गुरुवार, 16 नवंबर 2017

 रिपब्लिक टी.वी.पर प्रकाश सिंह की यह दूसरी बड़ी स्टोरी 
है।ताजा स्टोरी पटना लोअर कोर्ट के घूसखोर कर्मियों के स्टिंग आपरेशन से संबंधित है।
प्रकाश ने पहली बड़ी और सनसनीखेज स्टोरी इस टीवी के उद्घाटन के दिन ही यानी गत मई में ब्रेक की थी।
उसमें  जेल से मो.शहाबुद्दीन से लालू प्रसाद की फोन पर बातचीत का विवरण था।
उस स्टोरी की भी देश भर में चर्चा हुई थी।
दूसरी बड़ी स्टोरी भी कानून के शासन से जुड़ी है जो कल ब्रेक हुई।
पटना सिविल कोर्ट के कर्मियों द्वारा रिश्वत लेकर काम करते हुए स्टिंग आपरेशन किया था प्रकाश सिंह ने।यह हिम्मत का काम है।ऐसी हिम्मत की पत्रकारिता जगत में कमी होती जा रही है।
 रिश्वत तो अन्य सरकारी दफ्तरों में भी ली जाती रही है।
 पर यह काम ‘न्याय के घर’ में हो तो बात चिंताजनक हो जाती है।फिर कोई कहां जाएगा ?
 यह माना जाता है कि जिसे पुलिस-प्रशासन से  न्याय नहीं मिलता,उसे अदालतों से मिलता है।अनेक मामलों में मिल भी रहा है।
  पर यदि एक मामले मंे भी अदालत मेंे घूस चल जाए तो फिर उससे लोगों का विश्वास हिल जाता है।
यह अच्छी बात है कि रिपब्लिक टी.वी.के स्टिंग आपरेशन को पटना हाई कोर्ट ने गंभीरता से लिया है।उम्मीद है कि हाई कोर्ट विश्वास बहाली का काम करेगा।
  यह किसी न्यूज चैनल और उसके संवाददाता की सफलता है।
 ऐसी रिर्पोंटिंग के लिए जितनी कुशलता और हिम्मत की जरूरत है,वह सब इस चैनल और उसके संवाददाता में मौजूद है।यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है।
लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि उसके चारों प्रमुख स्तम्भ ईमानदारी से काम करते रहें।


बुधवार, 15 नवंबर 2017

संयोग से मैंने आज सुबह इ टी नाउ चैनल लगा दिया।
उस पर न्यायपालिका पर गंभीर चर्चा चल रही थी।
मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि अतिथियों में कोई
 व्यक्ति अपनी बारी से पहले नहीं बोल रहा था।
विभिन्न  चैनलों पर इन दिनों जारी  टाॅक शो के भारी शोर गुल, हंगामे और अशालीन शब्दों के प्रयोग के कारण उत्पन्न भीषण गर्मी के बीच  इ टी नाउ पर  आज की चर्चा ठंडीे हवा के झोंके की तरह थी।
   अन्य चैनलों को भी चाहिए कि जहां तक संभव हो सके वे शालीन स्वभाव के वैसे अतिथियों को ही बुलाएं जिनकी आदत बारी से पहले बोलने की ना हो।यदि कोई बोलते हैं तो उनकी आवाज बंद कर दी जानी चाहिए।
इससे होगा यह कि श्रोतागण  बातें सुन और समझ सकेंगे ।उनके समय का सदुपयोग होगा।चैनलों और एंकरों की साख बढ़ेगी।
 चैनलों पर आने वाले कुछ खास नेता तथा अन्य पेशे के कुछ ऐसे लोग हैं जो अपनी उदंडता के लिए कुख्यात हैं।वे न तो शालीनता का ध्यान रखते हैं और न ही एंकरों की बात मानते हैं।यह भी नहीं सोचते कि उनकी बात  कोई सुन या समझ पा रहा है भी या नहीं ।
पता नहीं, कुछ एंकर भी ऐसे शोरगुल की अनुमति क्यों देते हैं ! जहां भी मैं किसी चैनल पर ऐसे उदंड वक्ताओं-प्रवक्ताओं  को देखता हूं, तुरंत चैनल बदल देता हूं।
 वैसे भी शोरगुल और हंगामे के कारण ऐसी टी वी चर्चाओं में मेरी रूचि कम होती जा रही है।
आप कहेंगे कि इ टी नाउ की आज की चर्चा में जितने प्रतिष्ठित व शालीन लोगों को बुलाया गया था,उतनी संख्या में  प्रतिष्ठित व शालीन लोग राजनीतिक चर्चाओं के लिए  उपलब्ध ही नहीं हैं।पर मेरी समझ है कि चैनल वाले यदि खोजेंगे तो मिल सकते हैं।राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं में से भी कुछ शालीन हैं तो कुछ अन्य अशालीन।
 हालांकि मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जितने अतिथि इन दिनों चैनलों पर आते हैं, वे सब के सब अशालीन ही हैं।उनमें कुछ  शालीन लोग भी हैं।पर उनकी आवाज दब  जाती है।   

