सोमवार, 11 दिसंबर 2017

कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीतने पर भी पद नहीं बचा पाए थे सुभाष चंद्र बोस


          
 बात सन् 1939 की है। कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस ने अध्यक्ष पद के चुनाव में पट्टाभि सीता रमैया को हरा दिया था।
 रमैया  महात्मा गांधी के उम्मीदवार थे।बोस की जीत पर गांधी ने कहा कि सीता रमैया की हार मेरी हार है।
 नतीजतन पूरी कार्य समिति ने इस्तीफा दे दिया।समितिके सदस्य बोस के साथ काम करने को तैयार नहीं थे।
  मजबूर होकर सुभाष चंद्र बोस ने भी कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
  बाद में सुभाष चंद्र बोस ने फाॅरवर्ड ब्लाॅक बना लिया। पर सुभाष चंद्र बोस के विमान दुर्घटना में निधन की जब खबर आई, तो महात्मा गांधी ने कहा कि ‘हिंदुस्तान का सबसे बहादुर व्यक्ति आज नहीं रहा।’
   पर इस विवाद पर सरदार बल्लभ भाई पटेल तथा कुछ अन्य लोगों के साथ सुभाष चंद्र बोस के पत्र -व्यवहार पढ़ने लायक हैं।  
  सरदार  पटेल ने 7 फरवरी, 1939 को सुभाष चंद्र बोस को लिखा कि ‘आपके निर्वाचन के तुरंत बाद प्रेस ने यह छापा कि हम सबने कार्य समिति से त्यागपत्र दे दिया है। ए.पी. के प्रतिनिधि ने बारदोली में मुझसे जानना चाहा। मैंने उनसे उस समय इस रिपोर्ट का प्रतिवाद करने को कहा।’
  ‘उसके बाद मुझे मौलाना @अबुल कलाम आजाद@का तार मिला, जिसमें उन्होंने हम सबको त्यागपत्र देने का सुझाव दिया है। मैंने सोचा कि आपके निर्वाचन के तुरंत बाद हमारे त्यागपत्र देने से गलतफहमी पैदा होगी तथा आपको उलझन हो सकती है। अब राजेन बाबू@डाॅ राजेंद्र प्रसाद @ने मुझे लिखा है कि यदि इस समय हम इस्तीफा दें, तो इससे मदद मिलेगी और इस सुझाव के समर्थन में जो तर्क उन्होंने दिए हैं, वे मुझे उचित लगते हैं।’
    ‘हम सब त्यागपत्र देने को तैयार हैं, जैसे ही आप हमें सूचित करते हैं कि आपको इससे कोई परेशानी नहीं होगी। यदि आप चाहते हैं कि हम थोड़ा इंतजार करें, तो हम आपकी बात मानेंगे, लेकिन उतना ही जितना आपको सुविधाजनक हो। कृपया इस विषय पर अपनी इच्छा तार द्वारा सूचित करें।’
 अंततः सरदार पटेल ने त्यागपत्र दे ही दिया। उसे दुःख के साथ स्वीकार करते हुए  कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने 26 फरवरी, 1939 को लिखा,‘ प्रिय सरदार जी, आपका संयुक्त त्याग पत्र 22 फरवरी को वर्धा में ठीक समय पर प्राप्त हो गया। मेरी अस्वस्थता के कारण उसका उत्तर पहले देना संभव न हो सका। सामान्यतया मुझसे आपसे आपके निर्णय पर पुनर्विचार के लिए कहना चाहिए था और  मिलने तक इस त्यागपत्र को रोकना चाहिए था, लेकिन मैं जानता हूं कि आपने खूब सोच विचार कर निर्णय लिया है और निर्णय लेने से पहले आपने सभी परिस्थितियों पर विचार किया होगा। यदि इस समय मुझे जरा भी संभावना होती कि आप अपने त्यागपत्र पर पुनर्विचार करेंगे, तो मैं आपसे इस्तीफा वापस लेने का अनुनय विनय करता, लेकिन वर्तमान परिस्थिति में औपचारिक प्रार्थना से काम नहीं बनेगा, अतः मैं आपका त्यागपत्र बहुत दुःख के साथ स्वीकार करता हूं।’
