रविवार, 11 मार्च 2018

  कल पटना में दिवंगत पत्रकार फरजंद अहमद को याद किया गया।
दरअसल फरजंद अहमद को याद करना संतुलित व गंभीर पत्रकारिता का सम्मान है।
  उन्होंने  लंबे पत्रकार जीवन में अपने लेखन में भरसक
संतुलन बनाए रखा।
 वे ऐसे मीडिया संस्थानों से जुड़े भी रहे जिनमें इसकी जरूरत भी थी।
 दैनिक ‘इंडियन नेशन’ अपने जमाने का एक गरिमामय अखबार था।फरजंद यू.एन.आई. में भी थे।
मेरा तो हमेशा यह मानना रहा है कि दैनिक अखबारों खास कर हिंदी अखबारों के संवाददाताओं को किसी न्यूज एजेंसी में कम से कम छह महीने की ट्रेनिंग दिलायी जानी चाहिए।
उससे रिपोर्टिंग में संतुलन व जिम्मेदारी का बोध होता हेै।ऐसा संवाददाता के कैरियर के शुरूआती दौर में ही किया जाना चाहिए।
 इसके लिए यदि न्यूज एजेंसी कुछ शुल्क ले तो भी वह ‘सस्ता’ ही पड़ेगा।
खैर फरजंद ‘इंडिया टूडे’ में लंबे समय तक रहे।
 फरजंद अहमद सहित उस पत्रिका के जिम्मेवार संवाददाताओंं -लेखकों के कारण आप आम तौर उस पत्रिका की सामग्री पर आप भरोसा कर सकते हैं।
यू.एन.आई.के पटना ब्यूरो चीफ दिवंगत डी.एन.झा ने मुझसे एक बार कहा था कि इंडिया टूडे चलेगा,पर रविवार-संडे नहीं चलेगा।
कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि इंडिया टूडे जिस पर आरोप लगता है,उसका पक्ष भी लिखता है।
संडे-रविवार ऐसा नहीं करता है।
उन दिनों मैं संडे -रविवार का फैन था।इसलिए तब तो मुझे झा जी की बात  अच्छी नहीं लगी थी।पर आज इस उम्र में अच्छी लगती है।
 ऐसे मीडिया संस्थानों में काम करने पर पत्रकारांे के
व्यक्तित्व में  संतुलन आता है या पहले से संतुलन है तो वह बना रहता है।
फरजंद अहमद इस मामले में सौभाग्यशाली रहे।
इसलिए उनके व्यक्तित्व और उनके कामों से यदि नयी पीढ़ी के पत्रकार अगर चाहें तो कुछ सीख सकते हैं।
नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक दिवंगत राजेंद्र माथुर कहा करते थे कि संवाददाता को ऐसा होना चाहिए कि वह  मिल कर भी खुश करे और लिख कर भी।
सौम्य स्वभाव के फरजंद अहमद के लिए कभी किसी की जुबान पर मैंने नाराजगी  या नफरत नहीं देखी।होगी भी तो मुझे नहीं मालूम ।
  पुनश्चः-
पर आज के दौर में संतुलित ढंग से देश-संविधान के बारे में सोचने व लिखने वाले पत्रकार को बारी -बारी से  दोनों रंगों के उन्मादियों के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है।
जातीय व सांप्रदायिक नजरिए से किसी मीडियाकर्मी के लेखन को परखने वाले कुछ लोग उसे कभी भगवाधारी कह देंगे और कभी कुछ अन्य लोग कम्ुयनिस्ट या कुछ और..........।पर यह खतरा तो उठाना ही पड़ेगा। 
@ 11 मार्च 2018@

  

शनिवार, 10 मार्च 2018

सदनों में कुछ सांसदों-विधायकों के कांव-कांव और 
टी.वी. चैनलों पर कुछ बकबादियों के झांव-झांव में अधिक कर्कश कौन सी आवाज लगती है ?
मेरे लिए तो तय करना कई बार कठिन हो जाता है। और आपके लिए ?

