शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

शास्त्री जी की मौत से संबंधित कागजात सार्वजनिक किए जाएं


         
नेता जी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलें सार्वजनिक 
हो जाने के बाद अब लाल बहादुर शास्त्री परिवार की उम्मीदें 
भी बढ़ी हैं।
  शास्त्री जी की पुत्र बधू और भाजपा नेता नीरा शास्त्री यह मांग करती रही हैं कि शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़े सारे दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिएं।
  नीरा शास्त्री को इस बात का अफसोस है कि अब तक न तो शास्त्री जी की मृत्यु के कारणों का पता चला है और न ही केंद्र सरकार ने इस बारे में कोई दस्तावेज जारी किया है।
दिवंगत प्रधान मंत्री की विधवा ललिता शास्त्री ने नीरा शास्त्री को बताया था कि शास्त्री जी के चश्मे की खोली में मिली एक पर्ची से पता चला कि उन्हें कुछ मिला हुआ दूध दिया गया था।उसके बाद उनके सीने में दर्द शुरू हो गया और सांस लेने में कठिनाई होने लगी। इस तरह 10 जनवरी 1966 को ताशकंद में  ही शास्त्री जी का निधन हो गया।
नीरा शास्त्री के अनुसार उनके निधन के बाद शास्त्री जी की निजी डायरी और कुछ दूसरे सामान भी परिजन को नहीं मिले ।याद रहे कि कुछ दशक पहले यह आरोप भी सामने आया था कि शास्त्री जी के निजी सेवक रामलाल की भी रहस्यमय परिस्थितियों में एक दुर्घटना के बाद मृत्यु हुई थी।रामलाल उनके साथ ताशकंद गया था।
 यह आरोप भी सामने आया था कि शास्त्री जी के साथ ताशकंद गए उनके निजी चिकित्सक डा.चुग की भी रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हुई थी।
 याद रहे कि भारत -पाकिस्तान युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच 10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौता हुआ था।उसी समझौता बैठक में शामिल होने के लिए प्रधान मंत्री शास्त्री  ताशकंद गए थे।
  शास्त्री जी मृत्यु को लेकर कई सवाल अब भी अनसुलझे रह गए हैं।इस पृष्ठभूमि में  भी नीरा शास्त्री की मांग में दम लगता है।
  शास्त्री जी के साथ तीन वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री वाई.वी.चव्हाण,सरदार स्वर्ण सिंह और जगजीवन राम ताशकंद गए थे।
सवाल है कि इसके बावजूद ऐसा क्यों हुआ कि मृत्यु के कारणों को लेकर कोई स्पष्ट मेडिकल रपट नहीं तैयार हो सकी ?
 जबकि अकस्मात मृत्यु को लेकर  शुरू में  ही संदेह पैदा हो गया था।
 शास्त्री जी को ऐसे कमरे में क्यों ठहराया गया था जहां न तो काॅल बेल था न ही किसी फोन का एक्सटेंशन  ?
शयन कक्ष के बगल के बैठकखाने में फोन था।ताशकंद में पोस्टमार्टम नहीं कराने की सलाह किसने दी  थी ?
 24 घंटे पहले ताशकंद में शास्त्री जी के ठहरने का स्थान क्यों बदला गया  था ? 
मृत्यु के बाद उनका शरीर नीला क्यों पड़ गया था ?
उस पर चंदन का लेप लगा कर उस नीलेपन को   ढकने की कोशिश क्यों की गयी थी ?
 निजी सेवक के रहते हुए किसी अन्य सेवक ने 10 जनवरी की रात में रात में शास्त्री को दूध क्यों दिया ?
दूध पीने के बाद ही शास्त्री जी की तबियत क्यों बिगड़ने लगी थी ?भारतीय राजनयिक  राय सिंह ने एक जगह लिखा है कि सोवियत संघ के मेरे  मित्रों ने मुझे बताया था कि शास्त्री जी की मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में हुई थी। 
  ललिता शास्त्री ने सन 1970 में एक साप्ताहिक पत्रिका को बताया था कि ‘मैं नहीं जानती हूं कि  उनकी मृत्यु के संबंध में संसद में क्या पूछा गया और क्या उत्तर दिया गया, लेकिन इस बात की मैं गारंटी देती हूं कि इतिहास सत्य को रेखांकित करेगा।यह मिटाया नहीं जा सकता।’
  शास्त्री जी ने प्रधान मंत्री बनने के बाद बैंक से लोन लेकर एक फिएट कार खरीदी थी।यह उनके जीवन की पहली और आखिरी निजी कार थी।
 उनके जीवन काल में वह लोन चुकता नहीं हो सका था।
उनके निधन के बाद  की केंद्र सरकार ने ललिता  शास्त्री से कहा कि सरकार उस लोन को माफ कर देना चाहती है। ललिता जी उसके लिए तैयार नहीं हुईं।उन्होंने अपनी पेंशन राशि से लोन चुकाया।
आखिर ललिता जी ने सरकार के उस  आॅफर को अस्वीकार क्यों कर दिया   जबकि वह आर्थिक कठिनाइयों में थीं ?क्या वह सरकार से नाराज थीं ?
 ललिता जी ने कुछ समय बाद ताशकंद जाकर उस स्थान को देखा था जहां 1966 में शास्त्री जी को ठहराया गया था।
बाद में ललिता जी ने कहा था कि सब सामान तो थे,पर थर्मस नहीं था।
ऐसा क्यों हुआ ? इस तरह के कुछ अन्य सवाल भी उठते रहे हैं।
यदि सारे संबंधित कागजात और सूचनाएं सामने आ जाएं तो इस मृत्यु पर पड़ा दशकों पुराना रहस्य का पर्दा उठ  जाएगा। 
@ लाइवबिहार.लाइव पर प्रकाशित@ 
  
