गुरुवार, 30 जनवरी 2014

इतिहास गवाह बेहद जरूरी है सुरक्षा चक्र


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को निजी सुरक्षा के संबंध में इतिहास तथा ‘जनता दरबार’ के संबंध में वर्तमान से सीखना चाहिए। भगदड़ मच जाने का खतरा सामने होने पर मुख्यमंत्री को शनिवार को अपने ‘जनता दरबार’ को बीच में ही स्थगित कर देना पड़ा। अब वे बेहतर तरीके से जनता दरबार आयोजित करने का प्रयास करेंगे।

   बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वर्षों से ‘जनता के दरबार में मुख्यमंत्री’ कार्यक्रम आयोजित करते रहे हैं। वहां कोई भगदड़ नहीं मचती क्योंकि भीड़ को नियंत्रित रखने के उपाय किये जाते हैं। केजरीवाल को उस अनुभव से लाभ उठाना चाहिए था।

   दूसरी ओर, अपनी निजी सुरक्षा को लेकर उन्हें इतिहास से सीखना चाहिए। जो इतिहास से नहीं सीखता, वह उसे दुहराने के लिए अभिशप्त होता है।


नेता नहीं, विशेषज्ञ करें सुरक्षा का फैसला

   केजरीवाल ने शुक्रवार को भी कहा है कि वे जेड श्रेणी की सुरक्षा स्वीकार नहीं करेंगे। दरअसल किस नेता को किस श्रेणी की सुरक्षा चाहिए, उसका फैसला खुद नेता को नहीं बल्कि विशेषज्ञों को करने देना चाहिए।  

  इस बीच यह खबर आई है कि केजरीवाल के इस निर्णय से मुख्यमंत्री की सुरक्षा का खर्च बढ़ गया है। क्योंकि उनकी परोक्ष सुरक्षा पर शासन को अधिक खर्च करना पड़ रहा है।

   मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल जनहित में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। उनके प्रारंभिक सरकारी फैसलों से भी निहितस्वार्थी तत्व सख्त नाराज हो सकते हैं। उन्हें नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी कर सकते हैं। 

केजरीवाल कहते हैं कि उनका जीवन भगवान के हाथों में है। पर कहावत  है कि ‘भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है।’


देश भुगत चुका है नुकसान

सुरक्षा के मामलों में लापरवाही बरतने या फिर इसे भगवान के भरोसे छोड़ दे़ने का भारी नुकसान यह देश कई बार भुगत चुका है। मध्य युग में जब विदेशी हमलावर हमारे मंदिरों पर आक्रमण करते थे तो पुजारीगण हमलावरों का मुकाबला करने -करवाने के बदले उसी समय भगवान की प्रार्थना करने लगते थे। वे मंदिर की रक्षा के लिए भगवान को बुलाने लगते थे। भगवान को तो न आना होता था और न ही वे आते थे। नतीजों की कहानियां हमारे इतिहास के पन्नों पर मौजूद हैं।ं 


महात्मा गांधी ने भी किया था इंकार

  केजरीवाल को महात्मा गांधी हत्याकांड से भी सबक लेना चाहिए। महात्मा गांधी तब दिल्ली के बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभाएं आयोजित करते थे। उनमेंं शामिल होने के लिए आने वालों की तलाशी लेने तक की अनुमति उन्होंने शासन को कभी नहीं दी थी।

  यदि सघन तलाशी ली गई होती तो नाथूराम गोडसे अपनी पिस्तौल लेकर गांधी जी के नजदीक नहीं पहुंच पाता। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने भी अपनी सुरक्षा के मामले में अव्यावहारिक रुख अपनाया था।


दुश्मनों की कमी नहीं

केजरीवाल की भी सुरक्षा की समस्या सिर्फ उनकी खुद की समस्या नहीं है। दरअसल केजरीवाल अब उन लोगों की भी संपत्ति हैं जिन लोगों ने उनसे एक बेहतर सरकार व नई राजनीतिक शैली की उम्मीद लगा रखी है। वे कितने दिनों तक दिल्ली की गद्दी पर रहते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे सत्ता से बाहर भी रहेंगे तो उनके दुश्मनों की अब कोई कमी नहीं रहेगी। क्योंकि केजरीवाल शैली की राजनीति को यह सिस्टम स्वीकार करने के लिए अभी तैयार ही नहीं दिखता है। निहितस्वार्थियों की जमात ऐसे भी हर समय सक्रिय रहती है। 

  बेहतर सरकारी फैसलों के साथ- साथ सादा जीवन बिताना केजरीवाल का स्वभाव सा बन गया है। इससे केजरीवाल के पक्ष में देश में अच्छा संदेश गया है। इसे ही पर्याप्त माना जाना चाहिए था।


जनता को हक का हौसला

    इस देश में आतंकवाद, नक्सलवाद और आर्थिक तथा आपराधिक माफियागिरी का दौर -दौरा चल रहा है। उसमें किसी ईमानदार व देशभक्त नेता की सुरक्षा कभी भी खतरे में पड़ सकती है। आम आदमी की सरकार दिल्ली के जिन बड़े- बड़े व ताकतवर आर्थिक अपराधियों के स्वार्थों को क्षति पहुंचाकर आम जनता को उनका हक दिलाने का हौसला बांध रही है, वैसी स्थिति में केजरीवाल की निजी व बेहतर सुरक्षा बहुत जरूरी है।


पटेल को मना किया था महात्मा गांधी ने

   20 जनवरी, 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस के पास बम विस्फोट हुआ था। उस घटना के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने एक एस.पी. को बापू के स्टाफ के पास भेजा। एस.पी. ने उन लोगों से कहा कि हम चाहते हैं कि प्रार्थना सभा में शामिल होने वालों की तलाशी ली जाए।

 पर गांधी जी इसके लिए तैयार नहीं हुए। उसके बाद डी.आइ.जी. स्तर के एक अधिकारी गांधी जी से मिले। उनसे गांधी जी ने कहा कि मेरी जान ईश्वर के हाथ है। अंत में सरदार पटेल ने खुद गांधी से मिलकर उनसे प्रार्थना की। पर गांधी जी ने साफ -साफ कह दिया कि यदि किसी की भी तलाशी शुरू कराओगे तो मैं आमरण अनशन शुरू कर दूंगा। शासन लाचार हो गया और नाथू राम गोडसे सफल हो गया। हालांकि तब घटना के समय वहां सादे कपड़े में 30 पुलिस अधिकारी तैनात थे।


इंदिरा ने की चेतावनी की अनदेखी

  अब जरा इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या की चर्चा की जाए। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में जून ,1984 में हुए ब्लू स्टार आपरेशन की पृष्ठभूमि में उनके निजी सुरक्षाकर्मियों ने ही उनके आवास में इंदिरा जी की हत्या कर दी।

  आपरेशन ब्लू स्टार के बाद ही इंदिरा गांधी की जान पर खतरा काफी बढ़ गया था। खुफिया सूत्रों ने इंदिरा गांधी के निजी सचिव आर.के. धवन से कहा था कि एक खास समुदाय के सुरक्षाकर्मियों को प्रधानमंत्री की सुरक्षा से हटा दिया जाना चाहिए। उन्हें नहीं हटाया गया। धवन ने बाद में एक आयोग के समक्ष कहा कि ‘उन सुरक्षाकर्मियों को न हटाने का निर्णय खुद प्रधानमंत्री का था न कि मेरा।’

  हालांकि एक अन्य खबर के अनुसार इंदिरा गांधी ने 1971 के बंगलादेश युद्ध के समय संदिग्ध लोगों को महत्वपूर्ण स्थानों से हटवा दिया था।

