शुक्रवार, 11 मई 2018

इस भीषण गर्मी में जब वृक्ष शीतल छांव देने लगें तो उनके प्रति कृतज्ञता से भर उठना स्वाभाविक ही है। इसीलिए मैं वृक्षों के प्रति एक सुखद एहसान के साथ इस पोस्ट में उनकी अनुभूति -याद को सहेज रहा हूं।
करीब तीन साल पहले मैंने पटना एम्स के पास के गांव के अपने नवनिर्मित मकान में रहना शुरू किया था। पैसे के अभाव में नगर में घर नहीं बसा सका। उसका सबसे बड़ा अफसोस यह रहा कि दोस्तों से मिलना -जुलना कम हो गया।कुछ अन्य तरह की कमियां भी महसूस हुईं।
पर, उसके साथ ही ‘विपत्ति में वरदान’ वाली कहावत भी चरितार्थ हुई्र। मैं अपने परिवार, अपनी लाइब्रेरी तथा प्रकृति के अधिक करीब हो गया।
मकान बनाने के लिए मैंने कोई वृक्ष नहीं कटवाया था। दरअसल उसकी नौबत ही नहीं आई। पर अपने मकान के अहाते व पास की सड़क व चहारदीवारी के बीच की जगह में मैंने कई पौधे रोपे जो अब वृक्ष बन रहे हैं।
आम, नीम, चंदन, अमरूद, आंवला, तेजपत्ता, नीबू, गुल मोहर, केला, दालचीनी सहित अन्य कई औषधीय पौधे लगाए गए हैं। कुछ पौधे जेपी आंदोलन के नेता मिथिलेश कुमार सिंह के दिए हुए हैं। उनके संगठन ने इसका अभियान ही चला रखा था।
अफसोस है कि पीपल के लिए कोई जगह नहीं बना सका हूं। फूल और तुलसी तो हमारे यहां है ही। अभी गुंजाइश और पेड़-पौधों की है। फिलहाल पेड़ - पौधों को बढ़ते हुए देखने में जो आनंद है, वह अवर्णनीय है।
एक किसान पुत्र होने के कारण बचपन में प्रकृति के निकट रहा। बीच के जीवन के अनेक दशक सीमेंट के जंगलों में बीते। पर अब एक बार फिर प्रकृति के करीब आ गया हूं।
इसे कहते हैं विपत्ति में वरदान ! पेड़-पौधों-परिवार -पुस्तकों के साथ जीना वरदान ही तो है !़   

 क्या मल्लिकार्जुन खगड़े को लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता 
का दर्जा इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वे अनुसूचित 
जाति के हैं ?
  यह आरोप सच नहीं है।सच यह है कि दर्जा पाने की कानूनी शर्त वे पूरी नहीं करते।
फिर भी कांग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा ने यही आरोप लगाया है।
 शर्मा को लगता है कि जातीय आधार वाले आरोप से कर्नाटका के चुनाव में कांग्रेस को लाभ मिलेगा।
  क्या झूठे आरोप से भी लाभ मिलता है ?
जो व्यक्ति कम से कम 55 सांसदों वाले दल  का नेता होगा,उसे ही वह पद मिलेगा।यानी सदन के सदस्यों की कुल संख्या के दसवंें हिस्से का नेता।
पर कांग्रेस यह शत्र्त पूरी नहीं करती।उसके पास उससे कम सदस्य हैं।फिर भी उसे वह पद चाहिए।
क्योंकि उस पद को कई तरह की सुविधाएं हासिल हैं।
  तत्संबंधी कानून 1977 में बना था।उसके बाद कई बार कांग्रेस सत्ता मंे आई।उसे उस कानून को बदलवा देना चाहिए था।
ताकि, कम सदस्यों वालों को भी दर्जा मिल सके।पर उसे तो लगता था कि वह कभी कम सीटें जीतेगी ही नहीं।इसलिए प्रतिपक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए क्यों कानून बदला जाए।
पर जब गत चुनाव में कांग्रेस 44 सीटों पर ही सिमट गयी तो उसने दलित कार्ड खेलना शुरू कर दिया।
  सोनिया गांधी ने हाल में यह आरोप लगाया कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी गलत ऐतिहासिक तथ्य पेश कर रहे हैं।
सोनिया गांधी के आरोप में दम है।
पर स्वस्थ राजनीति के हक में  खुद कांग्रेस भी तो गलत आरोप न लगाए।  