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

खुशवंत सिंह चाहते थे कि नेहरू के खिलाफ लिखने वाले मथाई पर सरेआम लगे कोड़े




मशहूर पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह ने कहा था कि जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ लिखने वाले एम.ओ.मथाई को सरेआम कोड़े लगाए जाने चाहिए।
पाकिस्तान  के जिया उल हक जैसा शासक यहां होता तो वह मथाई को चैराहे पर कोड़े लगाने के लिए यहां भी कानून बनाता।
 पर, अपने खिलाफ लिखने वालों के साथ  खुद प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू का ऐसा सलूक नहीं था।वे कैसा  सलूक  
करते थे,उसका नूमना दिल्ली का एक बड़ा अखबार समूह था।
  प्रधान मंत्री नेहरू ने उस अंग्रेजी दैनिक अखबार और उस ग्रूप की साप्ताहिक पत्रिका का प्रवेश तीन मूत्र्ति भवन में बंद करवा दिया था।बस इतना ही।कोई दूसरी दंडात्मक कार्रवाई नहीं।तब प्रधान मंत्री तीन मूत्र्ति भवन में रहते थे।
  एम.ओ.मथाई प्रधान मंत्री नेहरू के 13 साल तक निजी सचिव रहे।
मथाई ने  नेहरू के सार्वजनिक जीवन और निजी जीवन के बारे में सत्तर के दशक में कई जानी-अनजानी बातें लिखीं।
 दो खंडों में लिखी गयी संस्मरणात्मक पुस्तकों को तब इंदिरा गांधी ने भी पढ़ी थी।
उन्होंने तो मथाई पर कोई कार्रवाई नहीं की किंतु  मीडिया और राजनीतिक हलकों में उस पर काफी चर्चाएं हुईं।तीखी प्रतिक्रियाएं भी हुईं।
उन पुस्तकों में जहां अधिकतर मामलों में नेहरू की तारीफ की गयी है,वहीं कुछ बातें  उनके खिलाफ भी जाती हैं।
इन पुस्तकों को पढ़ने पर  कई लोगों की यह धारणा बनी  कि किसी नेता के निजी सचिव को अपने बाॅस के बारे में ऐसी बातें ंंनहीं लिखनी चाहिए।यदि लिखता है तो उसे नमक हराम ही माना जाएगा।
कुछ लोगों ने मथाई को सरेआम नमक हराम  कहा। मथाई ने इस पर यह सफाई दी कि ‘सच कहा जाए तो नेहरू जी भी मेरे उतने ही आभारी थे जितना मैं उनका।’
  मथाई की नेहरू के बारे में कुल मिलाकर कैसी राय थी,उसे मथाई की सिर्फ एक टिप्पणी से समझा जा सकता है।
एक बार जार्ज फर्नांडिस ने नेहरू के खिलाफ एक कड़ा बयान दिया था।उस पर मथाई ने कहा कि नेहरू एक महान नेता थे।
जार्ज फर्नांडिस नेहरू के जूते का फीता बांधने की भी औकात नहीं रखते ।’
  लोहियावादी समाजवादियों की एक विचार पत्रिका ‘सामयिक वात्र्ता’ ने मथाई की पुस्तकोंे के बारे में अपने 1979 के  जुलाई अंक में लिखा कि ‘पुस्तक में इंदिरा गांधी और उनके बेटों के बारे में ऐसी चर्चाएं हैं जिसे हमारे भद्र समाज के लोग अच्छा नहीं मानते हैं।अपनी दोनों पुस्तकों से मथाई ने अपने को निश्चय ही छिछला व्यक्ति साबित कर दिया है।पर दोनों पुस्तकें उन लोगों के छिछलेपन को भी प्रकट करती है जिन्हें हम संभ्रांत ,सुरूचिसंपन्न और बहुत कुछ समझते हैं।
और इसी अर्थ में मथाई के छिछलेपन के बावजूद उनकी पुस्तकों का अर्थ गंभीर हो जाता है।’
 मथाई की एक पुस्तक का नाम है -नेहरू युग,जानी-अनजानी बातेंें।दूसरी पुस्तक का नाम है-नेहरू के साथ तेरह वर्ष।हिंदी में उन्हें वाणी प्रकाशन ने छापा था।पर अब वे पुस्तकें शायद आउट आॅफ प्रिंट हो गयी हंै।
 कुछ बातों और विवादों को नजरअंदाज कर दें तो इन दो पुस्तकों को पढ़ने से यह लग जाता है कि आजादी के बाद के हमारे शासकों ने देश के साथ कितना अच्छा और कितना बुरा किया।
दरअसल मथाई तेरह साल तक केंद्र की सत्ता के जितना करीब थे,उतना अन्य कोई नहीं था।इसीलिए कुल मिलाकर मथाई की किताबों का कोई जोड़ नहीं है।
   किसी एक लेखक की पुस्तक से किसी शीर्ष नेता की पूरी अच्छाइयों और सारी कमियों का एक साथ पता चल जाए,ऐसा बहुत कम होता है।पर मथाई ने यह काम कर दिया है।
 मथाई की पुस्तक के महत्व का इस बात से भी पता चलता है कि  यू.पी.एस.सी.की तैयारी कराने वाली एक नामी संस्था ने अनिवार्य रूप से पढ़ी जाने वाली पुस्तकों की सूची में मथाई की पुस्तकों को भी उन दिनों शामिल किया था।
मेरी भी यह राय रही है कि आजादी के तत्काल बाद के भारत की दशा-दिशा किसी को जाननी हो तो उसे मथाई की पुस्तकें पढऩी  चाहिए ।और, आजादी के शुरूआती वर्षों के  बिहार के हुक्मरानों  को बाहर -भीतर से जानना हो तो अय्यर कमीशन की रपट पढ़ी जानी चाहिए।@लाइवबिहार.लाइव में 14 नवंबर 2017 को प्रकाशित मेरे काॅलम भूले-बिसरे से@