    

विश्वसनीय पैथोलाॅजिकल जांच घरों की भारी कमी


गुणवत्तायुक्त पैथोलाॅजिकल जांच घर की अपने देश
खास कर बिहार में  सख्त कमी महसूस की जा रही है।कुछ विश्वसनीय जांच घर जरूर हैं,पर वे जरूरत के अनुपात में अत्यंत नाकाफी हैं।
 इस कमी के कारण न जाने कितने मरीज रोज -रोज धोखा खा रहे हैं।जब जांच रपट ही गलत मिलेगी तो बेचारे डाक्टर क्या इलाज करेंगे !
 मैं एक मरीज को जानता हूंं जिसने उत्तर बिहार के एक नगर में अपना लगातार टेस्ट करवाया।रपट के अनुसार उसका सुुगर नार्मल पाया जाता था।
वर्षों तक वहां से ऐसी ही रपट उसे मिलती रही।
पर जब उसने एक विश्वसनीय जांच घर में जांच करवाई , तब तक देर हो चुकी थी।इस बीच सुगर बढ़कर लगभग 300 से भी अधिक हो चुका था।
बेचारे का जीवन बर्बाद हो गया।
  इस स्थिति में एम्स को आगे आना चाहिए।उसे हर जिले में 
अपना लैब खोलना चाहिए।या फिर पतंजलि समूह यह काम भी अपने हाथ में ले।
यदि ऐसा हुआ तो बहुत से मरीज समय से पहले काल के गाल में जाने से बचेंगे। 

सिर्फ जयंती मनाओगे या कोई गुण भी अपनाओ !


