शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

  दहेजमुक्त शादी में जो कुछ खास तरह की समस्याएं  आती हंै, आज मैं उनकी चर्चा करना चाहूंगा।
ऐसा नहीं है कि समाज के पास इन  समस्याओं का हल नहीं है।
पर, शत्र्त यह है कि समाज के कुछ जन सेवी लोगों को थोड़ा समय देना होगा।
  जातीय व सामाजिक संगठन इसमेें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं।
कुछ तो निभाते भी हैं।पर, इसमें विस्तार की जरूरत है।
 फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर राजपूत समुदाय में जो एकता देखी जा रही है, उस एकता का सदुपयोग ऐसे  काम में हो सकता है।
   मेरे छोटे भाई नागेंद्र सन 1976 में बिहार सरकार में श्रम प्रवत्र्तन पदाधिकारी पद पर नियुक्त हुए थे।एक तो सरकारी नौकरी,दूसरे अपनी खेती-बारी और तीसरे लड़के का प्रभावशाली व्यक्तित्व।
  दहेज देने वालों की कमी नहीं थी।
पर, मेरा परिवार चाहता था कि हम दहेज के चक्कर में न पड़ें।अन्य बातों पर ध्यान दें।हमने 1979 में पटना जिले के बैकट पुर मंदिर में नागेंद्र की शादी आयोजित की।कोई दहेज नहीं ,कोई फालतू दिखावा नहीं।
 अच्छी शादी हुई।परिवार व रिश्तेदार अच्छे मिले।
   पर, उससे पहले मुझे 1978 में एक अजीब अनुभव हुआ। उन दिनों मैं दैनिक ‘आज’ के पटना ब्यूरो में काम करता था।एक विधि पदाधिकारी  मेरे एक रिश्तेदार को लेकर मेरे आॅफिस में  आए।आते ही उस पदाधिकारी ने मुझसे पूछा कि ‘आप भाई का कितना तिलक लीजिएगाा ?’
मैंने कहा कि हम लोग तिलक -दहेज नहीं लेते।
लड़की यदि पसंद आ जाएगी तो मुफ्त में शादी हो जाएगी।
 वे चले गए।उन्होंने लौटते समय मेरे रिश्तेदार से कहा कि लगता है कि लड़के में कोई दोष है,इसीलिए यह आदमी दहेज नहीं मांग रहा है।
   अब यहीं सामाजिक संगठन की भूमिका आती है।
संगठन ऐसे लोगों की सूची तैयार करें जो दहेजमुक्त और कम से कम खर्च में शादी करना चाहते हैं।
  मैरिज एक्सचेंज बनाएं।दोनों पक्षों को मिलाएं।वैसे लोग कम मिलेंगे,पर मिलेंगे जरूर।
 वैसी जातियों के समाजसेवी लोगों को यह काम पहले शुरू करना चाहिए जिन जातियों में दिखावे के लिए शादियों में अनाप -शनाप खर्च करने की परंपरा रही है।शादियों में फिजूलखर्ची के कारण कई परिवारों की आर्थिकी बिगड़ते मैंने देखा है।
   एक और कठिनाई है।
यदि किसी लड़की वाले से कहिए कि हम मंदिर में शादी करना चाहते हैं तो वे कहेंगे कि लोग क्या कहेंगे ?
बारात हमारे दरवाजे पर आनी चाहिए।
  ऐसी ही समस्या 1971 में कर्पूरी ठाकुर को भी झेलनी पड़ी थी।वे चाहते थे कि उनकी पुत्री की शादी देवघर मंदिर में हो,पर लड़की की मां की जिद पर शादी उनके गांव पितौझिया में हुई।
  मेरी अपनी शादी 1973 में सोन पुर में हुई।मैं भी चाहता था कि शादी मंदिर में हो।पर मेरी भावी पत्नी के पिता की अपनी समस्या थी।
उनकी बड़ी लड़की की दहेजमुक्त आदर्श शादी मंदिर में हुई थी।
इस बार मेरी ससुराल वाले चाहते थे कि उनके घर बारात जाए।
मेरी शादी दहेज मुक्त होनी थी।इसलिए समस्या थी कि बारात का खर्च कहां से आएगा ?
मैंेने बाबू जी को साफ मना कर दिया था कि बारात सजाने के लिए जमीन नहीं बिकेगी। 
हालांकि वे वैसा करने को तैयार थे।
 उन्होंने कहा कि जब मेरे रिश्तेदार और मित्र-परिचित बारात में नहीं जाएंगे तो मैं भी नहीं जाऊंगा।उन्हें मैं कैसे छोड़ दूं ? तुम जाओ शादी कर लो।
मुझे कोई एतराज नहीं।
 फिर क्या था ! मेरी शादी की ‘बारात’ में पटना  लाॅ कालेज  के मेरे  सहपाठी, युवजन सभा के  साथी और सोशलिस्ट नेता तथा  आधा दर्जन विधायक थे ।मेरे दोनों भाई जरूर शादी में थे।कर्पूरी ठाकुर ने एक तरह से समधी की भूमिका निभाई।
  रात में ही बारात के लोग पटना लौट आए।लगे हाथ बता दूं कि उसी साल मेरी अपनी शादी के कुछ ही दिन पहले मैं पटना के लाला लाजपत भवन में नीतीश कुमार के आदर्श विवाह में शामिल हुआ था।
मैंने अपने बड़े बेटे अमित की शादी भी उसी तरह से की।मेरे समधी उदय नारायण सिंह हजारीबाग में वकील हैं।
वे ही लोगों को बताते हैं कि ‘मुझसे  सुरेंद्र जी ने कोई दहेज नहीं ली।’
मेरे छोटे पुत्र अनुपम ने मुम्बई के टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंस से एम.एस.डब्ल्यू. किया है। उसने  ‘नेट’ भी कर लिया है।इन दिनों वह रांची में  एन. जी. ओ. में काम करता है।
उसने कहा है कि वह जब भी शादी करेगा, कोर्ट मैरिज ही करेगा।
कोई तामझाम नहीं।जाहिर है कि मुझे उसके फैसले पर गर्व है।
पर मेरा मानना है कि ऐसी शादियों के लिए जो भी और जहां भी तैयार हो, उन्हें समाज का बढ़ावा और सहयोग मिलना चाहिए ताकि ऐसे कदमों को  सामाजिक स्वीकृति मिले।
  जहां इस देश के अधिकतर सत्ताधारी नेताओं के यहां की  शादियों में अत्यंत कीमती उपहारों की झरी लगा दी जाती है, वहीं बिहार के उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने आज अपने पुत्र की दहेजमुक्त शादी करके मिसाल कायम की है।उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसी शादी  से अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी।
@ --सुरेंद्र किशोर--3 दिसंबर 2017@

