गुरुवार, 23 नवंबर 2017

  सत्तर के दशक की बात है। बिहार के एक बड़े नेता ने आत्म हत्या कर ली।उन दिनों इस बात की चर्चा थी।
नेता जी स्वतंत्रता सेनानी थे।बाद में बिहार सरकार के मंत्री बने थे।उन पर भ्रष्टाचार केे आरोप लगे थे।जेल जाने की नौबत आ गयी थी।
स्वतंत्रता सेनानी के रूप में तो वे सगर्व जेल जाते थे।पर, भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाने से बेहतर उन्होंने मर जाना समझा।
हालांकि उन पर मामूली आरोप थे।
  देश में आज के अनेक नेताओं पर सरकारी खजाने की लूट और महा लूट के जितने बड़े-बड़े आरोप लग रहे हैं,उनके मुकाबले उस नेता जी  पर जो आरोप थे,उसे अधिक से अधिक ‘पाॅकेटमारी’ का आरोप कहा जा सकता है।आज कितना फर्क आ गया है राजनीति में पहले के मुकाबले !
  

रविवार, 19 नवंबर 2017

अस्पतालों-बाजारों के शौचालयों को ठीक कराए राज्य सरकार



बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय और नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा इन दिनों अपने -अपने विभाग के कामों को ठीकठाक करने के लिए सक्रिय नजर आ रहे हैं।
  अच्छी बात है।उत्साह और अच्छी मंशा को देख कर उम्मीद की जा सकती है कि इन विभागांे में अब बेहतरी आएगी।
पर पुराने अनुभव बताते हैं कि  शुरूआती उत्साह पर पानी फिर जाता है जब वास्तविकता से पाला पड़ता है।
दरअसल  आम लोगों से संबंधित इन विभागों को भीषण भ्रष्टाचार ने जितनी मजबूती से जकड़ रखा है,उसमेंे कुछ परिणामदायक काम कर पाना असंभव नहीं तो बहुत कठिन जरूर है।
न तो सभी सरकारी डाक्टरों को उनकी ड्यूटी पर हाजिर कराना
आसान काम है और न ही नगरों की सफाई कराना।
देखना है कि नये मंत्री कितना सफल होते हैं ! मेरी शुभकामना हे।
  हां, ये मंत्री द्वय अपने- अपने महकमे के तहत आने वाले   शौचालयों को ही ठीक कर पाएं तो भी वे नाम कमा लेंगे।
 किसी व्यक्ति की सफाई पसंदगी की जांच इससे नहीं होती कि वह अपना ड्राइंग रूम कितना साफ रखता है बल्कि इससे होती है कि वह शौचालय और रसोई घर के साथ कैसा सलूक करता है।
सन 1972 के मुख्यमंत्री केदार पांडे सिर्फ एक काम के लिए आज भी यदा-कदा याद किए जाते हैं।उनकी सरकार ने परीक्षाओं में कदाचार को बिलकुल ही समाप्त कर दिया था।
    क्या पटना के मौर्य लोक मार्केट काम्प्लेक्स के शौचालयों को ठीक करना आसान काम है ? वर्षों  के अनुभव बताते हैं कि इस काम में बड़े -बड़े हुक्मरान फेल कर गए हैं।
उधर मौर्य लोक जाने वाले हजारों स्त्री -पुरुषों को कितनी परेशानी होती है, वह वे ही जानते हैं।
 वहां अभी जो शौचालय है, वह नरक तुल्य है।उसमें कोई प्रवेश भी नहीं करना चाहता।
 यही हालत राज्य के अन्य मार्केट के शौचालयों का भी  है।कई स्थानों में तो शौचालय हैं ही नहीं।