बिहार सरकार का वार्षिक बजट --2001-02
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कुल बजट-- 16,599 करोड़ रुपए।
इनमें योजना बजट-2381 करोड़ रुपए
आंतरिक संसाधन - करीब 2000 करोड़ रुपए
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बिहार सरकार का कुल बजट-2018-19
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कुल बजट--एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए
इसमें योजना बजट--92 हजार करोड़ रुपए
आंतरिक संसाधन- 35 हजार 448 करोड़ रुपए
-------- 
रुपए की कीमत--
---------
सन 2000 के  100 रुपए आज के 342 रुपए के बराबर है। 

------नहीं सुधरे तो टूट गए---



जब किसी राजनीतिक पार्टी में खुद को सुधारने और बदलने की क्षमता समाप्त हो जाए तो वही होता है जो सी.पी.एम.के साथ हो रहा है।त्रिपुरा की सत्ता भी सी.पी.एम. के हाथ से निकल गयी।
एक गरीब देश में कम्युनिस्ट पार्टी की ऐसी हालत कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए चिंताजनक है।आश्चर्यजनक भी।
साठ-सत्तर के दशकों में गरीबों के पक्ष में जब कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट सड़कांे पर निकलते थे तो गरीबों को लगता था कि उनका भी कोई हमसफर है।
पर आज गरीब और कमजोर वर्ग के लोग भ्रष्ट सिस्टम के रहमो करम पर हैं।
उधर कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े पदाधिकारी ने कई साल पहले  अपनी आंतरिक रपट में इस बात पर चिंता जताई थी कि ‘वामपंथी आदर्श भ्रष्टाचार में गुम हो रहे हैं।’  
पूर्व मुख्य मंत्री ज्योति बसु ने 2007 में ही कह दिया था कि 
‘कुछ भ्रष्ट तत्व व्यक्तिगत लाभ के लिए पार्टी का इस्तेमाल कर रहे हैं।कुछ सदस्य समाज विरोधी गतिविधियों में लगे हुए हैं।वे सुधर जाएं अन्यथा उन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा।’
ज्येति बसु की सरकार में मंत्री रहे डा.अशोक मित्र ने एक बार कहा था कि ‘हमारी पार्टी में 18 वी.-19 वीं सदी के जमींदारों का चरित्र घर कर गया है।’
  बाद में समय -समय पर कुछ अन्य माकपा नेताओं ने भी चुनाव हारने के बाद अपनी कमियां गिनार्इं और उन्हें सुधारने का संकल्प किया।पर वे कुछ वैसा कर नहीं पाए।
खबर है कि त्रिपुरा में भी वाम कार्यकत्र्ताओं में भी कुछ वैसी ही कमजोरियां घर कर गयी थीं।एक ईमानदार मुख्य मंत्री मानक सरकार ने त्रिपुरा राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए केंद्र की मोदी सरकार से मेलजोल बढ़ाना शुरू किया तो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
यानी समय व जरूरत के अनुसार जो पार्टी खुद को नहीं बदलेगी तो वही होगा जो वाम पंथियों के साथ आज हो रहा है।  @9 मार्च 2018 के मेरे साप्ताहिक काॅलम कानोंकान से@

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

क्या महिला आरक्षण विधेयक का अब समर्थन करेगा राजद !



