शुक्रवार, 25 मई 2012

भाजपा के गले की हड्डी बने येदियुरप्पा

 कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा भारतीय जनता पार्टी के गले की हड्डी बन गये हैं। जातीय वोट बैंक के आधार पर राजनीतिक ताकत पाये इस देश के अन्य नेताओं की तरह येदियुरप्पा भी अपने राज्य में अपनी मर्जी चलाना चाहते हैं। उधर माया और राम के बीच डोलती भाजपा को  इस मामले में न माया मिलेगी और न राम। अभी तो यही लगता है।

     भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा नेतृत्व के दोहरे चरित्र के कारण ही येदियुरप्पा जैसे नेताओं को विद्रोह करने के लिए बल मिलता है। इस मामले में येदियुरप्पा की यह टिप्पणी आंशिक रूप से ही सही है कि ‘सोनिया गांधी का नेतृत्व भाजपा से बेहतर है, क्योंकि कांग्रेस में कोई गलती करे तो पार्टी उसका साथ देती है, पर भाजपा में उसे छोड़ दिया जाता है।
 
 बंगारू लक्ष्मण के मामले में भी भाजपा ने उन्हें तब छोड़ा जब कोर्ट ने हाल में उन्हें सजा दे दी। अन्यथा दल की राष्ट्रीय कार्यसमिति से बंगारू ने पहले ही इस्तीफा दे दिया होता। कोर्ट की सजा के बाद तो आम जनता भी आम तौर पर अपने पुराने नेताओं को छोड़ने लगती है।

  बंगारू जी जब एक लाख रुपये रिश्वत लेते हुए कैमरे पर पकड़े गये थे तब तो पार्टी प्रवक्ता विजय कुमार मल्होत्रा ने कहा था कि उन्होंने अपने लिए नहीं बल्कि पार्टी फंड के लिए वे पैसे लिये थे। भाजपा ने अगले चुनाव में बंगारू की पत्नी को टिकट भी दे दिया था। दिलीप सिंह जू देव के साथ भी पार्टी ने कुछ नहीं किया, जिन्हें लोगों ने अपने टी.वी. सेट पर कहते हुए सुना था कि पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा कसम खुदा से कम भी नहीं।

   यदि भाजपा ने इससे पहले भी भ्रष्टाचार के आरोपितों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया होता तो येदियुरप्पा का मनोबल नहीं बढ़ता। जब किसी अधिक वजन के बोरे के कारण कोई नाव डूबने लगती है तो होशियार नाविक अन्य सामान व सवारियों को बचाने के लिए उस बोरे को बीच नदी में पानी में फेंक देता है। पर भाजपा सहित इस देश के कुछ दलों के साथ दिक्कत यह है कि वे इस रणनीति का अनुसरण करते हैं कि भले पूरी नाव डूब जाए, पर अवांछित सामान को भी ढोये जाना है।

  ऐसा हो भी क्यों नहीं ? कई बार राजनीतिक बोझोें को उठाये रखने में राजनीतिक व आर्थिक फायदे भी तो होते हैं। हालांकि वे अततः क्षणिक ही साबित होते हैं।

 अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने येदियुरप्पा के खिलाफ के आरोपों की जांच सीबी.आई. से कराने का आदेश दे दिया, तब वे चाहते हंै कि कर्नाटक में उनके मन मुताबिक का मुख्यमंत्री बनें। सन 1997 में इसी तरह की परिस्थितियों में लालू यादव ने अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनवाया था। सन 2000 के चुनाव में लालू को बिहार विधानसभा में बहुमत नहीं मिला। वह तो कांग्रेस थी जिसने लालू के दल के साथ मिलकर राबड़ी देवी की सरकार फिर बनवा दी अन्यथा राजद तभी सत्ता से बाहर हो जाता। सत्ता से बाहर होने का यह काम हुआ 2005 में। कांग्रेस ने 1997 में कहा था कि भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए वह राजद के साथ बिहार में मिलकर सरकार बना रही है। पर कांगेेस न तो भाजपा को सत्ता में आने से रोक सकी और न ही अगले चुनावों में अपनी पार्टी की इज्जत बचा सकी।

   दरअसल नीति -सिद्धांतांे के बदले जातीय वोट बैंक के आधार पर राजनीतिक ताकत बढ़ाने वाले येदियुरप्पा पर भाजपा अपना दांव खेलेगी तो वही होगा जो आज कर्नाटक में हो रहा है।

 दलीय सिद्धांत, सुशासन, सर्वजन कल्याण और राजनीतिक शुचिता के आधार पर जब कोई पार्टी संगठित होगी तो येदियुरप्पा जैसा कोई वोट का ठेकेदार पैदा नहीं होगा। भाजपा के साथ- साथ अन्य दलों के लिए भी यह एक सीख है। हालांकि ऐसे जातीय -सह-राजनीतिक महंत को भी भ्रष्टाचार के आरोप में जब कोई अदालत सजा दे देती है तो उसका प्रभाव उस जाति में भी कम होने लगता है। अभी तो आरोप लगे हैं, इसके बावजूद कर्नाटक से यह खबर आ रही है कि येदियुरप्पा का लिंगायतों के बीच भी पहले जैसा दबदबा नहीं है।

  यदि भाजपा ने येदियुरप्पा के मामले में कछुए की तरह कभी मुंह बाहर और कभी मुंह भीतर किया तो उसे न सिर्फ सन 2013 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में ,बल्कि सन 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

   अगर इसके विपरीत कर्नाटक में सत्ता गंवाने की कीमत पर भी भाजपा ने येदियुरप्पा से किसी तरह का समझौता करने से इनकार कर दिया तो उसका राजनीतिक लाभ भाजपा को लोकसभा चुनाव में पूरे देश में मिल सकता है।
 ऐसे भी यदि कांग्रेस की गलतियों का लाभ उठाकर 2014 में भाजपा केंद्र में सत्ता में आ ही गई तो वह येदियुरप्पा जैसे नेताओं को पाल पोस और अपने दाये-बाएं रखकर देश में कौन सा अच्छा काम कर पाएगी। येदियुरप्पा से निबटते समय भाजपा यह भूल रही है कि अभी देश में भ्रष्टाचार विरोधी माहौल है और भ्रष्टाचार के आरोप से सने नेताओं के प्रति कोई भी कमजोरी भाजपा को महंगी पड़ सकती है। जिस तरह भाजपा ने येदियुरप्पा को सी.एम.पद से हटाया, उसी तरह उसे अब येदियुरप्पा को साफ -साफ यह कह देना चाहिए था कि अब आप सी.बी.आई. और कोर्ट से स्वच्छता प्रमाण पत्र ले लेने के बाद ही कर्नाटक भाजपा के कामों में हस्तक्षेप करेंगे। कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने भी कहा है कि येदियुरप्पा के खिलाफ  आरोप गंभीर हैं। पर क्या येदियुरप्पा से यह कहने का नैतिक साहस आज भाजपा में है ? क्या भाजपा एक भारी बोरे को बचाने के चक्कर में नाव को ही डूबो देगी? यह अब उसे ही तय करना है।

(जनसत्ता: 16 मई 2012:से साभार)
 
  