   
  


  

 पारस नाथ तिवारी नहीं रहे। पत्रकार ब्रजनंदन जी के बाद
 इतनी जल्दी दूसरा झटका ! सोचा भी न था।
यहां से चले जाने का भला यह भी कोई उम्र होती है !
पर क्या कीजिएगा ! सब विधि का विधान है। 
 पारस नाथ तिवारी को हम सब ‘पारस बाबा’ या सिर्फ ‘बाबा’
कहा करते थे।
लगभग मेरी ही उम्र के थे।फिर भी बाबा  ? बाबा में आदर और प्यार के मिले -जुले भाव थे।
  जिन लोगों ने खुद ही खुद को बनाया हो, उनके प्रति आदर स्वाभाविक ही है।
 दैनिक अखबार ‘अमृत वर्षा’ के संपादक सह मालिक थे।
कभी उन्होंने दक्षिण बिहार से एक साप्ताहिक ‘मंगलवार’ निकाला था।
   मैं पटना से उसमें भी लिखा करता था।बाबा मुझे पारिश्रमिक भी भिजवाते थे।
 मुझे याद है कि जिन  दिनों मैं पटना में ‘पद यात्री’ था, तो उनके ही भेजे गए पारिश्रमिक के पैसे से  मैंने एक सेकेंड हैंड साइकिल खरीदी थी।
 पहले वे धनबाद-बोकारो में सक्रिय थे।समाजवादी और मजदूर नेता के  रूप में।बाद में वे अखबार निकालने लगे।
पटना और  दिल्ली से भी ‘अमृत वर्षा’ का प्रकाशन शुरू हुआ।इन दिनों बाबा दिल्ली में ही रहते थे।यदाकदा  उनसे  फोन पर मेरी बातचीत हो जाया करती थी। 
  जहां तक मुझे याद है, मैंने पहली बार उन्हें पटना में श्रीकृष्ण सिंह के आवास पर देखा था।लोहियावादी समाजवादी श्रीकृष्ण सिंह के पारसनाथ तिवारी करीबी थे।श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पूर्व मंत्री नरेंद्र
सिंह के पिता थे।वे खुद भी सांसद व बिहार में मंत्री रह चुके थे।
 पारस नाथ जी जैसा जीवंत व्यक्ति मैंने बहुत कम देखे हैं।पारस बाबा विपरीत परिस्थितियों में भी कभी घबराते नहीं थे।
किसी से भी डरते नहीं थे।
बड़े से बड़े नेता से भी वे बेबाकी से बातें करते थे।
उन्होंने अपने अखबार में भी नब्बे के दशक में बड़ी हिम्मत से खबरें छपवाईं।
उसको लेकर उन्हें कठिनाइयां भी झेलनी पड़ीं।वह दौर ही ऐसा था।
पर उसकी परवाह किसे थी ?
  बाबा से बात करना इसलिए भी ऊबाई नहीं होता था क्यांेकि वे 
जमीन से जुड़े हुए थे। हिंदी, भोजपुरी और अंग्रेजी शब्दों से  मिश्रित भाषा वे बोलते थे।
  लाइवबिहार.लाइव के राजनीतिक संपादक कन्हैया भेलाड़ी पारसनाथ तिवारी के बारे मंे कहते हैं कि ‘वैसा मस्त आदमी मैंने नहीं देखा।पारस नाथ जी समस्याओं को पराजित कर देना जानते थे।सामने वाले में सोये हुए आत्म विश्वास को जगा देते थे।’
मेरी श्रद्धांजलि।     
  