  राजद सहित सभी पार्टियों की महिला विधायकों ने महिलाओं के लिए लोक सभा-विधान सभा  में  आरक्षण की व्यवस्था करने की मांग बिहार विधान सभा में की है।सदन के बाहर भी इस मांग के समर्थन में नारे लगाए गए।
  याद रहे कि कई साल पहले राजद और सपा ने महिला आरक्षण विधेयक का संसद में विरोध किया था और उसे लोक सभा में पास नहीं होने दिया था।
राज्य सभा में 2010 में महिला विधेयक तो पास हो गया,पर भारी विरोध के कारण लोक सभा में नहीं पास हो सका।
इस गुरूवार के विरोध प्रदर्शन में राजद की विधायकों के भी शामिल होने के कारण यह सवाल उठ रहा है कि क्या राजद अपना रुख अब बदलेगा ?
याद रहे कि राजद सहित कुछ दल महिला  आरक्षण के भीतर जातियों के आधार पर आरक्षण की मांग करते रहे हैं।
खबर है कि  कांग्रेस व भाजपा आरक्षण के भीतर आरक्षण के लिए तैयार नहीं है।
कुछ समय पहले सोनिया गांधी ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से सार्वजनिक रूप से यह मांग की  थी कि वे महिला आरक्षण विधेयक पास कराएं।
 लगता है कि राजग सरकार यह काम अपने  अनुकूल समय 
पर करेगी।
महिला आरक्षण का राजनीतिक लाभ तो उसे  मिलेगा ही जो इसे अमली जामा पहनाएगा।
 पहली बार लोक सभा में महिला आरक्षण विधेयक 
1996 में  पेश हुआ था।
पर कदम -कदम पर उसका विरोध हुआ।
1997 में एक सदस्य ने संसद में कहा कि क्या आपको लगता है कि ये परकटी महिलाएं सांसद बन कर महिलाओं के पक्ष में आवाज उठाएंगी ?
1998 में एक अन्य सदस्य ने विधेयक की काॅपी स्पीकर बालयोगी के हाथ से छीन ली थी।
 विरोध के बावजूद 2010 में राज्य सभा में तो यह विधेयक पास हो गया,पर लोक सभा में लटक गया।
2004 में तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि कांग्रेस ने इस बिल को पास नहीं होने दिया।
हम अगली बार सत्ता में आएंगे तो इसे जरूर पास कराएंगे।
पर 2004 के लोक सभा चुनाव के बाद उनकी सरकार नहीं बनी ।
अब नरेंद्र मोदी सरकार से लोग उम्मीद कर रहे हैं कि वह इसे पास कराएगी और अटल के सपने को पूरा करेगी।
इस बीच राजद की महिला विधायकों की मांग एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विकास है।
 महिला आरक्षण विधेयक के तहत  संसद और विधायिकाओं की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करनी है। 
 ------नहीं सुधरे तो टूट गए---
जब किसी राजनीतिक पार्टी में खुद को सुधारने और बदलने की क्षमता समाप्त हो जाए तो वही होता है जो सी.पी.एम.के साथ हो रहा है।
एक गरीब देश में कम्युनिस्ट पार्टी की ऐसी हालत चिंताजनक है।आश्चर्यजनक भी।
साठ-सत्तर के दशकों में गरीबों के पक्ष में जब कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट सड़कांे पर निकलते थे तो गरीबों को लगता था कि उनका भी कोई हमसफर है।
पर आज गरीब और कमजोर वर्ग के लोग भ्रष्ट सिस्टम के रहमो करम पर हैं।
उधर कम्युनिस्ट पार्टी के एक पदाधिकारी ने कई साल पहले  अपनी आंतरिक रपट में इस बात पर चिंता जताई थी कि 
‘वामपंथी आदर्श भ्रष्टाचार में गुम हो रहे हैं।’  
पूर्व मुख्य मंत्री ज्योति बसु ने 2007 में ही कह दिया था कि 
‘कुछ भ्रष्ट तत्व व्यक्तिगत लाभ के लिए पार्टी का इस्तेमाल कर रहे हैं।कुछ सदस्य समाज विरोधी गतिविधियों में लगे हुए हैं।वे सुधर जाएं अन्यथा उन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा।’
ज्येति बसु सरकार में मंत्री रहे डा.अशोक मित्र ने एक बार कहा था कि ‘हमारी पार्टी में 18-19 वीं सदी के जमींदारों का चरित्र घर कर गया है।’
  बाद में समय -समय पर कुछ अन्य माकपा नेताओं ने भी चुनाव हारने के बाद अपनी कमियां गिनार्इं और उन्हें सुधारने का संकल्प किया।पर वे कुछ वैसा कर नहीं पाए।
खबर है कि त्रिपुरा में भी वाम कार्यकत्र्ताओं में भी कुछ वैसी ही कमजोरियां घर कर गयी थीं।मुख्य मंत्री मानक सरकार ने राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए केंद्र की मोदी सरकार से मेलजोल बढ़ाना शुरू किया तो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