इससे अधिक मुश्किल काम तो है सरकारी अस्पतालों और निजी क्लिनिकों के शौचालयों को इस्तेमाल लायक बनाना है।
अनेक निजी क्लिनिकों में तो शौचालय का कोई प्रावधान ही नहीं होता है।हैं भी वे इस्तेमाल लायक नहीं होते जबकि चिकित्सकों की आय कम नहीं है।
वैसे विभिन्न पैथों से जुड़े वैसे चिकित्सकों के क्लिनिकों में भी शौचालय नहीं हंै जहां रोज सैकड़ों मरीज और उनके परिजन जाते हैं। इस मानवीय पक्ष की ओर संबंधित मंत्री ध्यान देंगे तो उन्हें लोगबाग याद रखेंगे।
  भ्रष्टाचार के खिलाफ हाईकोर्ट की सराहनीय पहल--
एक निजी चैनल ने स्टिंग आपरेशन के जरिए पटना लोअर कोर्ट के 
कर्मचारियों को रिश्वत लेते पकड़ा और पटना हाई कोर्ट ने तत्काल  उन्हें निलंबित कर दिया।
हाई कोर्ट की इस पहल की सराहना हो रही है।
इस कदम से हाई कोर्ट से लोगों की उम्मीदें बढ़ी हैं।
दरअसल ऐसा भ्रष्टाचार सिर्फ पटना कोर्ट तक ही सीमित नहीं है।हाईकोर्ट से उम्मीद बंधी है कि वह अन्य जिलों की ओर भी
ध्यान देगा ताकि आम लोगों की कठिनाइयां कम हो सकें। 
  कचहरियों में ऐसी घूसखोारी की खबरें पहले भी मिलती रही हैं।
पर ताजा स्टिंग आपरेशन में जिस तरह निर्भीक होकर बेशर्मी से और अधिकारपूर्ण ढंग से पैसे ऐंठते हुए कर्मचारी देखे जा रहे हैं,उससे लगता है कि हाल के वर्षों में भ्रष्ट कर्मी अधिक निर्भीक हो गए हैं।
ऐसी निर्भीकता उनमें कैसे आई ?
हाई कोर्ट प्रशासन को इस मनोवृति के पीछे के कारणों की जांच करनी होगी।तभी इस समस्या का समाधान हो पाएगा और गरीब व निःसहाय वादी -प्रतिवादी राहत पा सकेंगे।
   भ्रष्टाचार चीन में अधिक या भारत में ?---
चीन में यह कहा जा रहा है कि ‘यदि चीन खुद को सोवियत संघ की तरह तबाह होने से बचाना चाहता है तो उसे भ्रष्टाचार से और मजबूती से लड़ना होगा।’ क्या भारत के हुक्मरान और विरोधी दलों के नेतागण इस बात पर आकलन  करेंगे कि हमारे यहां चीन से कम भ्रष्टाचार है या अधिक ?
यदि इस देश में भ्रष्टाचार बढ़ता गया तो इस देश का क्या हाल होगा ?
भारत में क्यों भ्रष्टाचार हमेशा ही एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है ?
क्या भ्रष्टाचार कभी देशहित का मुददा  भी बनेगा ? कुछ अपवादों को छोड़ दें तो देश के हर कोने से और हर महकमे से भीषण भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं।
भ्रष्टाचार को लेकर दिग्गजों की चिंता पुरानी--
महात्मा गांधी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने इस देश में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार पर समय -समय पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
पर भ्रष्टाचार है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है।
महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार को लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज नहीं बनने दिया जाना चाहिए।’
जवाहर लाल नेहरू ने आजादी के तत्काल बाद कहा था कि ‘भ्रष्टाचारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए।’
1988 में समाजवादी नेता और पूर्व सांसद मधु लिमये ने कहा था कि ‘ इस देश के शक्तिशाली लोग इस देश को बेच कर खा रहे हैं।’
सन 1998 में पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री मन मोहन सिंह ने कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’
सन 2008 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूत्र्ति बी.एन.अग्रवाल और न्यायमूत्र्ति जी.एस.सिंघवी ने कहा कि ‘भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता।’
2003 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम.लिंगदोह ने कहा कि ‘राज नेता कैंसर हैं जिनका इलाज संभव नहीं है।’
सन् 1998 में केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एन. सी.सक्सेना ने कहा कि ‘भ्रष्टाचार में जोखिम कम और मुनाफा अधिक है।’
1997 में तो संसद ने राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ मिल कर अभियान चलाने के लिए सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया।
इन सब के बावजूद चीजें सुधरती नजर नहीं आ रही हैं।जो थोड़े लोग भ्रष्टाचार के महा दानव के खिलाफ अभियान शुरू करते हैं,उनके खिलाफ ही ताकतवर शक्तियां उठ खड़ी हो जाती हैं।  
     एक भूली बिसरी याद---
सन् 1986 में पुष्पा भारती ने ‘धर्मयुग’ के लिए  लिखे अपने लेख में इन शब्दों में इंदिरा गांधी को याद किया था-- ‘इंदिरा जी के जन्म दिवस पर सोनिया हमेशा चावल और चने से बने कश्मीरी व्यंजन ‘सरवारी’ और मीठे चावल बनवाती थीं।नेहरू परिवार में हर मांगलिक अवसर पर ये चीजें जरूर पकती हैं।
पर अब उनका मन नहीं होता।
एक हूक सी उठती है जी में।पर समय चक्र तो घूमेगा ही और 19 नवंबर आएगा ही।
सोनिया चुपचाप मां के कमरे के सामने दरवाजे पर आम की पत्तियों 
का तोरण लगवा देंगी।प्रियंका के साथ कमरे के हर कोने में फूल सजा देंगी।चादरें ,तकियों के गिलाफ, मेजपोश और तौलिये, सभी कुछ नये रखवा देंगी।
कमरे का माहौल तो नया हो जाएगा, पर क्या होगा उन यादों का जो हमेशा पुरानी ही होती हैं !’  
   और अंत में---
मशहूर भौतिकशास्त्री  स्टीफन हाॅकिन्स ने हाल में यह कहा है कि ‘सन् 2600 तक पृथ्वी आग का गोला बन जाएगी।’
हाॅकिन्स की ऐसी भविष्यवाणियां पढ़कर अनेक लोग उनका मजाक उड़ाते हैं।
पर, दिल्ली के पर्यावरण का जो हाल है,उसे देखकर आप हाॅकिन्स की बातें हवा में उड़ा सकते हैं ?
@प्रभात खबर-बिहार -में 17 नवंबर 2017 को प्रकाशित मेरे कानोंकान काॅलम से@