     इससे पहले 8 फरवरी, 1939 को सरदार पटेल ने जवाहर लाल नेहरू को लिखा कि ‘ मुझे आपका पिछला पत्र बारदोली में मिला, जो आपने संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने या स्वतंत्र बयान जारी करने के मेरे निवेदन के उत्तर में लिखा था। मैंने बापू के अनुरोध पर आपसे यह निवेदन किया था। मैंने उन्हें आपका जवाब दिखाया था और उन्होंने मुझसे, जो कुछ मैं महसूस करता हूं, पत्र में लिखने को कहा। वह स्वयं उस पत्र से अप्रसन्न थे, लेकिन मैंने आपको परेशान करना ठीक नहीं समझा। संयुक्त बयान भी उनके अनुरोध पर जारी किया गया। वास्तव में मैंने उनसे कहा था कि इससे मेरे विरुद्ध गाली-गलौज करने का और भी बहाना मिलेगा, परंतु उन्होंने जोर दिया तथा मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया। मौलाना अंतिम क्षण में पीछे हट गए।’
    ‘मुझे आपके विचार ज्ञात नहीं हैं, लेकिन मुझे आशा है कि जो कुछ हम करने जा रहे हैं, उसके लिए आप हमें दोष नहीं देंगे। मैं सोचता हूं कि मेरे भाग्य में गाली खाना लिखा है। बंगाल प्रेस बहुत गुस्से में है और नारीमन और खरे घटना के लिए मुझे दोष दे रहे हैं। हालांकि मेरे सभी सहयोगी इसके लिए संयुक्त रूप से जिम्मेदार हैं। ’ 
     सुभाष चंद्र बोस जब कांग्रेस अध्यक्ष पद से अलग हुए, तो उन्होंने देशव्यापी आंदोलन व विद्रोह आयोजित करने का निर्णय कर लिया। तब डाॅ राजेंद्र प्रसाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे। सरदार बल्लभ भाई पटेल ने इस बारे में 12 जुलाई, 1939 को डाॅ राजेंद्र प्रसाद को लिखा कि ‘मेरा सुझाव है कि सुभाष बाबू के अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के निर्णयों के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन और विद्रोह आयोजित करने के उनके निर्णय के स्पष्टीकरण के लिए एक नोटिस दिया जाए, क्योंकि बंगाल प्रांतीय कांग्रेस कार्यपालिका के अध्यक्ष होने के नाते उन निर्णयों का आदर करने और कार्यान्वयन करने को वे बाध्य हैं। जहां तक बंगाल प्रांतीय कार्यपालिका का संबंध है, बेहतर होगा कि उसे भी ऐसा नोटिस दिया जाए। उन्होंने आपकी सलाह की उपेक्षा की है, अनुशासन भंग किया है। उन्हें अपना स्पष्टीकरण भेजने दीजिए और अगली बैठक में हम उन पर कार्रवाई करने के प्रश्न पर विचार करेंगे। इस समय हमारी ओर से कमजोरी दिखने से अनुशासनहीनता फैलेगी और हमारा संगठन कमजोर होगा। आपने बंबई सरकार की मद्य निषेध नीति पर सुभाष बाबू का बयान देखा होगा। उन्होंने हमारे शत्रुओं से भी बुरा व्यवहार किया है।’
   @मेरा यह लेख फस्र्टपोस्ट हिंदी पर 11 दिसंबर 2017 को प्रकाशित@ 