यानी समय व जरूरत के अनुसार जो पार्टी खुद को नहीं बदलेगी तो वही होगा जो वाम पंथियों के साथ आज हो रहा है।  
---एग्जिट पोल की जरूरत----
पूर्वोत्तर राज्यों के हाल के चुनावों को लेकर एग्जिट पोल के रिजल्ट 28 मार्च के अखबार में प्रकाशित हुए।
इस काम में लगी तीन एजेंसियों में से त्रिपुरा के मामले में दो का आकलन सही निकला।तीसरे ने भी यह अनुमान लगाया कि दोनों प्रमुख दलों में बराबरी का मुकाबला है।
  अक्सर कुछ लोग ओपियन  और एग्जिट पोल के नतीजों के बारे में प्रतिकूल टिपणियां करते रहते हैं।यह सच है कि कुछ चुनावों में  इनके अनुमान गलत साबित हो जाते हैं।हां,सीटों की संख्या की दृष्टि से तो गलत साबित होते ही हैं।पर हवा का रुख किधर है,यह पूर्व सूचना तो ऐसे सर्वेक्षण दे ही देते हैं।
 लोगों की उत्सुकता को देखते हुए ओपियन  व एग्जिट पोल को अधिकतर लोग जरूरी मानते हैं।
 1989 के लोक सभा चुनाव से पहले एक साप्तााहिक पत्रिका ने 
देश के 10 शीर्ष ज्योतिषियों की चुनावी भविष्यवाणियां छापी थीं।
चुनाव नतीजा आने के बाद पता चला कि उनमें से 9 के अनुमान गलत साबित हुए थे।
  खुद नेताओं का हाल जानिए।
एक बार मधेपुरा लोक सभा चुनाव के लिए मतदान हो जाने के बाद उम्मीदवार शरद यादव धरना पर बैठ गए।उन्होंने चुनाव में धांधली कव आरोप लगाया।उन्हें हार की आशंका था।पर जब मत गणना हुई तो शरद जी जीत गए।
यानी जो उम्मीदवार कई सप्ताह से क्षेत्रमें रहते हैं ,उन्हें भी पता नहीं होता।ज्योतिषियों को तो बिलकुल पता नहीं होता।
ऐसे में जब तीन में से दो एजेंसियां सही आकलन कर पाती हैं तो 
ओपिनियन व एग्जिट पोल के नतीजों की आलोचना क्यों ? 
 ---एक भूली बिसरी याद---
सन् 2002 में बिहार के तत्कालीन डी.जी.पी.,आर.आर.प्रसाद 
ने अपनी सेवा अवधि के आखिरी दिनों में एक महत्वपूर्ण पहल की थी।
  उन्होंने लोगों से यह जानने की कोशिश की कि उनकी नजर में  पुलिस का असली चेहरा कैसा है ?
आर.आर.प्रसाद 1999 से 2002 तक इस कठिन प्रदेश बिहार के
पुलिस प्रधान थे।उन दिनों यह प्रदेश और भी ‘कठिन’ था।तब रोज -रोज पुलिस की परीक्षा होती रहती थी।कई कारणों से उस परीक्षा में वह अक्सर फेल ही कर जाती थी।
 हालांकि उस स्थिति के लिए सिर्फ आर.आर.प्रसाद जिम्मेदार नहीं थे। तकनीकी रूप से तो कई हलकों में वही जिम्मेदार माने जाते थे।
 इस पृष्ठभूमि में तब आर.आर.प्रसाद ने अपने सभी डी.आई.जी.को यह निदेश दिया कि वे सर्वेक्षण के जरिए जनता की राय जानने का अभियान चलाएं।खबर आई कि  
 जिला आरक्षी अधीक्षकों को निदेश दिया गया कि वे लिफाफे खरीद लें।
राज्य के प्रत्येक थाने में 100 लिफाफे भिजवाने थे,साथ में पांच सवालों की सूची  भी।लिफाफों को समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के बीच बांटा जाना था।
उनमें से एक सवाल यह था कि क्या सन् 2001-02 में पुलिस की छवि बेहतर हुई ?
अपने इलाके के पांच कुख्यात अपराधियों के नाम बताएं।
तीन अन्य सवाल भी थे।तय हुआ था कि जब लिफाफे लौट कर आएंगे तो उन्हें डी.आई.जी.स्तर के अफसर ही खोलेंगे।
 किंतु इस सर्वेक्षण पर विवाद हो गया।कहा गया कि ऐसा सर्वेक्षण किसी निजी एजेंसी से ही कराया जाना चाहिए।
अंततः उस सर्वेक्षण का क्या हुआ ,यह पता नहीं चल सका।पर ऐसे सर्वेक्षणों की अपनी उपयाोगिता जरूर है।
    ---और अंत में---
  एक अच्छी खबर आई है। आपराधिक घटनाओं पर काबू पाने के लिए अब विधायकों की सिफारिश पर शहरों और कस्बों में सी.सी.टी.वी.लगेंगे।पर, इस सिलसिले में सी.सी.टी.वी की गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना होगा।अन्यथा बाद में पता चलेगा कि आपराधिक घटनाओं  के समय सी.सी.टी.वी कैमरे खराब पड़े थे । 
@ 9 मार्च, 2018 को प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे कानोंकान काॅलम से@   