मामलों के अनुसंधान में तेजी से ही जुर्म पर अंकुश संभव



आपराधिक मामलों के अनुसंधान में तेजी आ जाए और अदालतों में देरी न हो तो जुर्म पर काबू पाना संभव है।
यह अच्छी बात है कि बिहार के पुलिस प्रमुख के.एस.द्विवेदी ने 
इसकी पहल की है।
यह सूचना चिंताजनक है कि पटना और नालंदा के डी.एस.पी.के पास सुपरविजन के लिए करीब दो हजार मामले लंबित हैं।
डी.जी.पी.ने अधीनस्थ अफसरों को निदेश दिया है कि वे जिम्मेदारी तय करें कि केस के सुपरविजन में अनावश्यक देरी क्यों होती है।
 उन्होंने अनुसंधान में तेजी लाने व उसकी गुणवत्ता बढ़ाने की भी जरूरत बताई है।
हाल में यह भी पता चला है कि बिहार के अनेक पुलिस अधिकारियों में अनुसंधान - क्षमता का भी अभाव है।कानून की जानकारी भी नहीं है।जबकि, दारोगा-डी.एस.पी.की टं्रेनिग में कानून की किताबें भी पढ़ाई जाती हैं।अब तो सरकार जरा इस बात की भी समीक्षा कर ले कि ट्रेनिंग संस्थान में पढ़ाने वालों की क्षमता तो ठीकठाक है न ! 
  -- कार्य शैली बदलने की जरूरत--
दरअसल रिजल्ट पाने के लिए बिहार पुलिस की कार्य  शैली, कार्य संस्कृति और कार्य क्षमता पर भी ध्यान देना होगा।
 पहली नजर में किसी भी सरकार की छवि उसकी पुलिस और उसकी सड़कों से ही बनती-बिगड़ती है।यदि अतिक्रमण को छोड़ दें तो सड़कों की स्थिति पहले से बेहतर है।पर पुलिस ?
बाहर से पहली बार पटना आने वालों को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि प्रादेशिक राजधानी में पुलिस मुख्य सड़कों पर भी अतिक्रमण करवा कर रिश्वत वसूलने के काम में लगी रहती  है।
 यदि यह समझ ले तो कोई गलत बात नहीं होगी।क्योंकि सूचनाएं भी इसी तरह की हैं।
अन्यथा क्या कारण है कि पटना हाई कोर्ट के बार -बार सख्त निदेश देने के बावजूद पटना में अतिक्रमण हटाने के कुछ ही  घंटे के भीतर ही दुबारा वहां अतिक्रमण हो जाता है ?
  इसी बुधवार को मुख्य पटना के बोरिंग रोड से दोपहर में अतिक्रमण हटाया गया और शाम होते -होते दुबारा वहां अतिक्रमण हो गया।
वैसे यह समस्या तो पूरे राज्य की है।अन्य राज्यों का भी कमोवेश यही हाल है।पर इससे जूझना तो पड़ेगा ही।
 डी.जी.पी.को चाहिए कि अनुसंधान व सुपरविजन के काम 
में तो अपने समर्थ अफसरों को लगाएं ही,पर यदि प्रादेशिक राजधानी को अतिक्रमण से मुक्त करवा देंगे तो उनकी भी धाक जमेगी और राज्य सरकार की छवि भी निखरेगी।
पुलिस की धाक जमेगी तो उसका लाभ आम अपराध को कम करने में भी हो सकता है।
अन्यथा उस पुलिस से अपराधी कैसे व क्यों डरेंगे जो सड़कों पर अतिक्रमण करवा कर पैसे वसूलती है ? 
  -- आखिर कैसे हो जाते हैं घोटाले !--
 सन 96 की बात है। चारा घोटाला सामने आ चुका था। बिहार सरकार में वित्त विभाग के अपर सचिव रह चुके एस.के.चांद ने लिखा था कि ‘सरकारी कोष से व्यय पर नियंत्रण रखने के लिए विस्तृत नियम और प्रक्रिया हैं।उसके  अनुपालन के लिए कई स्तरों के पदाधिकारी जिम्मेदार हैं।फिर भी एक लंबे समय तक कैसे इतने सारे पदाधिकारी अपने दायित्वों के निर्वहन के प्रति शिथिल हो गये ?
इस घोर अनियमितता और घोटाले के लिए सभी संबद्ध पदाधिकारी समान रूप से जिम्मेदार नहीं हो सकते हैं।इन में से कुछ की जिम्मेदारी प्राथमिक और प्रमुख होगी और कुछ की सापेक्ष और परोक्ष।’
वित्तीय नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था रहते हुए भी हाल में सृजन घोटाला हो गया।क्या इन दो घोटालों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने किसी बेहतर व फूलप्रूफ वित्तीय नियंत्रण व्यवस्था स्थापित करने की जरूरत महसूस की है ताकि आगे कोई तीसरा घोटाला न हो जाए ?         
  ----एक परिवत्र्तन यह भी--- 
कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं है।
माकपा को भी हिंदी राज्यों में अपनी कमजोरी का कारण समझ में आने लगा है।