  यह और बात है कि तब प्रतिपक्षी नेता जार्ज फर्नांडिस ने यह सवाल उठाया था। जार्ज 1972 की अपनी जनसभाओं में इस बात को लेकर  इंदिरा जी की आलोचना किया करते थे।


राजीव गांधी ने भी तोड़ा था नियम

   इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश व खुद कांग्रेस की राजनीति बदल गई। राजीव गांधी की 1991 में मद्रास के पास बेरहम हत्या कर दी गई। जिस सभा में मानव बम के जरिए तमिल उग्रवादियों ने उनकी हत्या की, उस सभा में सुरक्षा नियमों को खुद राजीव गांधी और तमिलनाडु कांग्रेस के नेताओं ने तोड़ा था। राजीव गांधी ने मानव बम बनी युवती को अपने पास आने दिया जबकि सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा करने की मनाही थी। राजीव गांधी के नहीं रहने पर कांग्रेस को और अधिक नुकसान हुआ।

  राजीव गांधी आज होते तो कांग्रेस की जैसी स्थिति आज बनी हुई है, शायद वैसी नहीं होती। आज सोनिया -राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस बिना पतवार की दिशा विहीन नाव बन चुकी है। एक बड़ी पार्टी की दुर्दशा का दंश पूरा देश भी झेल रहा है।


देश के लिए महत्वपूर्ण थे नेता 

इसलिए कई बार किसी देश की राजनीति को प्रभावित करने के लिए एक नेता का बड़ा रोल होता है। कल्पना कीजिए कि यदि महात्मा गांधी आजादी के पांच-दस साल बाद तक भी हमारे बीच रहते तो क्या सत्ताधारी कांग्रेसियों की वैसी ही दशा-दिशा होती जैसी प्रारंभिक वर्षों में ही सत्ताधारियों ने बना दी ?

याद रहे कि जब गांधी की हत्या हुई तब उनकी उम्र 80 साल भी पूरी नहीं हुई थी। गांधी की तरह ही निजी जीवन में संयमी मोरारजी देसाई करीब सौ साल तक हमारे बीच थे। करीब 95 साल तक तो मोरार जी भाई  दिमागी तौर पर सजग व सक्रिय थे। 

  इस पृष्ठभूमि में अपनी निजी सुरक्षा को लेकर आज अरविंद केजरीवाल जैसे नेता लापरवाही व अपरिपक्वता अपनाते हैं तो वे राजनीति के इस मोड़ पर खुद से अधिक उस जनता को भी अनिश्चितता में डालते हैं जो लोग उनकी ओर उम्मीद भरी नजरों से आज देख रहे हैं।

(इस विश्लेषण का संपादित अंश 12 जनवरी, 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)

भ्रष्ट व्यवस्था से उकताए लोगों की आस है ‘आप’

 आम तौर पर भीषण भ्रष्टाचार से भरी सरकार व राजनीति के तपते रेगिस्तान में आम आदमी पार्टी पानी की ठंडी फुहार बन कर उभरती हुई नजर आ रही है। दिल्ली में कुछ ही दिनों के अपने व्यवहार और कामों से इस नवोदित दल ने अन्य अधिकतर दलों से खुद को साफ- साफ अलग साबित कर दिया है। ताजा जनमत सर्वेक्षण का नतीजा भी इसी बात की पुष्टि कर रहा है।


तीसरी बड़ी पार्टी होगी आप!

 आठ महानगरों में हाल में कराए गए सर्वे के अनुसार भाजपा और कांग्रेस के बाद ‘आप’ ही तीसरी बड़ी राजनीतिक शक्ति बन कर उभरी है। याद रहे कि जिन महानगरों में सर्वे कराए गए हैं, उनमें से कुछ महानगर क्षेत्रीय दलों के गढ़ भी रहे हैं। इसके बावजूद उन महानगरों के औसतन 44 प्रतिशत लोग अगले चुनाव में ‘आप’ के उम्मीदवार को वोट देना चाहते हैं। हालांकि कुछ लोग ‘आप’ की तरफ से बेहतर उम्मीदवार भी चाहते हैं।


भ्रष्टाचार से निजात पाने की छटपटाहट

  भीषण सरकारी और गैर -सरकारी भ्रष्टाचार से सड़ रही राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्था से निजात पाने की छटपटाहट इस सर्वे नतीजे में भी दिखाई पड़ रही है।

   यदि केजरीवाल सरकार के काम लगातार बेहतर रहे तो देश भर में उसकी साख  समय के साथ और भी बढ़ने की संभावना भी लग रही है।

  ताजा सर्वेक्षण नतीजों को भी नकारने में परंपरागत राजनीतिक दल लग गये हैं। लगता है कि उन्हें उसी तरह अब भी सरजमीन की हकीकत का पता नहीं है जिस तरह वे दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजों का पूर्वानुमान नहीं कर सके थे जहां आम आदमी पार्टी गत साल चुनाव लड़ रही थी।

 याद रहे कि  2 दिसंबर 2013 को नई दिल्ली में आयोजित अपने साझा प्रेस कांफें्रस में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने कहा था कि ‘आम आदमी पार्टी का दिवा स्वप्न 8 दिसंबर को टूट जाएगा।’ याद रहे कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए 4 दिसंबर को मतदान हुआ और 8 दिसंबर को मतगणना हुई। कांग्रेस को आठ, आप को 28 और भाजपा को 32 सीटें मिलीं।

  चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा और कांग्रेस ने अलग -अलग यह स्वीकार किया था कि उन्हें ‘आप’ की वास्तविक ताकत का सही पूर्वानुमान नहीं लगा।


खुद को बदल नहीं रहे दल

    दरअसल यह ताकत ‘आप’ को कहां से मिल रही है, इस बात का भी इन दलों को अब भी अनुमान नहीं है। यदि है भी तो भी वे स्वीकारना नहीं चाहते। क्योंकि ‘आप’ की तर्ज पर वे खुद को बदल नहीं सकते। दरअसल वह ताकत ‘आप’ को इसलिए मिल रही है क्योंकि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ समझौताविहीन संघर्ष के हौसले से भरी हुई इकलौती पार्टी है।

भ्रष्टाचार से ही महंगाई
आज भ्रष्टाचार से देश की अधिकतर जनता अत्यधिक पीडि़त है। कुछ लोग सीधे तो अन्य लोग परोक्ष रूप से। भ्रष्टाचार से ही महंगाई भी बढ़ रही है। देश के सामने अन्य कठिन समस्याएं भी पैदा हो रही हैं। उस स्थिति में जो दल या नेता जनता को यह विश्वास दिला देगा कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ बेलाग संघर्ष करेगा, तो उसे जनता खुले बांहों से स्वीकार करने को तैयार है।
 पर कांग्रेस से तो उसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती। भाजपा भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आधे मन से लड़ाई करना चाहती है। अन्यथा, वह येदियुरप्पा को दुबारा गले नहीं लगाती। जबकि एक समय उत्तर प्रदेश में बाबू सिंह कुशवाहा को गले लगा कर भाजपा अपने हाथ जला चुकी थी।
पर उसे अब तक लगता यही लग रहा है कि कांग्रेस के खिलाफ सत्ताविरोधी लहर और मोदीत्व के बल पर अंततः वह चुनावी बाजी मार लेगी।


अहमदाबाद में भी केजरीवाल 

   पर, इस बीच भाजपा को एक नये तरह के संगठन से पाला पड रह़ा है जिसको फूंक मार कर उड़ा देना किसी के लिए संभव नहीं लगता है। सर्वे के अनुसार अहमदाबाद के 31 प्रतिशत लोगों की राय है कि केजरीवाल बेहतर नेता हैं।

 पहले तो लगता था कि ‘आप’ को पूरे देश में फैलने से पहले दिल्ली में खुद के कामों को और मजबूत व सुगठित करना पड़ेगा। संभव है कि इस बीच लोकसभा चुनाव गुजर जाए। यह भी संभव है कि इस बीच भाजपा बाजी मार ले।

पर आठ राज्यों में हुए ताजा जनमत सर्वेक्षण के नतीजे कुछ दूसरी ही कहानी कह रहे हैं। संभव है कि निकट भविष्य में पूरे देश में भी कोई जनमत सर्वेक्षण आयोजित हो। संभव है कि उसके नतीजे भी ऐसे ही हो जिस तरह के नतीजे महानगरों से आये हैं। फिर क्या होगा?

