शुक्रवार, 23 मार्च 2018

कल 23 मार्च को डा.राम मनोहर लोहिया का जन्म दिन 
है।उस अवसर के लिए दो  शब्द
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प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी राम नंदन मिश्र लिखते हैं--
1962 के चुनाव में पिट कर  राम मनोहर काशी 
की गंगा में मेरे साथ एक नौका में बैठे विचार मंथन कर रहे थे।
वे मुझसे पूछते हैं, ‘राम नंदन, इस तरह क्यों हो रहा है ?
मैं उनसे कहता हूं, ‘ राम मनोहर, चरित्र हीनता और उन्मत्तता
के ताण्डव नृत्य के बीच तुम सृजन की क्रिया नहीं कर सकते।
इस सड़ी हुई समाज की धरती में सर्वोदय या समाजवाद जिसका भी पौधा डालोगे, वह सड़ेगा ही।’
  1967 के चुनाव में लोहिया  कांग्रेस को राजसत्ता के एकाधिकार से गिराने में तो सफल हो गए,लेकिन सृजन के काम में सफल नहीं हुए।अतृप्त भोगों की वासना और अवसरवादिता उनकी अपनी जमत में भी जलती ही रही।’



बिहार दिवस पर  खुश होने वाली कुछ बातें 
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 पश्चिम बंगाल जब बिहार की सराहना करता है तो बिहारी मानस खुश होता है। बिहार  सन 1912 तक  बंगाल का ही हिस्सा था।
कुछ साल पहले पश्चिमं बंगाल सरकार ने बिहार के कुछ कामों को अपनाया था।
   एक जमाने में एक कहावत प्रचलित थी कि बंगाल जो कुछ आज सोचता है, बाकी भारत कल उसका अनुसरण करता है। कई कारणों से अब वह बात नहीं रही। 
   पश्चिम बंगाल की वाम सरकार ने बिहार का अनुसरण करते हुए अपने यहां की नौंवी कक्षा की छात्राओं को मुफ्त साइकिल देने का निर्णय किया था।
  मन मोहन सरकार के कार्यकाल के  वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने राज्य सभा में कहा था कि बिहार में विकास दर 13 फीसदी रही जो सराहनीय है।राज्य के लिए विशेष पैकेज एक हजार करोड़ रुपये से बढ़ा कर दो हजार करोड़ रुपये कर दिया गया है।बिहार जब बंगाल का हिस्सा था,और उसके बाद के वर्षों में भी बिहार के बारे में आम बंगाली मानस में कोई अच्छी धारणा नहीं थी।बंगाल से लौटे बिहारी ग्रामीण बताते थे कि हमें वहां सत्तूखोर कहा जाता है।
 पर  स्थिति बदली है।बंगाली नेताओं से सराहना पाकर बिहार को खुशी होती है।
    ममता बनर्जी जब रेल मंत्री थीं तो उन्होंने रेल बजट प्रस्ताव में यह घोषणा की थी  कि वह 16 हजार पूर्व सैनिकों को रेल यात्रियों की सुरक्षा के लिए बहाल करेगी।
   ऐसा करके ममता बनर्जी ने बिहार फार्मूला को ही अपनाया था।
 कभी  बौद्धिक उच्चता  के किले में कैद वाम मोर्चा को  सन 2009 में लोक सभा चुनाव में भारी चुनावी पराजय का मुंह देखना पड़ा था। उसके बाद पिछड़े  अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करने की उसे सूझी।इससे पहले वाम मोर्चा जाति के आधार पर  आरक्षण के प्रावधान को प्रतिगामी कदम मानता रहा है।उसे समाज में सिर्फ वर्ग यानी क्लास ही नजर आता था।यूरोप के चश्मे से भारतीय समाज को देखने का यही नतीजा है।

  पर, सन 2009 की चुनावी पराजय के बाद बंगाल के वाम नेताओं ने नये विचार के लिए बिहार की ओर रुख किया।बिहार में पसमांदा मुसलमानों के लिए आरक्षण का प्रावधान  है।तब एक सत्ताधारी वाम नेता ने बिहार में अपने सूत्रों के जरिए यह पता किया था कि किस तरह बिहार ने पसमांदा मुसलमानों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया है।पटना से उन्हें उसका स्वरूप  बता दिया गया।
@2018@