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

काटजू उवाच - नब्बे प्रतिशत भारतीय बेवकूफ

  भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष की टिप्पणियों पर अक्सर विवाद हो जाया करता है। पर, उनकी हाल की एक अत्यंत विवादास्पद टिप्पणी पर कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ जबकि उनका यह ताजा बयान आए कई दिन बीत चुके। क्या न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू की विवादास्पद टिप्पणियों को लोगों ने नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है ? इस बात के बावजूद कि श्री काटजू का ताजा बयान अब तक का सर्वाधिक विवादास्पद है ? न्यायमूर्ति काटजू ने 24 मार्च को दिल्ली में कहा था कि नब्बे प्रतिशत भारतीय बेवकूफ हैं क्योंकि उनके दिमाग में अंध-विश्वास, सांप्रदायिकता और जातीयता भरी हुई हैं। वे इसी आधार पर वोट देते हैं। ऐसे ही लोगों ने फूलन देवी तक को भी लोकसभा में इसलिए पहुंचा दिया था क्योंकि वह पिछड़ी जाति की थीं।

    इस देश में ऐसे विचार रखने वाले काटजू साहब अकेले नहीं हैं। इसलिए भी इस पर चर्चा जरूरी है। इस मामले में आजादी के तत्काल बाद भी कई प्रमुख लोगों ने यह सलाह दी थी कि मतदान का अधिकार सबको नहीं बल्कि चुने हुए पढ़े लिखे लोगों को ही मिलना चाहिए। पर संविधान निर्माताओं ने उन लोगों की सलाह नहीं मानी।

  आजादी के तत्काल बाद के पहले आम चुनाव में भी कुछ ऐसे लोग व दल उम्मीदवार थे जिन पर यह आरोप था कि वे अंधविश्वास, सांप्रदायिकता और जातिवाद फैलाने की कोशिश करते थे। पर उन उम्मीदवारों को आम तौर से नजरअंदाज करके इस देश की अधिसंख्य जनता ने कांग्रेस को बड़े बहुमत से सत्ता में बैठा दिया था। ऐसा इसलिए हुआ कि आजादी की लड़ाई में तपे -तपाये कांग्रेसी नेताओं पर अधिकतर जनता ने अधिक भरोसा किया। ऐसा नहीं है आज भी अंधविश्वासी, सांप्रदायिक और जातिवादी तत्वों की इस देश में उपस्थिति नहीं है। पर क्या उनकी संख्या नब्बे प्रतिशत है और वे चुनाव में भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं ? हां, कभी- कभी और जहां- तहां वे तत्व जरूर चुनाव में निर्णायक हो जाते हैं जहां के नेताओं की साख गिर चुकी होती है। और जनता को दो बुरे लोगों में से ही किसी कम बुरे को चुनना  पड़ता  है। क्या इसके लिए आप जनता को दोषी ठहराएंगे या नेता या फिर राजनीतिक दलों को या शासन को ?

 कोई भी कहेगा कि आम अंधविश्वास के मामले में 1952 में आज की अपेक्षा बदतर स्थिति थी। इसके बावजूद अधिसंख्य जनता ने तब आजादी की लड़ाई की मुख्य पार्टी कांग्रेस को हाथों -हाथ लिया। उस समय वही विवेकशीलता थी। अंधविश्वासी तत्वों के लिए प्रथम आम चुनाव अनुकूल नहीं रहा।

   विद्वान न्यायाधीश काटजू साहब को किसी अगले अवसर पर यह बताना चाहिए कि यदि अंधविश्वासी थी तो क्यों अधिसंख्य जनता यानी मतदाताओं ने सन 1952, 1957 ओर 1962 के आम चुनाव में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया ?

   क्या अधिकतर भारतीयों ने आजादी दिलाने वाली प्रमुख पार्टी कांग्रेस को वोट देकर अंधविश्वास, जातीयता और सांप्रदायिकता का ही परिचय दिया था?

   हां, जब बाद के वर्षों में कांग्रेसी सरकारों के खिलाफ शिकायतें अधिक बढ़ने लगीं तो इस देश की अधिसंख्य जनता ने सत्ता पर से उनके एकाधिकार को भी तोड़ दिया।

 सन 1967 के चुनाव में मतदाताओं ने देश के नौ राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। क्या ऐसा करके जनता ने बेवकूफी का परिचय दिया था? क्या 1971 में अधिकतर जनता ने इंदिरा गांधी की गरीबपक्षी घोषणाओं के पक्ष में खड़ा होकर गलत काम किया था ? क्या सन 1977 के चुनाव में कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से हटाकर और पूरे उत्तर भारत से कांग्रेस का लगभग सफाया करके अधिकतर जनता ने बेवकूफी का परिचय दिया ? दरअसल तब अधिकतर लोगों के दिलो दिमाग में आपातकाल की ज्यादतियां हावी थीं न कि कोई अंधविश्वास या दूसरा कुछ। क्या सन 1980 के चुनाव में आपसी कलह के लिए जनता पार्टी को सजा देने वाली जनता बेवकूफ थी?

क्या बोफोर्स तथा अन्य कई घोटालों की पृष्ठभूमि में 1989 में हुए आम चुनाव में राजीव सरकार को गद्दी से उतारकर मतदाताओं ने बेवकूफी की थी ?

क्या जंगल राज के खिलाफ 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में वोट देकर नीतीश कुमार को गद्दी पर बैठाने वाली बिहार की जनता अंधविश्वासी, सांप्रदायिक और जातिवादी थी ?

काटजू साहब को इस बात का भी जवाब ढूंढ़ना चाहिए कि पांच साल के अंतराल के बाद मुलायम सिंह यादव की पार्टी तो यू.पी. में फिर से सत्ता में आ गई, पर लालू प्रसाद की पार्टी बिहार में 2010 के चुनाव के बाद भी ंफिर से सत्ता में क्यों नहीं आ सकी ? दोनों प्रदेश तो भारत में ही है। दोनों प्रदेशों के लोगों का मनमिजाज करीब- करीब मिलता -जुलता भी है।

   कभी फुर्सत के क्षणों में इन प्रश्नों के जवाब ढूंढ़ने के लिए इसके मूल में काटजू साहब को जरूर जाना चहिए। काटजू साहब तो मीडियाकर्मियों को अनपढ़ या अधपढ़ बता चुके हैं। इसलिए विद्वान न्यायाधीश अपने गहन अध्ययन के जरिए शायद किसी सही नतीजे पर पहुंच जाएं। यदि ऐसा हुआ तो देश को कोई सही दिशा -निदेश भी मिल जाएगा।

 हाल के वर्षों के चुनावों में कतिपय विवादास्पद तत्वों की चुनावी सफलताओं को लेकर काटजू साहब की उपर्युक्त टिप्पणी की प्रासंगिकता एक हद तक समझी जा सकती है। पर उसके लिए 90 प्रतिशत जनता को दोषी ठहरा देने के अपने निर्णय पर उन्हें एक बार फिर विचार करना चाहिए। क्योंकि उसके लिए जनता नहीं बल्कि राजनीतिक दल व सरकारें जिम्मेदार रही हैं। इसको समझने के लिए बिहार के कुछ उदाहरण पेश कियो जा सकते हैं।

  अधिक साल नहीं हुए जब बिहार में राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, आनंद मोहन और मोहम्मद शहाबुद्दीन जैसे बाहुबली लोकसभा के चुनाव भी भारी बहुमत से जीत जाते थे। कई बार वे अपने समर्थकों को भी चुनाव जितवा देते थे। पर आज बिहार में इनका राजनीतिक सिक्का क्यों नहीं चल पा रहा है ?
  इस सवाल के जवाब में सिवान लोकसभा चुनाव क्षेत्र का उदाहरण दिया जा सकता है।