  हमारे जागरूक फेसबुक मित्र अनिल सिंहा ने आज  लिखा है कि 
पटना में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि ,श्री बाबू पर कुछ कहने के बजाए अपने विरोधियों के खिलाफ बोलने में ही लगे रहे।
   अनिल जी ने ठीक ही कहा।पर क्या कीजिएगा !
आजकल ऐसे अवसरों पर ऐसा ही होता है।सिद्धांतवादी स्वतंत्रता सेनानियों की जयंती मनाने का उद्देश्य ही कुछ दूसरा होता है।
 गांधी युग के वैसे महा पुरूषों के बारे में आज के अवसरवादी नेता आखिर बोलंे तो बोलें क्या ?
 यह तो बोल नहीं सकते कि श्रीबाबू ने अपने पुत्र को अपने जीवन काल में विधायक तक नहीं बनने दिया तो मैं भी उनके ही रास्ते पर चलूंगा !
यह भी नहीं बोल सकते कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद श्रीबाबू ने अपना एक मकान तक पटना में नहीं बनवाया तो मैं भी नहीं बनाऊंगा।
श्री बाबू ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को व्यक्तिगत दुश्मन नहीं माना तो मैं भी नहीं मानूंगा,आज के नेता यह बात किस मुंह से बोलेंगे ?
  यह कैसे बोलेंगे कि चुनाव के समय श्रीबाबू अपने चुनाव क्षेत्र में नहीं जाते थे तो मैं भी नहीं जाऊंगा क्योंकि मैं बाकी के पौने पांच साल तो अपने क्षेत्र की जनता की  सेवा करता ही हूं !
  इस बात की चर्चा आज के कितने नेता कर सकेंगे कि श्री बाबू के निधन के बाद उनके पास कुछ ही हजार रुपए मिले थे जो उनके मित्रों और समर्थकों के लिए रखे हुए थे ।यह सब बोलने में शर्म नहीं आएगी !
 उनके गुणों की चर्चा करने और उनसे सीख लेने की लोगों से अपील करने में आज के अधिकतर नेताओं के सामने कठिनाइयां हैं ! क्योंकि, वे  खुद उस तरह की जीवन शैली से काफी दूर  हैं।
  इसीलिए ऐसे अवसरों पर भी आज के अधिकतर नेता अपने ताजा राजनीतिक एजेंडे को ही आगे रखते हैं।बेचारों पर दया कीजिए अनिल बाबू !  
  @ 22 अक्तूबर 2017@