रविवार, 10 दिसंबर 2017

भारत के राष्ट्रपति बनते -बनते रह गए थे सी.राज गोपालाचारी



    
सी.राज गोपालाचारी यानी राजा जी कई बातों के लिए याद किए जाते हैं।
वे न सिर्फ आजाद भारत के पहले और आखिरी भारतीय गवर्नर जनरल थे बल्कि उन्होंने 1959 में एक ऐसी गैर कांग्रेसी पार्टी यानी स्वतंत्र पार्टी बनाई जिसे 1967 में  लोक सभा में 44 सीटें मिलीं।
तब तक इतनी अधिक सीट किसी अन्य प्रतिपक्षी पार्टी को नहीं मिल सकी थी।
  आजादी के बाद तब के गवर्नर जनरल लाॅर्ड माउंट बेटन वापस जाने लगे तो सवाल उठा कि उनकी जगह कौन लेगा।
 कांग्रेस पार्टी  की राय सरदार बल्लभ भाई पटेल के पक्ष में थी ।किंतु प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू की जिद पर राज गोपालाचारी गवर्नर जनरल बने।उससे पहले राजा जी पश्चिम बंगाल के गवर्नर रह चुके थे।
 सन 1950 में जवाहरल लाल जी, राजा जी को राष्ट्रपति बनवाना चाहते थे।पर , सरदार पटेल की जिद पर डा.राजंेद्र प्रसाद बने।
 सरदार पटेल के निधन के बाद राजा जी देश के गृह मंत्री बने थे।पर नेहरू के साथ सैद्धांतिक मतभेद के कारण वे उस पद से 10 महीने में ही हट गए।
हालांकि बाद में भी राजा जी मद्रास के मुख्य मंत्री बने।
वे 1937-39 में भी वहां के मुख्य मंत्री यानी प्रीमियर रह चुके थे।
पर कभी उन्होंने अपने विचारों से समझौता नहीं किया।
राजा जी खुली अर्थ व्यवस्था के कट्टर समर्थक थे।
इसीलिए जब उन्होंने स्वतंत्र पार्टी बनाई तो उससे बड़े -बड़े उद्योगपति व राजा महाराजा जुड़े।फिर भी कुछ कारणवश जवाहर लाल नेहरू उन्हें पसंद करते थे।
राजा जी 1952 से 1954 तक मद्रास के मुख्य मंत्री थे।उनके ही मुख्य मंत्रित्व काल में मद्रास से अलग होकर 1953 में भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश अलग राज्य बना।
  गांव के स्कूल से अपनी शिक्षा प्रारंभ करने वाले राजा जी विद्वान लेखक ,वकील और राज नेता थे ।उन्होंने ऊंची शिक्षा हासिल की थी।राजा जी का जन्म मद्रास प्रेसिडेंसी के एक गांव में 10 दिसंबर 1878 को हुआ था।उनका निधन 25 दिसंबर 1972 को हुआ।
उन्होंने बाल गंगाधर तिलक के प्रभाव में आकर 1911 में सार्वजनिक जीवन की शुरूआत की।
सन 1919 में वे गांधी जी से जुड़े।
वे गांधी जी से पारिवारिक रूप से जुड़ गए थे।
राजा जी की बेटी लक्ष्मी की शादी महात्मा गांधी के चैथे पुत्र देव दास गांधी से हुई थी।देवदास गांधी हिन्दुस्तान टाइम्स के प्रबंध संपादक  थे।
देव दास गांधी -लक्ष्मी के पुत्र राज मोहन गांधी, राम चंद्र गांधी और गोपाल कृष्ण गांधी हुए।राम चंद्र गांधी का 2007 में निधन हो गया।गोपाल कृष्ण गांधी पश्चिम बंगाल के गवर्नर थे।
  राजा जी हमेशा ही स्वतंत्र विचार के राज नेता रहे ।
वे जो ठीक समझते थे,वही करते थे।उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया था।उनके अपने तर्क थे जो गांधी जी से नहीं मिलते थे।
इसीलिए जब जवाहरलाल नेहरू ने उन्होंने राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव किया तो कांग्रेस पार्टी ने उनका कड़ा विरोध कर दिया।
विरोध इसी आधार पर हुआ कि जिस व्यक्ति ने कांग्रेस की सबसे कठिन लड़ाई में हमारा साथ नहीं दिया ,उन्हें हम राष्ट्रपति कैसे बनाएं।
  हालांकि दूसरी ओर अपने निधन से पहले राजाजी ने एक बार सार्वजनिक रूप से कहा था कि आजादी के बाद यदि जवाहर लाल नेहरू की जगह सरदार पटेल प्रधान मंत्री बने होते तो देश के लिए बेहतर  होता।
@ फस्र्टपोस्ट हिंदी में 10 दिसंबर 2017 को प्रकाशित मेरा लेख@
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शनिवार, 9 दिसंबर 2017

