल्ली के जामिया नगर में हुई आतंकी-पुलिस मुंठभेड़ के बाद कुछ लोगों के द्वारा नक्सलियों से इन आतंकियों की तुलना की जाने लगी है।कहा जा रहा है कि नक्सली भी तो समाज की मुख्य धारा से अलग- थलग पड़े मुख्यतः दलितों और आदिवासियों को गोलबंद करके उनके लिए हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे हैं ! पर यह तुलना गलत है। इंडियन मुजाहिदीनों और नक्सलियों के चरित्र में मूल अंतर हैं।नक्सलियों ने न सिर्फ दलित-आदिवासी के लिए, बल्कि समाज के करीब अस्सी प्रतिशत गरीब लोगों के लिए लड़ाई शुरू की है।वे इस देश पर सर्वहारा का शासन चाहते हैं। इस देश में अस्सी प्रतिशत सर्वहारा हैं जिनकी रोज की औसत आय मात्र बीस रुपए है। यानी वे बहुमत का शासन चाहते हैं।पर इंडियन मुजाहिदीन कुरान के उपदेशों के आधार पर अल्पसंख्यक का बहुमत पर शासन कायम करना चाहते हैं जैसा कि मध्य युग में यहां था।यह बात उनके साहित्य और बयानों में है जिसे मुशीरूल हसन जैसे बुद्धिजीवी जानबूझकर या अनजाने में नजरअंदाज कर रहे हैं।हालांकि यहां नक्सलियों के तरीके का समर्थन नहीं किया जा रहा है।एक बात और याद रखने की है।जब नक्सलियों की धरपकड़ के सिलसिले में उनके छिपे हुए स्थानों में पुलिस या अर्ध सैनिक बल धावा बोलते हैं और मुंठभेड़ें होती हैं और कुछ निर्दोष लोगों को भी क्षति पहुंचती है,तो उन स्थानों और उसके आसपास के लोगों की वैसी ही प्रतिक्रिया नहीं होती जैसी प्रतिक्रिया इन दिनों जामिया नगर और आसपास के कुछ लोगों की हो रही है।

दिन में कहीं, रात में कहीं और
राजनीति में भीतरघाती पहले भी हुआ करते थे,पर अब उनकी संख्या काफी बढ़ गई है। राजनीति में पैसे का बोलबाला बढ़ने और किसी तरह के आदर्श के लोप होतेे जाने के कारण ऐसा हुआ है। बिहार में किस दल का कौन नेता दिन में कहां है और रात में कहां रहता है, इसका पता ही नहीं चल रहा है। अपने दलीय सुप्रीमो से विश्वासघात करने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। कुछ सुप्रामों भी परेशान हैं।पर उन्होंने भी जब मौका आया था तो अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपने कैरियर निर्माताओं के साथ इसी तरह विश्वासघात किया था। छोटे नेता अपने बड़े नेताओं को अब उसी लहजे में जवाब दे रहे हैं।कहते हैं कि एक गति से चलना गधे का गुण होता हे। होशियार व्यक्ति तो जिस सीढ़ी के जरिए छत पर चढ़ता उस सीढ़ी को ढोए नहीं फिरता। यह बात और है कि जब वह छत से गिरता है तो उसे चोट बहुत लगती है। यह हर पेशे में है।पर राजनीति जबसे सेवा के बदले पेशा हो गई है, तब से इसमें यह अधिक है। हालांकि आज भी राजनीति में कई अच्छे लोग भी हैं। अगले लोक सभा चुनाव में बिहार का कौन सा नेता कहां से लड़ेगा, यह ठीक नहीं है। इस आशंका में टिकटार्थियों द्वारा लाॅयल्टी बदलने की प्रक्रिया तेज है। कोसी प्रलय को लेकर नेताओं और दलों के बीच आरोप प्रत्यारोप का जो दौर चल रहा है उसमें तो कई नेता अपने ही सुप्रीमो के खिलाफ उनके राजनीतिक विरोधियों को दबे छिपे सूचना, ‘मसाला’ व तर्कों से लैस कर रहे हैं।
तापमान (अक्टूबर, 2008)

चुनावी टिकट की शर्त

मध्य प्रदेश की कांग्रेस पार्टी ने एक अनुकरणीय काम किया है। उसने अपने वैसे सदस्यों को दो पेज का एक फार्म धराया है जो अगले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस का टिकट चाहते हैं। चुनाव इसी साल होने वाला है। उस फार्म में क्षेत्र के भाजपा विधायकों, मंत्रियों और प्रमुख भाजपा नेताओं के भ्रष्टाचार की तथ्यपूर्ण जानकारियां भर कर देनी हैं। जो कांग्रेसी नेता ऐसी तथ्यपूर्ण जानकारियां देगा, उसको टिकट मिलने की संभावना रहेगी। कांग्रेस ने मध्य प्रदेश विधान सभा के चुनाव में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाने का फैसला किया है। कांग्रेस कह रही है कि मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चैहान तथा उनके मंत्रिमंडल के 14 सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं। उधर भाजपा की मध्य प्रदेश इकाई ने जवाबी हमला करते हुए कहा है कि यदि कांग्रेस ने अपने इस फार्म को टिकट का आधार बनाया तो हम अपने कार्यकर्ताओं से कहेंगे कि हमें मध्य प्रदेश से किसी एक ईमानदार कांग्रेसी नेता, पूर्व मंत्री या पूर्व या वत्र्तमान विधायक का नाम बताओ और इनाम में भाजपा का टिकट ले जाओ। अच्छा होता कि बिहार की सत्ताधारी पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं से कहतीं कि सरकारी भ्रष्टाचार का मामला सबूत के साथ पकड़ो और इस तरह अगले चुनाव में टिकट पाने या फिर और कोई पद पाने की योग्यता हासिल करो। याद रहे कि बिहार की इन दिनों सबसे बड़ी समस्या सरकारी भ्रष्टाचार है जिस पर चाहते हुए भी नीतीश कुमार काबू पाने में असमर्थ हैं।