 वहां गरीबों-मजदूरों के शोषण के खिलाफ सी.पी.एम. (माले) सक्रिय हुआ। क्योंकि शासन-प्रशासन गरीबों के हितों की रक्षा करने में आम तौर पर विफल रहता था। वहां मजदूर बनाम भूमिपति तनाव बढ़ा और मोहम्मद शहाबुद्दीन भूमिपतियों के पक्ष में उठ खड़े हुए। नतीजतन वे भूमिपतियों के एक बड़े हिस्से के हीरो बन गये।

  ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि शासन ने न तो माले कार्यकर्ताओं, समर्थकों व गरीबों के साथ न्याय किया और न ही भूमिपतियों के साथ। शासन ने न गरीबों के खिलाफ भूमिपतियों की हिंसक कार्रवाइयांें को रोका और न ही भूमिपतियों पर माले समर्थकों की हिंसक कार्रवाइयों पर लगाम लगाई।

शासनहीनता की स्थिति लंबे समय तक बनी रही। परिणामस्वरूप समाज के एक हिस्से के लिए माले के नेतागण पुलिस थाने की तरह काम करने लगे  और दूसरे हिस्से के लिए मोहम्मद शहाबुद्दीन।
पर, जब 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद सिवान सहित पूरे बिहार में राज्य शासन तंत्र सक्रिय हुआ और कानून -व्यवस्था बेहतर हुई तो चुनाव की दृष्टि से एक तरफ माले कमजोर हुआ तो दूसरी तरफ अनेक लोगों के लिए शहाबुद्दीन की अनिवार्यता भी कम हो गई। यह अकारण नहीं है कि आज न तो शहाबुद्दीन या उनके कोई परिजन किसी सदन के सदस्य हैं और न ही माले का ही कोई प्रतिनिधित्व है।

    यानी जब शासन कमजोर होता है या फिर तरह -तरह के हिंसक तत्वों से उसकी सांठगांठ हो जाती है तो हिंसक तत्व राजनीति में भी हावी हो जाते हैं। पर जहां साख वाला नेता या शासन उपलब्ध होता है तो वहां ऐसी नौबत नहीं आती। ऐसी स्थिति के लिए 90 प्रतिशत जनता दोषी है या वे लोग जो सरकार या पार्टी चलाते हैं ? इस सवाल का जवाब काटजू साहब को अगली बार देना चाहिए।
       
(जनसत्ता में 10 अप्रैल 2012 को प्रकाशित)

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

तुम करोे तो पुण्य और मैं करूं तो पाप ?