पार्टी के महा सचिव सीताराम येचुरी ने हाल में यह माना है कि पहले हम सिर्फ आर्थिक शोषण के खिलाफ संघर्ष चलाते थे, अब हम सामाजिक शोषण के खिलाफ भी संघर्ष कर रहे हैं।
माकपा का नया  है ‘जय भीम, लाल सलाम।’
यानी माकपा का ध्यान अभी सिर्फ अनुसूचित जातियों के शोषण की ओर गया है।
जानकार लोग बताते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां जब तक कमजोर पिछड़ों के लिए अपना एजेंडा तय नहीं करेगी तब तक हिंदी राज्यों में उनका विकास मुश्किल ही रहेगा।
2009 के लोक सभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में जब सी.पी.एम.सिर्फ 10 सीटों पर सिमट गयी तो उसे अल्पसंख्यक मतदाताओं की समस्याओं की याद आयी।उस दल के एक नेता 
ने बिहार में अपने सूत्रों से यह पता लगाया कि वहां मुसलमानों के बीच के पिछड़ों को किस तरह आरक्षण मिलता है।पता तो चल गया।वाम सरकार 2011 तक वहां रही।पता नहीं चल सका कि उस सरकार ने पिछड़े मुसलमानों के कल्याण के लिए क्या-क्या  किया।
   ---- जोकीहाट उप चुनाव का महत्व---
जोकी हाट विधान सभा चुनाव क्षेत्र का चुनाव नतीजा यह बताएगा कि अल्पसंख्यक मतों का कितना प्रतिशत राजग यानी जदयू के साथ है।
वैसे यह माना जाता रहा है कि अधिकतर अल्पसंख्यक मतदाता  राजद के साथ है।
 जोकी हाट विधान सभा चुनाव  क्षेत्र में 28 मई को उप चुनाव होगा।
जदयू के विधायक सरफराज आलम के इस्तीफे से वह सीट खाली हुई है।
 आलम 2015 के  चुनाव में जोकी हाट से जदयू के उम्मीदवार थे।तब जदयू ने राजद-कांग्रेस के साथ महा गठबंधन बना कर चुनाव लड़ा था। 
अब सरफराज आलम अररिया से राजद सांसद हैं।
अररिया लोक  सभा चुनाव क्षेत्र के तहत ही जोकीहाट
विधान सभा क्षेत्र पड़ता है।
अररिया लोक सभा चुनाव में जोकीहाट विधान सभा खंड में राजद को करीब एक लाख 21 हजार मत मिले थे।राजग उम्मीदवार को करीब 40 हजार वोट मिले।
इस बार जोकी हाट में जदयू ने मुर्शिद आलम को खड़ा कराया है।राजद के उम्मीदवार स्थानीय सांसद के भाई शाहनवाज हैं।
    ---- एक भूली बिसरी याद--
‘जय प्रकाश नारायण नाम के इस आदमी ने मुझे कभी इतना आकर्षित  नहीं किया कि मैं उसके पीछे पड़ूं।’
यह बात किसी और ने नहीं बल्कि
खुद जय प्रकाश नारायण ने कही थी।
यह विवरण  न्यायमूत्र्ति चंद्र शेखर धर्माधिकारी ने 1993 में लिखा था।धर्माधिकारी जी के अनुसार यह बात तब की है कि जब जय प्रकाश नारायण से बार-बार कहा जा रहा था कि वे आत्म कथा लिखें।
एक अंग्रेज पत्रकार ने जब यही सुझाव दिया तो जेपी ने उल्टे सवाल कर दिया कि ‘ क्यों, मेरे पास इससे अधिक महत्वपूर्ण कोई काम नहीं बचा है ?’
ऐसी ही  सलाह जब नोबल पुरस्कार विजेता नोएल बेकर ने दी  तो जेपी ने कहा कि ‘ मैं तो क्या लिखूंगा ? अब ये प्रशांत कुछ लिखंे।....खास कर मेरे विचारों के बारे में।’
उसके बाद कुमार प्रशांत की पुस्तक  ‘शोध की मंजिलें’ नाम से जय प्रकाश की वैचारिक जीवन आई।
कुमार प्रशांत अंतिम ऐतिहासिक वर्षों में जेपी के साथ रहे।
चंद्र शेखर धर्माधिकारी के अनुसार कुमार प्रशांत लिखित यह वैचारिक जीवनी अद्वितीय है।   
  कुमार प्रशांत के अनुसार ‘जय प्रकाश ने सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूमिका यह निभायी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जन्मी पूरी पीढ़ी के लिए गांधी को एक बार फिर सामयिक बना दिया।’
          ---और अंत मंे--ं
  किसी राजनीतिक विचारक ने कभी कहा था कि यदि 25 साल की उम्र में आप लिबरल नहीं हैं तो इसका मतलब यह है कि आपके पास दिल नहीं है। यदि आप 35 साल की उम्र में 
अनुदार नहीं हैं तो फिर यह माना जाएगा कि आपके पास दिमाग नहीं है।
लगता है कि यह बात किसी पाश्चात्य विचारक ने कही थी।
इस देश में तो ऊपर दर्ज की गयी  उम्र में आप को फेरबदल करना पड़ेगा।
@ 11 मई 2018 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@ 