चाहोगे तो मिल जाएंगे ईमानदार लोग


आज के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में 
एक उद्योगपति  के हवाले से एक सनसनीखेज बात 
छपी है।
प्रदीप नामक उस उद्योगपति  ने कहा है कि उसने एक सी.बी.आई.निदेशक पर खर्च करने के लिए मीट व्यापारी मोईन कुरैशी को  5 करोड़ रुपए से भी अधिक दिए थे।
उस व्यापारी के खिलाफ सी.बी.आई.ने केस चला रखा  था।उसे उस मामले में सी.बी.आई. से मदद की दरकार थी।
याद रहे कि विवादास्पद कुरैशी इसी साल  अगस्त में  गिरफ्तार हुआ ।उस पर 
काले धन को सफेद करने का आरोप है।
कुरैशी उस निदेशक का मित्र है।एक्सपे्रस ने उस निदेशक का नाम भी लिखा है।मैं नहीं लिख रहा हूं।केस आगे बढ़ने पर मैं भी लिखूंगा। 
  क्या यह संयोग था कि उसे सी.बी.आई.का निदेशक उस सरकार ने बनाया था जिस पर टू -जी ,कोयला घोटाला तथा इस तरह के कई अन्य महा घोटालों के आरोप लगे थे ?
  यह खबर पढ़कर मुझे अपने गांव के बगल के गांव के निवासी एक ऐसे ईमानदार अफसर राजदेव सिंह की याद आयी जिन्हें मोरारजी देसाई सरकार ने सी.बी.आई.का निदेशक बनाया था।
 पर, 1980 में सत्ता में आते ही इंदिरा गांधी सरकार ने  राजदेव सिंह को हटा दिया था।राजदेव सिंह की जगह जिसे  निदेशक बनाया,वह उच्चस्तरीय निदेश पर बिहार का चर्चित बाॅबी हत्याकांड मुकदमे को खा गया क्योंकि उसमें सत्ताधारी नेता फंसे हुए थे।
 हालांकि उससे पहले  इंडियन एक्सप्रेस के एक लेख में  राजदेव सिंह पर यह आरोप लगाया गया था कि उनकी सहानुभति इंदिरा परिवार के प्रति रही, इसीलिए इंदिरा गांधी के मेहरौली फार्म हाउस की सी.बी.आई.ने तब ठीक से तलाशी नहीं ली थी । हालांकि जहां तक मेरी जानकारी है कि उसके अनुसार  राजदेव सिंह किसी को बचाने या फंसाने वाले अफसर नहीं थे।पर ऐसे अफसर तो कुछ  सत्ताधारी नेताओं को पसंद ही नहीं आते।पसंद आते तो सी.बी.आई. को कभी-कभी  सरकार का  तोता नहीं कहा जाता।
 सारण जिले के दिघवारा के पास  स्थित राजदेव सिंह के गांव मठिया के उनके  बुजुर्ग पत्रकार मित्र ने मुझे काफी पहले एक चिट्ठी दिखाई थी।
वह चिट्ठी राजदेव सिंह की हस्तलिखित थी।आई.पी.एस.बनने के बाद भी राजदेव बाबू ने किसी खास परिस्थिति में अपने उस पत्रकार मित्र से कुछ कर्ज ले रखा था।पत्र मेेंं उन्होंने लिखा था कि आपका कर्ज मैं अब चुका दूंगा, क्योंकि मुझे कुछ भत्ता मिलने वाला है। 
  ऐसे ही एक अन्य ईमानदार व सरल अफसर दीनेश्वर शर्मा की चर्चा बिहार वाणिज्य मंडल के एक नेता एन.के.ठाकुर ने व्हाट्सेप पर की है।
 बिहार के गया जिले के बेला गंज अंचल के पाली गांव के मूल निवासी दीनेश्वर शर्मा जब गांव आते हैं तो कंधे पर गमछा रख कर अपने खेतों में काम करते पाए जाते हैं।
बेहद सरल और ईमानदार शर्मा जी जनवरी , 2015 से दिसंबर 2016 तक आई.बी. के प्रधान रहे।अब कश्मीर में वात्र्ताकार नियुक्त किए गए हैं।
   यानी, हमारे सत्ताधारी नेता चाहें तो आज भी जहां -तहां उन्हें ईमानदार व कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर मिल सकते हैं।