संसद ने सांसदों के खिलाफ टीम अन्ना की एक ताजा टिप्पणी की एकमत से मंगलवार को निंदा की। वह खास टिप्पणी निंदा के काबिल थी भी। पर, सांसदों के उस सर्वसम्मत वायदे की लगातार वादाखिलाफी की निंदा कब यह संसद करेगी जो वायदा सन् 1997 में देश के साथ किया गया था ?
आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर संसद ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव में कहा था कि हम भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण को समाप्त करेंगे और चुनाव सुधार भी करेंगे। यदि संसद, सांसद व अब तक की सरकारों ने इस दिशा में ठोस कदम आगे बढ़ाया होता तो आज अन्ना टीम उभर कर सामने आती ही नहीं। उसकी जरूरत ही नहीं पड़ती। पर इसके विपरीत हकीकत तो यह है कि आज देश में सन् 1997 की अपेक्षा अधिक भ्रष्टाचार है। राजनीति का अधिक अपराधीकरण हुआ है और चुनाव सुधार के अभाव में विधायिकाओं का स्वरूप व चरित्र भी बदलता जा रहा है। इन दिनों अनेक छोटे -बड़े नेतागण व जन प्रतिनिधि सदन के भीतर व बाहर एक दूसरे को चोर, उच्चके, बदमाश, हत्यारे, बलात्कारी और न जाने क्या -क्या नहीं कहते रहते हैं। इस संबंध में इस देश में जहां -तहां मानहानि के मुकदमे भी दायर होते रहते हैं।
सन 1997 में हुए संसद के उस छह दिवसीय विशेष अधिवेशन में उस समय की दुरअवस्था को लेकर जिस तरह की कड़ी टिप्पणियां खुद सांसदों ने की थीं, सामान्यतः वैसी ही टिप्पणियां तो आज टीम अन्ना कर रही है। पर इस पर इस देश के अधिकतर नेतागण टीम अन्ना पर तमतमाये हुए हैं। यानी हम करें तो पुण्य और तुम करो तो पाप? इस देश की राजनीति आखिर आज कहां जा रही है ?
नई दिल्ली के जंतर मंतर पर टीम अन्ना के धरने के दौरान सोमवार को की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी पर संसद या यूं कहें कि अधिकतर सांसद तमतमा गये। वह टिप्पणी ही ऐसी थी कि संसद का तमतमाना वाजिब भी था। पर सवाल यह उठता है कि इसी संसद व उसके सदस्यों ने
पिछले 15 साल में अपने ही उस सर्वसम्मत प्रस्ताव को कूड़ेदान में आखिर क्यों फेंक दिया जो प्रस्ताव 1997 में पास हुआ था ? क्या इससे संसद या सांसदों की गरिमा बढ़ी ? क्या इस सर्वदलीय वादाखिलाफी के लिए जनता का तमतमाना उचित नहीं होगा ? क्या जनता से भी बड़ी संसद है ?
आज देश की अधिकतर जनता इसलिए भी तमतमाई हुई है क्योंकि इस बीच देश में 15 से भी अधिक महा घोटाले हो चुके हैं। नये -नये घोटाले होते ही जा रहे हैं। टीम अन्ना जनता के उसी तमतमाए तेवर को तो स्वर दे रही है। हां, स्वर कभी -कभी कर्कश हो जा रहे हैं। टीम अन्ना को उससे जरूर बचना चाहिए। पर अफसोसनाक स्थिति यह है कि घोटालों के आरोप बारी -बारी से इस बीच बारी बारी से सत्ता में आए करीब -करीब सभी प्रमुख दलों के अनेक नेताओं पर लगे। इसमें कुछ अपवाद जरूर हैं। पर अपवादों से तो देश नहीं चलता। इससे राजनीति की साख घटी या बढ़ी है? इससे संसद और उसके सदस्यों की गरिमा व साख बढ़ी या घटी ? जैसा आप बोओगे, वैसा ही तो काटोगे। यदि साख घटी है तो टीम अन्ना का भी तमतमाना कहां से गैर वाजिब है ?
अब जरा उस सर्वदलीय वायदे को एक बार फिर याद कर लिया जाए जो इस देश के करीब-करीब सभी दलों के नेताओं ने संसद के ऊंचे मंच से पूरे देश के सामने किया था। आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर छह दिनों तक संसद का विशेष सत्र चला था। उसमें पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव से संबंधित खबर 2 सितंबर 1997 के अखबारों में छपी थी। खबर का इंट्रो इस प्रकार था, ‘संसद ने आज एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए भारत के भावी कार्यक्रम के रूप में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया। प्रस्ताव में भ्रष्टाचार को समाप्त करने, राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने के साथ- साथ चुनाव सुधार करने, जनसंख्या वृद्धि, निरक्षरता और बेरोजगारी को दूर करने के लिए जोरदार राष्ट्रीय अभियान चलाने का संकल्प किया गया।’
छह दिनों की चर्चा के बाद जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास किया गया उस प्रस्ताव को सर्वश्री अटल बिहारी वाजपेयी,इंद्रजीत गुप्त,सुरजीत सिंह बरनाला,कांसी राम,जार्ज फर्नांडीस, शरद यादव,सोम नाथ चटर्जी,एन.वी.एस.चितन,मुरासोली मारन,मुलायम सिंह यादव,डा.एम.जगन्नाथ,अजित कुमार मेहता,मधुकर सरपोतदार,सनत कुमार मंडल,वीरंेद्र कुमार बैश्य ,ओम प्रकाश जिंदल और राम बहादुर सिंह ने संयुक्त रूप से पेश किया था।
यह प्रस्ताव आने की भी एक खास पृष्ठभूमि थी।सन् 1996 में विभिन्न दलों की ओर से 40 ऐसे व्यक्ति लोक सभा के सदस्य चुन लिए गए थे जिन पर गंभीर आपाराधिक मामले अदालतों में चल रहे थे।उन मेंसे बिहार से चुने गये दो बाहुबली सदस्यों ने लोक सभा के अंदर ही एक दिन आपस में ही मारपीट कर ली।इस शर्मनाक व अभूतपूर्व घटना को लेकर अनेक बड़े नेता शर्मसार हो उठे और उन लोगों ने तय किया कि ऐसी समस्याओं पर सदन में विशेष चर्चा की जाए और इन्हें रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। इस विशेष चर्चा के दौरान सदन में कोई दूसरा कामकाज नहीं हुआ।वक्ताओं ने सदन में देशहित में भावपूर्ण भाषण किए।पैंसठ घंटे तक चर्चा हुई।कुल 218 सदस्यों ने भाषण दिये।इनके अलावा कई सांसदों ने अपने लिखित भाषण भी पेश किये।एक पर एक सदस्यों ने देश की गंभीर स्थिति पर भारी चिंता व्यक्त की।पर,उसका नतीजा शून्य रहा।यानी वे भाषण अंततः घड़िय़ाली आंसू ही साबित हुए। उस के बाद सन् 1998,1999, 2004 और 2009 में लोक सभा के चुनाव हो चुके हैं।इस बीच भाजपानीत और कांग्रेसनीत गठबंधन सरकारें केंद्र में बनीं।करीब -करीब सभी प्रमुख दलों के अनेक नेतागण बारी -बारी से केंद्र में मंत्री रहे।या फिर बाहर से समर्थन देते रहे।जो नेता 1997 में सांसद थे,उनमें कई नेता आज भी सांसद हैं। पर हमारे उन्हीं नेताओं ने अपने ही वायदे भुला दिए।इसका नतीजा यह हुआ कि ऐसे लोक सभा सदस्यों की संख्या बढ़कर आज 162 हो गई है जिन पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं।अगले चुनावों में उनकी संख्या बढ़ते जाने के ही संकेत हैं,घटने के नहीं।
इस बीच जब देश पर आतंकवादी हमले तेज हुए तो सुरक्षा मामलों के जानकारों ने केंद्र सरकार को बताया कि माफिया और आपराधिक प्रवृति के प्रभावशाली लोग विदेशी आतंकियों के लिए शरणस्थली मुहैया करते हैं।इस पृष्ठभूमि में देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक बार फिर इस समस्या पर नए ढंग से विचार करने का समय आ गया है।एन.एन.वोहरा समिति ने भी 1993 में ऐसी ही सिफारिश की थी।वोहरा समिति ने अपनी रपट में नेता-माफिया-अफसर गंठजोड़ की सक्रियता व उनकी बढ़ती ताकत की चर्चा की थी। इसलिए आज यह और भी अधिक आवश्यक हो गया है कि बड़ेे अपराधी और माफिया तत्वों के बीच से कुछ लोग चुनाव लड़ कर संसद सदस्य न बन जाएं।इसलिए भी यह जरूरी है कि जिन दलों और नेताओं ने आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर संसद में बैठकर देश के सामने जो सर्वसम्मत वायदे किये थे,उन्हें वे देश की सुरक्षा को ध्यान में रख कर अब तो पूरा करें।अब भी समय है कि विभिन्न दलों के नेतागण मिल बैठकर कम से कम यह फैसला करंे कि वे अब किसी विवादास्पद व्यक्ति को अगली बार लोक सभा चुनाव का उम्मीदवार नहीं बनाएंगे।इसके विपरीत लग तो यह रहा है कि हमारे अनेक सांसद ऐसे लोगों से ही लड़ते नजर आ रहे हैं जिन लोगों ने भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ अभियान चला रखा है।इससे अंततः संसद,सांसद व पूरी राजनीति के प्रति आम जनता मेें कैसी धारणा बनेगी ?
कौन ईमानदार व्यक्ति आज यह कहेगा कि जिन मुद्दों और समस्याओं को लेकर हमारे नेताओं ने 1997 में संसद में भारी चिंता प्रकट की थी,उन मामलों में इस देश की हालत तब की अपेक्षा आज बेहतर हुई है ?
तो इस स्थिति को बदलने के लिए क्या-क्या उपाय हो रहे हैं ?राजनीति तथा दूसरे प्रभावशाली हलकों में आज भ्रष्टाचार का पहले की अपेक्षा काफी अधिक बोलबाला हो चुका है।पर जब बोलबाला कम था,तब हमारे नेताओं ने 1997 में सदन में क्या- क्या कहा था,उसकी कुछ बानगियां यहां पेश हैं।इससे भी यह पता चलेगा कि इन समस्याओं को हल करना अब और भी कितनी जरूरी हो गया है।क्या आज के सांसदगण 1997 में छह दिनों तक चली संसद की कार्यवाही का पूरा विवरण एक बार पढ़ने की जहमत उठाएंगे ?
लोक सभामें तब के प्रतिपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने बहस का समापन करते हुए एक सितंबर 1997 को कहा था कि ‘इस चर्चा से एक बात सबसे प्रमुखता से उभरी है कि भ्रष्टाचार को समाप्त किया जाना चाहिए।इस बारे में कथनी ही पर्याप्त नहीं,करनी भी जरूरी है।उन्होंने यह भी कहा था कि राजनीति के अपराधीकरण के कारण भ्रष्टाचार बढ़ा है।’
पूर्व प्रधान मंत्री एच.डी.देवगौड़ा ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सभी दलों को मिलकर लड़ाई लड़नी चाहिए।तत्कालीन रेल मंत्री राम विलास पासवान ने कहा कि देश के सामने उपस्थित समस्याओं के हल के लिए सभी दलों को मिल बैठकर ठोस कदम उठाने चाहिए।लोक सभा के तत्कालीन स्पीकर पी.ए.संगमा ने तो भावावेश में आकर आजादी की दूसरी लड़ाई छेड़ देने का ही आह्वान कर दिया।आम तौर पर स्पीकर बहस में हिस्सा नहीं लेते।पर तब सदन का माहौल इतना भावपूर्ण था कि स्पीकर संगमा भी चर्चा में हिस्सा लेने से खुद को नहीं रोक सके थे।पर उस भावना की भी हमारे नेताओं ने बाद में कोई परवाह नहीं की।
1997 में संसद में जो प्रस्ताव सर्वसम्मत से पास हुआ था,उसे भाजपा नेता श्री वाजपेयी ने ही पेश किया था।यह भी दुर्भाग्यपूर्ण ही रहा कि इस बीच राजनीति के अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण के खिलाफ जो भी प्रमुख व कारगर कदम उठाए गए,वे मुख्यतः चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट या कुछ मामलों में हाई कोर्ट की पहल पर ही उठाए गए न कि दलों,नेताओं या सरकारों द्वारा।इस बीच राजनीति में भी इक्के -दुक्के अपवाद जरूर उभर कर सामने आये हैं।पर वे समस्या के अनुपात में उंट के मुंह में जीरे के समान ही हैं।इस मामले में एन.डी.ए.सरकार का छह साल का कार्यकाल भी खुद अटल बिहारी वाजपेयी की उस भावना के अनुकूल नहीं रहा जो भावना अटल जी ने 1997 में लोक सभा में व्यक्त की थी।इस मामले में कांग्रेस सरकार का रिकार्ड तो आज लोगबाग देख ही रहे हैं जो अधिक खराब है।
आज भी टीम अन्ना पर तमतमाने के बजाये क्या पूरी संसद व केंद्र सरकार 1997 में संसद द्वारा देश को किये गये सर्वसम्मत वायदों को पूरा करने की कोशिश करेगी ?
यदि इस दिशा में ठोस काम शुरू भी कर दिया गया तो टीम अन्ना की प्रासंगिकता घट जाएगी।पर इसके बदले टीम अन्ना को ही लोकतंत्र व संसद का दुश्मन मानकर व बताकर कोई कार्रवाई की गई या अन्ना विरोधी बयानबाजी जारी रही तो उसके नतीजे प्रति -उत्पादक हो सकते हैं।यह नहीं भूलना चाहिए कि सन 1974 में जय प्रकाश नारायण को भी तब की सत्ता द्वारा लोकतंत्र का दुश्मन और विदेशी ताकतों का खिलौना कहा गया था। पर सन 1977 के चुनाव में उसका क्या नतीजा हुआ ?