बुधवार, 9 मई 2018

  एक अच्छी खबर मैंने जरा देर से पढ़ी।
यह खबर बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के शिष्टमंडल की  इजरायल यात्रा को लेकर है।
एसोसिएशन के अध्यक्ष के.पी.एस.केसरी के अनुसार शिष्टमंडल इजरायल जाएगा। 8 से 10 मई तक वहां विश्व स्तरीय सम्मेलन में शामिल होगा।सम्मेलन कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण को लेकर है। एसोसिएशन इजरायल से एग्रो इंड्रस्ट्रीज तकनीक लाएगा।
इन पंक्तियों के लिखते समय वहां सम्मेलन हो रहा होगा।
 मेरा मानना रहा है कि इस देश खास कर बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य के लिए कृषि आधारित उद्योग अधिक जरूरी है।इससे खेती पर निर्भर लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी।
वह बढ़ेगी तभी तो कोई सामान्य उद्योग भी फलेगा,फूलेगा।
जब अधिकतर लोगों के पास कुछ खरीदने के लिए पैसे ही नहीं होंगे तो कारखानों के माल खरीदेगा कौन ?
आजादी के बाद से ही सरकार की ओर से यदि कृषि व उस पर आधारित उद्योगों की ओर समुचित ध्यान दिया गया होता तो आज देश की आार्थिक स्थिति बेहतर रहती।बेरोजगारी भी कम हुई होती। 

सोमवार, 7 मई 2018

केंद्रीय लोकसेवा की सन् 2017 की परीक्षा के टॉपर को सिर्फ 55.6 प्रतिशत अंक मिले। यानी द्वितीय श्रेणी के अंक। इस तरह दूसरे दर्जे का दिमाग देश का प्रशासन चलाएगा।

यदि पूरे सवालों की संख्या 100 मान ली जाए तो इस टॉपर ने उनमें से लगभग 44 सवालोंं के गलत जवाब दिए। देश में शिक्षा के गिरते स्तर का इससे बेहतर उदाहरण कोई और हो सकता है क्या?