एक आंख-खोलू आंकड़ा
नब्बे के दशक तक इस देश में सिर्फ 18 लोग ऐसे थे जिनकी संपत्ति एक हजार करोड़ रुपए या उससे अधिक थी। आज ऐसे लोगों की संख्या बढ़ कर 533 हो चुकी है जिनमें प्रत्येक की संपत्ति चार हजार करोड़ रुपए या उससे अधिक है। दूसरी ओर इस देश में ऐसे लोगों की संख्या 84 करोड़ पहुंच चुकी है जिनकी रोज की औसत आय मात्र बीस रुपए है। इन 84 करोड़ लोगों में से 24 करोड़ लोगों की रोज की आय तो सिर्फ 9 रुपए है। यह सरकारी आंकड़ा है किसी प्रतिपक्षी नेता का आंकड़ा नहीं है।इस बढ़ती विषमता के कारण बढ़ रहे असंतोष को सरकार कैसे संभालेगी,यह देखना महत्वपूर्ण होगा।अभी तो इस देश के पक्ष-विपक्ष के अधिकतर नेतागण लोकतंत्र को नोट-तंत्र में पूरी तरह बदल देने के काम में लगे हुए हैं। नौ रुपए रोज की आय वाले अति गरीबों की ओर उनका ध्यान कभी जाएगा भी या नहीं, यह भी एक बड़ा सवाल है।

चारा घोटाला केस में आगे क्या ?
चारा घोटाले में आरोपितों को इन दिनों कोर्ट से धुआंधार सजाएं मिल रही हैं। आईएएस अफसरों को भी सजाएं मिल रही हैं। एक वर्तमान और एक सेवानिवृत आईएएस अफसर को निचली अदालत सजा दे चुकी है। अन्य आरोपित आईएएस अफसर भी शायद सजा से नहीं बचें। संकेत तो यही है। पहले आईएएस अफसरों का समाज में भी बड़ा सम्मान था। पर बाद के दिनों में जब इस देश व प्रदेश के अनेक आईएएस अफसर भ्रष्ट नेताओं के साथ मिलकर देश-प्रदेश को लूटने के धंधे में लग गए, तो उनकी अब वह इज्जत समाज में नहीं है जो कभी थी। साथ-साथ जब ऐसे लोगों को कोर्ट से सजा मिलती है तो इनके नाम पर कोई रोने वाला भी नहंीं मिलता है। 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले से संबंधित कुल 53 मुकदमे दायर हुए थे। इन में से अब तक 28 मुकदमों में फैसला आ चुका है। सभी मामलों में अधिकतर आरोपितों को सजाएं मिली हैं। इन मुकदमों को करीब से देखने वाले लोगों का अनुमान है कि बाकी 25 मामलों में भी कोई अलग फैसला नहीं होने वाला है। इन में से कई ऐसे मुकदमे फैसला का इंतजार कर रहे हैं जिनमें कई नेतागण आरोपित हैं। उनका क्या होगा ? बिहार व झारखंड के अनेक लोगों की आंखें उन मुकदमों की ओर लगी हुई हैं। सजल चक्रवर्ती को सजा की मात्रा पर सुनवाई के दौरान सी।बी.आई. के वकील ने अदालत से यह अपील की थी कि वरीय अधिकारियों द्वारा किए गए अपराध के मामलों में नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।यानी सी.बी.आई.यह कह रही थी कि जिसकी जितनी बड़ी जिम्मेदारी, गलती होने पर उसको उतनी ही अधिक सजा मिलनी चाहिए। तभी अन्य लोग भ्रष्टाचार करने से डरेंगे। देखना है कि आरोपित नेताओं का क्या होता है और उनके केस का कब फैसला होता है! क्या अगले लोक सभा चुनाव से ठीक पहले उन नेताओं के केस का फैसला होगा ? यह तय तो नहीं है, पर शायद संयोग से उसी समय फैसला हो ! फिर तो फैसले के अनुसार पक्ष विपक्ष को उसका राजनीतिक लाभ मिलना तय है। क्योंकि अब भी जन मानस में कोर्ट के किसी फैसला के लिए सम्मान का भाव मौजूद है।

शाबास मायावती !
राजनीति में बढ़ते प्रदूषण को कम करने में मायावती की भले कोई रूचि नहीं हो,पर नदियों के प्रदूषण को रोकने की दिशा में उत्तर प्रदेश की दबंग मुख्यमंत्री ने हाल में ठोस कदम उठाया है। बिहार सहित अन्य प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों को कम से कम इस मामले मेंे मायावती से शिक्षा लेनी चाहिए। लखनऊ के पास से बह रही गोमती नदी को पूरी तरह प्रदूषणमुक्त करने के लिए मायावती सरकार ने फिलहाल 170 करोड़ रुपए की राशि मंजूर की हैं। लखनऊ में सीवेज शोधन संयंत्र का शिलान्यास हो चुका है। बन कर तैयार हो जाने पर 34 करोड़ 50 लाख लीटर दूषित जल का हर दिन शोधन होगा। यानी, लखनऊ के गंदे नालों का पानी शुद्ध बन कर ही गोमती में गिरेगा। उम्मीद है कि मायावती जल्दी ही गंगा को भी प्रदूषणमुक्त करने के लिए ऐसा ही कदम उठाएगी। इस तरह यदि उत्तर प्रदेश में गंगा और गोमती साफ हो गई तो फिर तो बंगाल, बिहार और दिल्ली की सरकारों पर भी ऐसा करने के लिए जन-दबाव पड़ेगा।

एक पुस्तक की प्रतीक्षा
कल्पना कीजिए कि जवाहर लाल नेहरू और डा श्रीकृष्ण सिन्हा ने एक दूसरे को अपने पत्रों में क्या-क्या लिखा होगा। एक ने दूसरे को अनेक पत्र लिखे थे। वे पत्र अब तक अप्रकाशित हैं। पता चला है कि उन पत्रों की प्रतियां बिहार सरकार के पास भी नहीं हैं। डा श्रीकृष्ण सिंह का अपने सचिव को संभवतः यही निदेश था। इन पत्रों को अलग से पुस्तकाकार छपवाया जा रहा है। उस पुस्तक का जल्दी ही लोकार्पण होगा। राजनीति के पतन के इस दौर में यह पढ़ना दिलचस्प होगा कि गांधी युग के उन दो महारथियों ने एक दूसरे को क्या- क्या लिखा था।
तापमान (अगस्त, 2008)

