गुरुवार, 17 मई 2018

पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री नवाज शरीफ ने अब यह स्वीकार किया  है कि 2008 मेें हुए मुम्बई हमले में पाक आतंकियों के हाथ थे।उस हमले में करीब डेढ़ सौ लोग मारे गए थे।
पर उस हमले के तत्काल बाद कांग्रेस महा सचिव दिग्विजय सिंह व पूर्व मुख्य मंत्री अब्दुल रहमान अंतुले ने क्या -क्या बयान दिए थे ? कुछ याद है ? 

  यह प्रसंग स्वतंत्रता सेनानी जगलाल  चैधरी  की पुत्री  की शादी के अवसर का है।
 तब वे बिहार सरकार के कैबिनेट  मंत्री थे।कैबिनेट मंत्री तो वे 1937 में भी थे।
उनकी सरकार ने हाल में गेस्ट कंट्रोल एक्ट पास किया था।
 उस कानून के अनुसार अत्यंत सीमित संख्या में ही अतिथियों को ही बुलाने का नियम बनाया गया ।चैधरी जी के यहां बारात आई।उतने ही लोगों का खाना बना ।
पर,बिना बुलाए कई अन्य अतिथि आ गए।
नतीजतन खुद चैधरी जी के परिवार को उस रात भोजन नहीं मिला।चैधरी जी ने अतिरिक्त भोजन नहीं बनने दिया था।
शादी को सम्मेलन बनाने वाले नेताओं के आज के दौर में 
जगलाल चैधरी याद आते हैं।हालांकि गेस्ट कंट्रोल एक्ट आज भी लागू है ,पर सिर्फ कागज पर। 
मेरी राय में ऐसे कानून को समाप्त ही कर देना चाहिए जो कानून आप लागू नहीं कर सकते।
कोई कानून मौजूद है और उसे लोग रोज टूटते हुए देख रहे हैंं तो यह देख कर अन्य तरह के कानून तोड़कों को बढ़ावा ही मिलता है।
 हालांकि गेस्ट कंट्रोल एक्ट बिहार के बाहर अधिक टूटता है।जो लोग कानून का पालन करने के लिए बहाल  होते हैं,उनके सामने भी टूटता है।
  बिहार में भी सामान्य लोग समाज के दबाव में निर्धारित अतिथियों से अधिक अतिथि शादी-ब्याह में बुलाते है।अमीर लोग अपने पैसों के प्रदर्शन के लिए ऐसा करते हैं।नेता लोग अपने यहां की शादियों में अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए हजारों लोगों को बुला लेते हैं।

   

सोमवार, 14 मई 2018

   26 नवंबर, 2008 को मुम्बई पर हुए आतंकी हमले पर अजीज बर्नी ने एक पुस्तक लिखी है ।उसका नाम है --‘ 26-11 आर.एस.एस.की साजिश।’
उसका लोकार्पण कांग्रेस महा सचिव दिग्विजय सिंह ने 6 दिसंबर, 2010 को दिल्ली में किया।
पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट है कि उसमें क्या लिखा गया है।
उधर पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री नवाज शरीफ ने पाकिस्तान के अंगेजी दैनिक डाॅन से बातचीत में कहा है कि ‘हमारे यहां हथियारबंद गुट मौजूद हैं।आप उन्हें नाॅन स्टेट एक्टर कह लें।
 क्या ऐसे गुटों को बार्डर क्रास करने देना चाहिए कि वे मुम्बई जाकर डेढ़ सौ लोगों को मार दें ?
समझाएं मुझे ! हम इसी कोशिश में थे।
हम दुनिया से कट के रह गए हैं।हमारी बात नहीं सुनी जाती।’ 
  एक तरफ भारत के दिग्विजय सिंह व अजीज बर्नी कह रहे हैं कि 2008 के मुम्बई हमले में आर.एस.एस.का हाथ है और दूसरी ओर नवाज शरीफ पाकिस्तान सरकार की शह पाए नाॅन स्टेट एक्टर्स को उसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।ताजा खबर यह है कि दबाव के बावजूद नवाज अपने बयान पर कायम हैं।
 फिर भी  कांग्रेस दिग्विजय सिंह को पार्टी से निलंबित भी नहीं करती है।
  इसी तरह जब अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर 2001 में आतंकियों ने हवाई हमले किए  तो भारत के कई भाजपा विरोधी लोगों ने अखबारों में लेख लिख कर यह साबित करने की कोशिश की कि उस दिन वल्र्ड ट्रेड सेंटर से सारे यहूदी कर्मचारी अनुपस्थित थे।यानी यहूदियों ने ही हमला किया था।
ऐसे एकाध लेख मेरे पास भी है।
जबकि दूसरी ओर 27 अक्तूबर 2001 को ओसामा बिन लादेन का एक टेप सामने आया जिसमंे उसे यह कहते हुए दुनिया ने देखा कि ‘अमेरिका के खिलाफ  हमले की तारीफ होनी चाहिए।क्यांेकि वह इस्लाम का दुश्मन है और इजरायल की मदद करता है।’
  दिल्ली के बाटला हाउस में पुलिस के साथ आतंकियों की मुंठभेड़ की घटना के बाद कुछ बड़े कांग्रेसी नेताआंे ने उसे नकली बताया।जबकि खुद मन मोहन सरकार की पुलिस ने उसे आतंकियों के साथ पुलिस मुडभेड़ बताया।
 उस कांड में दिल्ली पुलिस की भूमिका पर शंका उठाने वाले कांग्रेसियों के खिलाफ कांग्रेस हाई कमान  ने कोई कार्रवाई नहीं की। 
 2002 में गोधरा में 50 से अधिक कार सेवकों को जिंदा जला दिया गया।
भाजपा विरोधियों नेताओं ने कहा कि ट्रेन दहन के लिए खुद कार सेवक ही जिम्मेदार थे।
 दूसरी ओर सी.बी.आई.ने जांच करके असली हत्यारों को सजा दिलवाई।
 ऐसे कई अन्य उदाहरण समय -समय पर सामने आते रहते हैं।मणि शंकर अययर समय -समय पर अपनी ‘प्रतिभा’ का प्रदर्शन करतेे ही रहते हैं।
 ऐसे में भाजपा का जन समर्थन बढ़ेगा या घटेगा  ? यानी भाजपा के  असली दोस्त व मददगार कौन साबित हो रहे हैं ?