सरकारी मकानों पर कब्जा कराने वाले अफसरों पर कार्रवाई जरूरी ---


पटना के बहादुर पुर में बिहार राज्य आवास बोर्ड ने बहुत पहले सैकड़ों फ्लैट्स बनवाए ।
  आज उनकी  स्थिति क्या है ? उनकी स्थिति की एक झलक खुद आवास बोर्ड के एक विज्ञापन से मिलती है।वह विज्ञापन इसी 27 नवंबर को स्थानीय अखबार में छपा है।
विज्ञापन में  दो सौ से अधिक फ्लैटों के नंबर प्रकाशित किए गए हैं।
साथ ही, उसी विज्ञापन के जरिए कार्यपालक अधिकारी की ओर से यह नोटिस निकाला गया है कि ‘ इन अनावंटित फ्लैटों में रह रहे अवैध अतिक्रमणकारियों को सूचित किया जाता है कि सूची प्रकाशन के पंद्रह दिनों के भीतर  वर्णित फ्लैटों को खाली कर उन्हें बोर्ड को सौंप दें।अन्यथा, कानूनी प्रक्रिया अपना कर उन्हें खाली करवा दिया जाएगा।’
  उधर इसी बुधवार को यह खबर भी आई कि दाना पुर रेल मंडल के सैकड़ों सरकारी आवास अवैध कब्जे में हैं।
 सवाल यह है कि क्या इतनी अधिक संख्या में फ्लैट्स व मकान पर कब्जा एक दिन  हुआ होगा ? ऐसा नहीं है।इन मकानों पर कब्जे की खबर  देख कर लगता है कि ये फ्लैट्स न हों, मानो फुटपाथ हों !
जो चाहे जब चाहे, कब्जा कर ले ! शासन लाचार !
 क्या संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना ऐसा कब्जा संभव है ?
यह कब्जा क्या सिर्फ इन्हीं दो जगहों  में ही है ?
कत्तई नहीं।बल्कि ऐसी खबरें देश के विभिन्न स्थानों  से आए दिन आती रहती हैं।
 इस समस्या के स्थायी हल के लिए सरकार के पास कौन- कौन से  उपाय हंै ?
 उपाय होंगे ही ।पर वे उपाय अब कारगर नहीं हो पा रहे हैं।अब सरकारों को  कुछ नया सोचना होगा।
  यह तो मानी हुई बात है कि संबंधित अफसरों की सांठगाठ या मौन सहमति के बिना ऐसे अतिक्रमण नहीं हो सकते हैं।
उन अफसरों पर जब तक सबक सिखाने लायक कार्रवाइयां नहीं होंंगी , तब तक सरकारी मकानों पर कब्जे होते ही रहेंगे।
और उसके असली हकदार कठिनाइयां  झेलते रहेंगे।
     एक पुण्य स्मृति ऐसी भी----
कोई नेता अपनी पुस्तक किसी पत्रकार की पुण्य स्मृति में समर्पित करे,यह मैंने पहली बार देखा।
झारखंड के संसदीय कार्य मंत्री सरयू राय ने अपनी नयी पुस्तक ‘समय का लेख’ अपने  पत्रकार मित्र दिवंगत फरजंद अहमद को समर्पित की है।
   एक बड़े नेता और बड़े पत्रकार का यह संबंध अलग ढंग का  लगता है।
जीवन काल और पत्रकारिता के सक्रिय काल में तो कई पत्रकार कई नेताओं बड़े करीबी रहते हैं।पर रिटायर होते ही  आम तौर से एक-दूसरे को भुला देने की परंपरा रही है।पर यहां रिटायर कौन कहे, दिवंगत हो जाने के बाद भी सरयू राय अपने मित्र  पत्रकार को याद कर रहे  हंै।  
  कैसे बढ़े सिद्ध दोषियों की संख्या ----
  अदालती सजाओं का प्रतिशत घट रहा है।यही हाल लगभग पूरे देश का है।पर, अभी दिल्ली का एक नमूना पेश है।
 सिद्ध दोषियों की संख्या कम होने का एक बड़ा कारण है फाॅरेंसिक जांच प्रयोगशालाओं की देश भर में  भारी कमी।
 पूरी दिल्ली में ऐसी सिर्फ एक ही प्रयोगशाला है।
ताजा खबर के अनुसार उस प्रयोगशाला में डी.एन.ए.के करीब 5 हजार नमूने जांच के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
वैसे वहां नमूनों की कुल संख्या 9 हजार हैं।
  याद रहे कि दोषियों को अदालतों से सजा दिलाने में डी.एन.ए.के जांच नतीजे बड़े काम आते हैं।
पर उसके अभाव में अधिकतर मामलों में केस कमजोर हो जाते हैं।
हालांकि अपराधियों के बच जाने के कई और कारण भी हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश है कि किसी की इच्छा के खिलाफ उसके डी.एन.ए.के नमूने नहीं लिए जा सकते।
  इस फैसले का लाभ उठाकर अनेक शातिर अपराधी अपने नमूने नहीं देते।
शासन को चाहिए कि वह उपर्युक्त फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार करे।    
     आखिर कौन करेगा गंगा की सफाई ?---
यदि मोदी-योगी  की सरकारें गंगा की सफाई नहीं करेंगी तो फिर भला कौन करेगा ?
गाय और गंगा की बात करने वाली भाजपा की केंद्र में बहुमत की सरकार है।उत्तर प्रदेश में भी।यहां तक कि उत्तराखंड में भी।हालांकि भाजपाई ही कौन कहे, समाजवादी नेता डा. राम मनोहर लोहिया ने भी कभी सरकार से मांग की थी कि ‘नदियां साफ करो ।’
 पर पिछली सरकारों ने तो गंगा जैसी बहुमूल्य नदी को जहां-तहां बड़े नाले में परिणत कर दिया।यही आरोप पहले भाजपा लगाती थी।
अब वही सरकार में है तो  कुछ करे।मौजूदा सरकार कुछ तो रही है।नितिन गडकरी ने गंगा रिवर फ्रंट विकसित करने के लिए भारतीय मूल के कुछ विदेशी पूंजीपतियों को तैयार किया है।वह अच्छी बात है।वह काम भी जरूरी है।
पर गंगा के पानी के औषधीय गुणों को बरकरार रखने के लिए क्या हो रहा है ? पटना के पास  गंगा नदी में जो पानी है,क्या वह गंगा जल है ?
या सहायक नदियों और नाले-नालियों का जल है ? क्या गंगा के किनारे बसे नगरों के गंदे पानी को साफ करके उसे गंगा में गिराया जाएगा और उसे ही गंगा जल कह दिया जाएगा ?
 वास्तविक गंगा जल में औषधीय गुण हैं।
गंगा जल पर  19 वीं सदी मंे ब्रिटिश वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैन्किन ने रिसर्च किया था।जांच के बाद उसने पाया था कि गंगा जल के वायरस हैजा फैलाने वाले बैक्टीरिया में घुस कर उसे नष्ट कर देते हैं।
  इनके अलावा भी गंगा जल में अनेक गुण हैं।गंगा नदी के ऊपरी हिस्से में वैसे गुणों वाला गंगा जल मौजूद है।उसे फिर से हासिल करने का अधिकार बिहार और बंगाल के लोगों को कब मिलेगा ?
    उत्तर प्रदेश में  विधान सभा उप चुनाव---
बहुजन समाज पार्टी उप चुनाव नहीं लड़ती।उत्तर प्रदेश की सिकंदरा विधान सभा उप चुनाव भी वह नहीं लड़ रही है।क्या उसका लाभ सपा को मिलेगा ? या कांग्रेस को ?
पिछले आम चुनाव में भाजपा के मथुरा प्रसाद पाल करीब 38 हजार मतों से विजयी हुए थे।बसपा दूसरे स्थान पर थी।
भाजपा ने दिवंगत विधायक के पुत्र
को टिकट दिया है।कांग्रेस के भी उम्मीदवार हैं।
  नगर निकायों के चुनावों में बाजी मार लेने के बाद अब मुख्य मंत्री योगी की परीक्षा सिकंदरा में होगी।
वहां 21 दिसंबर को मतदान होगा और 24 दिसंबर को रिजल्ट।
याद रहे कि इससे पहले के विधान सभा उप चुनावों में बसपा की अनुपस्थिति का लाभ आम तौर पर सपा को मिलता रहा है।
  एक भूली बिसरी याद---
पंडित सुंदर लाल ने ‘भारत में अंग्रेजी राज’ नामक पुस्तक लिखी है।किताब दो भागों में है। अंग्रेजों के छल-कपट के उदाहरण देते हुए उन्होंने लिखा है कि कच्छ के राजा को अंग्रेजों ने यह कह कर डराया कि तुम पर सिंध के मुसलमान और अमीर हमला करने वाले हैं।
यदि तुमने अंग्रेज कंपनी के संरक्षण में आना स्वीकार नहीं किया तो अंग्रेज भी तुम्हारे खिलाफ सिंध के अमीरों को मदद देने को मजबूर हो जाएंगे।
सुंदर लाल ने लिखा कि इस विचित्र न्याय के औचित्य पर बहस करने की आवश्यकता नहीं।न ही यह बताने की आवश्यकता है कि कच्छ पर सिंध के हमले की आशंका बिलकुल झूठ थी।
लाचार होकर सन 1816 में कच्छ के राव ने कंपनी के साथ संधि कर ली।
इस तरह कच्छ की स्वाधीनता समाप्त हो गयी और पश्चिमी भारत में
अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ गया।
पडित सुंदर लाल ने छल कपट से सत्ता हथियाने के कुछ अन्य उदाहरण भी दिए हैं। 
और अंत में---
सन 1967 से पहले कई राजनीतिक दल छोटे जरूर थे,पर उनमें 
नैतिक बल अधिक था। सन् 2017 आते -आते कई राजनीतिक दल आकार में तो बड़े हो चुके हैं,पर उनमें नैतिक बल घट चुका है।
@ 8 दिसंबर 2017 को प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे कानोंकान काॅलम से@