आचार्य विनोबा भावे कहा करते थे कि यदि आपका रसोइया सौ में से 65 रोटियां जला दे तो क्या आप फिर भी अगले दिन उसे काम पर बुलाइएगा? याद रहे कि वे 35 प्रतिशत में ही परीक्षाथियों के पास हो जाने की सुविधा का विरोध कर रहे थे।

जो लोग लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं को बहुत कठिन मानते हैं यानी हौआ बनाए रखते हैं, उनके लिए एक व्यक्तिगत अनुभव बता रहा हूं।

सन् 1983 में दैनिक ‘जनसत्ता’ में नौकरी के लिए मैंने भी टेस्ट परीक्षा दी थी।

उत्तर लिखने में कुछ घंटे लगे थे।

जनसत्ता में नौकरी के लिए आवेदन पत्र जरूर भेजा था,पर 

उम्मीद नहीं थी कि लिखित परीक्षा भी देनी पड़ेगी।इसलिए कोई तैयारी नहीं की थी।

बहुत बाद में ‘जनसत्ता’ के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी ने अपने कॉलम में उस परीक्षा की चर्चा की थी।उन्होंने लिखा कि हमने जनसत्ता की टेस्ट परीक्षा के लिए जो प्रश्न पत्र तैयार किया था, वह  यू.पी.एस.सी. परीक्षा के प्रश्न पत्र की अपेक्षा अधिक कठिन था।

 याद रहे कि जनसत्ता की मौखिक परीक्षा एल.सी.जैन, एम.वी.देसाई, बी.जी.वर्गीज और प्रभाष जोशी के बोर्ड ने ली थी।

इन परीक्षाओं के बाद मुझे वहां नौकरी मिल गयी थी।यानी मैं 

उस परीक्षा में पास कर गया था।

कितना प्रतिशत अंक मुझे मिले थे यह तो नहीं मालूम ,पर कम से कम पास मार्क्स तो मिला ही होगा।

  अब मेरी प्रतिभा व जानकारियों का हाल सुनिए।

मैं 1963 में मैट्रिक प्रथम श्रेणी में जरूर पास कर गया था,पर अच्छे अंक नहीं थे।यानी मेरिट स्कॉलरशिप लायक अंक नहीं थे।

इसलिए लोन स्कॉलरशिप लिया था।

कालेज में जाने के बाद कभी गंभीरता से पढ़ाई नहीं की।

किसी तरह स्नातक हुआ।

ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं पहले अध्यात्म और बाद में सक्रिय राजनीति से जुड़ गया।

उन क्षेत्रों में पढ़ाई -लिखाई की कोई मजबूरी थी नहीं ।नौकरी करने का इरादा ही नहीं था,इसलिए प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी ही नहीं की कभी।

पत्रकारिता छोड़ कर किसी अन्य नौकरी के लिए जीवन में कभी आवेदन  ही नहीं दिया।

  यानी ज्ञान-विज्ञान-प्रतिभा  के मामले में हमेशा औसत  रहा।

इसके बावजूद बिना किसी तैयारी के जनसत्ता की टेस्ट परीक्षा में पास कर गया।

यदि किसी प्रतियोगिता परीक्षा के लिए तैयारी की होती तो अंदाज लगाइए कि उसके बाद मेरे जैसे मेडियोकर को भी   कितने अंक आते ?

@हां, नियमित सेवा से रिटायर होने के बाद हाल के वर्षों में अपनी जानकारियां बढ़ाने का मुझे जरूर अवसर मिल रहा है।@ 


आज के उम्मीदवार तो रात दिन पढ़ने ,कोचिंग करने के बावजूद यू.पी.एस.सी.की परीक्षा में प्रथम श्रेणी के मार्क्स भी नहीं ला पा रहे हैं।ऐसा क्यों हो रहा है ?