रविवार, 13 मई 2018

   बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने ‘हिन्दुस्तान’ के आशीष कुमार मिश्र से बातचीत में कहा है कि ‘मैंने बीएड की पढ़ाई को दुरुस्त करने का रिस्क भरा निर्णय किया है।’
 मेरा मानना है कि महामहिम ने सही जगह से शुरूआत की है।
इस काम में किसी भले आदमी के लिए कोई रिस्क नहीं है।गेन ही गेन है।
यदि नियम-कानून तोड़कों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई होती है तो उस काम में आम जनता से  मदद मिलती है।उनकी दुआएं मिलती हैं।बिना भेदभाव के कार्रवाई करने की अपनी मंशा राज्यपाल प्रकट कर भी चुके हैं।
जिसके साथ आम लोग होंगे,उसे किसी बात की चिंता नहीं करनी चाहिए।यह एक ऐतिहासिक काम है जो लगता है कि मौजूदा राज्यपाल के लिए ही रुका पड़ा था।
दरअसल आज  बिहार की सबसे बड़ी समस्या यह है कि योग्य शिक्षकों की भारी कमी हो गयी है।बीएड में दाखिला ईमानदारी से हो और उसमें पढ़ाई भी ठीक-ठाक  हो जाए तो योग्य शिक्षक मिलने लग जाएंगे।
 यदि योग्य शिक्षक मिल जाएंगे और साथ ही सरकार शालाओं को  बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया करा दे तो शैक्षणिक स्थिति में भारी सुधार होने लगेगा।कालेजों -विश्व विद्यालयों में पढ़ने में रूचि रखने वाले छात्र अधिक पहुंचने लगेंगे।
  अभी तो हर स्तर पर शिक्षा का भगवान ही मालिक है।
वैसे तो यह हाल पूरे देश का है,पर बिहार की हालत अधिक खराब है।
नतीजतन ऐसे डिग्रीधारियों की संख्या अत्यंत कम होती जा रही है जिन्हें कोई किसी काम में लगा सके।
यह अकारण नहीं है कि इंफोसिस के सह संस्थापक  और मानद अध्यक्ष एन.आर. नाराण मूत्र्ति ने  कहा  कि ‘हमारे 85 प्रतिशत युवा नौकरी के लायक नहीं।उन्होंने यह भी कहा कि देश में बेरोजगारी भी तभी कम होगी जब लोग बिजनेस को प्राथमिकता देंगे।’
  इस विषम स्थिति के लिए वे लोग अधिक जिम्मेदार हैं जिनकी चर्चा राज्यपाल ने पिछले दिनों एएन काॅलेज के मंच से की थी।क्या कारण है कि बिहार के ही नालंदा ओपेन यूनिवर्सिटी की परीक्षाओं में चोरी नहीं होती है कि अन्य जगहों में कोई भी परीक्षा बिना चोरी के संभव ही नहीं हो पाती ?अपवादों की बात और है।
  जिस राज्य में टाॅपर छात्र अवैध आग्नेयास्त्र लेकर चलते हैं,उस राज्य की शिक्षा-परीक्षा की दयनीय स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।


    

पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री नवाज शरीफ ने अब यह स्वीकार किया  है कि 2008 मेें हुए मुम्बई हमले में पाक आतंकियों के हाथ थे।उस हमले में करीब डेढ़ सौ लोग मारे गए थे।
पर उस हमले के तत्काल बाद कांग्रेस महा सचिव दिग्विजय सिंह व पूर्व मुख्य मंत्री अब्दुल रहमान अंतुले ने क्या -क्या बयान दिए थे ? कुछ याद है ? 