  इन दिनों इस देश के अनेक बुद्धजीवी एक बात को 
लेकर  चिंतित लग रहे हैं।
उनकी चिंता है कि प्रतिपक्ष कमजोर होता जा रहा है।यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
व्यक्तिगत रूप से मेरी भी यही राय है।
 इस समस्या का समाधान आखिर कौन करेगा ?
  वही करेगा जिसने प्रतिपक्ष को कमजोेर किया है।
मेरा मानना है कि प्रतिपक्ष ने खुद ही प्रतिपक्ष को कमजोर किया है।
 आज का प्रतिपक्ष जब  सत्ता में था तो उनमें से बहुलांश   पर लगातार घोटालों और महा घोटालों के आरोप लगते रहे।
उन पर यह आरोप भी था कि उसने अल्पसंख्यकों के बीच के अतिवादियों का तुष्टिकरण किया।अल्पसंख्यकों को लेकर खुद कांग्रेस की ए.के.एंटोनी कमेटी की रपट में भी इस तरह की  बात कही गयी है।
  इन दो बातों का भाजपा ने पूरा लाभ उठाया।
  अब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं।
बल्कि कहिए कि बन ही चुके हैं।घोषणा बाकी है।
क्या राहुल जी  उपर्युक्त कारणों से सहमत हैं ?
यदि नहीं तो अपनी पार्टी की लगातार हार के असली कारणों
का वे खुद पता लगाएं और लगवाएं। जरूरत समझें तो देश-विदेश की किसी निष्पक्ष एजेंसी से जांच करवा लें।
चिंतित बुद्धिजीवी उन्हें इस काम में मदद करें।सब मिल कर उन कारणों को दूर करने के गंभीर उपाय करें।
उसके बाद  ही वे मतदाताओं से उम्मीद करें कि वे उन्हें दोबारा मजबूत करेंगे।
  यह मान कर चलें कि मतदाता कभी गलत नहीं होते।
मेरी समझ से गत विधान सभा चुनाव में न पंजाब के मतदाता गलत थे और न ही उत्तर प्रदेश के ।
आम मतदाताओं को बेहतर सरकार चाहिए।यहां वैसे मतदाताओं की बात नहीं की जा रही है जो धर्म और जाति के नशे में डूबे रहते हैं।
 इसे नहीं भूलना चाहिए कि सोफ्मा जैसी ज्यादा अच्छी तोप को छोड़कर जब केंद्र सरकार ने कम अच्छी तोप बोफर्स खरीद ली तो जनता नाराज हो गयी थी। इसीलिए 1989 में कांग्रेस हार गयी।जनता सब जानती है। 
  
     