    वही होगा जो कुछ पहले होता रहा है। यानी अधिकतर वैसे दल सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहेंगे जिनकी बढ़त नहीं दिखाई गई हो। पर फिर भी इसकी पड़ताल वे नहीं करेंगे कि आखिर आम आदमी पार्टी का जनसमर्थन क्यों बढ़ रहा है।

   दिल्ली विधानसभा के चुनाव नतीजे आने के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि वे ‘आप से सीखेंगे।’ पर उन्होंने आखिरकार क्या सीखा ? घटनाएं बताती हैं कि कुछ नहीं सीखा।


कांग्रेस-भाजपा को नहीं दिखता खुद का भ्रष्टाचार

भाजपा के पास तो मोदीत्व की चुनावी चाशनी है। उसी में वह मगन है। जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है तो भाजपा को सिर्फ कांग्रेस का भ्रष्टाचार दिखता है और कांग्रेस को भाजपा का। किसी को अपना नहीं दिखता। जबकि भ्रष्टाचार के मामले में दोनों में मात्रा का फर्क है, गुण का नहीं।

दूसरी ओर ‘आप’ के साथ देश भर से अच्छी छवि वाले प्रमुख लोग एक -एक करके जुड़ते जा रहे हैं। शायद इसलिए भी कि केजरीवाल  सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करते हैं कि ‘भाजपा व कांग्रेस के साथ -साथ यदि हमारी पार्टी के कोई व्यक्ति भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाया गया तो उसे भी हम नहीं छोड़ेंंगे।’ उनकी इस खास अपील का भी दिल्ली सहित देश में सकारात्मक असर होता दिख रहा है कि आम लोग भ्रष्ट अफसरों  के खिलाफ स्टिंग आपरेशन चलाएं और उसकी सूचना दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा को दें। हम भ्रष्टों को गिरफ्तार करवाएंगे।  

   हाल की कुछ अन्य राजनीतिक घटनाओं से भी ‘आप’ को अपनी जड़ें जमाने का अवसर मिला है। करीब दो साल पहले टीम अन्ना द्वारा तैयार जन लोकपाल विधेयक का लगभग सभी दलों के अधिकतर नेताओं ने संसद की चर्चा में मजाक उड़ाया। वे खास कर अन्ना जमात के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के ही खिलाफ थे।

   सजा मिल जाने के बावजूद जन प्रतिनिधियों की सदस्यता बचाने के लिए जिस तरह सर्वदलीय कोशिश हुई, उससे भी परंपरागत दलों के प्रति जनता के एक हिस्से में गुस्सा बढ़ा।

इतना ही नहीं, अधिकतर राजनीतिक दलों ने पार्टी फंड को न सिर्फ आर.टी.आई. के दायरे में लाने का विरोध किया बल्कि वे चुनाव आयोग को भी चंदे में मिली अपनी पूरी राशि का पूरा विवरण देने को तैयार नहीं हुए। जबकि ‘आप’ ने पार्टी फंड तैयार करने और उसका विवरण सार्वजनिक करने के मामले में पूरी पारदर्शिता बरती।इतना ही नहीं,अधिकतर राजनीतिक दल न तो दागियों से भरे  दलों या नेताओं से चुनावी तालमेल करने से कोई परहेज  कर रहे हैं, न ही  उन  उम्मीदवारों को टिकट देने से खुद को रोक रहे हैं जिन्हें पूरा समाज भ्रष्ट व अपराधी मानता हैं। ऐसे लोगों के टिकट काटने भी पड़े तो उनके परिजनों को टिकट दिये जा रहे हैं।इन मामलों में ‘आप’ अन्य दलों से अलग दिखाई पड़ती है।इस तरह आप के प्रति जन समर्थन बढ़ने के अनेक कारण मौजूद हैं।

 भाजपा सांसद  शत्रुघ्न सिंहा ने  6 जनवरी को अकारण यह नहीं कहा है कि ‘आप कई दलों का बाप है।’ एक दिन पहले कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि ‘आप का उद्भव स्थापित राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी है।यदि वे अब भी जनता की आवाज नहीं सुनेंगे तो खुद इतिहास बन जाएंगे।’

     (इस लेख का संपादित अंश जनसत्ता के 10 जनवरी, 2014 के अंक में प्रकाशित)
   

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

ऊपरी सदन में बिहार की छवि बदलेंगे ये नुमाइंदे

  जनता दल (यू) और भाजपा बिहार से शालीन व बौद्धिक छवि के लोगों को राज्यसभा में भेज रहे हैं। राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव के लिए इस बार जिन उम्मीदवारों का चयन किया गया है, उन लोगों से बारी से पहले बोलने की कोशिश करने की कतई उम्मीद नहीं है।

 सदन की कार्यवाही में इनके द्वारा बाधा पहुंचाये जाने का प्रयास करने की भी कोई उम्मीद नहीं है। याद रहे कि गत दो दशकों से लोकसभा व राज्यसभा के सत्र शोरगुल, हंगामा, नारेबाजी, अभद्रता तथा इस तरह के अन्य गैर संसदीय आचरण के लिए चर्चित रहे हैं।

सदन की बैठकों को किसी न किसी उचित-अनुचित बहानों से बाधित करने में वैसे तो लगभग अधिकतर राज्यों के कुछ सदस्यों का योगदान रहा है, पर ऐसे कामों में बिहार के कतिपय सदस्यों की अपेक्षाकृत कुछ अधिक ही विवादास्पद भूमिका रही है। इससे बिहार की छवि खराब भी होती रही है। दूसरी ओर बेहतर लोगों के सदन में जाने से बिहार की छवि सुधरेगी।

  पिछली लोकसभा में बिहार से ही एक महिला सांसद ने सदन में ही यह कह दिया था कि मैं तो शांतिपूर्वक सदन की कार्यवाही में भाग लेना चाहती हूं, पर हमारे दल के नेता हमें हंगामा करने के लिए कहते हैं। ऐसे में मैं क्या करुं, कुछ समझ में नहीं आता।

  इस पृष्ठभूमि में यह महत्वपूर्ण है कि कोई दल ऐसे लोगों को देश के सर्वोच्च सदन मेें भेजे जो अपनी शालीनता व बौद्धिक क्षमता से सदन की उस गरिमा को कायम रखे जिसकी उम्मीद संविधान निर्माताओं ने की थी।

 आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में राज्यसभा में आम तौर पर गरिमामय व्यक्तित्व वाले बौद्धिक लोगों को ही भेजा जाता था। पर बाद के वर्षों में कई कारणों से इस परंपरा को कायम नहीं रखा जा सका। हाल के वर्षों में बिहार सहित कुछ अन्य राज्यों से कुछ ऐसे-ऐसे लोग राज्यसभा में गये जो अपने गैर संसदीय कार्यों के लिए ही अधिक चर्चित रहे हैं।