इंदिरा ने कठोरता से ठुकरा दी थी पाक युद्ध बंदियों को छोड़ देने की बुद्धिजीवियों की अपील


           
बंगला देश युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने देश के कुछ शीर्ष बुद्धिजीवियों की इस अपील को कठोरतापूर्वक ठुकरा दिया था कि 93 हजार पाक युद्धबंदियों को जल्द रिहा कर दिया  जाए।
  लेखक व पत्रकार खुशवंत सिंह के नेतृत्व में बुद्धिजीवियों का प्रतिनिधिमंडल इंदिरा गांधी से इस उद्देश्य से मिला था।खुशवंत सिंह तब चर्चित इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया के संपादक थे।
खुशवंत ने अपने संपादकीय कौशल से वीकली का सर्कुलेशन 60 हजार से बढ़ा कर 4 लाख कर दिया था।इसको लेकर उनका बड़ा दबदबा था।
पर इंदिरा ने उस दबदबे की परवाह नहीं की।
इदिरा गांधी से उस मुलाकात का विवरण खुद खुशवंत सिंह ने ईमानदारी से लिखा है।
 उनके अनुसार ‘एक मुलाकात के दौरान मैंने इंदिरा गांधी का गरम मिजाज देखा।मैं पाकिस्तानी युद्धबंदियों की रिहाई की मांग करने एक प्रतिनिधि मंडल लेकर उनके पास गया था।प्रतिनिधिमंडल में अमेरिका में हमारे भूतपूर्व राजदूत गगन विहारी मेहता, प्रसिद्ध उर्दू लेखक कृशन चंदर और ख्वाजा अहमद अब्बास थे।
    खुशवंत सिंह ने लिखा कि मैं उनसे कुछ कहूं, उसके पहले ही इंदिरा जी ने तपाक से मुझे कहा ‘मिस्टर सिंह, आपने पाकिस्तान के युद्धबंदियों के बारे में जो लिखा है ,वह सरकार के लिए अत्यधिक परेशानी का सबब बना है।’
मैंने भी तपाक से जवाब दिया,‘यही तो मेरा उद्देश्य था।
मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने आपकी सरकार को परेशानी में डाला।’
इस पर इंदिरा गांधी ने बड़ी तिक्तता से खुशवंत से कहा कि ‘आप अपने को शायद महान संपादक मानते हैं,पर आपको राजनीति का क ख ग नहीं मालूम।’ खुशवंत का जवाब था, ‘मैं मानता हूं कि मैं राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानता।लेकिन नैतिकता के बारे में जरूर जानता हूं।जो नैतिक दृष्टि से गलत है , वह राजनीतिक दृष्टि से सही कैसे हो सकता है ?’
  इस पर  इंदिरा जी ने कहा कि ‘उपदेश के लिए धन्यवाद !’
यह कहते हुए प्रधान मंत्री ने खुशवंत की ओर से मुंह फेर लिया।
 अब गगन विहारी  की बारी थी।
वयोवृद्ध मेहता बोलना शुरू ही कर रहे थे कि श्रीमती गांधी ने बड़ी रुखाई से उन्हें टोकते हुए कहा कि ‘मैं आपसे कुछ भी सुनना नहीं चाहता।मुझे आपके अमेरिका समर्थक दृष्टिकोण का पता है।’
इस पर बूढ़े गगन विहारी ने अपने को अत्यधिक अपमानित महसूस किया।
कृशन चंदर और अब्बास की बातों पर तो उन्होंने कोई ध्यान ही नहीं दिया।मशहूर काॅलम लेखक और फिल्म निर्माता अब्बास ने भी मेहता की तरह ही महसूस किया।
  पर वह इंदिरा गांधी ही थीं जो किसी तरह के दबाव में नहीं आने वाली थीं।बंगला देश युद्ध को लेकर जब वह अमेरिका के दबाव में नहीं आईं तो किसी और का कितना महत्व था ?
याद रहे कि 1971 के बंगला देश मुक्ति संग्राम के समय अमेरिका ने अपनी नेवी का सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में उतार दिया था।
तब यह कहा गया था कि उसका उद्देश्य पूर्वी पाकिस्तान से अमेरिकी नागरिकों को निकालना था।
पर, 2011 में मिले गुप्त अमेरिकी दस्तावेज से यह पता चला कि निक्सन सरकार का उद्देश्य भारतीय सेना को निशाना बनाना था।
इसके बावजूद इंदिरा सरकार ने बंगला देश को आजाद करा ही दिया।
जुलाई, 1972 में भारत-पाक के बीच शिमला समझौता हुआ।
उस समझौते के जरिए पाक राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत सरकार के साथ शांति कायम रखने  का आश्वासन दिया था।
इस द्विपक्षीय समझौते से भारत सरकार ने यह धारणा बनाई थी कि 
इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ का वह प्रस्ताव निरस्त हो गया है जिसमें कश्मीर में जनमत संगंह कराने की बात कही गयी थी।
  यह और बात है कि भुट्टो ने बाद में समझौते की धज्जियां उड़ा दी और अपना वादा नहीं निभाया।हालांकि 93 हजार युद्ध बंदी शिमला समझौते के बाद ही रिहा किए जा सके थे।
 यदि इस देश के कुछ बद्धिजीवियों के कहने पर इंदिरा ने पहले ही युद्ध बंदियों को छोड़ दिया होता तो भुट्टो जैसा जिद्दी नेता शिमला समझौता क्यों करता ? शिमला समझौता हुआ तो यह भी माना गया कि  पाक ने बंगला देश के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया। 
@फस्र्टपोस्ट हिंदी में 19 नवंबर 2017 को प्रकाशित मेरा लेख@