   
  
  


  

दुनिया के अनेक देशों के नागरिकों के लिए अनिवार्य 
सैनिक सेवा या ट्रेनिंग का कानूनी प्रावधान है।
ब्रिटेन के राज कुमार भी युद्ध भूमि में सैनिक बन कर जा चुके हैं।
  ऐसे देशों में भी नागरिकों के लिए भी सैनिक प्रशिक्षण व सीमित अवधि के लिए सेवा का प्रावधान है जिन देशों पर युद्ध का खतरा नहीं रहता है।
पर हमारे देश में न सिर्फ बाहरी बल्कि ‘घोषित -अघोषित आंतरिक युद्ध’ भी होते रहते हैं।फिर भी यहां ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
 इस देश के भीतर ही इस देश के खिलाफ सक्रिय लोगों की ताकतवर जमात सक्रिय है।वे ऐसा नहीं होने देंगे।
 यहां के राजनीतिक नेताओं के परिजन तो शायद ही सैनिक सेवा में जाते हैं।
  ऐसे में कुछ अच्छे नेताओं को ही इस दिशा में पहल करनी होगी।
देश से ममता रखने वाले जो राजनीतिक दल हैं,वे इस दिशा में एक महत्वपूर्ण काम कर सकते हैं।
वे संसद और विधान सभाआंे के 10 प्रतिशत सीटें ऐसे उम्मीदवारों के लिए रिजर्व कर दें जिनके पुत्र सेना में हैं।फिर देखिए कितना फर्क पड़ता है।
    