  दूसरी ओर, बिहार से ताजा उम्मीदवारी में उस परंपरा की हल्की झलक मिलती है जो आजादी के तत्काल बाद शुरू की गई थी। भाजपा ने डा. सी.पी. ठाकुर और आर.के. सिन्हा तथा जदयू ने हरिवंश, रामनाथ ठाकुर और कहकशां परबीन को बिहार से राज्यसभा का इस बार उम्मीदवार बनाया है।

  जरूरत पड़ने पर मतदान सात फरवरी को होगा। जदयू और भाजपा के विधानसभा सदस्यों की संख्या को देखते हुए इन उम्मीदवारों की जीत पक्की मानी जा रही है। डा. ठाकुर एक प्रतिष्ठित डाक्टर हैं और केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं। वे शालीन व्यवहार के लिए जाने जाते हैं। उन्हें कभी सदन में शोरगुल करते नहीं देखा गया।

 आर.के. सिन्हा यानी रवींद्र किशोर अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में चर्चित पत्रकार रहे हैं। प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश सौम्य स्वभाव के चिंतक पत्रकार हैं। वे अच्छे वक्ता भी हैं।

वे बिहार और झारखंड के पिछड़ापन को सवाल मजबूती से उठाते रहे हैं। बिहार के पूर्व मंत्री रामनाथ ठाकुर चर्चित, ईमानदार व शालीन नेता दिवंगत कर्पूरी ठाकुर के पुत्र हैं। पूरी नहीं, पर कर्पूरी ठाकुर की कुछ-कुछ छाप उन पर जरूर है।

  कर्पूरी ठाकुर ने अपने जीवनकाल में तो अपने किसी परिजन को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया, पर उनके निधन के बाद पहले लालू प्रसाद और बाद में नीतीश कुमार ने रामनाथ ठाकुर को समय-समय उचित सम्मान दिया। जदयू अध्यक्ष शरद यादव के मन में भी कर्पूरी ठाकुर के लिए विशेष श्रद्धा के भाव रहे हैं।

पटना में 24 जनवरी को कर्पूरी जयंती के अवसर पर जब शरद यादव ने राज्यसभा उम्मीदवारों के नामों की सार्वजनिक रूप से घोषणा की तो समारोह में उपस्थित रामनाथ ठाकुर की आंखों में खुशी के आंसू आ गये। भर्राए गले से उन्होंने मीडिया से कहा कि मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था।

याद रहे कि रामनाथ ठाकुर ने इस उम्मीदवारी के लिए न तो कोशिश की थी और न ही इतनी बड़ी जगह मिलने की उन्हें उम्मीद ही थी। पर नीतीश कुमार ऐसे मामलों में कई बार लोगों को अंतिम समय में चकित करते रहे हैं।

  कहकशां परबीन बिहार महिला आयोग की अध्यक्ष हैं और भागलपुर नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। बिहार से राज्यसभा के लिए पांच सीटों पर चुनाव होना है। 243 सदस्यीय विधानसभा के पिछले चुनाव में जदयू और भाजपा के कुल 206 सदस्य विजयी हुए थे। सबसे बड़े प्रतिपक्षी दल राजद के सदस्यों की संख्या मात्र 22 है। यानी जदयू और भाजपा को छोड़कर किसी अन्य दल को अपना एक उम्मीदवार जिताने की भी क्षमता नहीं है।ं

  हरिवंश तो पूर्णकालिक पत्रकार रहे हैं, पर बिहार से ही पूर्व पत्रकार अली अनवर पहले से ही राज्यसभा में हैं। अली अनवर दैनिक जनशक्ति, जनसत्ता तथा कई अन्य प्रकाशनों के लिए काम कर चुके हैं।

 इस बार राज्यसभा के लिए भाजपा उम्मीदवार आर.के. सिन्हा भी सत्तर के दशक में बिहार के चर्चित पत्रकार थे। उन्होंने पटना के दैनिक प्रदीप और इलाहाबाद की पत्रिका माया के लिए काम किया था। उन्होंने तब कई स्टोरी ब्रेक की थी। बाद में दूसरे काम में लग गये। वे भी शालीन स्वभाव के नेता हैं।

बुधवार, 8 जनवरी 2014

बुत बनने की राह पर अन्ना


  अन्ना हजारे ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को चिट्ठी लिखकर उनसे मदद मांगी है। यह मदद किसी जन कल्याणकारी काम के लिए नहीं मांगी गई है। मदद अन्ना की खुद की मूर्ति की स्थापना के लिए मांगी गई है।

   विख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे ने भाजपा नेता से आग्रह किया है कि वे गुड़गांव में उनकी मूर्ति लगाने में आ रही अड़चन को दूर करें। अन्ना समर्थकों द्वारा अन्ना हजारे की मूर्ति लगाने की कोशिश का स्थानीय भाजपा नेता विरोध कर रहे हैंं।

  भाजपा अध्यक्ष ने अन्ना की चिट्ठी पर क्या कदम उठाया है, यह तो पता नहीं चला है, पर अन्ना की यह चिट्ठी चैंकाती है। (ताजा जानकारी के अनुसार राजनाथ सिंह के हस्तक्षेप के बाद गुड़गांव के भाजपा नेता ने  अन्ना की मूर्ति के लिए स्थल चयन में मदद करने का आश्वासन दिया है।)

 यह बात खुद अन्ना हजारे के स्वभाव व व्यक्तित्व के खिलाफ लगती है। अन्ना हजारे की छवि एक निःस्वार्थ सेवाभावी की बनी है। उस छवि में इस बात का कोई स्थान नहीं है कि वे अपने जीवनकाल में ही अपनी मूर्ति लगवाने के काम में मदद करें। आज की तारीख में तो अन्ना हजारे करोड़ों लोगों के दिलों में घर बना चुके हैं। उन्हें मूर्तियों में समेटना बनावटी लगता है।

  राजनाथ सिंह को लिखी चिट्ठी से अन्ना हजारे की खुद की छवि को धक्का लगता है। अन्ना के अनेक प्रशंसकों ने इसे अच्छा नहीं माना है। उन्हें डर है कि इससे अन्ना के विरोधियों को बल मिलेगा। अन्ना के भ्रष्टाचारविरोधी अभियान के कारण अनेक निहितस्वार्थी तत्व अन्ना के विरोधी हो गये हैं।

इससे पहले मायावती अपनी मूर्ति को लेकर काफी चर्चा में आई थीं। अपने शासनकाल में उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपनी भी मूर्तियां लगवाईं।

मायावती जैसी नेताओं को यह आशंका हो सकती है कि उनके नहीं रहने के बाद पता नहीं कोई उनकी मूर्तियां लगवाएगा या नहीं। पर अन्ना हजारे को तो इसकी कोई आशंका नहीं होनी चाहिए थी।

  उनके नहीं रहने पर उनकी मूर्तियां लगेंगी ही ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान व जन सेवा के क्षेत्रों में उनके काम उल्लेखनीय रहे हैं। अभी तो उन्हें और भी काम करने हैं।

डा. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि किसी व्यक्ति की मूर्ति उसके निधन के सौ साल बाद ही लगनी चाहिए। क्योंकि इतिहास तब तक उस व्यक्ति के बारे में निष्पक्ष आकलन कर चुका होता है।

  नब्बे के दशक मेंे मास्को में उस देश के वासियों द्वारा ही जब लेनिन की मूर्ति सरेआम तोड़ दी गई तो कुछ लोगों ने डा. लोहिया की उक्ति याद की थी। तब तक बोल्शेविक क्रांति के सौ साल पूरे नहीं हुए थे।