कहां से आए नया दल नया नेता

इस देश में एक नए दल और नए नेतृत्व की जरूरत तीव्रता से महसूस की जा रही है। ऐसा दल जो आर्थिक मामलों में गरीबपक्षी हो, पर देश की एकता - अखंडता को लेकर राष्ट्रवादी हो। कम्युनिस्ट गरीबपक्षी हैं, तो देश की सुरक्षा को लेकर वे लापारवाह हैं। उनमें अंतरराष्ट्रीयतावाद का पुट जरूरत से काफी अधिक है। जबकि दुनिया के अन्य देशों के कम्युनिस्ट पहले अपने देश के हित को देखते हैं। बाद में ही उन्हें अन्य देशों का या वहां के कम्युनिस्टों का ध्यान आता है। भाजपा राष्ट्रवादी जरूर है, पर गरीबों के लिए वह अपेेक्षाकृत कम ही सोचते और करते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ वे अब पहले जैसे निर्मम नहीं रहे।जबकि कम्युनिस्ट दलों में अब भी ईमानदार नेताओं और कार्यकत्र्ताओं की भरमार है। कभी डा राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जनसंघ राष्ट्रवादी है, तो गरीबपक्षी नहीं है। कम्युनिस्ट गरीब पक्षी हैं तो राष्ट्रवादी नहीं। इस देश के कम्युनिस्ट अपने देश देश की सीमाओं के प्रति लापारवाह हैं।भारत पर 1962 में हुए चीनी हमले को लेकर यहां के कम्युनिस्टों के चीनपक्षी व्यवहार को लोहिया ने देखा था। दुर्भाग्यवश डा लोहिया का नाम लेने वाले अधिकतर लोहियावादियों के क्रियाकलापों को देखकर तो आज यही लगता है कि वे न तो राष्ट्रवादी हैं और न ही गरीबपक्षी। एक अच्छी बात यह हुई है कि कम्युनिस्टों ने पिछले दिनों भारत सरकार पर दबाव डाल कर इस देश की आर्थिक नीतियों में कई महत्वपूर्ण प्रस्तावित बदलाव को रोक दिया। मन मोहन सिंह की सरकार बदलाव चाहती थी। इसी का नतीजा है कि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी के कुप्रभाव में उतना नहीं आया जितना कुछ अन्य देश आ चुके हैं। इसके लिए कम्युनिस्टों की सराहना की जानी चाहिए। पर, ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में जारी वैश्विक जेहादी हमलों को लेकर इस देश के कम्युनिस्ट ऐसी भूमिका निभा रहे हैं जिससे आतंकवादियों को ही परोक्ष रूप से मदद मिल रही है। अपनी इस शर्मनाक भूमिका पर शायद कम्युनिस्ट बाद में पछताएंगे। पर तब तक तो देर हो चुकी होगी।कांग्रेस अब इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस तो रही नहीं। इंदिरा गांधी तो दोनों तरह के अतिवादियों पर करारा हमला करती थीं।भाजपा का रुख ओसामा बिन लादेन के बंदों के खिलाफ सही जान पड़ता है। ऐसी स्थिति में इस देश में एक राष्ट्रवादी और गरीबपक्षी दल की सख्त जरूरत है। पर,उसके लिए जिस तरह के प्रभावशाली नेता की जरूरत है, वैसा नेता अभी इस देश में दिखाई नहीं पड़ रहा है। शायद अगली किसी आंदोलन, विपत्ति या संकट से वैसा नेता पैदा हो जाए !



नीतिगत बदलाव के खतरे

एक समय था जब इस देश में पहले जनसंघ और बाद में भाजपा के लोग आक्रमणशील राष्ट्रीयता की नीति में विश्वास करते थे। दूसरी ओर, आजादी के पहले की मुस्लिम लीग के लोग और कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीयतावाद में भरोसा रखते रहेे। कम्युनिस्ट कहते रहेे कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हो।’ आजादी के पहले की मुस्लिम लीग के लोग या फिर उस तरह का विचार रखने वाले आज के लोग दुनिया भर के मुस्लिमों के बीच भाईचारे में विश्वास करते रहे हैं। सन् 1947 में मुस्लिम लीग ने देश का बंटवारा करा दिया। अब भी मुस्लिम लीग की नीतियों में भरोसा रखने वाले लोग भारत में मौजूद हैं। आजाद भारत में करीब बीस साल पहले तक कांग्रेस पार्टी की नीति इन दोनों अतियों के बीच की थी। पर मिली -जुली सरकारों के दौर शुरू होते ही कांग्रेस ने अपनी पोजिशन बीच से खिसका कर वाम दल और मुस्लिम लीग की तरह की नीतियों के करीब कर ली। इस बदलाव के अपने खतरे हैं। उन खतरों से यह देश इन दिनों आए दिन रू ब रू हो रहा है। मुम्बई हमले के बाद शायद कांग्रेस की इस नीति में शायद बदलाव हो ! पर अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।क्योंकि सवाल वोट का जो है !आगे -आगे देखिए, होता है क्या !



चुनाव का एक नतीजा यह भी

हाल में देश के पांच राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव नतीजे सामने आए। मिजोरम की स्थिति तो विशेष है। उसे छोड़ दें तो बाकी चार राज्यों में कौन जीता और कौन हारा ? इस संबंध में अनेक विश्लेषण सामने आए। पर एक अलग तरह का विश्लेषण यहां पेश है। कल्पना कीजिए कि इन चारों राज्यों को मिला कर कभी एक ही राज्य बना दिया जाए तो क्या होगा ?फिर तो संयुक्त प्रदेश में भाजपा की ही सरकार बन जाएगी। क्योंकि इन चारों राज्यों में कुल मिला कर भाजपा ने विधान सभा की 295 सीटें जीती हैं। कांग्रेस को कुल मिला कर 246 सीटें ही मिलींं। हालांकि किन्हीं राज्यों के विलयन का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता, पर लोक सभा का चुनाव तो देश भर में एक ही साथ होना है। यानी विश्लेषण का यह नतीजा पूरी तरह सही नहीं लगता है कि हाल के विधान सभा चुनावों में भाजपा हार गई और कांग्रेस जीत गई।