शालीन हंसी और चुटीले व्यंग्यों से संसद को जीवंत बनाये रखते थे पीलू




बात उस समय की है जब पीलू मोदी भारतीय लोक दल में थे।संभवतः वे दल के राष्ट्रीय महा सचिव थे।उसके नेता चैधरी चरण सिंह थे और बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर भी उसी दल में थे।
 पीलू मोदी पटना आए थे।भालोद के राज्य कार्यालय में मोदी एक आराम कुर्सी पर बैठे थे।
  बगल की एक कुर्सी पर बैठकर कर्पूरी ठाकुर उनसे बातचीत कर रहे थे।
  कर्पूरी जी ने कहा कि ‘मोदी साहब, यदि आप बिहार पार्टी के लिए एक हेलिकाॅप्टर का प्रबंध कर दें तो हम विधान सभा की आधी सीटें जीत जाएंगे।’
  इस पर बिना देर किए मोदी ने कहा कि ‘दो का प्रबंध कर देता हूं।पूरी सीटें जीत जाओ।अरे भई, चुनाव हेलिकाॅप्टर से नहीं जीते जाते।’
  हंसी में बात आई -गई हो गयी।
देर तक पास में बैठ कर मैं उन दोनों दिग्गजों की बातें सुनता रहा था।
उस संवाद के जरिए  मुझ पर पीलू मोदी ने एक छाप छोड़ दी।
 उनके बारे में अधिक जानने की कोशिश करने लगा।जाना भी। उनके साथ सबसे बड़ी बात यह थी कि वे सदाबहार व्यक्तित्व के धनी थे।
उनके समकालीन पत्रकार शरद द्विवेदी ने उनके बारे में लिखा है कि ‘पीलू मोदी की भाषण कला,अंग्रेजी भाषा पर अद्वितीय अधिकार, वाक् पटुता और सुलझे हुए विचार सभी को आकर्षित करते थे।कटाक्ष करने में वह माहिर थे।उनके कटाक्ष और हाजिरजवाबी सुनने वालों को हंसा देते थे।जिसकी भाषा ऐसी होती थी कि कटाक्ष के शिकार भी उनका आनंद लेते थे।
लेकिन कभी किसी के लिए बुरी भावना उनके मन में नहीं थी।
पत्रकार सी.एस.पंडित के अनुसार ‘ उस घटना को शायद ही कोई भूल सकता है जब एक दिन संसद के केंद्रीय हाल में पीलू मोदी अपने गले में एक पट्टा पहन कर आए जिस पर लिखा था ‘ मैं सी.आई.ए.का एजेंट हूं।’ यह उस आलोचना का जवाब था जो संसद में कुछ दिन पहले सत्तारूढ़ दल की ओर से की गयी थी।
  पीलू मोदी, सर होमी मोदी के पुत्र थे जो संयुक्त प्रांत के गवर्नर रह चुके थे।
पीलू मोदी के भाई रूसी मोदी टिस्को के चेयरमैन थे।
पीलू ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में वास्तु शिल्प की पढ़ाई की थी।
वहां पीलू मोदी जुल्फिकार अली भुट्टो के रूम मेट थे।
पीलू की एक चर्चित किताब है ‘जुुल्फी माई फं्रेंड।’ वह 1973 में लिखी गयी।
  14 नवंबर 1926 को जन्मे पीलू मोदी का 29 जनवरी 1983 को निधन हो गया।तब वे राज्य सभा के सदस्य थे।
उससे पहले पीलू मोदी 1967 और 1971 में गोधरा से लोक सभा के लिए चुने गए थे।पर वे 1977 में हार गए थे।