(प्रभात खबर: 29 मार्च 2012 से साभार)

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

आंदोलन के प्रति इंदिरा से अधिक लचीला है मनमोहन सरकार

सन् 1974-75 में इंदिरा गांधी की सरकार को जय प्रकाश आंदोलन से मुकाबला करना पड़ा था। आज अन्ना हजारे के नेतृत्व में जारी आंदोलन का मुकाबला मनमोहन सरकार कर रही है। दोनों आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ
रहे। पर, दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण फर्क सामने आया है। इंदिरा गांधी का जेपी के प्रति रुख अत्यंत कड़ा था। जबकि जेपी की मुख्य मांग यह थी कि बिहार विधान सभा को भंग कर दिया जाए। हालांकि उनकी अन्य कई मांगें भी थीं। पर इंदिरा जी बिहार विधानसभा को भंग करने को कतई तैयार नहीं थीं। जबकि उन्हीं दिनों वह संगठन कांग्रेस के नेता मोरारजी देसाई के अनशन के कारण गुजरात की विधानसभा का नया चुनाव कराने पर तैयार हो गई थीं। बाद में वहां बाबू भाई पटेल के नेतृत्व में संगठन कांग्रेस की सरकार भी बन गई थी।

पर जेपी की मांग पर इंदिराजी ने कहा कि चुनी हुई विधानसभा को किसी के कहने पर भंग नहीं किया जा सकता। इसी पर बात बिगड़ गई और और उसका नतीजा इंदिरा गांधी के लिए बुरा हुआ। उन्हें सन 1977 में भारी चुनावी हार का सामना करना पड़ा।


इसके विपरीत आज ना- ना कहते हुए भी मनमोहन सरकार अन्ना हजारे की मांगों के प्रति लचीलापन दिखा रही है। मनमोहन सरकार के लोग और कांग्रेस पार्टी तथा यू.पी.ए. के नेतागण बार- बार यह कहते रहे हैं कि वे अन्ना यानी संसद के बाहर के किसी व्यक्ति के दबाव में आकर कुछ नहीं कर रहे हैं। पर रोज -रोज अपना पक्ष बदलती केंद्र सरकार अन्ना आंदोलन से घबराई हुई जरूर लग रही है। यह घबराहट अन्ना टीम को मिल रहे जन समर्थन के कारण ही है।


लोकपाल विधेयक सन 1968 से लंबित है। इस बार यह विधेयक लाया भी जा रहा है तो अन्ना के दबाव के कारण ही। हाल में केंद्रीय कैबिनेट ने जिन चार विधेयकों के प्रारूप को अपनी स्वीकृति दी, वे भ्रष्टाचार से निपटने वाले विधेयक ही हैं। यह और बात हैं कि वे कितने कारगर हैं और अन्ना टीम को वे पसंद हैं या नहीं। पर अन्ना आंदोलन से पहले तो मनमोहन सरकार ऐसे कानूनों के प्रति तनिक भी उत्साही नहीं थी। निष्पक्ष राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार भी आंदोलन के दबाव में ही यह सब हो रहा है।

सन 1974-75 का जेपी आंदोलन आज के अन्ना के आंदोलन की अपेक्षा व्यापक और अधिक नैतिक धाक वाला आंदोलन था। जेपी को भी आंदोलन के बल पर सत्ता नहीं आना था। उस आंदोलन की नैतिक धाक इसलिए भी थी। तब के गैर कांगेसी दल जेपी के प्रति नतमस्तक भी थे। आजादी की लड़ाई के महान योद्धा होने का लाभ जेपी को मिला था।

जेपी की मांगें भी निर्दोष थीं। पर इंदिरा गांधी ने तब यह सोचा कि वह अपनी पुरानी लोकप्रियता व सत्ता की ताकत के बल पर जेपी आंदोलन को दबा देंगीं। याद रहे कि गरीबी हटाओ के नारे के कारण लोकप्रिय बनीं इंदिरा गांधी सन 1971 के लोकसभा चुनाव में बड़े बहुमत से सत्ता में आई थीं।


उन्हें इस बात का पता नहीं चल सका कि जेपी के आंदोलन का असर कितना व्यापक हो चुका है और उनकी लोकप्रियता कम हो रही है। इंदिरा जी का इतना शासकीय आतंक था कि खुफिया एजेंसियां भी उन तक सही खबरें पहुंचाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थीं। यहां तक कि 1977 के लोकसभा चुनाव की घोषणा के पहले और बाद में भी खुफिया एजेंसी ने इंदिरा जी को यही सूचना दी थी कि वह चुनाव जीत जाएंगीं।

कहा जाता है कि उन्हें इस बात की सही खबर होती कि आगे क्या होने वाला है तो वह न तो आपातकाल लगातीं और न ही जेपी की मांग को ठुकरातीं। बिहार विधानसभा भंग करने की जेपी की मांग वह उसी तरह मान लेतीं जिस तरह उन्होंने मोरारजी की मांग मान ली थी। तब संभवतः जेपी के आंदोलन का असर बिहार तक ही सिमट कर रह जाता। पर तब इंदिरा गांधी के हठीले रुख का उन्हें ही अधिक खामियाजा भुगतना पड़ा था। हालांकि उन लोगों को भी भुगतना पड़ा जिन लोगों ने आपातकाल की अभूतपूर्व विपदा जेल के बाहर व भीतर झेली।

आज यह बात सही है कि मनमोहन सरकार कमजोर है। साझे की सरकार है। सही दिशा देने वाला कोई केंद्रीय नेतृत्व उपलब्ध नहीं है। पर उसे लगता है कि प्रमुख गैर कांग्रेसी दलों के अन्ना टीम से मिल जाने के बाद केंद्र सरकार खतरे में आ गई है यदि अगले चुनाव को ध्यान में रखा जाए।

सिटीजन चार्टर विधेयक जैसे कानून की कैबिनेट द्वारा मंजूरी उसी आंदोलन के दबाव में उठाया गया कदम लगता है। इसे मनमोहन सरकार का लचीलापन ही कहा जा सकता है। यह और बात है कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित ऐसे भ्रष्टाचार विरोधी विधेयकों के प्रारूप से टीम अन्ना या फिर प्रतिपक्ष संतुष्ट होगा या नहीं। प्रतिपक्ष की संतुष्टि इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यू.पी.ए. के पास राज्यसभा में अपना बहुमत नहीं है।