मैंने अपने पोस्ट की अंतिम लाइन में  वी.पी.सिंह को उधृत करते हुए यह लिखा  है कि ‘मैंने कभी यह आरोप नहीं लगाया कि राजीव गांधी को पैसे मिले हैं।’
 दरअसल 1989 के लेास चुनाव में कांग्रेस इसलिए हार गयी क्योंकि वी.पी.सिंह बोफर्स के दलालों पर आरोप लगा रहे थे और राजीव और उनके दल के लोग दलालों का बचाव कर रहे थे।
मतदाताओं ने समझा कि जरूर दाल में कुछ काला है।इसलिए कांग्रेस हार गयी। 1988 में पटना के एक प्रेस कांफंे्रस में मैंने वी.पी.सिंह से यह सवाल किया था कि ....तब आप राजीव गांधी से इस्तीफा की मांग क्यों नहीं करते ? इस पर उन्होंने कहा कि आप कोई सिरियस सवाल कीजिए।
  जहां तक जल्दीबाजी में केस के निपटारे का सवाल है, तो उसके बारे में कुछ बातें।
2 दिसंबर, 1989 को वी.पी.प्रधान मंत्री बने और 22 जनवरी को 
बोफर्स में प्राथमिकी दर्ज कर दी गयी।
जिस घोटाले का अतंरराष्ट्रीय विस्तार हो,उसमें आखिर कितनी जल्दीबाजी हो सकती थी ?
एक बात और थी।कांग्रेस के अलावा भी कुछ दूसरे दलों के बड़े -बड़े नेता भी इस केस को दबाने में लगे थे।देश -विदेश की अदालतों में तरह -तरह की अपील करके मामले को लंबा खींचा जा रहा था।
जब -जब कांग्रेस या कांग्रेस समर्थित सरकारें आईं  , केस को कमजोर करने के काम हुए।
  इसके बावजूद  अटल सरकार के कार्यकाल में  1999 में  आरोप पत्र दाखिल किया गया।आरोप पत्र के सेकेंड काॅलम में आरोपित के रूप में राजीव गांधी का भी नाम है।  
   मृतक आरोपित का नाम उसी कालम में होता हैं।यदि वी.पी.सिंह और जांच एजेंसियों ने सारे संबंधित सबूत एकत्र नहीं किए होते तो आरोप पत्र कैसे तैयार होता ? केस इतना मजबूत था कि कांग्रेस सरकार भी कोर्ट में ट्रायल का सामना करने को कभी तैयार नहीं हुई।वह केस वापस ही कर रही थी। 
 बिहार के तब के एक कांग्रेसी विधायक ने इस संबंध में मुझे एक सनसनीखेज बात बताई थी।उस विधायक को राजीव जी के कारण ही  1985 ं टिकट दिया गया था।वह अब भी राजीव के कट्टर प्रशंसक हैं।राजीव से बातचीत के  आधार पर  बोफर्स पर उस विधायक @अब पूर्व@ ने किताब लिखी है।वह किताब मेरे पास भी है।
  उसमें यह कहा गया है कि बोफर्स सौदे में दलाली राष्ट्र हित के एक खास काम के लिए  ली गयी थी।वह राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित  काम था।
वह गुप्त काम था।
 उस गुप्त काम की चर्चा उस किताब में है।पर मैं  उसे जाहिर करना नहीं चाहता।
पूर्व विधायक के अनुसार उसे राजीव जी देशहित में सार्वजनिक नहीं कर सकते थे चाहे उनकी गददी ही क्यों न चली जाए।इसीलिए उन्होंने लगातार क्वात्रोचि का बचाव किया। 


  


  मेरे आवास के पास में ही सरकारी मिडिल स्कूल है।
स्कूल से  प्रार्थना और राष्ट्रगीत की आवाज मुझे रोज सुनाई पड़ती है।
  कल उसी स्कूल की एक छात्रा मेरे घर के पास से गुजर रही थी कि इसी बीच स्कूल में राष्ट्र गान शुरू हो गया।छात्रा जहां थी, तत्काल सावधान की मुद्रा में सड़क पर ही खड़ी हो गयी।
जब राष्ट्रगान समाप्त हुआ, तभी वह आगे बढ़ी।
मैं उसे जानता नहीं।पर उस छात्रा में यह अनुशासन और संस्कार देख कर मुझे अच्छा लगा।स्वाभाविक है कि इसमें परिवार के साथ-साथ संबंधित स्कूल का भी योगदान है।