गुरुवार, 22 मार्च 2018

अचानक बी. जी. वर्गीस की याद आ गयी।
वैसे यह अचानक भी नहीं था।
इन दिनों जब मैं सुनता हूं कि दिल्ली के कुछ पत्रकारों के अपने बड़े -बड़े फार्म हाउसेस और न जाने क्या -क्या हैं तो एक संत पत्रकार की याद आना स्वाभाविक ही है।
एक्सप्रेस के मालिक राम नाथ गोयनका ने उन्हें संत ही कहा था।
गोयनका ने वर्गीस कहा था कि तुम्हें यहां नहीं बल्कि वेटिकन सिटी में रहना चाहिए था।
1969 से 1975 तक हिन्दुस्तान टाइम्स का संपादक रहने के बाद वर्गीस  1982 में इंडियन एक्सप्रेस ज्वाइन कर रहे थे।
जब वेतन की बात चली तो गोयनका जी ने कहा कि एक्सप्रेस के संपादक का वेतन 20 हजार रुपए मासिक है।
वर्गीस ने कहा कि मेरा काम तो दस हजार रुपए में ही चल जाएगा।
गोयनका ने कहा कि कैसी बात करते हो ? इस पद के लिए इतना ही वेतन है, मैं इसे कम कैसे कर सकता हंू ?
इस पर वर्गीस ने कहा कि पत्रकार के पास अधिक पैसे नहीं होने चाहिए।फिर तो वह पत्रकार नहीं रह जाता।
 पत्रकारिता पर गर्व करने वाली यह कहानी मुझे प्रभाष जोशी ने सुनाई  थी।
मैं उनसे पूछ नहीं सका था कि आखिर अंततः वे 10 हजार ही लेते थे या 20 लेना स्वीकार कर लिया था ?खैर, उस जानकारी का कोई महत्व भी नहीं था। सवाल है कि क्या आज कोई बड़ा पत्रकार यह कह सकता है कि मेरा तो इतने ही में चल जाएगा ?
वर्गीस का जन्म 1926 में हुआ था।उनका निधन 2014 में हो गया। 

बुधवार, 21 मार्च 2018

 सिटी आॅफ होप नेशनल मेडिकल सेंटर के एक शोध में पाया गया है कि दांतों के खराब स्वास्थ्य का मधुमेह से गहरा संबंध है।
 गांधी जी कहते थे कि बीमारी हमारे ही पापों का परिणाम है।
दांतों की देखभाल पर भी गांधी की बात लागू होती है।
मैंने खुद अपनी गलती से अपना एक दांत गंवा बैठा।
गलती सुधार कर 
 बाकी को अब तक बचाए रखा है।
मुख्यतः दो उपाय किए।
एक उपाय पूर्व बिहार विधान पार्षद रघुनाथ गुप्त ने बताया था।
उन्होंने कहा कि रोज ब्रश करने के बाद अपनी अंगुली से पांच मिनट तक मसूंड़ों की हल्की मालिश कीजिए।
पांच मिनट तो नहीं,पर दो मिनट जरूर करता हूंं।फायदा है।
दूसरा लाभ पतंजलि के दंत कांति एडवांस टूस्ट पेस्ट से हुआ।हालांकि उसी कंपनी के दंतकांति और दंतकांति मेडिकेटेड से कोई लाभ नहीं हुआ था।
सुबह के अलावा रात के भोजन के बाद ब्रश करने की आदत सी हो गयी है।
एक दंत चिकित्सक की राय है कि सुबह में नाश्ते के बाद ही ब्रश करें।हर तीन महीने पर ब्रश को बदल देने से भी लाभ होता है। 