संसदीय समिति द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के मसविदे पर टीम अन्ना की विपरीत टिप्पणी आ चुकी है। पर केंद्र सरकार उस प्रस्ताव में भरसक संशोधन करने का मन बना रही है तो यह उसका लचीलापन ही है। यह और बात है कि सरकार के लोकपाल विेधेयक में संशेाधन के बाद भी टीम अन्ना व प्रतिपक्ष उससे संतुष्ट होगा भी या नहीं ? यह बाद में पता चलेगा।

पर यहां तो सन 1974 की अपेक्षा आज की केंद्र सरकार व कांग्रेस के लचीलेपन की बात की जा रही है। यह लचीलापन भले मजबूरी में है, पर स्वागतयोग्य है। लोकतंत्र में तंत्र लोक का ध्यान रखते हुए ही कानून बनाए और फैसले करे तो उसे 1977 की तरह जनता के गुस्से का सामना नहीं करना पड़ेगा।

दूसरी ओर अन्ना टीम द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक को हू ब हू मानने की जिद होती है तो उससे शायद कोई सर्वसम्मत विधेयक पास नहीं हो पाएगा।

यह एक अच्छी राय है कि अभी अन्ना टीम एक लचीली सरकार से जितना अधिक कठोर लोकपाल कानून पास करवा पाती है, वह करवा ले। और बाद में जरूरत पड़ने पर उसमें जरूरी संशोधन के लिए लड़े। क्योंकि प्रतिपक्ष भी अन्ना टीम के जन लोकपाल विधेयक के प्रारूप के सभी प्रावधानों से सहमत नहीं है। वैसे भी मौजूदा लोकसभा की बनावट भी कुछ ऐसी है कि उससे हू ब हू जन लोकपाल विधेयक पास करवाना शायद संभव नहीं होगा। पर जो भी यदि एक बेहतर लोकपाल विधेयक पास होगा, तो उसका श्रेय टीम अन्ना को ही तो मिलेगा।

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

बिहार लोकायुक्त बिल

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने टीम अन्ना से कहा है कि वह बिहार लोकायुक्त विधेयक का मसविदा तैयार करे। अन्ना टीम की ओर से यह काम संतोष हेगड़े करेंगे। संतोष हेगड़े कर्नाटक के लोकायुक्त और सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके हैं।
यही बात नीतीश कुमार को अन्य अनेक नेताओं से अलग करती है। याद रहे कि कर्नाटक के लोकायुक्त के रूप में हेगड़े ने भाजपाई मुख्यमंत्री येदुरप्पा की कुर्सी ले ली। पर जिसे कोई घोटाला नहीं करना है, उसे कड़े से कड़ा लोकायुक्त या फिर लोकपाल से क्यों डरना ? सूत्रों के अनुसार मुख्य मंत्री नीतीश कुमार यह भी चाहते हैं कि बिहार का लोकायुक्त विधेयक उस जन लोकपाल विधेयक से भी अधिक कड़ा और कारगर हो जिसको पारित कराने के लिए टीम अन्ना इन दिनों आंदोलित है।
दूसरी ओर लालू प्रसाद और राम विलास पासवान जैसे कुछ नेतागण टीम अन्ना पर रोज -रोज बरस रहे हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार इस तरह लालू-पासवान द्वय खुद ही अपने राजनीतिक पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। पर लगता है कि किसी कारणवश बेचारे ये नेताद्वय ऐसा ही करने को लाचार हैं !
याद रहे कि सामान्य राजनीतिक ज्ञान वाला कोई व्यक्ति भी आसानी से यह देख सकता है कि आज देश में 1967, 1977 और 1989 से भी अधिक केंद्र की सत्ता और देश भर में फैले भ्रष्टाचार के विरोध में हवा है।
जदयू के एक नेता ने इन पंक्तियों के लेखक से हाल में कहा कि हमें तो आशंका थी कि कहीं राम विलास पासवान अन्ना की टीम में शामिल न हो जाएं। उससे हमें बिहार में थोड़ी कठिनाई होती। पर भगवान ने बिहारहित में पासवान की बुद्धि को अन्ना के विरोध में ही जाने दिया।


जनमत संग्रह शुरू
अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि में जनमत संग्रह शुरू हो चुके हैं। उनके नतीजों पर नेताओं और विश्लेषणकर्त्ताओं की टिप्पणियां भी सामने आने लगी हैं।
एक एजेंसी ने दिल्ली और दूसरी एजेंसी ने हाल में देश के 28 नगरों में जनमत संग्रह किया। एक एजेंसी के अनुसार टीम अन्ना को दिल्ली में भारी जन समर्थन मिल रहा है। दूसरी एजेंसी के अनुसार भाजपा को 28 नगरों में बढ़त मिल रही है। कांग्रेस पीछे चली गई है। 32 प्रतिशत लोग भाजपा को और 20 प्रतिशत कांग्रेस को पसंद कर रहे हैं। यानी अन्ना के आंदोलन का लाभ राजग को मिल रहा है।
ऐसे सर्वेक्षणों पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं अब तक आती रही है, वैसी ही प्रतिक्रियाएं इस बार भी आने लगी हैं। जनमत संग्रह के नतीजे के अनुसार जो दल हारता होता है, उसके नेता हर बार यह कह देते हैं कि यह सर्वे फर्जी है। या फिर चुनाव आने तक स्थिति बदल जाएगी। जिसके पक्ष में जीत नजर आती है, वह कहता है कि हमारी स्थिति अभी और भी सुधरेगी।


कैसे-कैसे टिप्पणीकार !
इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और उनके नतीजों को लेकर टिप्पणियां करने वालों का पुराना रिकार्ड देखा जाना चाहिए। यदि उन में से किसी ने गत तीन चुनावों की लगातार गलत भविष्यवाणियां ही की हांे तो उनको एक बार फिर यह काम नहीं दिया जाना चाहिए।
ताजा जनमत संग्रह पर जिन नेताओं और विश्लेषणकर्त्ताओं के विचार इस बार आये हैं, उनके पिछले चुनावों के समय क्या विचार थे, यह बात जनता को एक बार फिर मालूम हो जाना चाहिए। यदि पिछली बार भी वे गलत ही साबित हुए थे तो जनता को उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। यदि बात उल्टी हो तो उन्हें जरूर गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
यदि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले उनकी टिप्पणियों की पुरानी क्लिपिंग एक बार फिर दिखा सकें तो आम लोगों को उन टिप्पणीकारों व दलों के बारे में अपनी राय बनाने में काफी सुविधा होे जाएगी।