शनिवार, 18 नवंबर 2017

  इस देश में भ्रष्टाचार पर नेताओं की चिंता लगभग 70 साल पुरानी है।
 यानी भ्रष्टाचार पर बोलना- लिखना कोई फैशन नहीं बल्कि इस गरीब देश के लिए जरूरत है।
कुछ शक्तिशाली लोग इस देश के सरकारी खजानों को लूटकर अरबपति बन रहे हैं और दूसरी ओर 20 करोड़ लोग हर शाम भूखा सो जाते हैं।यह संख्या अधिक भी हो सकती है।
शुरूआत  महात्मा गांधी की चिंता  से की जाए।
1 - महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार को लोकतंत्र की   अपरिहार्य उपज नहीं बनने दिया जाना चाहिए।’
--- दरअसल गांधी जी ने 1937-39 में राज्यों में और 1946 से राष्ट्रीय स्तर पर सरकारों को काम करते देखा तो उन्हें निराशा हुई।
उन्होंने केंद्र से तो एक मंत्री को हटवा भी दिया था,पर वे बिहार में विफल रहे।
2.- सत्ता संभालने के बाद प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि  ‘जमाखोरों,मनाफाखोरों और काला बाजारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका देना चाहिए।’
 ---लगता है कि यह उनके शुरूआती उत्साह के दौर की बात है।पर जब उन्होंने देखा कि समझौता किए बिना सरकार चलाना मुश्किल होगा तो उन्होंने वैसा ही कर लिया।प्रताप सिंह कैरो और वी.के. कृष्ण मेनन प्रकरण प्रमुख उदाहरण हंै।
जांच आयोग ने पंजाब के मुख्य मंत्री प्रताप कैरो को भ्रष्टाचार का देाषी माना ।इसके बावजूद नेहरू ने उन्हें मुख्य मंत्री पद से नहीं हटाया।पर लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधान मंत्री बनते ही यह काम कर दिया।
नेहरू की दूसरी कमजोरी जीप घोटाले के नायक  वी.के.कृष्ण मेनन थे ।उन्हें प्रमोशन देकर रक्षा मंत्री बना दिया गया।
3. - इंदिरा गांधी ने कोई ढांेग नहीं किया।उन्होंने कहा कि ‘भ्रष्टाचार सिर्फ भारत में ही नहीं है बल्कि यह वल्र्ड फेनोमेना है।’
जेपी ने जब उनकी सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया तो इंदिरा जी ने यह कह कर पलटवार किया कि पूंजीपतियों के पैसे लेने वाले को भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है कि इंदिरा गांधी के शासन काल में भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप मिल गया।
4. - मन मोहन सिंह ने सन 1998 में कहा कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’वे ठीक कह रहे थे।
क्योंकि तब वे राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे।
दरअसल प्रतिपक्ष में रहने पर नेताओं की तीसरी आंख खुल जाती है।पर सत्ता मिलते ही वह बंद हो जाती है।
याद रहे कि 1998 से पहले मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री थे और बाद में प्रधान मंत्री।
5.-1988 में समाजवादी नेता मधु लिमये ने कहा था कि ‘मुल्क के शक्तिशाली लोग इस देश को बेच कर खा रहे हैं।’
मधु लिमये कभी सत्ता में नहीं रहे,इसलिए उन पर क्या कहा जाए ! वह ईमानदारी से अपनी बात कह रहे थे।
 पर एक सवाल जरूर है।मुलायम सिंह उनके पास  अक्सर विचार-विमर्श करने जाते थे।मधु जी ने उन्हें क्या सिखाया ?
6. - 2008 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूत्र्ति बी.एन.अग्रवाल और न्यायमूत्र्ति जी.एस.सिंघवी ने कहा कि ‘भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता।’
7 - दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूत्र्ति एस.एन.धींगरा ने 2007 में कहा कि भ्रष्टाचार को साधारण अपराध के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
---- यह कह कर न्यायमूत्र्ति धींगरा ने उन लोगों के इस विचार को बल प्रदान किया कि भ्रष्टाचारियों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए।
8 - इस देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे. एम. लिंगदोह ने 2003 में कहा कि ‘राजनेता कैंसर हैं जिनका इलाज अब संभव नहीं।’
---लिंगदोह चुनाव आयोग में  काम करते हुए विभिन्न दलों के नेताओं के रुख -रवैये को देखकर इस नतीजे पर पहुंचे थे।
  याद रहे कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी अपने चंदे का पूरा हिसाब देने को आज भी तैयार नहीं हैं।भाजपा और कांग्रेस की बात कौन कहे  ! क्यों भाई ? 
9 - केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एन.सी.सक्सेना ने 1998 में कहा था कि ‘भ्रष्टाचार में जोखिम कम और लाभ ज्यादा है।’
--इस स्थिति को उलट देने के लिए सख्त कानून और उससे अधिक कड़ी कार्रवाई की जरूरत है।क्या इसका प्रबंध हो रहा है ?हो रहा है तो कितना और कब तक ?