कंधार पर अकारण अपराध बोध

28 दिसंबर, 1999 के दैनिक ‘ हिंदुस्तान ’ के पहले पेज पर एक खबर छपी थी। उसे हू ब हू यहां दिया जा रहा है, ‘देश के प्रमुख राजनैतिक दलों ने इंडियन एयरलाइंस के अपहृत विमान के यात्रियों और चालक दल की सकुशल रिहाई के लिए आवश्यक कदम उठाने का सरकार को सुझाव दिया है। इन दलों के नेताओं ने कहा कि संकट की इस घड़ी मेंे वे सभी एक हैं, मगर पल -पल बदलते घटनाक्रम के मद्दे नजर जरूरी कदम उठाने का फैसला तो सरकार ही ले सकती है। प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा बुलाई गई इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह,माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महा सचिव हर किशन सिंह सुरजित,भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जे।चित रंजन, समाजवादी पार्टी के अमर सिंह सहित कई प्रमुख नेताओं ने भाग लिया।सरकारी पक्ष से गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री जसवंत सिंह, नागरिक विमानन मंत्री शरद यादव , संसदीय कार्य मंत्री प्रमोद महाजन और संचार मंत्री राम विलास पासवान भी बैठक में मौजूद थे।तेलुगु देशम के येरन नायडु और जम्मू कश्मीर के मुख्य मंत्री फारूख अब्दुला भी बैठक में उपस्थित थे। बैठक में श्री वाजपेयी ने विपक्षी नेताओं को सारे घटना क्रम की विस्तृत जानकारी दी और आगे की रणनीति पर उनसे विचार विमर्श किया।’ यह बैठक 27 दिसंबर 1999 को हुई थी। कंधार विमान अपहरण कांड को लेकर आए दिन आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है। कांग्रेस तथा अन्य कुछ विपक्षी दल एनडीए खास कर भाजपा पर यह आरोप लगाते रहते हैं कि उसकी सरकार के विदेश मंत्री जसवंत सिंह तो अपने साथ विमान में ले जाकर आतंकवादी मसूद अजहर को कंधार छोड़ आए। ऐसे में भाजपा आतंकवाद के खिलाफ क्या लड़ेगी ? अब जरा उस समय की स्थिति पर विचार करें। करीब दो सौ बंधकों के साथ एयर इंडिया के विमान का अपहरण कर आतंकवादी ऐसे देश में ले गए थे जहां तालिबानियों का शासन था। उस सरकार के साथ भारत का कोई राजनयिक संबंध भी नहीं था। इधर पौने दो सौ बंधकों के रिश्तेदार दिल्ली में सरकार की नाक में दम किए हुए थे। वे दबाव डाल रहे थे कि चाहे देश को ही क्यों न ‘बेचना’ पड़,े पर हमारे रिश्तेदार सुरक्षित आने चाहिए। विपक्षी दलों की चिंता भी बंधकों की सुरक्षा में थी। कांग्रेस या किसी दल के किसी नेता ने अटल सरकार से तब यह नहीं कहा था कि चाहे बंधक मार ही क्यों न दिए जाएं, पर अजहर को रिहा नहीं किया जाना चाहिए। वे तो अटल सरकार को खुली छूट देकर सर्वदलीय बैठक से आए थे कि चाहे जो कुछ हो बंधकों की जानें नहीं जानी चाहिए। इस पृष्ठभूमि मेंे मसूद अजहर रिहा किया गया। अब इस देश की राजनीति के दोगलेपन का हाल तो देखिए। जिस फैसले में खुद प्रतिपक्षी दल शामिल हों, उसी फैसले को लेकर सरकार की बाद में सार्वजनिक रूप से आलोचना होगी ? यह कैसी परंपरा है ?

तापमान (जनवरी, 2009)

पुलिस की देशभक्ति

इस देश के कुछ वोटबाज नेताओं के बीच इस बात को लेकर सार्वजनिक तौर पर अब भी बहस जारी है कि सिमी एक निर्दोष संगठन है या राष्ट्रद्रोही । पर, दूसरी ओर इसी देश की पुलिस ने एकजुट होकर काफी मेहनत से यह खोज निकाला है कि इस देश के कई नगरों में हाल में जो बम विस्फोट हुए हैं, उनमें सिमी के लोग शामिल थे। हालांकि इस खोज में अग्रणी भूमिका गुजरात पुलिस ने निभाई क्योंकि उनके राज्य में ही हाल में सर्वाधिक राष्ट्रद्रोही घटनाएं हुई,पर इस काम में देश के अन्य राज्यों की पुलिस ने भी पेशेवर तरीके से व्यवहार करते हुए गुजरात पुलिस की मदद की।उन राज्यों में वे राज्य भी शामिल हैं जहां भाजपा या एन।डी.ए.की सरकार नहीं है।यहां तक कि केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियों ने भी गुजरात पुलिस को इस खोज बीन में भरपूर सहयोग दिया। यानी, चूंंकि पुलिस को किसी से वोट नहीं लेना होता है, इसलिए वे देशहित को ध्यान में रख कर अपना काम कर रही है। भले पुलिस पर जहां तहां आम जनता पर जुल्म करने व रिश्वतखोरी में लिप्त होने का आरोप लगें ,पर देशहित के मामले में वे इस देश के कई बड़े नेताओं से बेहतर साबित हुए हैं।क्या जयचंदी मानसिकता वाले वैसे नेताओं को अब भी शर्म आएगी ? सिमी के नेता खुद सार्वजनिक रूप से इस देश को बर्बाद करने का एलान करते रहे हैं। पर, हमारे देश के कुछ तथाकथित सेक्यूलर नेता उन्हें निर्दोष घोषित करते -फिरते हैं। 30 सितंबर ,2001 के टाइम्स आफ इंडिया में अहमदाबाद में सिमी के जोनल सेक्रेर्टी साजिद मंसूरी का बयान छपा था।मंसूरी ने कहा था कि ‘जहां भी हम सत्ता में आएंगे,हमलोग मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बनाएंगे।’उसी अखबार से बातचीत मेंं सिमी के बिहार जोन के सचिव रियाजुल मुसाहिल ने कहा था कि ‘अगर भारतीय संविधान का कुरान से टकराव होता है तो हम संविधान को नहीं मानेंगे।’ सिमी अपने लिटरेचर में लिखता है कि उसे एक और गजनी का इंतजार है।वह इस देश में खलीफा का शासन स्थापित करना चाहता है।