---प्रश्न पत्र लीक निरोधक मंत्रालय क्यों नहीं ?--


प्रश्न पत्र लीक घोटालों ने इस देश में महामारी का रूप धारण  कर लिया है।
  ये घोटाले इस देश की व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे हंै। पुलिस-प्रशासन उनके सामने लाचार नजर आ रहा है। साठगांठ है या अक्षमता ?
 जहां देखिए, प्रतियोगिता परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक हो जा रहे हैं।
सामान्य परीक्षाओं में भी प्रश्न पत्र लीक और भारी  कदाचार की समस्या अत्यंत गंभीर है।असली प्रतिभाएं कुंठित हो रही हैं।भ्रष्ट और धनपशुओं की संतानें इस व्यवस्था में लाभान्वित हो रही हैं।
 यह माना जाता था कि सामान्य परीक्षाओं से निकले 
उम्मीदवारों को नौकरी देने से पहले जांच परीक्षा तो होगी।उनमें अयोग्य छंट जाएंगे।
पर जब जांच व प्रतियोगी परीक्षाओं के भी  प्रश्न पत्र  लीक हो जाएं तो इस देश का भगवान ही मालिक है।
मेडिकल व इंजीनियरिंग कालेजों में प्रवेश के लिए हो रही   प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार  प्रश्न पत्र भी आए दिन लीक हो जाते हैं।नतीजतन न जाने इस विधि से कितने अयोग्य डाक्टर व इंजीनियर इस देश में हर साल तैयार हो रहे हैं।उनसे अलग तरह के खतरे हैं।गंभीर स्थिति बन रही है।
 याद रहे कि मेडिकल-इंजीनियरिंग कालेजों की वार्षिक परीक्षाओं में भी भारी कदाचार की खबरें आती रहती हैं।
 सीमाओं की रक्षा के लिए  हमने रक्षा मंत्रालय बना रखा है।पर क्या प्रश्न-पत्र लीक करने वाले प्रतिभा द्रोहियों यूं कहें कि देश द्रोहियों से कारगर मुकाबले के लिए सरकार को अलग से कोई मंत्रालय नहीं बनाना  चाहिए ?
पूरे सिस्टम में फैले परीक्षा पेपर लीक माफिया इतने ताकतवर हो चुके हैं कि उनसे निपटने के लिए कोई बड़ा व कारगर उपाय तो करना ही होगा अन्यथा यह देश एक दिन पूरी तरह कदाचार के कुत्तों के हाथों में चला जाएगा।   
 आजादी के बाद लोक उपक्रम बनाये गये थे।उसका एक छिपा उद्देश्य यह भी था कि नेताओं और अफसरों की अयोग्य संतानों और उनके लगुए-भगुए को  उनमें बड़े -बड़े पद दे दिए जाएंगे।
हालांकि उसके कुछ अपवाद भी थे।
पर जब भ्रष्टाचार और अयोग्यता-अक्षमता के कारण लोक उपक्रम एक -एक करके समाप्त होते चले गए तो महा प्रभुओं व धन पशुओं की  अयोग्य संतानों को खपाने के लिए प्रश्न पत्र लीक प्रचलन शुरू हुआ।क्या इस आरोप में दम नहीं है ?याद रहे कि सत्तावान लोगों के एक बड़े हिस्से की साठगांठ के बिना प्रश्न पत्र लीक का धंधा अधिक दिनोंं तक नहीं चल सकता था।पर चल तो रहा है ! बढ़ता जा रहा है।हम देख सकते हैं कि ऐसे घोटालों में आई.ए.एस.अफसर भी जेल जा रहे हैं। फिर भी धंधा जारी है।क्योंकि इसमें खतरा कम और मुनाफा अािक है।मुनाफा कम हो सकता है यदि ऐसे धंधे में लगे लोगों के लिए सजा की अवधि बढ़ा दी जाए। 