 8 सितंबर 2012 को लोक सभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा था कि संसद के काम काज को बाधित करना भी लोकतंत्र का एक फार्म है जिस तरह लोकतंत्र के अन्य रूप-विधान हैं।
स्वराज ने यह भी कहा था कि प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह जब राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे तो उन्होंने भी तहलका के मुद्दे पर संसद के काम काज को बाधित किया था।
  अब विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज इस बात पर सख्त नाराज हैं कि उन्हें  इराक में मृत 39 भारतीय नागरिकों के बारे में अपनी बात लोक सभा में नहीं रखने दी।कांग्रेस के सदस्यों ने भारी हंगामा कर दिया।
उधर 12 दिनों से संसद में जारी हंगामे से खफा राज्य सभा के सभापति वेंकैया नायडु ने सांसदों को दिए जाने वाले रात्रि भोज को रद कर दिया।
 दरअसल जो भी दल प्रतिपक्ष में रहता है, वह संसद व विधान सभाओं को लोकलाज त्याग कर ‘हंगामा सभा’ बना ही देता है।
पर वही दल जब सत्ता में होता  है तो संसद के काम काज में बाधा पहुंचाने की आलोचना करता है।
 अपने देश के गैर जिम्मेदार नेताओं की इस करतूत पर सही सोच वाले सारे लोग छि छि करते हैं।
क्या नेतागण चाहते भी हैं कि सदन सुचारू रुप से चले ?
लगता तो नहीं है।पर यदि चाहते हैं तो एक उपाय मेरी समझ में आता है।इसके लिए सभी दलों को इस पर सहमत होना होगा।
पिछली गलतियों के लिए उन्हें सार्वजनिक रूप से देश से माफी मांगनी होगी।क्योंकि उन्होंने संसदीय लोक तंत्र को कलुुषित किया है। ं 
अन्यथा इस देश का संसदीय लोक तंत्र सभ्य लोगों का लोक तंत्र नहीं कहलाएगा।चाहे आप उन हंगामा करने वालों को अपने मन -मिजाज के अनुसार अन्य जो भी नाम दे दें।


  
   

मंगलवार, 20 मार्च 2018

लड़का मालिक ,बूढ़ दीवान,
मामला बिगड़े सांझ-बिहान !
अरविंद केजरीवाल नामक ‘लड़के’ के बारे में 2015 में  किरण बेदी ने कहा था कि क्या वे अब भी  लरनर लाइसेंस के ही साथ  गाड़ी चला रहे हैं ?
  तब तो कुछ लोगों को लगा था कि वे राजनीतिक द्वेषवश ऐसा बोल रही हैं।पर अब जब केजरीवाल ने मानहानि के मुकदमों के सिलसिले में एक पर एक माफी मांगनी शुरू कर दी है तब आप क्या कहेंगे ?
अरे भई, किसी के खिलाफ कोई आरोप लगाने से पहले यह तो देख लो कि यदि वह केस करेगा तो उसका जवाब देने के लिए आपके पास कोई सबूत है भी या नहीं ?
 कुछ दशक पहले  एक व्यवसायी ने एक पत्रकार पर मानहानि का मुकदमा दायर किया।
पर जब सुलह के लिए पत्रकार व्यापारी के यंहां गया तो उस व्यापारी ने कहा कि आपने जो लिखा है,वह शत प्रतिशत सही है।पर अपने बचाव में  कोर्ट में पेश करने के लिए आपके पास मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं है।
 दरअसल वह पत्रकार केजरीवाल की तरह ही अपरिपक्व था।
बिहार में  इन दिनों एक नेता दूसरे पर रोज-रोज  जिस तरह के धुआंधार गंभीर आरोप लगाते हुए अखबारों में बयान देते रहते हैं,यदि मानहानि के मुकदमे होने लगें तो न जाने कितने नेताओं को केजरीवाल की तरह घुटने टेकने पड़ेंगे !

संसद वाले आइटम में  मेरा कोई योगदान नहीं था।पर बाद में बिहार विधान सभा और विधान परिषद को लेकर मैंने उसी तरह की अलग -अलग रपट लिखी थी।उसके छपने के बाद  कांग्रेसी विधायक राधा नंदन झा ने मेरे  और जार्ज फर्नांडिस के खिलाफ  विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया था।
  मेरा पता तो विधान सभा सचिवालय के पास था नहीं।पर जार्ज को यहां से नोटिस जाती रही।इस बीच इमरजेंसी लग गयी।
जार्ज बड़ौदा डायनामाइट केस में गिरफ्तार कर लिए गए।
जार्ज ने मुझे 1977 में बताया था कि मुझे  बिहार विधान सभा की विशेषाधिकार समिति के सामने हाजिर कराने के लिए बी.एस.एफ. के विमान से दिल्ली से पटना लाने की सारी तैयारी हो चुकी थी।
पर प्रधान मंत्री ने बीच में रोक दिया।
उन्हें लगा होगा कि जार्ज वहां जाकर पता नहीं कैसा हंगामा कर दे !