कहां हैं एक लाख बंगला देशी ?
यह किसी का अनुमान नहीं बल्कि एक जिम्मेदार पुलिस अफसर का बयान है। मेघालय पुलिस के ए।डी.जी. कुलवीर कृष्णा ने हाल में यह रहस्योद्घाटन किया है कि बंगला देश से आए करीब एक लाख नागरिक भारत में आकर गुम हो गए हैं। उन लोगों ने वैध पासपोर्ट व वीसा के सहारे भारत में प्रवेश किया था,पर अब उनका कोई अता -पता नहीं हैं। हाल में गुवहाटी हाई कोर्ट के एक निर्णय से एक और सनसनीखेज खुलासा हुआ है।पता चला है कि सन् 1996 के असम विधान सभा चुनाव में एक पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद कमरूद्दीन ने जमुना मुख क्षेत्र से असम विधान सभा का चुनाव भी लड़ा।हाई कोर्ट ने बंगला देशी घुसपैठियों की समस्या की चर्चा करते हुए अपने जजमेंट में कहा कि ऐसा सिर्फ असम में ही संभव है।कमरूद्दीन के पास पाकिस्तानी पासपोर्ट था।वह पहले पाकिस्तान से बंगला देश आया और फिर अवैध तरीके से असम में घुस गया। ये एक लाख लोग उन लोगों के अलावा है जो अवैध तरीके से भारत में प्रवेश करते रहते हैं।याद रहे कि इन एक लाख गुम बंगलादेशियों को लेकर उन नेताओं ने अब तक कोई चिंता नहीं व्यक्त की है जो वोट बैंक के सौदागर हैं और सिमी पर प्रतिबंध का विरोध करते हैं।यह सब अपने ही देश में संभव है।आए दिन यह खबर आती रहती है कि भारत में जो बम विस्फोट हो रहे हैं,उनमें हुजी का हाथ है।खुफिया एजेंसियां बताती हैं कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई.,बंगला देशी खुफिया एजेंसी डी.जी.एफ.आई.और सिमी सब आपस में मिले हुए हंै।उनका उद्देश्य है कि भारत में एक हजार ‘घाव’ करना है।हजार घाव का नारा एक पाकिस्तानी नेता ने तब दिया था जब बंगला देश की मुक्ति वाहिनी को भारत ने मदद की थी और बंगला देश बना था।

अवैध घुसपैठ की समस्या
सन् 1971 में जब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना का जुल्म जारी था तो वहां से करीब एक करोड़ शरणार्थी भाग कर भारत आ पहुंचे थे।तत्कालीन बहादुर प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने शेख मुजीबुर रहमान की मुक्ति वाहिनी को इसलिए भी मदद की थी ताकि एक करोड़ शरणार्थी वापस जा सकें। वे हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए थे। पर आज दो से तीन करोड़ बंगला देशी अवैध तरीके से भारत में घुसपैठ कर चुके हैं और उनका आना जारी है।इस काम में इस देश के सीमा सुरक्षा बल के भ्रष्ट जवान व अफसर भी घुसपैठियों की मदद करते हैं क्योंकि उसके बदले उन्हें रिश्वत मिलती है। यह मांग पुरानी है कि भारत-बंगला देश की पूरी सीमा पर मजबूत बाड़ लगा दिए जाएं।पर इस काम में इसी देश के कुछ तत्व बाधक रहे हैं। एक बार एक निजी चैनल पर इस समस्या पर चर्चा चल रही थी।उसमें इस देश के एक पूर्व विदेश सचिव भाग ले रहे थे।चर्चा में यह सुझाव आया कि बंगला देश सीमा पर मजबूत बाड़ लगा दिए जाने चाहिए। @अब तो नेपाल सीमा पर भी बाड़ लगाने की जरूरत पड़ेगी।@इस पर पूर्व विदेश सचिव ने कहा कि सीमा पर बाड़ लगाने से दुनिया भर में हमारे देश की छवि खराब होगी।इस पर संजय निरूपम ने कहा कि लगता ही नहीं है कि आप भारत के विदेश सचिव थे या बंगला देश के ? पूर्व विदेश सचिव महोदय की बोलती बंद हो गई।पर वे अकेले नहीं हैं जो ऐसा सोचते हैं।भारत से सटे बंगला देश की सीमा 272 किलो मीटर है।हाल में बाड़े लगे हैं।पर अब भी पूरी सीमा की घेरेबंदी नहीं हो पाई है। बी।एस.एफ.के जवानों व अफसरों पर भारत सरकार सख्त कार्रवाई क्यों नहीं करती जो थोड़े से पैसे लेकर बंगला देशियों को भारत में प्रवेश कराते जा रहेे हैं ?

अपने भोला बाबू !
बिहार के नगर विकास मंत्री डा।भोला सिंह प्रभावशाली वक्ता हैं और मिलनसार और समझदार भी। निजी बातचीत में भी वे प्रभावित करते हैं।पर, हाल में पता नहीं क्यों वे गच्चा खा गए। पटना में नागरिक सुविधाओं को लेकर पटना हाई कोर्ट की एक टिपपणी पर भोला बाबू नाहक उखड़ गए।उन्होंने हाईकोर्ट को ही नसीहत दे डाली। पटना हाई कोर्ट पर बोलते समय नगर विकास मंत्री को याद ही नहीं था कि कुछ ही दिन पहले उन्होंने नगर निगम के कुछ काहिल व भ्रष्ट कर्मचारियों के बारे में खुद उन्होंने क्या कहा था। भोला बाबू ने भारी जल जमाव से दुखी होकर कहा था कि ‘पटना के संप हाउस के आपरेटर से जब कहा जाता है कि संप चालू करोे, तो लगता है कि उसके घर में कोई मर गया है।जब तक संप हाउस पर मैं रहा, तब तक तो वह चला,पर मेरे वहां से हटते ही बंद कर दिया गया।’ जाहिर है कि डिजल की चोरी के लिए संप नहीं चलते और लोग जल जमाव से पीडि़त होते रहते हैं।ऐसे नगर निगम के कामांे का बचाव करते हुए हाई कोर्ट पर टिप्पणी कर देने से भोला बाबू की छवि प्रभावित हुई है।यह तो अच्छा हुआ कि मुख्य मंत्री ने हाईकोर्ट के बचाव में बयान दे दिया। उम्मीद है कि भोला बाबू अब सावधानी बरतेंगे।
तापमान (सितंबर, 2008)