शनिवार, 12 मई 2018

 ताजा चुनाव को लेकर कर्नाटका  के कई स्थानों
की चर्चा मीडिया में हो रही है।
उसमें एक नाम राम गढ़  का भी है।वहीं राम गढ़  जहां ‘शोले फिल्म की शूटिंग हुई थी।बंगलुरू-मैसूर मार्ग पर बंगलुरू से 50 किलोमीटर दूर है रामनगरम उर्फ राम गढ़।
मैं इमरजंेंसी में बंगलोर @उस समय यही नाम था@गया था - लाड़ली मोहन निगम के साथ।करीब एक सप्ताह तक एक होटल में टिका था।एक ही कमरे में तीन जन-
जे.एच.पटेल, लाड़ली मोहन निगम और मैं।पटेल बाद में वहां के मुख्य मंत्री बने और निगम राज्य सभा सदस्य।
  खैर,उन दिनों बंगलोर की आबोहवा  इतनी अच्छी थी कि वातानुकूलित सिनेमा हाॅल से निकलने के बाद बाहर ही अच्छा लगता था।
   गहरे भूमिगत जार्ज फर्नांडिस के साथ हर रात राम गढ़ की पहाड़ी के पास जाते थे।
क्या करने जाते थे,यह नहीं बताऊंगा।
पर तब वहां जाने व एक  खास काम करने में बड़ा रोमांच और संतोष था।
 वहीं सुना था कि शोले की शूटिंग के समय धमेंद्र ,अमिताभ तथा  अन्य कलाकार बंगलोर में रहते थे और रोज राम गढ़  जाते थे।वहां सिप्पी साहब ने शूटिंग के लिए ही एक गांव बसा दिया था जो फिल्म में दिखाई पड़ता है। वह राम गढ़  अब जिला बन गया है।


  कल एक दुःखद खबर मुम्बई से आई ।महाराष्ट्र के योग्य व बहादुर आई.पी.एस.अफसर हिमांशु राय ने आत्म हत्या कर ली। वे कैंसर की असह्य पीड़ा को सह नहीं सके।
 इस घटना पर मुझे आरा के प्रो.केशव प्रसाद सिंह की कहानी याद आ गयी।उनकी कहानी 11 अप्रैल, 1994 के टाइम्स आॅफ इंडिया @पटना@में छपी थी।बाद में मैं एक मरीज के साथ आरा जाकर उनसे मिला भी था।लाभ हुआ था।
केशव बाबू आरा जैन काॅलेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के अध्यक्ष थे।
 वे मुंह के कैंसर से ग्रस्त हो गए।
मुम्बई के टाटा स्मारक अस्पताल में इलाज कराया।ठीक नहीं हुए।
मर्ज थर्ड स्टेज में था।
प्रो.सिंह ने हार कर मूत्र चिकित्सा शुरू की।
1978 में ठीक हो गए।
चेक अप कराने मुम्बई गए।
उनकी केस फाइल पर टाटा अस्पताल के डा.जस्सावाला ने लिखा कि ‘यह चमत्कार से कम नहीं है।’
बाद में प्रो. सिंह खुद प्राकृतिक चिकित्सक यानी मूत्र चिकित्सक बन गए।
उन्होंने कई लोगों के कैंसर ठीक किए।
वे कहते थे कि यदि कैंसर लीवर में न हो तो किसी अन्य अंग के कैंसर को मैं ठीक कर सकता हूं।
प्रो.सिंह पूरी आयु जिए।
दरअसल मूत्र चिकित्सा के बारे मंे अपने देश में बड़ी झिझक है।
मूत्र चिकित्सा अपनाने वाले मोरार देसाई का कुछ लोग इसी आधार मजाक भी उड़ाते थे।जब देसाई प्रधान मंत्री थे  तो उनके कुछ राजनीतिक विरोधियों व मीडिया के एक हिस्से के पास उनकी आलोचना का यह सबसे बड़ा हथियार होता था।पर वे उसकी परवाह नहीं करते थे।  
जापान के चिकित्सक हाशीबारा ने देसाई को  1991 में लिखा था कि जापान में 20 लाख लोग इस मूत्र चिकित्सा को अपना रहे हैं।
उन्हीं दिनों ताइवान की ऐसी ही  खबर अखबार में छपी थी।