कमी कहां है ? देश के लिए गंभीर चिंता और चिंतन का विषय है।पर सवाल है कि कौन चिंतन करेगा ?

मैं इस संबंध में जानकार लोगों से समझना चाहूंगा।  


रविवार, 6 मई 2018

जेल -जीवन पर मेरी टेलर की चर्चित पुस्तक

अविभाजित बिहार के अपने जेल -जीवन पर मेरी टेलर ने एक चर्चित पुस्तक लिखी थी।मैंने वह पुस्तक  सत्तर के दशक में पढ़ी थी। एक भारतीय नक्सली अमलेंदु की  ब्रिटिश पत्नी मेरी ने दक्षिण बिहार के कुछ जेलों में एक सामान्य विचाराधीन कैदी के रूप में कई  साल बिताए थे। उसमें जेल जीवन का नारकीय किंतु सजीव चित्र पेश किया गया । पुस्तक पठनीय है। जेल प्रबंध की पोल खोलने वाली। 

 जाहिर है कि उस पुस्तक के आने के बाद भी जेलों में कोई सुधार नहीं हुआ। लगता है कि सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने हाल में छपी अपनी पुस्तक में  जेल की आंतरिक व्यवस्था को  लेकर कुछ वैसा ही  दृश्य पेश किया है। पप्पू यादव की पुस्तक का 9 मई को लोकार्पण होगा।


सिटीलाइव वेबसाइट पर उस पुस्तक के बारे में अभी -अभी मैंने जो कुछ देखा-सुना, उससे यह लगा कि पप्पू यादव ने बड़ी हिम्मत के साथ बिहार के उन बाहुबलियों व दबंगों की करतूतों का विवरण पेश किया है जो  जेल के नियम -कानून को अपनी जेबों में रखते हैं और जेल में जंगल राज चलाते हैं।


याद रहे कि विधायक अजित सरकार हत्याकांड के सिलसिले में पप्पू यादव लंबे समय तक पटना के बेउर तथा अन्य जेलों में रहे।

5 मई 2018

शनिवार, 5 मई 2018

समाज को शिक्षित करने का प्रस्ताव

 पूर्व सांसद प्रो.रंजन प्रसाद यादव के संरक्षकत्व वाले गैर राजनीतिक संगठन ‘यादव जागरण मंच’ के सम्मेलन ने  समाज को शिक्षित करने का कल एक प्रस्ताव पारित किया। यह एक जरूरी पहल है। किसी भी जाति के जिन परिवारों में पहली बार शिक्षा आयी, उन परिवारों को विकसित होते मैंने देखा है।

यादवों के साथ -साथ कुछ अन्य जातियों में भी शिक्षा का उतना फैलाव नहीं हुआ है जितना आजादी के बाद हो जाना चाहिए था।

मेरी राय है कि जो लोग अपनी जाति के कल्याण की बातें विभिन्न मंचों से करते रहते हैं, उन्हें पहले अपनी -अपनी जातियों में शिक्षा के फैलाव और व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
जिन जातियों में कई कारणों से अब भी शिक्षा के प्रति अपेक्षाकृत अधिक  अरूचि है,उनके बीच काम करने की अधिक जरूरत है।

इस संबंध में ‘ डा.आम्बेडकर संपूर्ण ’ में एक प्रकरण आता है। वह प्रकरण सन 1858 का है। बंबई प्रेसिडेंसी के शिक्षा विभाग की एक रपट के अनुसार सरकार ने चार जातियों के बीच शिक्षा के प्रसार की कोशिश की थी।
तीन जातियों में तो शिक्षा के प्रति उत्साह देखा गया। पर एक खास जाति के बारे में पता चला कि उनकी रूचि नहीं है।वे अपने पूर्वजों की वीर गाथा में डूबे हुए थे।
बाद के वर्षों में भी शिथिलता रही थी। हालांकि  अब वैसी स्थिति नहीं है।काफी बदलाव आया है।फिर भी कुछ अन्य जातियों के साथ-साथ उस जाति में भी इस दिशा में काम करने की अभी जरूरत है।