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

जेपी को भी जिम्मेदार मानते थे बेनीपुरी




        
‘कलम के जादूगर’ के नाम से चर्चित राम वृक्ष बेनीपुरी ने 
प्रजा समाजवादी पार्टी की दुर्दशा के लिए जय प्रकाश नारायण को भी जिम्मेदार माना था।
 इस संबंध में बेनीपुरी ने 27 अक्तूबर 1959 को  जेपी को एक लंबा पत्र लिखा था।उन्होंने लिखा कि प्रजा सोशलिस्ट ‘पार्टी को इस स्थिति में लाने का श्रेय सिर्फ लोहिया को नहीं है बल्कि आपका इसमें सबसे बड़ा हाथ है।यों तो हम सब दोषी हैं,किंतु हमारे गुण -दोष की क्या हस्ती ! आपके लिए उचित था कि आप पार्टी के साथियों को एकत्र करके इस पार्टी को भंग कर देते ,फिर राजनीति से संन्यास लेते।’
  अब जरा बेनी पुरी जी के बारे में कुछ बातें।वे एक साथ स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिक नेता, पत्रकार और साहित्यकार थे।
माक्सर्ववादी विचारक डा.राम विलास शर्मा ने उनके बारे में कभी लिखा था कि ‘हिंदी प्रदेश में क्रांतिकारी पत्रकारिता के तीन मुख्य प्रतिनिधि हैं-गणेश शंकर विद्यार्थी,माखनलाल चतंर्वेदी और राम वृक्ष बेनीपुरी।’
मैथिली शरण गुप्त ने बेनीपुरी जी के बारे में लिखा था कि ‘यह लेखनी है या जादू की छड़ी हाथ में।’
राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ‘बेनी पुरी की सजीव लेखनी वास्तविकता के साथ सौंदर्य की प्रतिष्ठा है।’
भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल पूरा होने पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 9 अगस्त को बेनीपुरी जी को श्रद्धा के साथ याद किया था।
 यह सब इसलिए लिखा कि नयी पीढ़ी जाने कि बिहार में एक समय में कैसी -कैसी प्रतिभाएं थीं।
  बेनी पुरी जी का जन्म 1899 में मुजफ्फर पुर जिले के बेनी पुर में हुआ था।उनका निधन 1968 में हुआ।जब  उन्होंने जेपी को चिट्ठी लिखी,उन दिनों  वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विधायक थे।
  वह जेपी के करीबी भी थे।
 बेनीपुरी ने जेपी को लिखा था कि ‘यह पत्र बड़े हृदय मंथन के बाद लिख रहा हूं।मैंने अपने को राजनीति से तटस्थ सा कर लिया है।प्रिय महावीर @जपला@की हत्या के बाद तो मैं राजनीति से बिलकुल निराश ही हो चुका हूं।आपने भी राजनीति छोड़ दी है।’
  प्रजा समाजवादी पार्टी भारत में समाजवाद की रजत जयंती मनाने जा रही है।सुना है,अखबारों में पढ़ा है,उसमें आप भी सम्मिलित किए गए हैं।
 मैं चाहता हूं कि जब आप वहां बोलें ,तो कुछ स्पष्टता से काम लें।यानी संतों की तरह शुभाशीष नहीं दें,चिंतकों की तरह स्पष्ट बातें भी कहें ताकि पार्टी के बारे में और अपने बारे में कुछ सोच -विचार करने का सुअवसर मिले।
 मुझे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की दुर्गति पर बहुत क्षोभ होता है।मैंने एक बार आपसे  कहा भी था कि पार्टी को  इस स्थिति मंे लाने का श्रेय सिर्फ लोहिया को नहीं है, आपका इसमें सबसे बड़ा हाथ है।यों तो हम सभी दोषी हैं,किंतु हमारे गुण -दोष की क्या हस्ती ! यह पार्टी आपने बनाई और आज जो इसकी स्थिति है,उसमें भी आपका उतना ही बड़ा हाथ है जितना इसे भारत में प्रमुखत्तम स्थान दिलाने में।’
 ‘मेरे खयाल से इसकी उन्नति और अवनति का श्रेय मुख्यतः आपके दो ‘पलायनों’ पर है।एक बार आपने हजारीबाग जेल से 
पलायन किया और यह पार्टी उन्नति की चोटी पर जा पहुंची।दूसरी बार आपने बोध गया में पलायन किया और पार्टी गड्ढे में जा गिरी।’
 बेनीपुरी जी ने अपनी  खास शैली  लिखा कि ‘इस पार्टी की मौत भी शानदार होनी चाहिए थी।
आपने इससे ऐसी मौत भी छीन ली।आज इसके अंग-अंग गल- गल कर कट -कट कर गिर रहे हैं।
आपके लिए उचित था कि आप पार्टी के साथियों को एकत्र करके इस पार्टी को भंग कर देते,फिर राजनीति से संन्यास लेते।
 जिस पार्टी को आपने जीवन के बीस उत्कृष्ट वर्ष दिए  
--1934 से 1954 तक-उसकी मिट्टी नहीं खराब हो,यह तो आपको सोचना ही था।
अब तक नहीं सोच सके तो अब भी सोचिए।
-प्रायश्चित के रूप में ही सही।सोचिए और स्पष्टता से काम लीजिए।तानाशाही बनाम जनतंत्र की चर्चा करते हुए बेनी पुरी ने जेपी को लिखा था कि ‘आपने एक बार कहा था कि अगली लड़ाई तानाशाही बनाम जनतंत्र के बीच होगी।तानाशाही दिन दिन बढ़ती जा रही है।अंतः क्यों नहीं आप सभी जनतांत्रिक शक्तियों को एकत्र करने की दिशा में प्रयत्न करें !
आज देश भी यही पुकार रहा है।
 प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को इस क्रम में पहली कड़ी बनने का सौभाग्य आप दिला सकें तो  इतिहास आपकी इस सेवा को कभी नहीं भूलेगा।जनतंत्र का एक मसीहा ही मानेगा।’
  दरअसल वह अवसर 1974-77 में आया जब जेपी ने देश में आंदोलन चलाया।
 तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की पार्टी की  1977 के चुनाव में जब भारी हार हुई तो कहा गया कि वह तानाशाही पर लोकतंत्र की जीत हुई ।यह जेपी के नेतृत्व की सफलता है।
  उससे पहले प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में 1971 में विलय हो गया।दोनों को मिलाकर सोशलिस्ट पार्टी बनी।फिर जेपी की सलाह पर सोशलिस्ट पार्टी तथा तीन अन्य प्रमुख गैर कांग्रेसी दलों को मिलाकर जनता पार्टी बनी।इसी जनता पार्टी ने कांग्रेेस को 1977 के चुनाव मेंं केंद्र की सत्ता से पहली बार बाहर कर दिया था।आपातकाल की पृष्ठभूमि में वह चुनाव हुआ था।  
@ 17 अक्तूबर 2017-लाइवबिहार.लाइव पर मेरा लेख@


