Sunday, February 1, 2009

कहां से आए नया दल नया नेता

इस देश में एक नए दल और नए नेतृत्व की जरूरत तीव्रता से महसूस की जा रही है। ऐसा दल जो आर्थिक मामलों में गरीबपक्षी हो, पर देश की एकता - अखंडता को लेकर राष्ट्रवादी हो। कम्युनिस्ट गरीबपक्षी हैं, तो देश की सुरक्षा को लेकर वे लापारवाह हैं। उनमें अंतरराष्ट्रीयतावाद का पुट जरूरत से काफी अधिक है। जबकि दुनिया के अन्य देशों के कम्युनिस्ट पहले अपने देश के हित को देखते हैं। बाद में ही उन्हें अन्य देशों का या वहां के कम्युनिस्टों का ध्यान आता है। भाजपा राष्ट्रवादी जरूर है, पर गरीबों के लिए वह अपेेक्षाकृत कम ही सोचते और करते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ वे अब पहले जैसे निर्मम नहीं रहे।जबकि कम्युनिस्ट दलों में अब भी ईमानदार नेताओं और कार्यकत्र्ताओं की भरमार है। कभी डा राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जनसंघ राष्ट्रवादी है, तो गरीबपक्षी नहीं है। कम्युनिस्ट गरीब पक्षी हैं तो राष्ट्रवादी नहीं। इस देश के कम्युनिस्ट अपने देश देश की सीमाओं के प्रति लापारवाह हैं।भारत पर 1962 में हुए चीनी हमले को लेकर यहां के कम्युनिस्टों के चीनपक्षी व्यवहार को लोहिया ने देखा था। दुर्भाग्यवश डा लोहिया का नाम लेने वाले अधिकतर लोहियावादियों के क्रियाकलापों को देखकर तो आज यही लगता है कि वे न तो राष्ट्रवादी हैं और न ही गरीबपक्षी। एक अच्छी बात यह हुई है कि कम्युनिस्टों ने पिछले दिनों भारत सरकार पर दबाव डाल कर इस देश की आर्थिक नीतियों में कई महत्वपूर्ण प्रस्तावित बदलाव को रोक दिया। मन मोहन सिंह की सरकार बदलाव चाहती थी। इसी का नतीजा है कि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी के कुप्रभाव में उतना नहीं आया जितना कुछ अन्य देश आ चुके हैं। इसके लिए कम्युनिस्टों की सराहना की जानी चाहिए। पर, ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में जारी वैश्विक जेहादी हमलों को लेकर इस देश के कम्युनिस्ट ऐसी भूमिका निभा रहे हैं जिससे आतंकवादियों को ही परोक्ष रूप से मदद मिल रही है। अपनी इस शर्मनाक भूमिका पर शायद कम्युनिस्ट बाद में पछताएंगे। पर तब तक तो देर हो चुकी होगी।कांग्रेस अब इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस तो रही नहीं। इंदिरा गांधी तो दोनों तरह के अतिवादियों पर करारा हमला करती थीं।भाजपा का रुख ओसामा बिन लादेन के बंदों के खिलाफ सही जान पड़ता है। ऐसी स्थिति में इस देश में एक राष्ट्रवादी और गरीबपक्षी दल की सख्त जरूरत है। पर,उसके लिए जिस तरह के प्रभावशाली नेता की जरूरत है, वैसा नेता अभी इस देश में दिखाई नहीं पड़ रहा है। शायद अगली किसी आंदोलन, विपत्ति या संकट से वैसा नेता पैदा हो जाए !



नीतिगत बदलाव के खतरे

एक समय था जब इस देश में पहले जनसंघ और बाद में भाजपा के लोग आक्रमणशील राष्ट्रीयता की नीति में विश्वास करते थे। दूसरी ओर, आजादी के पहले की मुस्लिम लीग के लोग और कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीयतावाद में भरोसा रखते रहेे। कम्युनिस्ट कहते रहेे कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हो।’ आजादी के पहले की मुस्लिम लीग के लोग या फिर उस तरह का विचार रखने वाले आज के लोग दुनिया भर के मुस्लिमों के बीच भाईचारे में विश्वास करते रहे हैं। सन् 1947 में मुस्लिम लीग ने देश का बंटवारा करा दिया। अब भी मुस्लिम लीग की नीतियों में भरोसा रखने वाले लोग भारत में मौजूद हैं। आजाद भारत में करीब बीस साल पहले तक कांग्रेस पार्टी की नीति इन दोनों अतियों के बीच की थी। पर मिली -जुली सरकारों के दौर शुरू होते ही कांग्रेस ने अपनी पोजिशन बीच से खिसका कर वाम दल और मुस्लिम लीग की तरह की नीतियों के करीब कर ली। इस बदलाव के अपने खतरे हैं। उन खतरों से यह देश इन दिनों आए दिन रू ब रू हो रहा है। मुम्बई हमले के बाद शायद कांग्रेस की इस नीति में शायद बदलाव हो ! पर अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।क्योंकि सवाल वोट का जो है !आगे -आगे देखिए, होता है क्या !