आकाशवाणी-दूर दर्शन की खबरों की स्क्रिप्ट पी.एम.को नहीं दिखाने के कारण छिन गया था गुजराल का मंत्रालय



       आकाशवाणी -दूरदर्शन के हर समाचार बुलेटिन को प्रसारित करने से पहले प्रधान मंत्री को दिखा लेने के काम में असमर्थता व्यक्त करने के कारण 1975 में आई.के.गुजराल से सूचना व प्रसारण मंत्रालय छिन गया था।
  बाद में डी.एम.के.के मंत्रियों को सरकार से निकालने से इनकार कर देने के बाद 1998 में गुजराल का प्रधान मंत्री पद छिन गया था।ऐसे थे आई.के.गुजराल।
उनका 1919 में जन्म और 2012 में निधन हो गया।वे अपने ढंग से जिये।
 हालांकि बिहार को लेकर गुजराल ने कुछ समझौते भी किए थे।
 बात 1975 की है।तब इंदर कुमार गुजराल सूचना व प्रसारण मंत्री थे।
 तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव बिशन टंडन उन दिनों अपनी डायरी लिखते थे।बाद मंे उस  डायरी कव प्रकाशन भी हुआ।
 टंडन साहब ने 21 जून 1975 को अपनी उस डायरी मेें गुजराल से संबंधित प्रकरण को साफ -साफ ढंग से लिखा ।
 ‘आज गुजराल से पता चला कि उन्हें संजय @गांधी@ने बुला कर बहुत फटकारा कि कल की रैली का प्रचार ठीक से नहीं हुआ।प्रधान मंत्री के पक्ष में जो अभियान चल रहा है,उसका भी प्रचार अपर्याप्त है।
गुजराल को बुरा लगा कि  संजय उन्हें डांटे -फटकारे।
बुलाया गया था उन्हें प्रधान मंत्री के नाम पर ,किंतु मिलने को कहा गया संजय से।संजय ने गुजराल से कहा कि समाचार बुलेटिन प्रधान मंत्री आवास पर भेजा जाए।
इस पर गुजराल ने संजय गांधी से कहा कि कार्य की दृष्टि से अच्छा होगा कि किसी अधिकारी को इस काम के लिए मनोनीत कर दिया जाए।
वह आकाशवाणी केंद्र में ही रहें।उन्हें सब बुलेटिन दिखा दिए जाएंगे।उन्होंने शारदा का नाम सुझाया। पर संजय गांधी ने इस काम के लिए बहल की ड्यूटी लगा दी।
  बिशन टंडन की डायरी के अनुसार प्रधान मंत्री से भी उनकी जो भंेट हुई, वह अप्रिय ही रही।
प्रधान मंत्री ने कहा कि आज मोरारजी  के घर प्रदर्शन का आयोजन होगा,उसका बहुत व्यापक प्रचार होना चाहिए।
  प्रधान मंत्री ने यह भी इच्छा प्रकट की कि वे रेडियो और टी.वी.स्क्रिप्ट देखना चाहेंगी।सिर्फ इसी घटना से संबंधित नहीं ,बल्कि हर बुलेटिन प्रसारित होने से पहले मुझे दिखाया जाए।
   इस पर गुजराल ने प्रधान मंत्री से कहा कि स्क्रिप्ट बुलेटिन आदि तो सामान्यतः मैं भी प्रसारण से पहले कभी नहीं देखता।
इस पर प्रधान मंत्री ने बिगड़ते हुए कहा कि यदि आप पहले नहीं देखते तो सूचना मंत्री किस बात के हैं ?
खैर आप देखें या न देखें,प्रधान मंत्री यह सब देखना चाहती हैं।
 बाद में पता चला कि 20-25 आदमी मोरारजी के घर गए।कुछ लोगों ने पथराव किया।पर जब तक मोरारजी बाहर निकले,वे सब गायब हो गए।
पता नहीं इसका कितना रेडियो-टीवी पर प्रचार हुआ ,पर गुजराल शेषन से अपना दुखड़ा रो रहे थे।मैं चुपचाप सुन रहा था।’
  यह सब उन दिनों हो रहा था जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का रायबरेली से लोक सभा कव चुनाव रद कर दिया था।सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक तो लगाई,पर इंदिरा गांधी को सदन में मतदान करने से रोक दिया।
  इस राजनीतिक उथल -पुथल की स्थिति में एक तरफ जेपी और प्रतिपक्षी दल प्रधान मंत्री से इस्तीफे की मांग कर रहे थे,दूसरी ओर कांग्रेस इंदिरा गांधी के पक्ष में अभियान चला रही थी।
  25 जून 1975 की रात में आपातकाल लग गया और 28 जून को विद्याचरण शुक्ल ने नये सूचना व प्रसारण मंत्री का पद भार संभाल लिया।
उससे पहले टंडन ने अपनी डायरी में लिखा कि ‘शारदा ने यह बताया कि प्रधान मंत्री आवास पर पूरा कंट्रेाल संजय ने अपने हाथ में ले लिया है।’
  गुजराल जब 1997 में संयुक्त मोर्चा सरकार के  प्रधान मंत्री बने तो उन्हें कुछ ही महीनों में नाहक प्रधान मंत्री पद से हटवा दिया गया।यह काम तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने किया।
 उन दिनों जस्टिस एम.एल.जैन आयोग की रपट आई थी।
रपट में राजीव गांधी की हत्या के लिए डी.एम.के. को जिम्मेदार ठहरा दिया गया था।हालांकि जैन आयोग ने उसका कोई सबूत नहीं दिया था।
याद रहे कि 1991 में तमिल नाडु में राजीव गांधी की लिट्टे द्वारा हत्या कर दी गयी थी।हत्या की परिस्थियों की जांच के लिए जैन के नेतृत्व में न्यायिक जांच आयोग बना था।
जैन आयोग ने अंतरिम रिपोर्ट दी थी।
पर सीताराम केसरी समझ रहे थे कि गुजराल के हटने के बाद खुद उनके प्रधान मंत्री बनने के चांस होंगे।
केसरी ने पहले गुजराल से कहा कि वे डी.एम.के. के तीनों मंत्रियों को बर्खास्त कर दें।गुजराल जब नहीं माने तो केसरी ने मोर्चा सरकार से कांग्रेस का समर्थन वापस ले लिया।
1998 में फिर से लोक सभा का चुनाव हुआ।अटल बिहारी वजपेयी के नेतृत्व में राजग की सरकार बन गयी।
@सुरेंद्र किशोर -हिंदी फस्र्टपोस्ट@
@ 30 नवंबर 2017@
   