  पर इसी देश में संभवतः पहली बार इलाहाबाद में खुद डा. लोहिया की मूर्ति लगनी शुरू हुई तो विरोध होने पर उनके कुछ अनुयायियों ने डा.लोहिया की उक्ति को ही झुठला दिया। एक लोहियावादी ने कहा कि डा.लोहिया ने सौ साल बाद नहीं बल्कि दस साल बाद की ही सीमा बांधी थी।

दरअसल जिन्हें डा. लोहिया के कहे अनुसार नहीं चलना था, उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु को मूर्तियों तक ही सीमित कर देना ठीक समझा।

  इस संबंध में अविभाजित कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा की टिप्पणी याद आती है। 1994 में कर्नाटका के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली ने घोषणा की कि वे एस. निजलिंगप्पा की मूर्ति उनके जीवनकाल में ही लगवाना चाहते हैं। इसके लिए विधायकों की एक समिति गठित की जाएगी।

 पर, उस समय जब इस बारे में निजलिंगप्पा से एक पत्रकार ने पूछा तो उन्होंने एक अंग्रेज कवि की कविता सुना दी,--‘अनसंग, अनवेप्ट, अनहर्ड, लेट मी डाइ। लेट नाॅट अ स्टोन टेल व्हेयर आई लाइ।’ निजलिंगप्पा ने यह भी कहा कि ‘मैं नहीं चाहता कि कौवे मेरी मूर्ति पर बैठ कर उसे गंदा करें।’

   कर्नाटका के मुख्यमंत्री रहे निजलिंगप्पा के लिए लोगों के मन में  सम्मान था क्योंकि आजादी की लड़ाई के एक यांेद्धा थे। पर, उससे कम  इज्जत अन्ना हजारे के लिए आज नहीं है जिन्होंने भ्रष्टाचार से आजादी के लिए अपनी जान जोखिम में डाला। लंुजपुंज ही सही, पर उनके प्रयास से एक लोकपाल कानून देश के सामने आया।

   इसलिए अन्ना से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वे खुद अपनी मूर्ति के लिए प्रयास करें। नेताओं की मूर्तियों की स्थापना को लेकर इस देश में अक्सर विवाद होते रहे हैं।

जीवनकाल में ही मूर्तियां लगवाने की परंपरा संभवतः तमिलनाडु में शुरू हुई थी। सन 1961 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के. कामराज की मूर्ति मद्रास में  लगवाई गई थी जिसका अनावरण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया था। तब भी एक तबके ने उसका विरोध किया था।

 कामराज का निधन 1975 में हुआ। सन् 1967 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादोरै की मूर्ति मद्रास में ही लगाई गई तब भी उसकी आलोचना हुई थी।

  यह ऐसी ही बात है जैसे कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही अपना श्राद्ध कर्म करा ले। इस देश में कुछ ऐसे गिने -चुने लोग कराते भी रहे हैं जिन्हें यह आशंका होती है कि उनके नालायक वंशज यह काम ठीक से नहीं करेंगे। या, वे अपने नालायक वंशज से इतने नाराज होते हैं कि उनके हाथों यह काम नहीं होने देना चाहते।

   पर, यह देश इतना कृतघ्न नहीं है कि उनके नहीं रहने पर अन्ना हजारे की सेवाओं को भूल जाए और उनकी मूर्ति न लगाए।
(06 जनवरी, 2014 के जनसत्ता से साभार) 
   



रविवार, 29 दिसंबर 2013

‘आप’ के सामने सरकार से अधिक साख बचाने की चुनौती


अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली में गठित आम आदमी पार्टी की सरकार ने अच्छी शुरुआत कर दी है।
उसने जल्द ही कई ठोस जनहितकारी कदम उठाने का आश्वासन भी आम लोगों को दिया है। पर इस सरकार की सफलता को लेकर कुछ हलकों में अपशकुन भी किये जा रहे हैं। दरअसल कई लोगों को यह लग रहा है कि ‘आप’ प्रयोग अंततः विफल हो जाएगा। क्योंकि ‘आप’ के नेतागण राजनीति व प्रशासन से भ्रष्टाचार का खात्मा कर देना चाहते हैं। अपशकुन करने वाले वही लोग हैं जो यह मान बैठे हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार तो राजनीति व प्रशासन की गाड़ी को चलाने के लिए मोबिल का काम करते हैं और मोबिल के बिना गाड़ी चल ही नहीं सकती। फिर ‘आप’ की गाड़ी भला कैसे चल पाएगी !

  इसके साथ ही यह भी आशंका जाहिर की जा रही है कि कुछ विध्वंसक तत्व को ‘आप’ की सरकार को बदनाम व विफल करने के प्रयास में लग गये होंगे। इस पृष्ठभूमि में आम आदमी पार्टी के सामने अब अपनी सरकार से अधिक अपनी साख बचाये रखने की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

राजनीतिक प्रेक्षक बताते हैं कि यदि ‘आप’ की साख बची नहीं रही तो देश का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक बार फिर दशकों पीछे चला जाएगा। इसके विपरीत यदि दिल्ली की आप सरकार ने अपने बेहतर कामों के जरिए अपनी साख बढ़ाई तो उसे पूरे देश में फैल जाने से कोई रोक नहीं सकता। क्योंकि पूरा देश आज राजनीति व प्रशासन में फैले भीषण भ्रष्टाचार से ऊब गया है।

  आप के एक विधायक विनोद कुमार बिन्नी के सामने नहीं झुक कर ‘आप’ ने अच्छे संकेत दिये हैं। पर उसे आगे भी और अधिक सावधान रहने की जरुरत पड़ेगी। याद रहे कि बिन्नी मंत्री पद नहीं मिलने के कारण सख्त खफा थे और वे विद्रोह की मुद्रा में थे।

इस पर आप ने साफ साफ कह दिया कि उसके दल में सत्तालोलुपों के लिए कोई जगह नहीं है। नतीजतन बिन्नी शांत हो गये। पर ‘आप’ के सामने यह तो एक छोटी समस्या थी। समस्याएं और भी हैं। कठिन चुनौतियां सामने हैं। क्योंकि ‘आप’ के सत्तारोहन की आहट पर ही इस देश के भ्रष्ट सरकारी व गैर सरकारी लोग डरे हुए हैं। वे आप की साख खराब करने के लिए कोई भी षड्यंत्र कर सकते हैं। दूसरी ओर स्टिंग आॅपरेशन का खतरा भी सामने है। कुछ ‘आप’ नेताओं की यह आशंका सही है कि कांग्रेस का समर्थन केवल केजरीवाल को कुर्सी पर बिठाने तक है। उसके बाद वह चाहेगी कि केजरीवाल विफल हों ताकि भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन देश में जड़ नहीं पकड़ सके। कुछ अन्य दल भी ‘आप’ को सफल देखना नहीं चाहेंगे।

इससे पहले कांग्रेस पार्टी ने समय समय पर चैधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा और गुजराल के साथ यही किया। पर इस जाल से निकलने की जिम्मेदारी खुद आप नेताओं की ही है। उन्हें अपने चाल, चरित्र और चेहरे को बचाये रखना होगा। अन्यथा इस देश का भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन एक बार फिर काफी पीछे चला जाएगा।
 इसके पहले के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के साथ इस देश में यही हुआ। 1966-67 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन विफल होने पर दोबारा उसे शुरू करने में सात साल लग गये थे। इस बीच सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार बढ़ता गया। तानाशाही भी बढ़ी। यानी 1973 में ही गुजरात और 1974 में बिहार में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू हो सका।