  
  

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017


  छठ पर्व यानी सूर्य देवता की पूजा ।सूर्य ही ऐसे देवता हैं जिन्हें आप देख सकते हैं। आपके आसपास जो भी है,उनमें सर्वाधिक ताकतवर सूर्य ही हैं।आप बाकी का नुकसान पहुंचा सकते हैं,पर सूर्य का नहीं।
मान्यता है कि  देवताओं में वायु , जल और अग्नि भी शामिल हैं।
कुछ लोग वन देवता और वन देवी की भी चर्चा करते हैं।
मनुष्य वायु, जल, अग्नि और वन सबकों पराजित यानी बर्बाद करने के काम में लगा हुआ है।पर सूर्य को पराजित करना कौन कहे,  मद्धिम करना भी  मनुष्य के वश में नहीं है।
  एक पुरानी कहावत है।यह कहावत दुनिया भर में मशहूर हैं
कि ‘जिसे तुम पराजित नहीं कर सको,उससे मिल जाओ।’
पूरी दुनिया के चतुर -चालाक लोग यही काम करते हैं।
 चूंकि हम सूर्य को पराजित नहीं कर सकते हैं,लगता है कि शायद इसीलिए इस देश में सूर्य की पूजा यानी छठ पर्व का प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
  मुझे अपने बचपन की याद है।तब छठ पूजा बिहार के कुछ ही  जिलों में होती थी।
धीरे -धीरे अन्य जिलों में इसका  फैलाव हुआ। अब तो बिहार के लोग जहां भी गए,छठ पूजा को अपने साथ लेते गए।
 यदि सूर्य के देवता होने की बात थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दी जाए तो यह तो मानना ही पड़ेगा कि पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए उसकी उपस्थिति  अनिवार्य है।
   आॅक्सीजन के कम होने पर आप आक्सीजन मास्क का इस्तेमाल कर सकते हैं।दूषित जल यहां तक कि समुद्र जल को भी शुद्ध करके पी सकते हैं।पर सूर्य के बिना आप कैसे जिएंगे ?हालांकि हमलोगों के गलत कामों से समुद्र में भी कचड़ा बढ़ता जा रहा है।
   अपने क्षुद्र और क्षणिक स्वार्थ में  पर्यावरण को रोज -रोज बिगाड़ने में लगे इस दुनिया के लोगों का वश चलता तो वे सूर्य को भी नहीं छोड़ते।
  हमने नदियों को प्रदूषित कर दिया।गंगा जैसी औषधीय गुणों वाली विरल नदी को भी हमने कहीं का नहीं छोड़ा है।उसे करते जा रहे हैं हम प्रदूषित।हमने वायु को प्रदूषित कर दिया।करते जा रहे हैं।दिल्ली के लोगों ने तो इस दीवाली के फटाकों को लेकर न तो सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा की परवाह  की और न ही अपनी जान की ।
रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं के बेतरह इस्तेमाल के कारण धरती जहरीली बनती जा रही है।पंजाब में तो बुरी हालत है।गांव के गांव बंजर हो रहे हैं।हमने भूगर्भ जल का इतना शोषण किया और कर रहे हैं कि कुछ स्थानों में स्थिति विकराल बनती जा रही है।प्लास्टिक और इलेक्टा्रनिक कचड़ों से धरती तबाह हो रही है सो अलग।
   चलिए शुक्र है कि सूर्य आज के अदूरदर्शी मनुष्य की काली छाया की पहुंच रेखा से बहुत ऊपर है, शायद इसीलिए वंदनीय है।