       

रविवार, 3 दिसंबर 2017

उप प्रधान मंत्री पद से सरदार पटेल ने की थी अपने इस्तीफे की पेशकश


  सरदार पटेल ने 1948 में  उप प्रधान मंत्री पद 
से अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी।
इस संबंध में दुःखी मन से उन्होंने गांधी जी को 12 जनवरी 1948 को पत्र लिखा था।
पर गांधी की मंजूरी नहीं मिलने के कारण वह इस्तीफा नहीं दे सके। सरदार बल्लभ भाई पटेल गांधी युग के वैसे कुछ नेताओं में शामिल थे जो सिर्फ सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि अपने सिद्धांतों पर अड़े रहते हुए जन सेवा के लिए सरकार में जाते थे।
किसी कारणवश यदि वे जन सेवा नहीं कर पाते थे तो उनका पद खुद उन्हें बोझ लगने लगता था।
सरदार पटेल ने गांधी जी को लिखा कि ‘काम का बोझ इतना अधिक है कि उसे उठाते हुए मैं दबा जा रहा हूंं।
मैं समझ चुका हूं कि अब और अधिक समय तक बोझ उठाने से देश का भला नहीं होगा,बल्कि इसके विपरीत देश का नुकसान होगा।’
 उन्होंने लिखा कि ‘जवाहर लाल पर और भी अधिक बोझ है।उनके हृदय में दर्द जमा हो रहा है।मेरी आयु के कारण मैं उनका बोझ हल्का करने में सहायक नहीं हो पाऊंगा।
मौलाना@अबुल कलाम आजाद@मेरे कार्य से नाखुश हैं तथा मुझे यह विचार सहन नहीं हो पा रहा कि हर बार आपको मेरा बचाव करना पड़े।
  इन परिस्थितियों में यदि मुझे शीघ्र मुक्त कर दें तो इससे मेरा और देश का भला होगा।
पटेल ने लिखा कि मैं वत्र्तमान में जिस ढंग से काम कर रहा हूं,उससे भिन्न रूप से कार्य नहीं कर सकता।
यदि मैं पद नहीं छोड़ता हूं और आंख बंद कर इससे चिपका रहता हूं तो लोग यह सोचेंगे कि मैं सत्ता सुख के लिए ऐसा कर रहा हूं।