  1966-67 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेता डा.राम मनोहर लोहिया थे। उन्होंने जनसंघ और भाकपा सहित कई प्रतिपक्षी दलों को एक मंच पर लाया था। सन 1974 के आंदोलन के नेता जय प्रकाश नारायण थे। याद रहे कि गुजरात और बिहार आंदोलन छात्रों -युवकों ने शुरू किया था न कि राजनीतिक दलों ने। क्योंकि लोगों को उन गैर कांग्रेसी नेताओं पर भरोसा नहीं रह गया था जिन्होंने 1967 और 1972 के बीच देश के कई राज्यों में सत्तारुढ़ होकर अपनी सत्तालोलुपता दिखा दी थी।

  1974 के आंदोलन व उसके कारण बनी सरकारों ने जब पदलोलुपता दिखाई तो कोई नया आंदोलन शुरू होने में 13 साल लग गये। यानी वी.पी.सिंह का बोफर्स घोटाला विरोधी अभियान 1987 में ही शुरू हो सका। पर उस आंदोलन से उपजी सरकारें भी जनता की उम्मीदों पर खड़ी नहीं उतर सकी तो 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में जनलोकपाल विधेयक के लिए आंदोलन शुरू हो सका।

  यानी पहला आंदोलन विफल होने पर दूसरा शुरू करने मेंे सात साल लगे। दूसरा विफल होने पर तीसरा शुरू होने में 12 साल लग गये। तीसरा विफल होने पर चैथा शुरू करने में 20 साल लगे। अब यदि यह भी विफल हो जाएगा तो कल्पना कीजिए कि अगला आंदोलन शुरू होने में कितने साल लग जाएंगे ?
इस बीच इस गरीब देश की हालत और कितनी बुरी हो चुकी होगी। साथ ही परंपरागत राजनीति तब तक और कितनी गर्हित हो चुकी होगी !

   यदि डा.राम मनोहर लोहिया को थोड़ा लंबा जीवन मिला होता तो शायद 1967 के आंदोलन और उससे निकली सरकार को वे भरसक विफल नहीं होने देते। जय प्रकाश नारायण का स्वास्थ्य ठीक रहता तो वे जनता प्रयोग को सफल करने का प्रयास करते। अन्यथा वे फिर जनता के बीच जाते।

यदि भाजपा ने मंडल आरक्षण के खिलाफ मंदिर का बहाना बनाकर वी.पी.सिंह को सरकार को गिराया नहीं होता तो इस देश के भ्रष्टाचारियों का एक हद तक इलाज वी.पी. सिंह की सरकार कर चुकी होती। और उससे यह होता कि राजनीति के प्रति लोगों इतना मोहभंग नहीं हेाता जितना आज हो चुका है।

  आप विधायक विनोद कुमार बिन्नी के आगे नहीं झुक आम आदमी पार्टी ने अच्छा संकेत दिया है। पर आप को 1967 के डा.राम मनोहर लोहिया के कुछ कदमों को भी याद रखना होगा।

  1967 के चुनाव के बाद सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गई थीं। अन्य दो राज्यों में कांग्रेसी नेताओं के दलबदल के कारण गैरकांग्रेसी सरकारें बनीं। इन सरकारों को डा.लोहिया ने सलाह दी थी कि वे छह महीने के भीतर जनहित में कुछ ऐसे बड़े फैसले कर दें ताकि लोग यह समझ जायें कि ये सरकारें कांग्रेसी सरकारों से काफी अलग ढंग की सरकारें हैंे। ऐसा नहीं होने पर कांग्रेस फिर सत्ता में आ जाएगी।

   डा.लोहिया के अनुसार कुछ फैसले तो उन राज्य सरकारों को सत्ता में आने के कुछ ही हफ्तों के भीतर ही करने थे। बिहार पर डा.लोहिया की सबसे अधिक नजर थी क्योंकि आनुपातिक दृष्टि में लोहियावादियों की बिहार में अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे बड़ी चुनावी जीत हुई थी।

 बिहार में गैरकांग्रेसी सरकार ने जब डा.लोहिया के निदेश को नजरअंदाज किया तो लोहिया ने अपने दल के एक बड़े बिहारी नेता से मिलने से भी इनकार कर दिया था।  इस पर उस नेता जी को होश आये। उन्होंने कुछ सरकारी काम तो किये। पर पूरे काम नहीं हो सके।

 1967 में बिहार में ही बी.पी. मंडल को, जो बाद में मंडल आयोग के अध्यक्ष बने थे, मंत्री बना दिया गया था जबकि वे 1967 के लोकसभा चुनाव में संसोपा के टिकट पर मधेपुरा से सांसद चुने गये थे। उन्हें मंत्री बनाने से पहले डा.लोहिया की राय नहीं ली गई थी। डा.लोहिया मानते थे कि जो जहां के लिए चुना जाए , वह उसी सदन का काम करे। डा.लोहिया को जब पता चला तो उन्होंने निदेश दिया कि बी.पी.मंडल मंत्री पद से इस्तीफा देकर लोकसभा के सदस्य के रूप में काम करें। पर मंडल ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। मंडल कांग्रेस से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे।

  बिहार के कुछ संसोपा नेताओं ने डा.लोहिया को समझाने की कोशिश की कि मंडल को मंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर कीजिएगा तो वे सरकार गिरा देंगे। लोहिया ने कहा कि भले वे सरकार गिरा दें पर उनके लिए पार्टी की नीति नहीं बदली जाएगी। मंडल ने आखिरकार सरकार गिरा ही दी।

  सन 1968 में वे खुद मुख्यमंत्री बन गये। इससे संसोपा की साख घटी। हालांकि उससे पहले डा.लोहिया का अक्तूबर, 1967 में असामयिक निधन हो चुका था। यदि दिल्ली की आम आदमी पार्टी अपनी सरकार की चिंता किये बिना ऐसे ही  नीतिपरक रुख कायम रखे तो वह भविष्य में भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की अगुआ बनी रह सकती है।

अन्यथा इस देश के घाघ भ्रष्टाचारी गण एक बार फिर सांड़ की तरह जनता के खेत चरने लगेंगे।


बुधवार, 18 दिसंबर 2013

‘बकरे की बलि’ चढ़ाने से बच जाएगी कांग्रेस की इज्जत ?

कांग्रेस में एक बार फिर बलि के बकरे की तलाश हो रही है। केंद्र में और राज्यों में भी। मणि शंकर अयर का ताजा बयान उसी तलाश का हिस्सा है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से भी ऐसी ही तलाश की सूचना आ रही है।

    पर, क्या बकरे की बलि देने से कांग्रेस को कभी कोई लाभ मिला है जो इस बार मिलेगा ?

दरअसल इतिहास बताता है कि नीयत और नीतियां बदलने की मंशा नहीं हो तो सिर्फ नेता बदलने से कांग्रेस को कभी लाभ मिला ही नहीं है। हां, पर बलि का कोई बकरा खोजना ही है तो वे खोज रहे हैं। ऐसे अवसरों पर हर बार खोजा जाता रहा है तो इस बार भी खोजा जा रहा है। चीन के हाथों भारत की पराजय के लिए तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन को बलि का बकरा बनाया गया था।

  यह सब ऐसे देश में हो रहा है जहां 2004 से ही पद किसी और के पास है तो पावर किसी अन्य नेता के पास।
  पूरा पावर अपने पास रखने वाले संविधानेत्तर केंद्र की कमियों की चर्चा तो मणि जी करेंगे नहीं, इसलिए वे पद रखने वाले पर लाल-पीले हो रहे हैं। सवाल यह है कि मनमोहन सिंह ने अब तक कौन सा बड़ा फैसला सोनिया गांधी और राहुल गांधी की इच्छा के खिलाफ जाकर किया है? बल्कि चर्चा तो यही है कि उन्होंने यथा प्रस्तावित ही काम किया है। प्रस्ताव किसका होता है, यह सब जानते हैं।