मणि शंकर अय्यर जी,
 आप गत लोक सभा चुनाव से ठीक पहले नरेंद्र मोदी के लिए प्रधान मंत्री पद की जगह  चाय की दुकान का स्थल दे रहे थे।
 आपके इस बयान से  लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को कितना फायदा मिला ?
बाद में आपने पाकिस्तान जाकर वहां के लोगों से सार्वजनिक रूप से यह अपील की कि आप लोग मोदी की सरकार को हटवाइए।
 आपके इस बयान से उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को कितना लाभ मिला ?
अब आपने कहा कि नरेंद्र मोदी  नीच इनसान है।
गुजरात में इस बयान से कांग्रेस का कितना वोट बढ़ेगा ? 
   आप तो विदेश सेवा में थे।काफी प्रतिभाशाली हैं।राजीव के अत्यंत करीबी रह चुके हैं।आप जरूर सोच- समझ कर ही  बयान देते होंगे।बस उसके ,उददेश्य, कारण व परिणाम के बारे में भी कभी कुछ लोगों को बता दीजिएगा। 
@ 7 दिसंबर 2017@

  देश के नामी पत्रकार और समाजवादी विचारक राज किशोर
ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ में  अपने साप्ताहिक काॅलम ‘परत दर परत’ में  राम जन्म भूमि मंदिर-मस्जिद विवाद पर कल निम्न लिखित बातें लिखी हैं।
उनका लेख तो लंबा है और उसमें पूरी पृष्ठभूमि का संक्षिप्त विवरण है।
पर, राज किशोर ने अपने लेख के अंत में देशहित में महत्वपूर्ण सुझाव दिए  हंै जो इस प्रकार हंै--
‘ मेरी अल्प बुद्धि के अनुसार विकल्प अब दो ही हैं।एक न्यायिक समाधान का है।लेकिन यह रास्ता कंटीला है।कोर्ट में बहस मंदिर-मस्जिद पर नहीं , इस पर होगी कि विवादित जमीन पर मालिकाना हक किसका है।
यहां बाबरी मस्जिद का पक्ष मजबूत दिखाई पड़ता है,तब हिंदुओं की ओर से देशव्यापी उपद्रव का नया सिलसिला शुरू हो सकता है।
तब हमें बहुसंख्यकवाद का तांडव देखने को मिलेगा।
     इसलिए दूसरा विकल्प ही व्यावहारिक है कि मुसलमान स्वेच्छा से विवादग्रस्त भूमि हिंदूवादियों को दे दें।
इसे समर्पण या अपमान का मामला न माना जाए।मुसलमान उदारता दिखाएंगे तो उनकी प्रशंसा ही होगी।
बेशक हिंदूवादी इसे उदारता के रूप में नहीं लेंगे।
विजय दिवस मनाएंगे,लेकिन मुसलमानों को जहर का घूंट इसलिए निगल लेना चाहिए कि पूरा देश हिंदूवादी नहीं हुआ है।
मेरा मानना है कि भारत की व्यापक जनता मुसलमानों की उदारता से बहुत प्रभावित होगी जिससे राम मंदिर अभियान की हवा निकल जाएगी।
 कभी -कभी झुक जाना भी बुद्धिमानी होती है।इसलिए यह प्रयोग करके देखने में कोई हर्ज नहीं।’
    कई साल पहले खुशवंत सिंह ने भी इसी तरह का सुझाव दिया था।उन्होंने कहा था कि दावा किया जाता  है कि मध्य काल में इस देश के करीब 4000 मंदिरों को तोेड़कर वहां मस्जिदें बनायी गयीं।
 दिवंगत सिंह के अनुसार हिंदुओं को 3997 मस्जिदों पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए।उधर मुसलमान पक्ष काशी ,मथुरा और अयोध्या के मामले में हिंदुओं को सहूलियत दें।
पर ऐसा नहीं हो सका।हालांकि संघ  परिवार के कुछ सदस्य यह कह चुके हैं कि उन्हें सिर्फ राम मंदिर से मतलब है,काशी-मथुरा से नहीं।जब कि काशी का ज्ञानवापी मस्जिद ,मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
यह भी कहा जाता है कि यदि खुशवंत की बात मान ली गयी होती तो  आज भाजपा की केंद्र में बहुमत वाली सरकार नहीं होती।
  क्या इस मामले में विभिन्न पक्षों की जिद के पीछे कोई अन्य बड़ा कारण या उद्देश्य है ?  पता नहीं !