हमलावरों ने सदा उठाया हमारे मतभेदों का लाभ

‘मुसलमानों के आने से ठीक पहले पंजाब से दक्षिण तक और बंगाल से अरब सागर तक करीब -करीब सारा देश अलग -अलग राजपूत सरदारों के शासन में आ गया। किंतु कोई प्रधान केंद्रीय शक्ति इन सब छोेटी -बड़ी रियासतों को एक सूत्र में बांधने वाली न थी। आए दिन इन तमाम रियासतों के बीच अपना- अपना राज बढ़ाने के लिए एक दूसरे से संग्राम होते रहते थे।देश की राजनैतिक और राष्ट्रीय एकता स्वप्न मात्र थी।’ ये बातें सुंदर लाल ने अपनी इतिहास प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ में लिखी है। पहली बार 1929 में प्रकाशित इस पुस्तक पर अंग्रेज शासक ने प्रतिबंध लगा दिया था।इस प्रतिबंध का विरोध करते हुए महात्मा गांधी ने लोगों को सलाह दी थी कि वे कानून तोड़ कर इस पुस्तक के अंश को छापें और इसका वितरण करें। सुंदर लाल ने अंग्रेजी राज के विवरण से पहले यहां इस्लाम और मुस्लिम हमलावरों का विवरण किया है और उनके अच्छे -बुरे पहलुओं का व्योरा दिया है।आज के भारत में जिस तरह राष्ट्रीय मसलों पर भी यहां तक कि इस देश के खिलाफ जारी छद्म युद्ध पर भी यहां के विभिन्न नेताओं व शासकों में जिस तरह अनेकता दिखाई पड़ रही है,उसी तरह के हालात का विवरण भी सुंदरलाल की पुस्तक में है। सुंदर लाल लिखते हैं, ‘सिंध पर मोहम्मद बिन कासिम के हमले के तीन सौ साल बाद महमूद गजनवी के हमलों का समय आया।गजनवी ने यहां आकर कुछ नगरों को बर्बाद किया। कुछ हिंदू नरेशों के साथ सुलह करके उन्हें सुरक्षा प्रदान की,कुछ मंदिरों को लूटा और कहा जाता है कि सोम नाथ पर हमला करके वहां की मूत्र्ति को तोड़ा और लूट का बहुत सा माल लेकर वापस गजनी की राह ली। सोम नाथ पर गजनवी के हमले की सच्चाई के बारे में प्रामाणिक इतिहासज्ञों में जबर्दस्त मतभेद है। इसमें संदेह नहीं कि महमूद की सेना में हजारों सिपाही हिंदू थे। उसका एक प्रसिद्ध सेनापति हिंदू था जिसका नाम तिलक था।’ मोहम्मद गोरी के हमले के बारे में सुंदर लाल ने लिखा है कि ‘ मोहम्मद गोरी के भारत आने के समय भारत की राजनैतिक अव्यवस्था और बढ़ चुकी थी। तेरहवीं सदी तक सारे उत्तर भारत पर मुसलमानों का शासन जम गया। राजपूत नरेशों ने जगह -जगह अलग -अलग खासी वीरता के साथ उनका मुकाबला किया। किंतु उनमें किसी तरह की एकता या नीतिज्ञता बाकी न रह गई थी।इसके बाद धीरे- धीरे सौ साल के अंदर मैसूर तक अधिकांश भारत पर मुसलमानों की हुकूमत कायम हो गई।’ अंग्रेजों ने भारत को कैसे जीता, इसका विवरण प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार सर जे।आर।सिली ने अपनी पुस्तक ‘एक्सपैंसन आॅफ इंगलैंड’ में लिखा है । सिली के अनुसार, ‘भारत को विदेशियों द्धारा जीता हुआ शायद ही कहा जा सकता है। यह कहना अधिक संगत है कि खुद भारतीयों ने ही भारत को (हमारे लिए) जीता। 1757 से 1857 तक के सौ वर्ष लम्बेे समय में इस्ट इंडिया कंपनी की सेना में 16 प्रतिशत से अधिक अंग्रेज सिपाही कभी नहीं रहे।’ ‘केंद्रीय मुगल सत्ता का बिखराव के कारण भी ब्रिटिश सत्ता यहां जम गई। स्थानीय सामंत आपस में लड़ रहे थे। जनता अपने शासकों से जातीय, भाषागत और धार्मिक विद्वेष के कारण पूर्णतः अलगाव महसूस कर रही थी।’सर सिली की पुस्तक का हिंदी अनुवाद करवा कर चैधरी चरण सिंह ने यहां बंटवाया था। इसे बंटवाने का पूर्व प्रधान मंत्री लक्ष्य यह था कि भारतीय समाज में देशभक्ति का उदय हो,भारत की स्वाधीनता के प्रति उनका लगाव बढ़े और देश की एकता के लिए लोग इतिहास से प्रेरणा लें।वे कहते थे कि ‘सिकंदर से लेकर महमूद गजनवी तक और बाबर से लेकर राबर्ट क्लाइव तक भारत की हार के कारण स्पष्ट रूप से समान थे।’ आज भी आतंकवाद के रूप में भारत के खिलाफ जारी छद्म विदेशी युद्ध और उस पर भारत के विभिन्न नेताओं की परस्परविरोधी प्रतिक्रियाओं को देखते हुए मध्य युग की ही याद आती है । सन् 1985 में चैधरी चरण सिंह ने सिली की अनुदित पुस्तक बंटवाई थी।उस समय उस पुस्तक की भूमिका में चैधरी साहब ने जो कुछ लिखा था, उसे एक बार फिर से पढ़ लेना मौजूं रहेगा। वे लिखते हैं, ‘ आज भी एक नहीं बल्कि अनेक प्रकार की वे समान परिस्थितियां हमारे देश में मौजूद हैं जिनके कारण हमारा देश विदेशी सत्ता के सामने पराधीन हो गया था।आज की परिस्थितियों में केंद्रीय सत्ता देश को सुशासित तथा नियंत्रित करने की दिशा में उदासीन है अथवा अयोग्य है।इसलिए देश में एक कोने से दूसरे कोने तक तोड़फोड़ करने वाली अथवा विभाजित करने वाली प्रवृतियां उभर रही हैं। विदेशी शक्तियां इन परिस्थितियों से लाभ उठाने की प्रतीक्षा में ंबैठी हैं। देश की एकता, समृद्धि और प्रगति की ओर से उदासीन होकर नेतागण अपने अस्तित्व की रक्षा में संलग्न हैं।’
प्रभात खबर (28 नवंबर, 2008)