अगला राजनीतिक दृश्य
यदि इस बीच कोई अनहोनी नहीं हो गई तो लगता है कि लोकसभा का चुनाव 2014 में तय समय पर ही होगा। ताजा इतिहास बताता हैं कि कांग्रेस में येन-केण प्रकारेण गद्दी पर बने रहने की अद्भुत क्षमता है।
यह भी आशंका है कि इस बीच टीम अन्ना को पूरी तरह संतुष्ट करने लायक कोई लोकपाल विधेयक पास करने की स्थिति में कांग्रेस नहीं ही होगी। यानी अगले चुनाव तक अन्ना का आंदोलन चलता रहेगा। स्वामी राम देव भी आंदोलन में एक बार फिर मजबूती से कूदने ही वाले हैं। बाबा राम देव के साथ एक बड़ी संगठित जमात भी है। यानी देश गरमाता रहेगा। इसका लाभ एन.डी.ए. को अगले चुनाव में मिल सकता है।
पर दिक्कत यह है कि एन.डी.ए. में भी ऐसे-ऐसे नेताओं की कोई कमी नहीं है जो थोड़े-बहुत व मध्यम दर्जे के घोटाले के भीतर ही भीतर पक्षधर रहे हैं भले सार्वजनिक रूप से वे ऐसा नहीं कहें। वैसे लोगों की आदत ही ऐसी बन चुकी है। हालांकि राजग की कुल मिलकार कांग्रेस की अपेक्षा भ्रष्टाचार के मामले में अब भी बेहतर स्थिति है।
इसलिए यदि अन्ना को अपने त्याग-तपस्या-संघर्ष का लाभ एन.डी.ए.को ही अंततः पहुंचाना है तो अन्ना को राजग के सामने अभी से ही एक शर्त रखनी चाहिए। वह यह कि आप अपने बीच के भ्रष्ट और अपराधी तत्वों को टिकट कतई नहीं दोगे और परिवारवाद से दूर रहोगे, तभी हमारा समर्थन चुनाव में पाओगे। अगले साल होने वाले यू.पी. के चुनाव में राजग की इस मामले में परीक्षा ले ली जा सकती है। साथ ही अन्ना टीम राजग से यह भी कहे कि आप अपनी पिछली गलतियों के लिए देश से माफी भी मांगिए। यदि यू.पी. के विधान सभा चुनाव में फिर भी राजग कुछ अपराधी और भ्रष्ट उम्मीदवारों को टिकट देता है तो अन्ना टीम को वहां अपने समानांतर उम्मीदवार खड़ा कराने चाहिए अन्यथा जनता की उम्मीदें अन्ना टीम से भी टूटेगी। समानांतर उम्मीदवार के बाद तो राजग अन्ना के यश का लाभ नहीं उठा पाएगा। वैसे भी यदि कांग्रेस सरकार ने अन्ना टीम को सताना जारी रखा तो अन्ना के नेतृत्व में भी नेताओं की नई संघर्षशील व ईमानदार जमात देश भर में उभर जाएगी। जिस तरह जेपी आंदोलन मंे नया नेतृत्व उभरा था। उनमें कई लोगों को जेपी ने भी 1977 में जनता पार्टी का उम्मीदवार बनवाया था। हालांकि उनमें से अधिकतर जेपी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरे।


काम नहीं आएंगे गंदे खेल
1996 में चारा घोटाले की जब जांच शुरू हुई थी तो बिहार की विधायिका ने सी.बी.आई. के अफसर यू.एन. विश्वास को विशेषाधिकार हनन का नाटिस दे दिया था। विश्वास को माफी मांगने पर मजबूर कर दिया गया था। इतना ही नहीं, विधान परिषद में सी. ए.जी. और पटना हाईकोर्ट पर विशेष चर्चा करवा कर उनको क्या -क्या नहीं कहा गया। यानी इन संस्थाओं की अभूतपूर्व आलोचनाएं की गईं।
जांच कर्ताओं, कुछ नेताओं और पत्रकारों को तथा कुछ अन्य लोगों को भी घोटालेबाजों की ओर से धमकियां दी गई। और न क्या -क्या नहीं किया गया ? पर क्या इन तरीकों के जरिए आरोपितगण जेल जाने और मुकदमे का सामना करने से बच पाये ? अन्ना टीम को प्रताड़ित करने से पहले केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह बिहार की उन घटनाओं से सबक ले लेती।


और अंत में
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह कहा करते थे कि एक ग्रामीण चौकीदार का व्यवहार लोगों के साथ कैसा होता है, उसी को देख कर सरकार की छवि का पता चल जाता है।

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

दागी अफसरों को सजा दिलाने में केंद्र की दिलचस्पी नहीं

बिहार सरकार ने भ्रष्टाचार के मुकदमे का सामना कर रहे आई.ए.एस. अफसर एस.एस. वर्मा के आलिशान मकान को तो जब्त कर लिया, पर उस अफसर के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र सरकार नहीं दे रही है। नतीजतन अभियोजन पक्ष शिव शंकर वर्मा के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र नहीं दाखिल कर पा रहा है। वर्मा के अलावा भी बिहार के दो अन्य आई.ए.एस. अफसरों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र से बिहार को नहीं मिल पा रही है जबकि इसके लिए बिहार सरकार ने कई बार केंद्र को पत्र लिखे हैं। एक अन्य खबर के अनुसार केंद्रीय सेवाओं की प्रथम श्रेणी के अफसरों से संबंधित ऐसे करीब तीन सौ मामले प्रधानमंत्री सचिवालय में लंबे समय से लंबित है। ऐसा अन्ना आंदोलन के दौर में भी हो रहा है।

1981 बैच के आई.ए.एस. अफसर शिव शंकर वर्मा बिहार सरकार में लघु सिंचाई सचिव थे। उन पर अवैध संपत्ति बनाने का आरोप है। बिहार सरकार की विशेष निगरानी इकाई ने 6 जुलाई, 2007 को वर्मा के आवास पर छापा मार कर करीब एक करोड़ पचास लाख रुपये की अवैध संपत्ति के सबूत इकट्ठे किये थे। बिहार विशेष अदालत कानून, 2010 के तहत वर्मा के खिलाफ विशेष अदालत में मुकदमा चल रहा है। विशेष अदालत ने 17 मार्च 2011 को वर्मा की संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया। वर्मा ने अदालत से गुजारिश की थी कि पटना स्थित उस मकान को उन्हें ही किराए पर दे दिया जाए जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया। जब्त मकान की बाजार कीमत करीब पांच करोड़ रुपये बताई जा रही है।
एक अफसर इतने आलीशन मकान को भी किराए पर लेने को तैयार है। यह भी आश्चर्य की बात है। इससे उसकी अमीरी का पता चलता है। याद रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि ऐसे जब्त मकानों में बच्चों के सरकारी स्कूल खाले जाएंगे।

पर ऐसे अफसरों को भी सजा दिलाने में केंद्र सरकार की अरूचि आश्चर्यजनक है। इतना ही नहीं, बिहार सरकार ने जब 2009 में बिहार विशेष अदालत अधिनियम, 2009 विधायिका से पास करवाकर केंद्र को भेजा तो उस पर भी राष्ट्रपति की मुहर दिलवाने में केंद्र सरकार ने एक साल लगा दिये। याद रहे कि उस कानून में मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी आरोपित की अवैध संपत्ति को जब्त करने का आदश देने का कोर्ट को अधिकार मिल गया है। यह देश में अपने ढंग का नया व कारगर कानून है। हाल में केंद्र सरकार ने यह जरूर कहा है कि इस मामले में वह भी बिहार जैसा कानून बनवाना चाहती है। पर वर्मा पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देने के काम से लगता है कि केंद्र सरकार का वायदा खोखला है।

इस बीच बिहार सरकार ने प्रथम श्रेणी के कई अन्य अफसरों के खिलाफ भी ऐसे ही मुकदमे विशेष अदालतों में दायर कर रखे हैं। ऐसे छह स्पेशल कोर्ट में बिहार में काम कर रहे हैं। उनकी अवैध संपत्ति जब्त करने की कोर्ट से अभियोजन पक्ष ने गुजारिश भी की है। इस पर कोर्ट का फैसला आने ही वाला है। पर फिर सवाल उठेगा कि क्या केंद्र सरकार उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर करने की अनुमति देगी ?