 ऐसी स्थिति में मुझे मुक्ति दिलाई जानी चाहिए।मैं जानता हूं कि आपके उपवास के समय इन बातों पर विचार नहीं किया जा सकता।
लेकिन मैं आपका उपवास समाप्त करने में सहायक नहीं हो पा रहा हूं।
 इसलिए मैं किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो रहा हूं।
 यदि आप शीघ्र उपवास समाप्त कर दें और इस संबंध में  
निर्णय करें तो आपके उपवास के कारण भी दूर हो जाएंगे।
  13 जनवरी से 18 जनवरी 1948 तक गांधी जी का उपवास जारी रहा।विभिन्न समुदायों में शांति कायम करने की जरूरत पर जोर डालने के लिए गांधी जी ने उपवास किया था।
 जब दोनों पक्षों के लोगों ने शांति का भरोसा दिया तो उन्होंने उपवास खत्म कर दिया।
 देश के बंटवारे की तनावपूर्ण व हिंसक पृष्ठभूमि में उन दिनों के अधिकतर लोग जहां गांधी जी के उपवासों को तोड़वाने की कोशिश में लगे थे,वहीं कुछ लोग यह भी नारा लगा रहे थे कि ‘गांधी को मरने दो।’
 वैसे ही लोगों ने 20 जनवरी 1948 को गांधी की प्रार्थना सभा के पास बम फोड़ा और 30 जनवरी को तो उनकी हत्या ही कर दी।
 सांप्रदायिक उपद्रवों से निपटने के तरीके के सवाल पर केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी मतभेद था।
शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद और उप प्रधान मंत्री  सह गृह मंत्री सरदार पटेल आमने -सामने थे।
  विभिन्न मुददों पर पटेल की अपनी अलग राय रहती थी।
अपनी राय से अलग हट कर वे गद्दी से चिपके नहीं रहना चाहते थे।इसीलिए उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की थी।
 सवाल है कि आज के किसी बड़े नेता को ऐसी समस्या 
झेलनी पड़ती जो पटेल को झेलनी पड़ी थी तो  उस स्थिति में आज के सत्ताधारी नेता क्या करते ?
इस सवाल पर सोचिए और बदली हुई राजनीति पर थोड़ी देर के लिए चिंतन कर लीजिए।
उसके बाद पटेल के बड़प्पन का अनुमान लग जाएगा। 
--सुरेंद्र किशोर  
@ फस्र्टपोर्ट हिंदी-से अक्तूबर 2017 @

  
   