कंधार विमान अपहरण, पहले सहमति, फिर राजनीति

आतंकवादी हमलों को लेकर भारत के राजनीतिक दलों में आम सहमति तैयार करना आज भी टेढ़ी खीर है। पर, जिस बात पर कभी विभिन्न दलों के बीच एक खास परिस्थिति में सहमति बन भी जाती है,उस बात को लेकर भी बाद में असहमति जताना और राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करना, इस देश की राजनीति की फितरत बन चुकी है।यह बात लगभग सभी दलों पर लागू होती है।चिंताजनक बात यह है कि ऐसी राजनीति देश की रक्षा के मामलों में भी होती है। मुम्बई के ताजा आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में कंधार विमान अपहरण प्रकरण को एक बार फिर याद करना मौजूं होगा।कंधार अपहरण कांड यह बताता है कि हमारे हुक्मरान अपनी गलतियों से सीखने के लिए कत्तई तैयार नहीं हैं। पाकिस्तान समर्थित कश्मीरी आतंकवादियों ने 24 दिसंबर, 1999 को इंडियन एयर लाइंस के विमान 814 का अपहरण कर लिया।उसे वे कंधार यानी अफगानिस्तान ले गए।तब वह देश तालिबानियों के कब्जे में था। उस विमान के 152 यात्रियों ने आतंकियों ने बंधक बना लिया।कई दिनों के शर्मनाक ड्रामे के बाद हरकत उल अंसार के मौलाना मसूद अजहर तथा कुछ अन्य आतंकियों को रिहा करने के बदले अपहृत विमान के बंधक यात्रियों को छुड़ा लिया गया।आतंकियों को अपने साथ लेकर तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह कंधार गए थे। इससे पहले 27 दिसंबर 1999 को दिल्ली में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी।उस बैठक में ययह सहमति बनी थी कि बंधक यात्रियों को किसी भी कीमत पर बचाना है।पर जब कीमत दे दी गई तो उन्हीें दलों के नेतागण समय समय पर भाजपा और जसवंत सिंह पर ताने मारते रहते हैं कि आप भी तो मसूद अजहर को साथ लेकर कंधार गए थे।याद रहे कि विचारक और लोगों को प्रेरित करने में माहिर आतंकवादी अजहर कश्मीर के अनंतनाग में 1994 में गिरफ्तार किया गया था।हाल में फिल्म अभिनेता आमिर खान ने कहा है कि ‘मुझे और मेरे बच्चों को कुछ आतंकवादी बंधक बना लें तो मैं अपनी सरकार से यह कहने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहूंगा कि वह मेरी और मेरे बच्चों की परवाह न करें और और देश्श के व्यापक हित में आतंकवादियों को मार गिराए।’ काश,ऐसा ही साहस उन बंधकों के परिजनों ने दिखाया होताजोतब कंधार में थे।दुनिया के कई देश कभी ऐसे हालात में भी आतंकवादियों की शत्र्तें नहीं मानते।पर खुद अटल मंत्रिमंडल के सदस्य जसवंत सिंह और प्रमोद महाजन आपस में तू तू मैं मैं कर रहे थे।महाजन की शिकायत थी कि जसवंत जल्दी मसूद अजहर को लेकर कंधार क्यों नहीं जा रहे हैं। उधर दिल्ली में बंधकों के परिजन समूह बना कर सरकार की ऐसी तैसी कर रहे थे।वे चाहते थे कि जल्दी आतंकियों की शत्तें सरकार पूरी कर दे।सरकार ने कारगिल युद्ध के शहीदों की विधवाओं को उन रिश्तेदारों से बात कराई।विधवाएं कह रही थीं कि आतंकियों की शत्र्तें मानने पर और महिलाएं विधवा बनेंगीं।परउसका कोई असर उन परनहीं पड़ा।टी।वी।चैनल उन रिश्तेदारों के हंगामे का दृश्य दुनिया भर को दिखा रहे थे निरंतर। एक बंधक के रिश्तेदार डा.राजीव छिब्बर ने जसवंत सिंह से रोष भरे शब्दों में कहा कि ‘तब अपहृत रूबैया के बदले आतंकवादी छोड़े गए थे तो अब क्यों नहीं ?’ अब जरा तब की प्रशासनिक गलतियों से हाल की गलतियों की तुलना की जाए तो पता चलेगा कि गत नौ वर्षों में इस मामले में हमारी सरकार इस राह पर कायम हैं कि ‘हम नहीं सुधरेंगे।’ मुम्बई पर आतंकी हमले के बाद जिस तरह की खुफिया,सुरक्षा और प्रशासनिक विफलताएं की खबरें आईं,वे लोगो ंको याद ही होंगी।अब जरा कंधार कांड के समय की विफलताओं की चर्चा की जाए।तब के कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार पर आरोप था कि अपहरण की खबर मिल जाने पर भी बैठक बुलाने में देरी की।पी.एम.ओ.के प्रधान सचिव ब्रजेश मिश्र पर आरोप लगा कि विमान जब अमृतसर के पास फिर अमृतसर में था तब उसे उलझावपूर्ण संकेत भेजे। फैसले में देरी की। राॅ के पंमुख ए.एस.दौलत पर आरोप लगा कि अपहरण की खबर पाते ही चैकन्ना नहीं हुए। एन.एस. जी. प्रमुख निखिल कुमार ने राॅ की टीम के इंतजार में वक्त गंवाया।वात्र्ताकारों के बगैर एन.एस.जी.को अमृसर रवाना होना चाहिए था।याद रहे कि अमृसर जाने के लिए विशेष विमान इंतजार करता रहा,पर वात्र्ताकार नहीं पहुंचे।याद रहे कि अपहरणकत्र्ता विमान को काठमांडो से लखनउ,दिल्ली होते हुए अमृतसर ले गए थे।अमृसर में इंधन के लिए विमान रूका।फिर वे उसे कंधार ले गए।सरकार की सबसे बड़ी विफलता यह थी कि वह उस विमान को अमृतसर में अपने कब्जे में नहीं कर सकी।क्या इन गलतियों से भारत सरकार ने कोई शिक्षा ली हैं ?मुम्बई की ताजा घटना इसका नकारात्मक उत्तर देती है। प्रभात खबर (5 दिसंबर, 2008)