1960 में स्थापित स्वतंत्र पार्टी के संस्थापकों में एक पीलू मोदी राज गोपालाचारी के करीबी थे।
  कम ही लोग जानते हैं कि दिल्ली के ओबराय होटल की वास्तु रचना पीलू मोदी ने ही की थी।
 पर वे देश में जिस नयी राजनीति की रचना करना चाहते थे,वह काम वे पूरा नहीं कर सके।
 वे कहा करते थे कि इस देश के 50 हजार बदमाश विभिन्न तरह की ताकत की कुर्सियों पर बैठ कर अपनी स्वार्थ सिद्धि कर रहे हैं।
उनको सबक सिखाने  के लिए हम 5 लाख युवक -युवतियों की फौज बनाना चाहते हैं।
इस सिलसिलमें वे करीब डेढ़ लाख नाम एकत्र भी कर चुके थे।पर इस बीच उनका निधन हो गया।
  यानी सदाबहार व्यक्तित्व के स्वामी पीलू लोगों को हंसाने के अलावा गंभीर काम में भी लगे रहते थे।वे एक पत्रिका भी निकालते थे। 
 वे बाहर -भीतर से एक थे।
एक बार उन्हें जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का
प्रयास कुछ लोगों ने किया था।पर उस राह में शराब बाधक बन गयी।जनता पार्टी से जुड़े किसी बड़े गांधीवादी नेता ने मोदी से पूछवाया कि क्या आप शराब भी पीते हैं ? पीलू ने बिना देर किए कह दिया हां, अवश्य पीता हंू, ।इसी आधार पर उनका नाम कट गया।पर उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं थी।
 इस संबंध में पीलू के एक समकालीन सांसद ने लिखा है कि हम सब जानते हैं कि पीलू का पीना महीने में एकाध बार ही होता है।फिर भी पीलू ने कह दिया था कि ‘मैं जो खाउं, जो पीउ, वह मेरा अधिकार है।इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं मानूंगा।’
 चैथी लोक सभा में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के डा.राम मनोहर लोहिया ने लोक सभा में एक निजी विधेयक पेश किया था।लोहिया का प्रस्ताव था कि किसी भी व्यक्ति का खर्च प्रति माह 15 सौ रुपए से अधिक नहीं होना चाहिए।
स्वतंत्र पार्टी के एक सांसद ने उस विधेयक का सदन में मजाक उड़ाया।
सांसद का कहना था कि लोहिया का मजाक उड़ाने का निदेश उनकी पार्टी ने दिया था।
 पर पीलू मोदी ने इसे लोहिया का अपमान माना।उस संासद को लेकर पीलू लोहिया के आवास पर गए।
सांसद ने लोहिया के सामने अपने किए पर अफसोस प्रकट किया।
लोहिया ने उस सांसद से कहा कि  ‘तुमने तो यह  असंभव मांग कर दी कि मैं लोगों की मनोवृत्ति बदलूं। अरे भई, मैं संन्यासी तो हूं नहीं।राजनीति का खिलाड़ी हूं।’   
 @ मेरा यह लेख 14 नवंबर, 2017 के फस्र्टपोस्ट हिंदी में प्रकाशित@ 