  यहां तक कि हाल में राहुल गांधी ने जब एक अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से बकवास बताया तो मनमोहन सिंह ने सर्वदलीय बैठक और पूरे केंद्रीय कैबिनेट के फैसले तक को ताक पर रखकर उसे वापस कर लिया। यह और बात है कि सुप्रीम कोर्ट व राष्ट्रपति के रुख को भांप कर ही राहुल गांधी ने वह कदम उठाया था।
उससे लगा था कि उससे उन्हें चुनावी लाभ मिलेगा, पर मिला नहीं। क्योंकि हकीकत लोग जानते हैं।

   लगता है कि कांग्रेस के प्रथम परिवार के करीबी मणिशंकर अयर एक नया कामराज योजना लागू करना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि 2009 में मनमोहन सिंह को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय गलत था। यानी वे यह कहना चाहते हैं कि मनमोहन के कारण ही कांग्रेस की शर्मनाक हार हुई है। ऐसा कहकर वे मनमोहन को हटवाना चाहते हैंं। यानी वे एक बार फिर मिनी कामराज योजना लागू करना चाहते हैं।

   मणि शंकर अयर संभवतः छात्र रहे होंगे जब उन्हीं के प्रदेश के एक प्रमुख कांग्रेसी नेता के. कामराज ने कांग्रेस हाईकमान को एक सुझाव दिया था। वह कामराज योजना के नाम से जाना गया। तब कामराज योजना लागू की गई थी।
 
हार के बाद लागू हुई थी कामराज योजना

 जवाहर लाल नेहरु के प्रधानमंत्रित्व काल में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय और दूसरी सरकारी विफलताओं की पृष्ठभूमि में कामराज योजना लागू की गई थी। उन दिनों लगातार कई लोकसभा उपचुनाव कांग्रेस हार रही थी।

  कहा गया कि कांग्रेस संगठन की कमजोरी के कारण हार हो रही है। तय हुआ था कि कांग्रेस के कुछ बड़े नेता केंद्रीय मंत्री पद और मुख्यमंत्री पद छोड़कर संगठन के काम में लगें। नतीजतन करीब आधा दर्जन केंद्रीय मंत्री और आधा दर्जन मुख्यमंत्री 1963 में अपने पदों से हटा दिये गये।

  पर 1967 के आम चुनाव में इसका क्या नतीजा हुआ? कामराज योजना के नाम पर  जिन राज्यों के मुख्यमंत्री हटाये गये थे, उन राज्यों में भी कांगे्रस चुनाव हार गई और सत्ता से हटा दी गई। वहां गैर कांग्रेसी सरकार बन गई। लोकसभा में भी कांग्रेस का बहुमत पहले की अपेक्षा काफी कम हो गया। क्योंकि सिर्फ नेता हटे थे, जनपक्षी नीतियां नहीं बनी थीं। नीयत भी पहले ही जैसी ही थी। इसलिए कामराज योजना का कोई लाभ नहीं हुआ? आज भी क्या कांग्रेस और केंद्र सरकार अपनी नीतियां और नीयत बदलने को तैयार है ?

     इतना ही नहीं, 1980 से 1990 के बीच कांग्रेस हाईकमान ने बिहार में पांच  मुख्यमंत्री बदले। इसके बावजूद छठे मुख्यमंत्री भी 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता में नहीं ला सके।

ऐसे कई अन्य उदाहरण भी हैं। इसके बावजूद मणि शंकर अयर जैसे नेता समझते  हैं कि कांग्रेस की चुनावी विफलता के लिए सिर्फ मनमोहन सिंह जिम्मेदार हैं।

लगातार बलि का बकरा खोजते रहने वाले दल में मणि शंकर अयर ऐसे अकेले नेता नहीं होंगे। अंतर यही है कि मणि शंकर स्पष्टवादी व बड़बोले नेता हैं और दूसरे ऐसा नहीं हैं।

‘परिवार’ को सिर्फ सफलता का श्रेय

  जिस दल में प्रथम परिवार में किसी तरह गलती ढूंढ़ना ईशनिंदा मानी जाती हो, वहां यही होना है। वहां तो उस परिवार को सिर्फ किसी सफलता के लिए श्रेय देने की परंपरा है।

   वैसे कांग्रेस से नाराज मतदाता यह अच्छी तरह जानते हैं कि भ्रष्टाचार और महंगाई के लिए कोई जिम्मेदार है तो वही है जिसके हाथों में केंद्र सरकार का पावर है। जिसके पास राजनीतिक कार्यपालिका का सर्वोच्च पद है, वह आदेश का पालन करने वाला भर है।

 महंगाई का भी मूल कारण सरकारी भ्रष्टाचार ही है। अन्यथा क्या कारण है कि जब  केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकार बनती है कि महंगाई अरिथमेटिकल प्रोग्रेशन यानी अंकगणतीय गति से बढ़ती है और जब कांग्रेस की सरकार होती है तो ज्योमेट्रिकल प्रोग्रेशन यानी ज्यामितीय गति से ? भ्रष्टाचार गैर कांग्रेसी सरकारों में भी होता रहा है, पर कांग्रेसी सरकार की अपेक्षा कम।

मुख्यतः महंगाई व भ्रष्टाचार के मुद्दों पर कांग्रेस सरकार की विफलता के कारण मतदाता कांग्रेस से विमुख हो रहे हैं।

पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह का अब तक क्या रुख रहा है?

  यही रुख रहा कि भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वालों पर कार्रवाई करो और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए कुछ नहीं करो। अशोक खेमका प्रकरण इसका एक उदाहरण है। हाल के वर्षों में बड़े भ्रष्टाचारों के मामलों में भी तभी कोई कार्रवाई हुई जब सी.ए.जी. ने रपट दी और अदालत ने जांच का आदेश दिया। कोयला घोटाला हो या टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला। इसके अलावा भी इस बीच कई बातें हुईंं हैं। सब कुछ सोनिया गांधी और राहुल गांधी की जानकारी में हुआ। ताजा चुनाव रिजल्ट आने से पहले तक कांग्रेस के प्रवक्तागण भी यह कहते रहे हैं कि किसी मुद्दे पर सोनिया जी-राहुल जी और मनमोहन सिंह में कोई मतभेद नहीं है। फिर अचानक बलि के बकरे की तलाश व पहचान क्यों ?

मनमोहन सिंह एक बेचारे प्रधानमंत्री

 देश के अधिकतर लोग यह जानते हैं कि मनमोहन सिंह एक बेचारे प्रधानमंत्री की तरह आदेशानुसार ही काम करते रहे हैं।

मतदाताओं ने इसे समझा और उसके अनुसार हाल के चुनाव में मतदान किया। लोकसभा चुनाव में भी यही होगा, इसके संकेत साफ है। इसलिए यह कहा जा रहा है कि नेता बदलने के बदले नीयत और नीति बदलने से ही कांग्रेस आशंकित पराजय से बच सकती है। या फिर पराजय का प्रभाव कम हो सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी पार्टी का जो रुख सामने आया है, वह इस देश की राजनीति के लिए कसौटी बन गई है। अन्य पार्टियों को जनता उसी कसौटी पर कसेगी, इसके भी संकेत साफ हैं।
( 13 दिसंबर, 2013 के जनसत्ता में प्रकाशित)


बुधवार, 11 दिसंबर 2013

आम आदमी पार्टी पर करोड़ों नजरें


इस मिनी आम चुनाव (दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव 2013) की सबसे बड़ी उपलब्धि आम आदमी पार्टी का उभार है। उभार भी ऐसा वैसा नहीं बल्कि बेमिसाल है। ‘आप’ को भारी जीत दिलाकर दिल्ली के बहुमत मतदाताओं ने देश को एक नयी राजनीतिक दिशा भी दिखाई है। इस तरह मतदाताओं ने देश की राजधानी का नागरिक होने का फर्ज भी निभाया है।

