शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

 पारस नाथ तिवारी नहीं रहे। पत्रकार ब्रजनंदन जी के बाद
 इतनी जल्दी दूसरा झटका ! सोचा भी न था।
यहां से चले जाने का भला यह भी कोई उम्र होती है !
पर क्या कीजिएगा ! सब विधि का विधान है। 
 पारस नाथ तिवारी को हम सब ‘पारस बाबा’ या सिर्फ ‘बाबा’
कहा करते थे।
लगभग मेरी ही उम्र के थे।फिर भी बाबा  ? बाबा में आदर और प्यार के मिले -जुले भाव थे।
  जिन लोगों ने खुद ही खुद को बनाया हो, उनके प्रति आदर स्वाभाविक ही है।
 दैनिक अखबार ‘अमृत वर्षा’ के संपादक सह मालिक थे।
कभी उन्होंने दक्षिण बिहार से एक साप्ताहिक ‘मंगलवार’ निकाला था।
   मैं पटना से उसमें भी लिखा करता था।बाबा मुझे पारिश्रमिक भी भिजवाते थे।
 मुझे याद है कि जिन  दिनों मैं पटना में ‘पद यात्री’ था, तो उनके ही भेजे गए पारिश्रमिक के पैसे से  मैंने एक सेकेंड हैंड साइकिल खरीदी थी।
 पहले वे धनबाद-बोकारो में सक्रिय थे।समाजवादी और मजदूर नेता के  रूप में।बाद में वे अखबार निकालने लगे।
पटना और  दिल्ली से भी ‘अमृत वर्षा’ का प्रकाशन शुरू हुआ।इन दिनों बाबा दिल्ली में ही रहते थे।यदाकदा  उनसे  फोन पर मेरी बातचीत हो जाया करती थी। 
  जहां तक मुझे याद है, मैंने पहली बार उन्हें पटना में श्रीकृष्ण सिंह के आवास पर देखा था।लोहियावादी समाजवादी श्रीकृष्ण सिंह के पारसनाथ तिवारी करीबी थे।श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पूर्व मंत्री नरेंद्र
सिंह के पिता थे।वे खुद भी सांसद व बिहार में मंत्री रह चुके थे।
 पारस नाथ जी जैसा जीवंत व्यक्ति मैंने बहुत कम देखे हैं।पारस बाबा विपरीत परिस्थितियों में भी कभी घबराते नहीं थे।
किसी से भी डरते नहीं थे।
बड़े से बड़े नेता से भी वे बेबाकी से बातें करते थे।
उन्होंने अपने अखबार में भी नब्बे के दशक में बड़ी हिम्मत से खबरें छपवाईं।
उसको लेकर उन्हें कठिनाइयां भी झेलनी पड़ीं।वह दौर ही ऐसा था।
पर उसकी परवाह किसे थी ?
  बाबा से बात करना इसलिए भी ऊबाई नहीं होता था क्यांेकि वे 
जमीन से जुड़े हुए थे। हिंदी, भोजपुरी और अंग्रेजी शब्दों से  मिश्रित भाषा वे बोलते थे।
  लाइवबिहार.लाइव के राजनीतिक संपादक कन्हैया भेलाड़ी पारसनाथ तिवारी के बारे मंे कहते हैं कि ‘वैसा मस्त आदमी मैंने नहीं देखा।पारस नाथ जी समस्याओं को पराजित कर देना जानते थे।सामने वाले में सोये हुए आत्म विश्वास को जगा देते थे।’
मेरी श्रद्धांजलि।     
  

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