   

चीन युद्ध के बाद अगर नेहरू लंबी जिंदगी जीते तो बदल जाती भारत की विदेश नीति




    चीन और सोवियत संघ से झटके खाने के बाद यदि प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू कुछ अधिक दिनों तक जीवित रहते तो वे संभवतः भारत की विदेश नीति को पूरी तरह बदल देते।
  उसका असर घरेलू नीतियों पर भी पड़ सकता था।
 चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय के दिनों के कुछ दस्तावेजों से यह साफ है कि नेहरू के साथ न सिर्फ चीन ने धोखा किया बल्कि सोवियत संघ ने भी मित्रवत व्यवहार नहीं किया।
 याद रहे कि जवाहर लाल नेहरू उन थोड़े से उदार नेताओं में शामिल थे जो समय -समय पर अपनी गलतियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते रहे।
 कांग्रेस पार्टी के भीतर भी कई बार वे अपने सहकर्मियों की राय के सामने झुके।
1950 में नेहरू ने पहले तो राज गोपालाचारी  को राष्ट्रपति बनाने की जिद की, पर जब उन्होंने देखा कि उनके नाम पर पार्टी के भीतर आम सहमति नहीं बन रही है तो नेहरू बेमन से राजेंद्र बाबू के नाम पर राजी हो गए।ऐसा कुछ अन्य अवसरों पर भी हुआ था।
उन्होंने समाजवादी व प्रगतिशील देश होने के कारण चीन और सोवियत संघ पर पहले तो पूरा भरोसा किया,पर जब उन लोगों ने धोखा दिया तो नेहरू टूट गए।उन्होंने अपनी पुरानी लाइन के खिलाफ जाकर अमेरिका की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया।
अमेरिका के भय से ही तब चीन ने हमला बंद कर दिया था।
  यह आम धारणा है कि 1962 में सोवियत संघ ने कहा कि ‘दोस्त भारत’ और ‘भाई चीन’ के बीच के युद्ध में हम हस्तक्षेप नहीं करंेगे।
 पर  मशहूर राजनीतिक टिप्पणीकार व कई पुस्तकों के लेखक ए.जी.नूरानी ने 8 मार्च , 1987 के  साप्ताहिक पत्रिका  इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया में एक लंबा लेख लिख कर यह साबित कर दिया कि सोवियत संघ की सहमति के बाद ही चीन ने 1962 में भारत पर चढ़ाई की थी।
 उस लेख में नूरानी ने सोवियत अखबार ‘प्रावदा’ और चीनी अखबार पीपुल्स डेली में 1962 में छपे संपादकीय को सबूत के रूप में पेश किया है।
  उससे पहले खुद तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू वास्तविकता से परिचित हो चुके थे।
 इसीलिए उन्होंने अमेरिका के साथ के अपने ठंडे रिश्ते को भुलाकर 
राष्ट्रपति जाॅन एफ.कैनेडी को मदद के लिए कई त्राहिमाम संदेश भेजे।
  उससे कुछ समय पहले कैनेडी से नेहरू की एक मुलाकात के बारे में खुद कैनेडी ने एक बार कहा था कि ‘नेहरू का व्यवहार काफी ठंडा रहा।’
 चीन ने 20 अक्तूबर, 1962 को भारत पर हमला किया था।
चूंकि हमारी सैन्य तैयारी लचर थी।हम ‘पंचशील’ के मोहजाल में जो फंसे थे ! नतीजतन चीन हमारी जमीन पर कब्जा करते हुए आगे बढ़ रहा था।
 उन दिनों बी.के.नेहरू अमेरिका में भारत के राजदूत थे।
नेहरू का कैनेडी के नाम त्राहिमाम संदेश इतना दयनीय और समर्पणकारी था कि नेहरू के रिश्तेदार बी.क.े नेहरू कुछ क्षणों के लिए इस दुविधा में पड़ गए कि इस पत्र को व्हाइट हाउस तक पहुंचाया जाए या नहीं।पर खुद को सरकारी सेवक मान कर उन्होंने वह काम बेमन से कर दिया।दरअसल उस पत्र में अपनाया गया रुख उससे ठीक पहले के नेहरू के अमेरिका के प्रति विचारों से  विपरीत था।
 लगा कि इस पत्र के साथ नेहरू अपनी गलत विदेश नीति और घरेलू नीतियों को बदल देने की भूमिका तैयार कर रहे थे।
  शायद नयी पीढ़ी को मालूम न हो, इस देश की कम्युनिस्ट पार्टी  इस सवाल पर दो हिस्सों  में बंट गयी ।
एक गुट मानता था कि भारत ने ही चीन पर चढ़ाई की थी।
 याद रहे कि नेहरू ने 19 नवंबर, 1962 को कैनेडी को लिखा था कि ‘न सिर्फ हम लोकतंत्र की रक्षा के लिए बल्कि इस देश के अस्तित्व की रक्षा के लिए भी चीन से हारता हुआ युद्ध लड़ रहे हैं।इसमें आपकी तत्काल सैन्य मदद की हमें सख्त जरूरत है।’
भारी तनाव, चिंता और डरावनी स्थिति के बीच उस दिन नेहरू ने अमेरिका को दो -दो चिट्ठियां लिख दीं।
इन चिट्ठियों को पहले गुप्त रखा गया था ताकि नेहरू की दयनीयता देश के सामने न आए।
पर चीनी हमले की 48 वीं वर्षगाठ पर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने उन चिट्ठियों को छाप दिया।
  याद रहे कि आजादी के बाद भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति अपनाने की घोषणा की थी।
पर वास्तव में कांग्रेस सरकारों का झुकाव सोवियत लाॅबी की ओर
था।
यदि नेहरू 1962 के बाद कुछ साल और जीवित रहते तो अपनी इस असंतुलित विदेश नीति को बदल कर रख देते।
पर एक संवदेनशील प्रधान मंत्री, जो देश के लोगों का ‘हृदय सम्राट’ था, 1962 के  धोखे के बाद भीतर से टूट चुका  था।इसलिए वह युद्ध के बाद सिर्फ 18 माह ही जीवित रहे।
  चीन युद्ध में पराजय से हमें यह शिक्षा मिली कि किसी भी देश के लिए राष्ट्रहित और सीमाओं की रक्षा का दायित्व सर्वोपरि होना चाहिए।भारत सहित विभिन्न देशों की जनता भी आम तौर इन्हीं कसौटियों पर हमारे हुक्मरानों को कसती रहती है। 
@ फस्र्टपोस्ट हिंदी में 14 नवंबर, 2017 को मेरा यह लेख प्रकाशित हुआ@