‘भ्रष्टाचार से आजादी’ की लड़ाई जरूरी

इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि मेरा पत्रकार जीवन उसी कालावधि में शुरू हुआ जब देश और इस प्रदेश की राजनीति में भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर प्रवेश करने लगा था। भ्रष्टाचार को फलत,े फूलते और बढ़ते हुए इन आंखों ने देखा है।प्रशासन में भीषण भ्रष्टाचार तो कुछ बाद में फैला। उससे पहले राजनीति व प्रशासन में भ्रष्टाचार दाल में नमक के बराबर था। यह सन् 1969-70-71 की कालावधि थी।यही समय तीव्र जनांदोलन के शुरू होने का ंभी है। पहले नक्सल आंदोलन और बाद में जेपी आंदोलन।इन्हीं जनांदोलनों में से निकले कई पत्रकार भी बाद में मुख्य धारा की पत्रकारिता में आए। ये पत्रकार अन्य राज्यों के पत्रकारों से थोड़ा अलग रहे।जनांदोलनों से निकले या उनसे प्रभावित पत्रकारों के दिलो- दिमाग में भ्रष्टाचार और सामाजिक व आर्थिक उत्पीड़न के खिलाफ गुस्सा था। बिहार की मीडिया के उस हिस्से की ओर से उसका जिस तीव्रता से विरोध शुरू हुआ,वैसा शायद ही किसी अन्य प्रांत में शुरू हुआ।मैं भी उस हिस्से का एक छोटा पात्र रहा।परिणामस्वरूप पत्रकार यहां सरकारी दमन के अपेक्षाकृत अधिक शिकार बने।कुछ व्यक्तिगत परेशानियां सामने आईं तो कुछ सामूहिक परेशानियां पैदा करने की कोशिश की गईं। अस्सी के दशक का बिहार प्रेस बिल इसका एक उदाहरण था।हालांकि यह सब मैंने मुख्य धारा की पत्रकारिता में आने के बाद देखा और झेला। काॅलेज छोड़ने के बाद शुरूआती दौर में तो मैंने मीर गंज से प्रकाशित साप्ताहिक ‘सारण संदेश’,पटना से प्रकाशित ‘लोकमुख’ तथा साप्ताहिक ‘जनता’ और दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ के लिए काम किया।सन् 1977 में मुख्य धारा की पत्रकारिता यानी दैनिक ‘आज’ में काम करना शुरू किया।उसके बाद चर्चित दैनिक ‘जनसत्ता’ और आखिर मेंं दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के पटना संस्करण में राजनीतिक संपादक के रूप में काम करने का सुअवसर मिला। इस दौरान मैंेने यह महसूस किया कि बिहार की गरीबी का मुख्य कारण यहां के प्रशासन और राजनीति में तेजी से बढ़ता भ्रष्टाचार ही है। हालांकि यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि पक्ष-विपक्ष की राजनीति और राज्य सरकार के सारे कत्र्ताधत्र्ता बेईमान ही रहे। उनमें भी कुछ ईमानदार व कुछ अत्यंत ईमानदार भी रहे और आज भी हैं,जो आम लोगों के बारे ही अधिक सोचते हैं, पर आम तौर पर कई कारणों से वे प्रभावकारी नहीं हो पाते। इन बेईमान लोगों को कत्र्तव्यनिष्ठ पत्रकारों से हमेशा ही वैर रहा।ऐसे लोगों की यह आम धारणा रही कि ‘पत्रकार चाहे तो मेरे विरोधी होंगे ,या फिर समर्थक।’उन्होंने बीच की किसी स्थिति की कल्पना ही नहीं की। यह भी कि ‘यदि विरोधी हैं तो मेरे राजनीतिक दुश्मन के इशारे पर ही अपना लेखन करते हैं।’ अपनी मुख्य धारा की पत्रकारिता के काल में बिहार की राजनीति के दो चर्चित व विवादास्पद दिग्गजों ने अलग-अलग अवसरों पर पटना से मेरी बदली अन्यत्र करवाने की काफी कोशिश की थी। पर, उन अखबारों का प्रबंधन उनके दबाव में नहीं आया। मुकदमे, धमकियां और अन्य तरह की प्रताड़नाएं तो आम बात रहीं। इस बीच एक दिलचस्प बात भी हुई। एक सज्जन ने जिन्होंने मुझ पर मानहानि का केस कर रखा था, मिलने पर स्वीकार भी किया कि ‘आपने तो सही ही लिखा है। पर, यदि मैंने आप पर केस नहीं किया होता तो अन्य पत्रकार भी मेरे खिलाफ लिखने लगते। पर एक बात जरूर है कि आपने जो कुछ लिखा है, मैं जानता हूं कि उसका सबूत आपके पास उपलब्ध नहीं है।’ उनकी यह बात सही थी। उन दिनों सबूत इकट्ठा करना कुछ अधिक ही कठिन था। आज अपेक्षाकृत आसान है जिसका लाभ आज के पत्रकार चाहें तो उठा सकते हैं। पर आज एक दूसरी कठिनाई पत्रकारों के सामने है। मुसीबत पड़ने पर पत्रकार को संकट से बचाने वाले मीडिया प्रबंधन की कमी होती जा रही है। जो सरकारी धन विकास और कल्याण के लिए आवंटित होते रहे, उनमें से बड़ी राशि को लूट लिया जाता है।सन् 1998 में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एन.सी.सक्सेना ने बिहार सरकार के बारे में यही लिखा था। बिहार की गरीबी बढ़ाने वाले भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के खिलाफ उपलब्ध सूचनाओं को पाठकों तक पहुंचाने की आज भी जरूरत है।यह काम एक पैमाने पर हो भी रहा है।पर इसे तेज करने की आवश्यकता है। यह जरूरत पिछले 40 साल से अधिक रही है।मैंने अपनी पत्रकारिता के प्रारंभिक दौर से ही राजनीति व शासन के भ्रष्टाचार को अपने लेखन का प्रमुख मुद्दा बनाया।अब जब यहां के मुख्य मंत्री बिहार में कायापलट की कोशिश में लगे हुए हैं तो उन्हें भी लग गया है कि ‘अर,े भ्रष्टाचार के खिलाफ तो मामूली कदमों से काम ही नहीं चलेगा।क्योंकि स्थिति काफी बिगाड़ दी गई है।’नीतीश कुमार ने कहा है कि ‘मैंने तो भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया है।’यह कोई मामूली बात नहीं है कि किसी मुख्य मंत्री को अपने ही शासन के भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध का एलान करने की जरूरत पड़ जाए।इस बात से यह समझा जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में हमारे कर्णधारों ने स्थिति कितनी अधिक बिगाड़ दी है।मुझे संतोष है कि भ्रष्टाचार के इस सहश्रमुखी राक्षस के खिलाफ संघर्ष में मेरे पास भी जो थोड़ी-बहुत शक्ति और बुद्धि रही है, उसे मैंने लगाया है। देखना है कि एक ताकतवर मुख्य मंत्री इस युद्ध में कितना और कब तक सफल होते हैं।आज की पत्रकारिता को उसी तरह ‘भ्रष्टाचार से आजादी’ की पत्रकारिता बनाने की जरूरत मैं महसूस करता हूं जिस तरह इस देश के अधिकतर हिंदी पत्रकार सन् 1947 से पहले ‘ब्रिटिश शासन से आजादी’ की लड़ाई के सिपाही भी थे। यदि भ्रष्टाचार नहीं मिटा तो इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। यदि लोकतंत्र नहीं रहा तो पत्रकार कहां रहेंगे ? पटना डायरी (31 जनवरी, 2009)