चुनाव का एक नतीजा यह भी

हाल में देश के पांच राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव नतीजे सामने आए। मिजोरम की स्थिति तो विशेष है। उसे छोड़ दें तो बाकी चार राज्यों में कौन जीता और कौन हारा ? इस संबंध में अनेक विश्लेषण सामने आए। पर एक अलग तरह का विश्लेषण यहां पेश है। कल्पना कीजिए कि इन चारों राज्यों को मिला कर कभी एक ही राज्य बना दिया जाए तो क्या होगा ?फिर तो संयुक्त प्रदेश में भाजपा की ही सरकार बन जाएगी। क्योंकि इन चारों राज्यों में कुल मिला कर भाजपा ने विधान सभा की 295 सीटें जीती हैं। कांग्रेस को कुल मिला कर 246 सीटें ही मिलींं। हालांकि किन्हीं राज्यों के विलयन का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता, पर लोक सभा का चुनाव तो देश भर में एक ही साथ होना है। यानी विश्लेषण का यह नतीजा पूरी तरह सही नहीं लगता है कि हाल के विधान सभा चुनावों में भाजपा हार गई और कांग्रेस जीत गई।



कंधार पर अकारण अपराध बोध

28 दिसंबर, 1999 के दैनिक ‘ हिंदुस्तान ’ के पहले पेज पर एक खबर छपी थी। उसे हू ब हू यहां दिया जा रहा है, ‘देश के प्रमुख राजनैतिक दलों ने इंडियन एयरलाइंस के अपहृत विमान के यात्रियों और चालक दल की सकुशल रिहाई के लिए आवश्यक कदम उठाने का सरकार को सुझाव दिया है। इन दलों के नेताओं ने कहा कि संकट की इस घड़ी मेंे वे सभी एक हैं, मगर पल -पल बदलते घटनाक्रम के मद्दे नजर जरूरी कदम उठाने का फैसला तो सरकार ही ले सकती है। प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा बुलाई गई इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह,माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महा सचिव हर किशन सिंह सुरजित,भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जे।चित रंजन, समाजवादी पार्टी के अमर सिंह सहित कई प्रमुख नेताओं ने भाग लिया।सरकारी पक्ष से गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री जसवंत सिंह, नागरिक विमानन मंत्री शरद यादव , संसदीय कार्य मंत्री प्रमोद महाजन और संचार मंत्री राम विलास पासवान भी बैठक में मौजूद थे।तेलुगु देशम के येरन नायडु और जम्मू कश्मीर के मुख्य मंत्री फारूख अब्दुला भी बैठक में उपस्थित थे। बैठक में श्री वाजपेयी ने विपक्षी नेताओं को सारे घटना क्रम की विस्तृत जानकारी दी और आगे की रणनीति पर उनसे विचार विमर्श किया।’ यह बैठक 27 दिसंबर 1999 को हुई थी। कंधार विमान अपहरण कांड को लेकर आए दिन आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है। कांग्रेस तथा अन्य कुछ विपक्षी दल एनडीए खास कर भाजपा पर यह आरोप लगाते रहते हैं कि उसकी सरकार के विदेश मंत्री जसवंत सिंह तो अपने साथ विमान में ले जाकर आतंकवादी मसूद अजहर को कंधार छोड़ आए। ऐसे में भाजपा आतंकवाद के खिलाफ क्या लड़ेगी ? अब जरा उस समय की स्थिति पर विचार करें। करीब दो सौ बंधकों के साथ एयर इंडिया के विमान का अपहरण कर आतंकवादी ऐसे देश में ले गए थे जहां तालिबानियों का शासन था। उस सरकार के साथ भारत का कोई राजनयिक संबंध भी नहीं था। इधर पौने दो सौ बंधकों के रिश्तेदार दिल्ली में सरकार की नाक में दम किए हुए थे। वे दबाव डाल रहे थे कि चाहे देश को ही क्यों न ‘बेचना’ पड़,े पर हमारे रिश्तेदार सुरक्षित आने चाहिए। विपक्षी दलों की चिंता भी बंधकों की सुरक्षा में थी। कांग्रेस या किसी दल के किसी नेता ने अटल सरकार से तब यह नहीं कहा था कि चाहे बंधक मार ही क्यों न दिए जाएं, पर अजहर को रिहा नहीं किया जाना चाहिए। वे तो अटल सरकार को खुली छूट देकर सर्वदलीय बैठक से आए थे कि चाहे जो कुछ हो बंधकों की जानें नहीं जानी चाहिए। इस पृष्ठभूमि मेंे मसूद अजहर रिहा किया गया। अब इस देश की राजनीति के दोगलेपन का हाल तो देखिए। जिस फैसले में खुद प्रतिपक्षी दल शामिल हों, उसी फैसले को लेकर सरकार की बाद में सार्वजनिक रूप से आलोचना होगी ? यह कैसी परंपरा है ?

तापमान (जनवरी, 2009)

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