    

सोमवार, 13 नवंबर 2017

विदेशी तो लुटेरे थे ही देसी का भी वही हाल !


जदयू के राज्य सभा सांसद और प्रभात खबर के पूर्व 
प्रधान संपादक हरिवंश ने काले धन को लेकर ‘प्रभात खबर’ में दो हिस्सों में सरल भाषा में महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं।
 उसकी कुछ ही लाइनें यहां उधृत कर रहा हूं।
‘नोटबंदी के बाद जिन तीन लाख संदिग्ध कंपनियों के बारे में  पता चला था,जिनके  माध्यम से काले धन की लेनदेन की आशंका है, उनमें से दो लाख 20 हजार कंपनियों का रजिस्ट्रेशन रद किया जा चुका है।’
     ‘.......हमारे देश में एक कंपनी भी बंद करो  तो काले झंडों के जुलूस निकलते हैं।दो लाख से अधिक कंपनियां बंद की गयी।पर कोई समाचार नहीं आ रहा है।’
  ‘......शेल कंपनियों द्वारा निर्यात का फर्जी बिल बना कर विदेशों से भारत में पैसे लाए जाते हैं।ऐसी कंपनियां बनाने वालों में बड़े राज नेता और बड़े कारोबारी शामिल हैं।’
   कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आजादी के बाद से ही  हमारे अधिकतर हुक्मरानों ने इस देश को चारों -डकैतों के लिए अच्छा -खासा चारागाह बना कर रख दिया।
1985 में राजीव गांधी ने यूं ही नहीं , सौ पैसों में से 85 पैसे बीच में गायब कर दिए जाने की  बात नहीं उठाई थी।
  शेल कंपनियां ऐसी डकैती की बहुत बड़ी साधन रही है।इसकी गंभीरता का पता देश में कम ही लोगों को रहा है।
ऐसी सूचनाएं आम जनता की भाषा में देकर हरिवंश ने देश का कल्याण किया है।
  पर दूसरी ओर इसी तरह की भयंकर लूट
की खबर इन दिनों इंडियन एक्सप्रेस दे रहा है।उस पैराडाइज पेपर्स मामले की जांच इस देश की बहु एजेंसी समूह करेगा।
पैराडाइज के दस्तावेज के मुताबिक 714 भारतीय व्यक्तियों और इकाइयों ने भारत सरकार को  बताए बिना विदेश में निवेश किया है।
  अंग्रेजी नहीं जानने वाली जनता उन खबरों को विस्तार से नहीं जान-समझ  पा रही है।
प्रभाष जोशी आज होते तो  संभवतः वे जनहित में उसे पूरा का पूरा अनुवाद करा कर जनसत्ता में भी छापते।
यदि एक्सप्रेस को एतराज होता तो जनसत्ता में  एक दिन बाद ही छपता।एक दिन देर से ही सही, पर देश की अधिकतर आबादी यह जान तो पाती कि आजादी के बाद भी हमारे देश के साथ क्या-क्या होता रहा है।आजादी के पहले इस सोने की चिडि़या को जम कर लूटा ही गया था।