    दिल्ली की जनसंख्या की विविधता का आज जो स्वरूप है, उसे लगभग पूरे देश की प्रतिनिधि आबादी भी कहा जा सकता है। इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि यदि पहले से आम आदमी पार्टी के काम व प्रचार अन्य राज्यों में हुए होते और ‘आप’ ने वहां भी चुनाव लड़ा होता तो वह उन राज्यों में भी चुनाव को प्रभावित कर सकती थी जहां हाल में (2013) चुनाव हुए।


मोदीत्व बनाम ‘आप’वाद में राजनीतिक मुकाबले

    संकेत बताते हैं कि आने वाले समय में धीरे -धीरे कांग्रेस राजनीति के हाशिये पर जाएगी। ‘आप’ धीरे -धीरे उसकी जगह लेगी। देश भर के अच्छे तत्व आम आदमी पार्टी से जुड़ेंगे। मोदीत्व बनाम ‘आप’वाद के बीच आने वाले दिनों में राजनीतिक मुकाबले होंगे। क्योंकि मोदीत्व को हराने में अभी उनके विरोधियों को भी समय लगेगा। क्योंकि भाजपा के हिन्दुत्व की चाशनी और कांग्रेस की नकली धर्मनिरपेक्षता से मोदीत्व को ताकत मिली है। इसके हालांकि कुछ अन्य कारण भी हैं। वैसे तसलीमा नसरीन के खिलाफ फतवा देने वाले व्यक्ति की तरह के लोगों के साथ ‘आप’ ने यदि अधिक मेलजोल बढ़ाया तो उससे मोदीत्व को ही बढ़ावा मिलेगा।
 यह भी उम्मीद की जाती है कि इतनी बड़ी चुनावी सफलता के बाद ‘आप’ वास्तविक धर्मनिरपेक्ष बने न कि अन्य कुछ दलों की तरह एकतरफा या ढोंगी धर्म निरपेक्ष।


कांग्रेस के भ्रष्टाचार से परेशान जनता

   उधर कांग्रेस के भ्रष्टाचार, अहंकार, वंशवाद, काला धन और चमचागिरी से परेशान इस देश की आम व खास जनता को आम आदमी पार्टी के रूप में देर- सवेर एक खेवनहार मिल सकता है। एक हद तक मिल भी गया है।
बशर्ते कि ‘आप‘ ने अपने चाल, चरित्र व चेहरे को आगे भी ठीकठाक रखा। इसके लिए यह जरूरी है कि गंदे और अवसरवादी तत्व आप में घुसपैठ नहीं कर पायें। कांग्रेस की लगातार नाकामयाबियों से उभरे मोदीत्व ने दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी के विजय रथ को रोक लिया है, पर आने वाले समय में पूरे देश में ‘आप’वाद बनाम मोदीत्व के बीच मुकाबले की ही संभावना नजर आ रही है।

 सरकारी भ्रष्टाचार से पीडि़त इस गरीब देश में अगले चुनावों में अंततः आम आदमी की ही जीत की संभावना जाहिर की जा सकती है। हालांकि इसमें समय लग सकता है। आप के नेताओं की मौजूदा साख को देखते हुए देश के अन्य हिस्सों की जनता भी आप को स्वीकार कर सकती है।


घाघ नेताओं ने विफल किए जनता के बदलाव

   पर, इससे पहले के दशकों में जनता ने ऐसे ही तीन प्रयास किये थे जिन्हें घुटे हुए घाघ नेताओं ने अंततः विफल कर दिये। उम्मीद की जानी चाहिए कि आम आदमी पार्टी में वैसे घुटे हुए घाघ नेताओं का कभी वर्चस्व नहीं हो पाएगा। क्योंकि आप में अभी तो  नये ढंग के लोग हैं जो ‘राजनीति का विकल्प’ नहीं बल्कि वैकल्पिक राजनीति के पक्षधर हैं।

  याद रहे कि दिल्ली में शानदार प्रदर्शन के बाद यह उम्मीद की जाती है कि आम आदमी पार्टी देश के अन्य हिस्सों में भी अगला चुनाव लड़ेगी। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी मांग भी ‘आप’ के पास अब आएगी। बल्कि आनी शुरु हो चुकी होगी। सीमित शक्ति व साधनों के कारण भले उसे आगे भी सीमित चुनावी सफलता ही मिले, पर यह बात पक्की मानी जा रही है कि वह विकल्प की राजनीति नहीं, बल्कि वैकल्पिक राजनीति ही करेगी और आने वाले दिनों में देश का नेतृत्व भी करेगी।

  दिल्ली में प्रबुद्ध से लेकर आम मतदाताओं ने यही देख-समझकर आम आदमी पार्टी को अपनाया है क्योंकि ‘आप’ देश के सामने वैकल्पिक राजनीति पेश कर रही है।


’आप’ को जातपात से ऊपर उठकर मिले वोट

  याद रखने की बात है कि ‘आप’ को लोगों ने जातपात से ऊपर उठकर वोट दिये हैं। जब भी बेहतर विकल्प लोगों को दिखा है, इस देश के लोगांे ंने जातपात तथा अन्य लाभ-लोभ-दबाव से ऊपर उठकर ही वोट दिया है। हां, जब विकल्पों के बीच अंतर कम हो तो लोगों का एक हिस्सा संकीर्ण स्वार्थों में लिप्त हो जाता है। वही हिस्सा कभी -कभी चुनावों में निर्णायक भी हो जाता है।


1967, 1977 और 1989 में नेताओं ने दिया धोखा

  इससे पहले 1967, 1977 और 1989 मेंे भी देश के अधिकतर लोगों ने वैकल्पिक राजनीति की उम्मीद में संकीर्णता से ऊपर उठकर मतदान किये थे। 1967 के नेता डा. राम मनोहर लोहिया, 1977 के नेता जय प्रकाश नारायण और 1989 के नेता वीपी. सिंह थे। पर इस देश के जनतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही कि तीनों बार लोगों ने नेताओं से अंततः धोखा ही खाया। उम्मीद की जानी चाहिए कि आम आदमी पार्टी से उन्हें धोखा नहीं मिलेगा।

1967, 1977 और 1989 में आम लोगों ने मूलतः सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ मतदान किये थे। दरअसल किसी गरीब देश में सरकारी भ्रष्टाचार ही अन्य कई गंभीर समस्याएं भी पैदा कर देता है। 1967 के चुनाव में तो नौ राज्यों से कांग्रे्रेस का एकाधिकार खत्म हुआ था, पर 1977 में तो केंद्र से ही उसका एकाधिकार समाप्त हो गया था। 1984 में चार सौ से अधिक लोकसभा सीटें जीत चुकी कांग्रेस 1989 में बुरी तरह हार गई थी। बोफोर्स भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का गुस्सा इतना अधिक था।


आज कदम-कदम पर भ्रष्टाचार

 अब तो कदम -कदम पर बोफोर्स हैंं। आज इस देश की अधिकतर जनता यह चाहती है कि काला धन, भ्रष्टाचार, सत्ताधारियों के अहंकार, वंशवाद और चमचागिरी से देश को जल्द मुक्ति मिले। गरीब से लेकर अमीर जनता तक से  टैक्स में मिले पैसे जनता के लिए ही खर्च हों। वे घोटालों की भेंट नहीं चढे़। इस पृष्ठभूमि में आज मोदीत्व बनाम कांग्रेस के बीच ‘आप’ उम्मीद की नयी किरण बन कर उभरी है।

( 9 दिसंबर 2013 के जनसत्ता से साभार)