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

  हमारे जागरूक फेसबुक मित्र अनिल सिंहा ने आज  लिखा है कि 
पटना में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि ,श्री बाबू पर कुछ कहने के बजाए अपने विरोधियों के खिलाफ बोलने में ही लगे रहे।
   अनिल जी ने ठीक ही कहा।पर क्या कीजिएगा !
आजकल ऐसे अवसरों पर ऐसा ही होता है।सिद्धांतवादी स्वतंत्रता सेनानियों की जयंती मनाने का उद्देश्य ही कुछ दूसरा होता है।
 गांधी युग के वैसे महा पुरूषों के बारे में आज के अवसरवादी नेता आखिर बोलंे तो बोलें क्या ?
 यह तो बोल नहीं सकते कि श्रीबाबू ने अपने पुत्र को अपने जीवन काल में विधायक तक नहीं बनने दिया तो मैं भी उनके ही रास्ते पर चलूंगा !
यह भी नहीं बोल सकते कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद श्रीबाबू ने अपना एक मकान तक पटना में नहीं बनवाया तो मैं भी नहीं बनाऊंगा।
श्री बाबू ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को व्यक्तिगत दुश्मन नहीं माना तो मैं भी नहीं मानूंगा,आज के नेता यह बात किस मुंह से बोलेंगे ?
  यह कैसे बोलेंगे कि चुनाव के समय श्रीबाबू अपने चुनाव क्षेत्र में नहीं जाते थे तो मैं भी नहीं जाऊंगा क्योंकि मैं बाकी के पौने पांच साल तो अपने क्षेत्र की जनता की  सेवा करता ही हूं !
  इस बात की चर्चा आज के कितने नेता कर सकेंगे कि श्री बाबू के निधन के बाद उनके पास कुछ ही हजार रुपए मिले थे जो उनके मित्रों और समर्थकों के लिए रखे हुए थे ।यह सब बोलने में शर्म नहीं आएगी !
 उनके गुणों की चर्चा करने और उनसे सीख लेने की लोगों से अपील करने में आज के अधिकतर नेताओं के सामने कठिनाइयां हैं ! क्योंकि, वे  खुद उस तरह की जीवन शैली से काफी दूर  हैं।
  इसीलिए ऐसे अवसरों पर भी आज के अधिकतर नेता अपने ताजा राजनीतिक एजेंडे को ही आगे रखते हैं।बेचारों पर दया कीजिए अनिल बाबू !  
  @ 22 अक्तूबर 2017@