गुरुवार, 16 नवंबर 2017

 रिपब्लिक टी.वी.पर प्रकाश सिंह की यह दूसरी बड़ी स्टोरी 
है।ताजा स्टोरी पटना लोअर कोर्ट के घूसखोर कर्मियों के स्टिंग आपरेशन से संबंधित है।
प्रकाश ने पहली बड़ी और सनसनीखेज स्टोरी इस टीवी के उद्घाटन के दिन ही यानी गत मई में ब्रेक की थी।
उसमें  जेल से मो.शहाबुद्दीन से लालू प्रसाद की फोन पर बातचीत का विवरण था।
उस स्टोरी की भी देश भर में चर्चा हुई थी।
दूसरी बड़ी स्टोरी भी कानून के शासन से जुड़ी है जो कल ब्रेक हुई।
पटना सिविल कोर्ट के कर्मियों द्वारा रिश्वत लेकर काम करते हुए स्टिंग आपरेशन किया था प्रकाश सिंह ने।यह हिम्मत का काम है।ऐसी हिम्मत की पत्रकारिता जगत में कमी होती जा रही है।
 रिश्वत तो अन्य सरकारी दफ्तरों में भी ली जाती रही है।
 पर यह काम ‘न्याय के घर’ में हो तो बात चिंताजनक हो जाती है।फिर कोई कहां जाएगा ?
 यह माना जाता है कि जिसे पुलिस-प्रशासन से  न्याय नहीं मिलता,उसे अदालतों से मिलता है।अनेक मामलों में मिल भी रहा है।
  पर यदि एक मामले मंे भी अदालत मेंे घूस चल जाए तो फिर उससे लोगों का विश्वास हिल जाता है।
यह अच्छी बात है कि रिपब्लिक टी.वी.के स्टिंग आपरेशन को पटना हाई कोर्ट ने गंभीरता से लिया है।उम्मीद है कि हाई कोर्ट विश्वास बहाली का काम करेगा।
  यह किसी न्यूज चैनल और उसके संवाददाता की सफलता है।
 ऐसी रिर्पोंटिंग के लिए जितनी कुशलता और हिम्मत की जरूरत है,वह सब इस चैनल और उसके संवाददाता में मौजूद है।यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है।
लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि उसके चारों प्रमुख स्तम्भ ईमानदारी से काम करते रहें।


बुधवार, 15 नवंबर 2017

संयोग से मैंने आज सुबह इ टी नाउ चैनल लगा दिया।
उस पर न्यायपालिका पर गंभीर चर्चा चल रही थी।
मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि अतिथियों में कोई
 व्यक्ति अपनी बारी से पहले नहीं बोल रहा था।
विभिन्न  चैनलों पर इन दिनों जारी  टाॅक शो के भारी शोर गुल, हंगामे और अशालीन शब्दों के प्रयोग के कारण उत्पन्न भीषण गर्मी के बीच  इ टी नाउ पर  आज की चर्चा ठंडीे हवा के झोंके की तरह थी।
   अन्य चैनलों को भी चाहिए कि जहां तक संभव हो सके वे शालीन स्वभाव के वैसे अतिथियों को ही बुलाएं जिनकी आदत बारी से पहले बोलने की ना हो।यदि कोई बोलते हैं तो उनकी आवाज बंद कर दी जानी चाहिए।
इससे होगा यह कि श्रोतागण  बातें सुन और समझ सकेंगे ।उनके समय का सदुपयोग होगा।चैनलों और एंकरों की साख बढ़ेगी।
 चैनलों पर आने वाले कुछ खास नेता तथा अन्य पेशे के कुछ ऐसे लोग हैं जो अपनी उदंडता के लिए कुख्यात हैं।वे न तो शालीनता का ध्यान रखते हैं और न ही एंकरों की बात मानते हैं।यह भी नहीं सोचते कि उनकी बात  कोई सुन या समझ पा रहा है भी या नहीं ।
पता नहीं, कुछ एंकर भी ऐसे शोरगुल की अनुमति क्यों देते हैं ! जहां भी मैं किसी चैनल पर ऐसे उदंड वक्ताओं-प्रवक्ताओं  को देखता हूं, तुरंत चैनल बदल देता हूं।
 वैसे भी शोरगुल और हंगामे के कारण ऐसी टी वी चर्चाओं में मेरी रूचि कम होती जा रही है।
आप कहेंगे कि इ टी नाउ की आज की चर्चा में जितने प्रतिष्ठित व शालीन लोगों को बुलाया गया था,उतनी संख्या में  प्रतिष्ठित व शालीन लोग राजनीतिक चर्चाओं के लिए  उपलब्ध ही नहीं हैं।पर मेरी समझ है कि चैनल वाले यदि खोजेंगे तो मिल सकते हैं।राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं में से भी कुछ शालीन हैं तो कुछ अन्य अशालीन।
 हालांकि मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जितने अतिथि इन दिनों चैनलों पर आते हैं, वे सब के सब अशालीन ही हैं।उनमें कुछ  शालीन लोग भी हैं।पर उनकी आवाज दब  जाती है।   

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

खुशवंत सिंह चाहते थे कि नेहरू के खिलाफ लिखने वाले मथाई पर सरेआम लगे कोड़े




मशहूर पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह ने कहा था कि जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ लिखने वाले एम.ओ.मथाई को सरेआम कोड़े लगाए जाने चाहिए।
पाकिस्तान  के जिया उल हक जैसा शासक यहां होता तो वह मथाई को चैराहे पर कोड़े लगाने के लिए यहां भी कानून बनाता।
 पर, अपने खिलाफ लिखने वालों के साथ  खुद प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू का ऐसा सलूक नहीं था।वे कैसा  सलूक  
करते थे,उसका नूमना दिल्ली का एक बड़ा अखबार समूह था।
  प्रधान मंत्री नेहरू ने उस अंग्रेजी दैनिक अखबार और उस ग्रूप की साप्ताहिक पत्रिका का प्रवेश तीन मूत्र्ति भवन में बंद करवा दिया था।बस इतना ही।कोई दूसरी दंडात्मक कार्रवाई नहीं।तब प्रधान मंत्री तीन मूत्र्ति भवन में रहते थे।
  एम.ओ.मथाई प्रधान मंत्री नेहरू के 13 साल तक निजी सचिव रहे।
मथाई ने  नेहरू के सार्वजनिक जीवन और निजी जीवन के बारे में सत्तर के दशक में कई जानी-अनजानी बातें लिखीं।
 दो खंडों में लिखी गयी संस्मरणात्मक पुस्तकों को तब इंदिरा गांधी ने भी पढ़ी थी।
उन्होंने तो मथाई पर कोई कार्रवाई नहीं की किंतु  मीडिया और राजनीतिक हलकों में उस पर काफी चर्चाएं हुईं।तीखी प्रतिक्रियाएं भी हुईं।
उन पुस्तकों में जहां अधिकतर मामलों में नेहरू की तारीफ की गयी है,वहीं कुछ बातें  उनके खिलाफ भी जाती हैं।
इन पुस्तकों को पढ़ने पर  कई लोगों की यह धारणा बनी  कि किसी नेता के निजी सचिव को अपने बाॅस के बारे में ऐसी बातें ंंनहीं लिखनी चाहिए।यदि लिखता है तो उसे नमक हराम ही माना जाएगा।
कुछ लोगों ने मथाई को सरेआम नमक हराम  कहा। मथाई ने इस पर यह सफाई दी कि ‘सच कहा जाए तो नेहरू जी भी मेरे उतने ही आभारी थे जितना मैं उनका।’
  मथाई की नेहरू के बारे में कुल मिलाकर कैसी राय थी,उसे मथाई की सिर्फ एक टिप्पणी से समझा जा सकता है।
एक बार जार्ज फर्नांडिस ने नेहरू के खिलाफ एक कड़ा बयान दिया था।उस पर मथाई ने कहा कि नेहरू एक महान नेता थे।
जार्ज फर्नांडिस नेहरू के जूते का फीता बांधने की भी औकात नहीं रखते ।’
  लोहियावादी समाजवादियों की एक विचार पत्रिका ‘सामयिक वात्र्ता’ ने मथाई की पुस्तकोंे के बारे में अपने 1979 के  जुलाई अंक में लिखा कि ‘पुस्तक में इंदिरा गांधी और उनके बेटों के बारे में ऐसी चर्चाएं हैं जिसे हमारे भद्र समाज के लोग अच्छा नहीं मानते हैं।अपनी दोनों पुस्तकों से मथाई ने अपने को निश्चय ही छिछला व्यक्ति साबित कर दिया है।पर दोनों पुस्तकें उन लोगों के छिछलेपन को भी प्रकट करती है जिन्हें हम संभ्रांत ,सुरूचिसंपन्न और बहुत कुछ समझते हैं।
और इसी अर्थ में मथाई के छिछलेपन के बावजूद उनकी पुस्तकों का अर्थ गंभीर हो जाता है।’
 मथाई की एक पुस्तक का नाम है -नेहरू युग,जानी-अनजानी बातेंें।दूसरी पुस्तक का नाम है-नेहरू के साथ तेरह वर्ष।हिंदी में उन्हें वाणी प्रकाशन ने छापा था।पर अब वे पुस्तकें शायद आउट आॅफ प्रिंट हो गयी हंै।
 कुछ बातों और विवादों को नजरअंदाज कर दें तो इन दो पुस्तकों को पढ़ने से यह लग जाता है कि आजादी के बाद के हमारे शासकों ने देश के साथ कितना अच्छा और कितना बुरा किया।
दरअसल मथाई तेरह साल तक केंद्र की सत्ता के जितना करीब थे,उतना अन्य कोई नहीं था।इसीलिए कुल मिलाकर मथाई की किताबों का कोई जोड़ नहीं है।
   किसी एक लेखक की पुस्तक से किसी शीर्ष नेता की पूरी अच्छाइयों और सारी कमियों का एक साथ पता चल जाए,ऐसा बहुत कम होता है।पर मथाई ने यह काम कर दिया है।
 मथाई की पुस्तक के महत्व का इस बात से भी पता चलता है कि  यू.पी.एस.सी.की तैयारी कराने वाली एक नामी संस्था ने अनिवार्य रूप से पढ़ी जाने वाली पुस्तकों की सूची में मथाई की पुस्तकों को भी उन दिनों शामिल किया था।
मेरी भी यह राय रही है कि आजादी के तत्काल बाद के भारत की दशा-दिशा किसी को जाननी हो तो उसे मथाई की पुस्तकें पढऩी  चाहिए ।और, आजादी के शुरूआती वर्षों के  बिहार के हुक्मरानों  को बाहर -भीतर से जानना हो तो अय्यर कमीशन की रपट पढ़ी जानी चाहिए।@लाइवबिहार.लाइव में 14 नवंबर 2017 को प्रकाशित मेरे काॅलम भूले-बिसरे से@

   
  
  


  

दुनिया के अनेक देशों के नागरिकों के लिए अनिवार्य 
सैनिक सेवा या ट्रेनिंग का कानूनी प्रावधान है।
ब्रिटेन के राज कुमार भी युद्ध भूमि में सैनिक बन कर जा चुके हैं।
  ऐसे देशों में भी नागरिकों के लिए भी सैनिक प्रशिक्षण व सीमित अवधि के लिए सेवा का प्रावधान है जिन देशों पर युद्ध का खतरा नहीं रहता है।
पर हमारे देश में न सिर्फ बाहरी बल्कि ‘घोषित -अघोषित आंतरिक युद्ध’ भी होते रहते हैं।फिर भी यहां ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
 इस देश के भीतर ही इस देश के खिलाफ सक्रिय लोगों की ताकतवर जमात सक्रिय है।वे ऐसा नहीं होने देंगे।
 यहां के राजनीतिक नेताओं के परिजन तो शायद ही सैनिक सेवा में जाते हैं।
  ऐसे में कुछ अच्छे नेताओं को ही इस दिशा में पहल करनी होगी।
देश से ममता रखने वाले जो राजनीतिक दल हैं,वे इस दिशा में एक महत्वपूर्ण काम कर सकते हैं।
वे संसद और विधान सभाआंे के 10 प्रतिशत सीटें ऐसे उम्मीदवारों के लिए रिजर्व कर दें जिनके पुत्र सेना में हैं।फिर देखिए कितना फर्क पड़ता है।