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

अविरलता के बिना गंगा में निर्मलता लाने का निरर्थक प्रयास


भारतीय मूल के दो ब्रिटिश उद्योगपति अनिल अग्रवाल और रवि मेहरो़त्रा गंगा घाटों को संुदर बनाने का काम करेंगे।
‘वेदांता’ के अनिल अग्रवाल पटना के रिवर फ्रंट का रख रखाव करेंगे तो रवि मेहरोत्रा यही काम कानपुर में करेंगे।
गंगा और पटना से भावनात्मक लगाव रखने वाले अग्रवाल पटना के मिलर स्कूल के छात्र रह चुके हैं।
लंदन गए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को अग्रवाल और मेहरोत्रा ने यह आश्वासन दिया है।
 मंत्री और उद्योगपतियों की यह पहल सराहनीय है।
पर गंगा को निर्मल बनाने के लिए जो मूल काम होना चाहिए,उसकी जरूरत नरेंद्र मोदी सरकार भी शायद नहीं समझ सकी है।
 या,  यह काम उसके वश में भी नहीं है। कभी मुगल सम्राट अकबर गंगा नदी का ही पानी पीता था।पर, आज स्थिति यह है कि गंगा नदी का पानी पीने कौन कहे ,छूने लायक भी नहीं है।
इसे जहरीला बना दिया गया है।
शायद ऋषिकेश के पास  गंगा की स्वच्छता अपवाद है। 
 इसे जहरीला बनाने में आजादी के बाद की सरकारों का पूरा योगदान रहा है।अंग्रेजों के जमाने में भी इसकी स्थिति इतनी भयानक नहीं थी।
बचपन में मैंने सारण जिले के दिघवारा के पास गंगा की निर्मलता देखी थी।
   यदि गंगा जैसी दिव्य औषधीय गुणों वाली नदी किसी दूसरे
देश में होती तो इसे वहां के लोग अगली पीढि़यों के लिए संभाल कर रखते।
  अन्य बातों के अलावा दरअसल गंगा नदी पर डैम बना कर इसकी प्राकृतिक धारा को बाधित कर दिया गया है।
 जब नदी सूख जाएगी, उसमें नाले का गंदा पानी गिरने लगेगा तो उसकी जो हालत होगी,वही आज गंगा के साथ हो रहा है।
चाहिए तो यह था कि गंगा को छुए बिना उसकी सहायक नदियों में वर्षा जल को रोक कर उससे सिंचाई का काम किया जाता।
फिर भी गंगा किनारे वाले राज्यों खास कर उत्तराखंड को यदि आर्थिक नुकसान होता तो उसकी क्षतिपूत्र्ति 
केंद्र सरकार कर सकती थी।
  इससे गंगा की अविरलता कायम रहती।
आज यदि गंगा निर्मल नहीं है तो सिर्फ उसके रिवर फ्रंट को चमकाने से क्या फायदा ?
  अविरलता के बिना नाले की दुर्गंध लेने कौन जाएगा रिवर फ्रंट तक  ?
  कुछ नेताओं के उपेक्षित बाल-बच्चे----
इस देश के कई बड़े नेताओं के बाल-बच्चों की काली करतूतों को देखकर डा.राम मनोहर लोहिया की याद आती है।
डा.लोहिया कहा करते थे कि राजनीतिक जीवन बिताने का निर्णय  करने वालों को शादी नहीं करनी चाहिए।
खुद डा.लोहिया ने भी शादी नहीं की थी।
 हालांकि सभी नेताओं की संतानों में ऐसा भटकाव नहीं देखा जाता । पर अनेक नेताओं के बाल -बच्चों के  भटक जाने की खबरें आती रहती हंै ं।
 आजादी के तत्काल बाद गठित केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक दक्षिण भारतीय सदस्य को ऐसी ही परेशानी झेलनी पड़ी थी।
उनके बेलगाम पुत्र ने उत्तर प्रदेश में एक हत्या कर दी।
किसी तरह उसे जमानत दिलवा कर विदेश भिजवा दिया गया था।
यह और बात है कि बाद में अपने जीवन में उसने अच्छे काम किए। 
ऐसी घटनाओं का  सबसे बड़ा कारण यह है कि सार्वजनिक जीवन इतनी व्यस्तता वाला जीवन होता है कि नेताओं को अपने बाल-बच्चों को उचित शिक्षा और समुचित संस्कार देने की फर्सत ही नहीं मिलती।यह तो ईमानदार नेताओं की बात हुई।
 पर यदि नेता भ्रष्ट हो और उसे सत्ता भी मिल जाए तब तो उनके बाल -बच्चों के बिगड़ने का  बहुत अधिक चांस रहता है।
 ऐसे अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं।
 कुछ ऐसे नेताओं को जानता हूं जो अपनी संतान के अपराध व उदंडता के कारण खुद भी भारी पीड़ा झेलते रहे हैं।पर वे कहें तो किससे  ? यहां वैसे अभिभावकों की बात नहीं की जा रही है जो जानबूझ कर अपनी संतानों को विवादास्पद रास्तों पर ढकेल देते हैं।
ऐसे कटु अनुभवों को देखते हुए वे लोग सबक ले सकते हैं  जिनकी अभी शादी नहीं हुई है और वे सार्वजनिक जीवन को अपनाना चाहते हैं। 
   जनेऊ के बारे में कुछ बातें ऐसी भी ----
मैं खुद तो नियमित रूप से जनेऊ नहीं पहनता, पर इतना भी ‘क्रांतिकारी’ नहीं हूं कि यह कह दूं  कि ‘जनेऊ एक अश्लील धागा है।’
  हां, विनोबा भावे की एक बात मुझे ठीक लगती है।उन्होंने कहा था कि जनेऊ के दो ही उपयोग हैं - एक तो उसमें चाबियां बांधी जा सकती हैं और उससे पीठ खुजलाई जा सकती है।
याद रहे कि विनोबा जी भी जन्मना ब्राह्मण थे।
मैंने बचपन में अपने गांव में जनेऊ के दो अन्य उपयोग भी देखे हैं।
 मेरे पड़ोस के  बाबा लगते थे।वे पत्ते तोड़ने के लिए बांस पर चढ़ गए।बहुत मोटा जनेऊ पहनते थे।एक बांस से गिरे ,पर उनका जनेऊ दूसरे बांस में फंस गया।
गांव- जवार में चर्चा हो गयी कि फलां बाबा को जनेऊ ने बचा लिया।
दरसल बांस के निचले हिस्से में बांस की नुकीली जड़ेंं होती हंै ।उस पर गिरने से बाबा को जनेऊ ने बचा लिया था।
  एक अन्य अवसर पर एक किसान ने रस्सी से गेहूं का ‘बोझा’ बांधा था।
रस्सी टूट गयी।आसपास कोई रस्सी नहीं मिली।उसने अपने जनेऊ का सदुपयोग कर लिया।    
  एक भूली-बिसरी याद-----
जेपी आदोलन व आपातकाल की पृष्ठभूमि में सन् 1977 में लोक सभा का चुनाव हुआ था।जनता पार्टी की भारी जीत हुई थी।
पहली बार केंद्र की सत्ता से कांग्रेस का एकाधिकार टूटा था।उस जीत का सर्वाधिक श्रेय जयप्रकाश नारायण को मिला था।प्रधान मंत्री का नाम तय करने में भी जेपी-कृपलानी  की प्रमुख भूमिका थी।
  पर केंद्र की मोरारजी सरकार ने थोड़े ही दिनों में जेपी को निराश कर दिया था।
जेपी  देसाई की शासन -पद्धति से संतुष्ट नहीं थे।
वह प्रकट हुआ था जेपी के एक इंटरव्यू से ।जय प्रकाश नारायण ने  1978 में एक हिंदंी साप्ताहिक से बातचीत में यहां तक कह दिया कि 
‘यदि अब देश में कोई हिंसक आंदोलन भी होगा तो मैं उसका विरोध नहीं करूंगा।’
यह टिप्पणी जेपी की खिन्न मनोदशा को अभिव्यक्त कर रही थी।
याद रहे कि मुसहरी में हुए नक्सलियों के हिंसक आंदोलन की पृष्ठभूमि में 1969 में जेपी ने वहां शांति स्थापित करने के लिए  अभियान चलाया था।
1974 के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए  जेपी तभी तैयार हुए थे जब छात्र-युवा नेताओं ने उन्हें यह आश्वासन दिया था कि आंदोलन में शांति बनी रहेगी।
 यह प्रकरण इसलिए भी मौजूं है क्योंकि अपने देश में कई बार ऐसा हुआ कि राजनीतिक दल लुभावने नारे के बल पर सत्ता में तो आ गए पर  गददी मिलते ही अपने वायदे भूल गए।
   लीज पर लेने का प्रावधान सही----
बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकार @संशोधन@विधेयक में जमीन लीज पर लेने या खरीदने का प्रावधान सही और मौजूं है ।पर, मुआवजा समुचित मिलना चाहिए।जिस तरह नेशनल हाईवे के लिए केंद्र सरकार देती है।
इससे बिहार में उद्योग के लिए जमीन मिलने की संभावना बढ़ेगी।
इसके साथ ही कानून -व्यवस्था में सुधार जारी रहा तो औद्योगिकीकरण भी बढ़ेगा।
बिजली की व्यवस्था तो सरकार कर ही रही है।  
    और अंत में----
 उत्तर प्रदेश में नगर निकायों के चुनाव हो चुके हैं।रिजल्ट 
बाकी है।
एग्जिट पोल के नतीजे बता रहे हैं कि 16 नगर निकायों में से 15 में भाजपा को बहुमत मिलेगा।
 प्रदेश की योगी सरकार ने अब तक ऐसा कोई चैंकाने वाला काम नहीं किया है जिससे यह लगेगा कि वह रिजल्ट उन कामों का नतीजा है।हां, एक बात हो सकती है।भाजपा की  जीत होगी तो माना जाएगा कि शायद लोगों ने योगी सरकार की उपलब्धियों से अधिक उसकी मंशा पर अधिक भरोसा किया होगा।    
@ 1 दिसबंर 2017 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@