बुधवार, 7 मार्च 2018

  कोनराड संगमा जब मेघालय के मुख्य मंत्री बने तो एक  अखबार ने उस खबर की हेडिंग लगाई -- ‘अ चीफ मिनिस्टर बाई चांस।’
पी.वी.नरसिंह 1991 में जब प्रधान मंत्री बने थे तो उस समय भी यह कहा गया कि वे बाई चांस बन गए।
विप्लव कुमार देव जब त्रिपुरा के मुख्य मंत्री बन रहे हैं तो  यह कहा गया कि वे काम के बल पर बन रहे हैं।
राजस्थान की मुख्य मंत्री के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि वह एक खास परिवार की होने के कारण मुख्य मंत्री हैं।
    इस लोकतांत्रिक देश में समय -समय पर जब कुछ  व्यक्ति या नेता मुख्य मंत्री या  प्रधान मंत्री बनते हैं तो यह बात स्पष्ट रहती है कि वे किसी खास वंश या परिवार के कारण बने हैं।
  दरअसल भारत विविधताओं का देश है।
यहां की लोकतांत्रिक परंपरा भी विविधतापूर्ण रही है।
 एक खास परंपरा भी चल पड़ी है।कुछ राजनीतिक पार्टी  खास राजनीतिक परिवारों की निजी संपत्ति सी बनती जा रही है।
या यूं कहें कि कुछ दल व्यावसायिक उपक्रम की तरह बन रहे  हंै।
यदि किसी उद्यमी का निजी कारखाना हो और उसमें लगातार घाटा हो रहा हो,तोभी वह उस कारखाने को  किसी अन्य व्यक्ति को दान तो नहीं कर देगा !
उसी तरह  कोई पार्टी अयोग्य,अदूरदर्शी  व कल्पनाविहीन नेतृत्व के कारण यदि लगातार  पराभव की ओर जा रही है,फिर भी  उसका मालिक यानी नेतृत्व  नहीं बदल रहा है ! नीति और रणनीति भी नहीं ।
यानी अपना भारत महान ! लोकतंत्र से डाइनेस्टिक डेमोक्रेसी की ओर प्रस्थान !