बिहार के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण यह रहा है कि यहां के सरकारी पैसों में से अधिकंाश बिचौलिये खा जाते हैं। भ्रष्टाचार के आरोप में यहां दो -दो पूर्व मुख्यमंत्री और आधा दर्जन आई.ए.एस. अफसर जेल की हवा खा चुके हैं। पिछले बीस साल में कई मंत्रियों व विधायकों को भी जेल जाना पड़ा। पर यह बात महसूस की गई कि जेल गये आरोपित अपनी अकूत संपत्ति त्त के जरिए मुकदमे की गर्मी भी कई बार सह जाते हैं। वे महंगे वकील रखकर तथ्यों को तोड़ मरोड़ करके और अदालत के सामने गलत तथ्य पेश करके केस में अपने पक्ष में कई बार जजमंेट दिलवा देते है।

इसलिए हाल में नीतीश सरकार ने यह महसूस किया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही उनकी अवैध संपत्ति जब्त कर ली जाए तो आरोपित गण कई मामलों में अपनी उस अपार संपत्ति का बेजा फायदा मुकदमा जीतने के लिए नहीं उठा पाएंगे। इसलिए बिहार विशेष अदालत कानून बना। केंद्र सरकार ऐसे मामलों में अभियोजन की समय पर अनुमति देकर ही गरीबों के धन को लूटने वालों को सजा दिलवा सकती है। क्या अन्ना आंदोलन के सघन होते जाने के बावजूद केंद्र सरकार एस.एस. वर्मा जैसे अफसरों का परोक्ष रूप से बचाव करती रहेगी? बिहार में कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

उपाधियों के खिलाफ थी संविधान सभा


भारतीय संविधान सभा ने 30 अप्रैल 1947 को यह प्रस्ताव स्वीकार किया था कि ‘यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी। यूनियन का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। राज्य के अधीन किसी लाभप्रद या विश्वसनीय पद पर काम करने वाला कोई व्यक्ति बिना सरकार के सहमत हुए किसी विदेशी राज्य से किसी प्रकार का कोई उपहार, वेतन, पद या उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। ’यह प्रस्ताव सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रखा था।

पर, आज जो हमारा संविधान उपलब्ध है, उसमें उपाधियों से संबंंिधत अनुच्छेद -18 में लिखा हुआ है कि ‘सेना या विद्या संबंधित सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि राज्य प्रदान नहीं करेगा। भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।’

यानी समय के साथ हमने कुछ संशोधनों के साथ उपाधियों का तो खात्मा कर दिया, पर अलंकरणों की परंपरा जरूर शुरू कर दीं। उपाधियां और अलंकरण एक जैसे ही लगते हैं।

वे अलंकरण हैं भारत रत्न और पद्म पुरस्कार। बगल के देश पाकिस्तान में निशान-ए-पाकिस्तान वहां का सबसे बड़ा नागरिक अलंकरण है। वह हमारे देश के मोरारजी देसाई और दिलीप कुमार को भी मिला। हमने भारत रत्न मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व पाकिस्तान के नागरिक खान अब्दुल गफार खान को भी दिया।

अंग्रेज शासक नाइटहुड, राय बहादुर और खान बहादुर जैसी उपाधियां देते थे। अब पद्म विभूषण और पद्म भूषण जैसे अलंकरण हैं। अंग्रेज आम तौर पर अपने समर्थकों को उपाधियां देते थे। भारत की सरकारें भी आम तौर पर अपनी ही विचारधारा के लोगों को अलंकृत करती हैं। अपवादों की बात और है।

संविधान सभा में श्रीप्रकाश ने कहा था कि यदि जनता किसी नेता को सम्मानित करना चाहती है तो वह कर सकती है। लेकिन हम इस घातक दुराचार उत्पन्न करने वाली प्रथा को मिटाना चाहते हैं जो व्यक्तियों को विवश करती है कि किसी सम्मान विशेष की प्राप्ति के लिए अधिकारियों से अनुग्रह भिक्षा मांगता फिरे।

आजादी के करीब 64 साल बाद इन दिनों पद्म पुरस्कारों की क्या स्थिति है? अपवादों को छोड़कर ये पुरस्कार आये दिन विवादों में रहते हैं।

कानूनन मनाही के बावजूद कई पुरस्कृत महानुभाव इन पुरस्कारों को अपने लेटर हेड, विजिटिंग कार्ड और नेम प्लेट में लिख लेते हैं। इन पुरस्कारों के लिए नामों के चयन में कई बार प्रतिभा, योग्यता, क्षमता और देश सेवा से इतर कारण होते हैं। कई बार लेन-देन की भी बातें सुनी जाती हैं। मोरारजी देसाई की सरकार ने 1977 में इन पुरस्कारों व अलंकरणों को बंद कर दिया था। पर बाद में इंदिरा जी के शासनकाल में दुबारा शुरू कर दिया गया।

संविधान सभा में सेठ गोविंद दास ने कहा था कि फ्रांस की क्रांति और रूस की क्रांति के बाद वहां पर जितनी उपाधियां थीं, वे तमाम वापस ले ली र्गइं। मैं सरदार जी से पूछना चाहता हूं कि क्या वे गुलामी के तमगों से लोगों का उद्धार नहीं करना चाहते ? मैं चाहता हूं कि जो भी उपाधि उनके पास हैं, वह भी वापस ले ली जाएं। इस समय के उपाधिधारी भी स्वतंत्र भारत में उसी प्रकार के व्यक्तियों की तरह रह सकेंगे जिस तरह अन्य व्यक्ति रहेंगे।

दरअसल सरकार के पक्ष में कोई विशेष काम कर देने के लिए या करने की उम्मीद में या फिर अपनी सल्तनत को मजबूती प्रदान करने के लिए अंग्रेज शासक कतिपय गणमान्य लोगों को राय बहादुर -खान बहादुर या फिर इस तरह की अन्य उपाधियां देते थे। भारतीय संविधान सभा के अधिकतर सदस्यों ने ऐसी उपाधियों के खिलाफ सख्त टिप्पणियां की थीं। सब तो नहीं, पर संभवतः अधिकतर ऐसे उपाधिधारकों ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों का ही साथ दिया था।

यहां भी फणीश्वर नाथ रेणु का उदाहरण है जिन्होंने जेपी पर पुलिस लाठी प्रहार के खिलाफ 1974 में पद्मश्री का अलंकरण लौटा दिया था। उससे पहले जालियांवाला बाग नरसंहार के खिलाफ कवि गुरू रवींद्र नाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी जो उन्हें 1915 में मिली थी।

साथ ही, यह बात भी देखी गई कि अधिकतर लोगों ने नहीं लौटाई। न ही वे इतिहास के नाजुक मौकों पर स्वतंत्र चेतना के साथ कदम उठा पाए।

संविधान सभा के सदस्य इस बात से अवगत थे। इसीलिए वे आजाद भारत में ऐसे नागरिक चाहते थे जो किसी उपाधि के दबाव में आकर निर्णय नहीं करे। पर आज क्या हो रहा है? अनेक क्षेत्रों में जो गिरावटें बढ़ती जा रही हैं, उससे हमारे संविधान निर्माता परलोक में अपने सिर धुन रहे होंगे।

संविधान सभा में एम.आर. मसानी ने ठीक ही कहा था कि केवल पराधीन देशों में ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र कहे जाने वाले देशों में भी यह देखा गया है कि लेने वालों और देने वालों के लिए भी उपाधियां खतरनाक और दुराचरण का कारण बन जाती हैं। इसलिए देश भक्ति, आत्म सम्मान और सेवा भावना पर विश्वास रखते हुए बिना किसी प्रकार की उपाधियों के हम अपने काम करेंगे।

संबंधित प्रस्ताव पेश करते हुए सरदार पटेल ने कहा था कि विभिन्न कमेटियों में विचार विमर्श के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी।