शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

1996 के 133 करोड़ रुपए के चर्चित यूरिया घोटाले में
पूर्व प्रधान मंत्री पी.नरसिंह राव के अत्यंत करीबी रिश्तेदार बी.संजीव राव और पूर्व केंद्रीय उर्वरक मंत्री राम लखन सिंह यादव के पुत्र प्रकाश चंद्र को तीन -तीन साल की कैद की सजा हुई है।जुर्माना अलग से।
तुर्की के दो नागरिकों पर सौ करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है।
दिल्ली के  तिस हजारी स्थित सी.बी.आई.कोर्ट ने इन दो के अलावा  छह अन्य लोगों को भी सजा दी थी।
इस कांड में नरसिंह राव के सबसे छोटे पुत्र प्रभाकर राव भी 1998 में गिरफ्तार हुए थे।
 एक तरह से यह एक बैंक घोटाला भी था।क्योंकि बिना किसी बैंक गारंटी के 133 करोड़ रुपए का एडवांस तुर्की के कारसन कंपनी को दे दिया गया था । रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक ने गारंटी की शत्र्त को  नजरअंदाज कर दिया था।पता नहीं चला कि इन बैंकों के संबंधित अफसरों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुईं।कार्रवाई हुई होती तो बाद के वर्षों में  बैंक घोटालों की जो बाढ़ आई  ,वह शायद नहीं आती।  

राजेंद्र माथुर को याद करते प्रभाष जोशी
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 रज्जू बाबू यानी राजेंद्र माथुर तो मेरे दिल्ली आने के चैदह साल बाद आए।
लेकिन जिस दिन उन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’ में संंपादकी संभाली,रात को मेरे दफ्तर आए और फिर हम साथ घर खाना खाने गए।
लक्ष्मी नगर के मोड़ पर मैंने उनसे कहा कि -तो आपने काम संभाल लिया।
अब छोड़ोगे कब ?
उन्होंने हंस कर कहा -‘आज तो काम शुरू किया है और आप पूछते हैं छोड़ोगे कब ? यू वुड नेवर चेंज मिस्टर जोशी।’
  ‘दिल्ली ने हमेशा और अच्छे -अच्छे तीसमारखांओं को उल्लू बनाया है।आज भी बना रही है।इसके पहले कि वह हमें बनाए ,हमें उसे गच्चा दे के चलते बनना चाहिए’--मैंने कहा।
  लेनिक जनसत्ता निकलने के कुछ दिन बाद वे सवेरे आए और कहा ,चलो बाल बनवा के आते हैं।हम दोनों पैदल चैराहे पर नाई की दुकान पर गए।
बाल बनवा के लौट रहे थे कि तो मैंने  पूछा-कब आप सोचते हैं कि मुझे जनसत्ता छोड़ देना चाहिए ?
वे हद है वाली मुस्कराहट में बोले -अभी अखबार निकाले को दस दिन नहीं हुए हैं और पूछ रहे हो कि छोड़ना कब है।
इतने साल से कहते थे कि ऐसा अखबार निकालना चाहिए।
अब निकाला है तो उसे जमाओ।
अभी से क्या सोचना कि छोड़ना कब है ?
‘आप जानते हैं कि मैं तय कर लेता हूं कि इतने साल और ऐसा काम मुझे करना है।
और सब कुछ भुल-भुलाकर जी जान से लग जाने का यही मेरा रीका है।
आॅटो सज्जेशन नहीं,सेल्फ मोटिवेशन ।’
  अंग्रेजी में हुआ यह वात्र्तालाप याद आता है और निपट मित्र हीनता के इन दिनों में अक्सर मन भर आता है कि रज्जू बाबू तो दिल्ली को गच्चा देकर चले गए।मैं रह गया हूं अकेला इस रेगिस्तान में।
दिन रात आंधी में बनते -बिगड़ते ढूंहों के बीच।
इस उम्मीद में कि अपनी जड़ों से टपकते खून को किसी दिन अपने निश्चय की पट्टी बांध फिर मालवा के किसी घर की काली मिट्टी में उन्हें उतार दूंगा जहां से उन्हें पच्चीस साल पहले बड़ी बेरहमी और रूलाई के साथ उखाड़ लाया था।मजबूरी में या कुछ करने की तमन्ना से ? पता नहीं। @ 19 दिसंबर 1993@

जोशी जी पर राजेंद्र यादव को पढि़ए
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दिवंगत राजेंद्र यादव को पढ़ना हमेशा ही एक अलग तरह का
अनुभव से गुजरना होता है।
  आप भले कई बार उनसे असहमत हों,पर उन्हें पढ़ने से 
एक समानांतर सोच का पता तो चल ही जाता है।हर खुले दिमाग के व्यक्ति को उस सोच से भी परिचित होना ही चाहिए।
यह अकारण नहीं था कि उनके संपादकत्व में निकले मासिक ‘हंस’ के हर अंक मैंने खरीदे।वे मेरे संदर्भालय में अब भी हैं।
 खैर, यदि यादव जी प्रभाष जोशी के बारे में लिखें तो वह तो और भी दिलचस्प होगा।है भी।
दोनों दिग्गजों का आपस में खट्टा-मीठा रिश्ता रहा।
जोशी जी पर उन्होंने लंबा लिखा था ‘जो हद से अनहद गये’ नामक पुस्तक में संचयित है।पूरा लेख देना तो यहां संभव नहीं,पर उसके कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं।
‘प्रभाष जोशी कमिटेड व्यक्ति थे,इसलिए उनका मूल स्वभाव
‘पैशन’ का था।वे क्रिकेट के पीछे पागल थे।इसलिए उसी जुनून से राजनीतिक पत्रकारिता ,साहित्य-संस्कृति सभी पर लिखते थे।उन्होंने एक नितांत निजी भाषा विकसित कर ली थी-जिसमें मालवा के शब्द इतने सहज लगते थे कि भाषा जीवंत हो जाती थी।
 ‘जिस तरह तू बोलता है,उस तरह तू लिख’ का अप्रतिम उदाहरण।बातें दिमाग में इस तरह साफ और सुस्थिर होती थीं कि दो घंटे में कागद कारे कर डालते थे।वे अपने को गांधीवादी कहते थे।लेकिन गांधी उनकी सीमा कभी नहीं थे और न गिरिराज किशोर की तरह गांधी उनके लिए सौ मर्जों  की एक दवा थे।
पता नहीं,पूजा पाठी थे या नहीं,मगर संस्कारवादी जरूर थे।
यहां वे अतार्किक व जिद्दी भी हो जाते थे।
सती इत्यादि के मामले में उनसे मेरी भयानक झड़प भी हो गयी थी।वे वक्ता अद्भुत थे-सधे और विषयनिष्ठ होकर निडर भाव से अपनी बात कहते थे।
इधर तो उन्होंने अति ही कर डाली थी-आज यहां तो कल वहां-वे कहां नहीं होते थे।
यह हाल तो तब था जब आठ साल से उन्हें पेसमेकर लगा था।आदमी चाहे जितना अनुशासनबद्ध हो,यात्राओं में तो उसे समझौता करना ही पड़ता है।
  बकौल उनके वे हंस नहीं पढ़ते थे,मगर मेरे प्रति उनके व्यवहार में संक्रमणकारी गर्माहट थी।प्यार से मिलते थे,यहां तक कि मेरे जन्म दिन पर उन्होंने मेरे चरण छू डाले तो मैं लगभग स्तब्ध ।वे नामवर भक्त थे और अनेक शहरों में उन्होंने ‘नामवर के निमित्त’ आयोजन कर डाले थे ।
   इधर वे अशोक वाजपेयी को हिन्दी की  विभूति कहने लगे थे।मगर इसमें शक नहीं कि वे हिन्दी के एक मात्र पब्लिक इंटेलेक्चुअल थे।
उनका ज्ञान और जानकारियां चकित करती थीं।बेबाक इतने कि पहली बार उन्होंने पत्रकारिता के उस पर्दे को फाश किया था जहां चुनाव के दिनों में पैसे लेकर खबरें छापी जाती थीं या विरोधी को ठिकाने लगाया जाता था।यह वही जिहाद था जिसे वे बरसों से हिंदूवादियों के खिलाफ चलाए हुए थे।निडर,निर्र्भीक और प्रतिबद्ध-मेरे दिमाग में उनके लिए यही कुछ शब्द आते हैं।.................।’
@ 13 जुलाई 2018@

--मनिआर्डर इकाॅनोमी से स्वावलंबन की ओर सारण--



एक चर्चित कहावत है। अमेरिका ने सड़कें बनायीं और सड़कों ने अमेरिका को बना दिया।इस कहावत से सड़कों के महत्व का पता चलता है।
  इधर बिहार के सारण जिले में सड़कों के साथ- साथ पुल और फ्लाई ओवर  भी बन रहे हैं।वह भी ऐसा -वैसा फ्लाई ओवर नहीं।बल्कि डबल डेकर यानी दो मंजिला फ्लाई ओवर।वह छपरा शहर में बनेगा।इसी बुधवार को उसका शिलान्यास हो गया।
उस अवसर पर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि गंगा नदी पर दाना पुर से दिघवारा तक एक नया पुल भी बनेगा।
किसी ठोस शुरूआत के बिना मुख्य मंत्री ऐसी घोषणा नहीं करते।इसलिए सारण के लोग यह समझ कर खुश हंै कि यह पुल बनेगा जरूर ।यानी  प्रस्तावित दाना पुर-दिघवारा गंगा पुल पर काम भी जल्द ही शुरू हो जाएगा।
  उम्मीद है कि सरकार लोगों की इस  उम्मीद को जल्द ही पूरा करेगी। 
वह प्रस्तावित पुल पटना महा नगर को सारण जिले से जोड़ने वाला दूसरा गंगा पुल होगा।
पहला  पुल जेपी सेतु हाल ही में बन कर तैयार हुआ है।
वह चालू है।उसका लाभ लोगों को मिलने लगा है। गांधी सेतु भी बहुत दूर नहीं है।
उधर बबुरा-डोरी गंज गंगा पुल ने भी भोज पुर और सारण के बीच की दूरी घटा दी है।
  सारण में मढ़ौरा और दरिया पुर के रेल कारखाने ने भी वहां के लोगों की उम्मीदें बढ़ाई हंै।
  पर सबसे अधिक लाभ प्रस्तावित दाना पुर-दिघवारा पुल से होने की उम्मीद है।
इससे गंगा के उत्तर में उप नगर विकसित होने की उम्मीद बढ़ी है।
 यमुना पार की तरह।
अविभाजित सारण जिले को कभी मनी आर्डर इकाॅनोमी वाला जिला कहा जाता था।
यानी देश के किसी भी जिले की अपेक्षा सारण के लोगों को  बाहर से  सबसे अधिक मनिआर्डर मिलते  थे।बाहर कमाने गए  उनके परिजन उन्हें भेजते थे।
 यानी कम जमीन और सघन आबादी वाले इस जिले से काम की तलाश में बहुत सारे लोग बाहर चले जाते रहे हैं।आज भी जाते हैं।
 यदि सारण जिले की ओर सरकार व जन प्रतिनिधियों का ध्यान गया है तो वह अकारण नहीं है।किन्हीं खास जिलों को अत्यंत पिछड़ा छोड़कर आप पूरे राज्य को विकसित नहीं बना सकते।
 सारण जिला लालू प्रसाद का भी राजनीतिक क्षेत्र रहा है। वे वहां से सासंद व विधायक हुआ करते थे।सन 1990 में जब वे मुख्य मंत्री बने तो उन्होंने इस जिले को पूर्ण रोजगार मुक्त जिला बनाने 
के अपने निर्णय की घोषणा की।आवेदन मांगे गये।लाखों आवेदन आए।उन आवेदनों पर कोई निर्णय हो, उस बीच मंडल आरक्षण आंदोलन शुरू हो गया।फिर तो उस सरकार की कार्य शैली ही बदल गयी।
हालांकि बाद में रेल मंत्री के रूप लालू प्रसाद ने मढ़ौड़ा और दरिया पुर में रेल कारखाने की स्थापना की शुरूआत की।वैसे  उन पर ठोस काम हाल में ही  हो सका ।कुल मिला कर अब यह उम्मीद की जा सकती है कि एक पिछड़े इलाके का  विकास अब तेज होगा।
     --सारण का रिकाॅर्ड--
सारण जिला स्थित  सोन पुर का रेलवे प्लेटफार्म कभी देश का सबसे लंबा प्लेटफार्म था।
पर अब गोरखपुर ने वह स्थान ले लिया है।
सोन पुर का पशु मेला अब भी देश का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।
इधर छपरा में जब  डबर डेकर फ्लाईओवर बन कर तैयार होगा तो वह अपने ढंग का देश का सबसे बड़ा फ्लाई ओवर होगा।
साथ ही, अब यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि सारण देर सवेर देश के 
 गरीब जिलों में से एक नहीं रहेगा।    
   --चुनाव वर्ष के चरचे--
सन 2019 में लोक सभा का चुनाव होने वाला है।
यानी यह जो चल रहा है ,वह चुनाव वर्ष है।चुनाव पूर्व की राजनीतिक गतिविधियां शुरू भी हो चुकी  हैं।
चुनाव वर्ष में कुछ खास बातें व चर्चाएं होती हैं।उन खास बातों में
दो बातों की यहां चर्चा कर ली जाए।
एक तो ज्योतिषियों की बन आती है।
दूसरी बात यह भी होती है कि कुछ नेता लोग अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कई बार बे सिर पैर की बातें फैलाने की कोशिश करने लगते हैं।
 सन 1989 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले एक पत्रिका ने देश के दस नामी ज्योतिषियों की चुनावी भविष्यवाणियां छापी थीं।उनमें से नौ की भविष्यवाणी गलत निकली।उनके मुकाबले चुनाव सर्वेक्षणों और  अखबारों की भविष्यवाणियां वास्तविकता के  अपेक्षाकृत अधिक करीब थीं।
  इसके साथ ही कुछ नेताओं की ऐसी संपत्तियों का भी ‘खुलासा’ होने लगता है जो उनके पास होती ही नहीं हैं।
अब तो खैर अनेक नेताओं के पास बहुत संपत्ति आ चुकी है,पर जब संपत्ति काफी कम हुआ करती थी,तब से ऐसी अफवाहें उड़ती रही है।
 1977 की बात है।जब मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री बने तो कुछ लोगों ने यह उड़ा दिया कि मोरारजी क्लाथ मिल्स भी उन्हीं का है।
 सच्चाई का पता बाद में चला।
 मोरारजी देसाई  के पास न तो कोई मकान था और न कोई जमीन।
गुजरात के बुलसर में उनके पास पुश्तैनी मकान था।उसमें उनके भाई भी हिस्सेदार थे।मोरारजी के कहने पर उनके भाई इस बात पर राजी हो गए कि वह मकान गल्र्स स्कूल को दे दिया जाए।दे दिया गया।
     --कैसे रहे सदन में शांति--
 राज्य सभा की नियम पुनरीक्षण समिति ने अपनी अंतरिम सिफारिश में कहा है कि हंगामा करने वाले सदस्यों की सदस्यता अपने -आप समाप्त हो जाने का नियम होना चाहिए।
 इसके लिए सदन की  कार्य संचालन नियमावली में जरूरी बदलाव हो जाना चाहिए।
दूसरी सिफारिश यह है कि राज्य सभा का प्रश्न काल 11 बजे से शुरू हो।
पहले ऐसा ही होता था।पर कुछ साल पहले 12 बजे से शुरू होने लगा।
पीठासीन अधिकारियों के आदेश का लगातार उलंघन करने वाले सदस्यों के लिए यदि कोई ठोस व सबक सिखाने लायक  सजा की व्यवस्था 
हो जाए तो वह लोकतंत्र के लिए सही रहेगा।
      --एक भूली-बिसरी याद---
स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व केंद्रीय मंत्री महावीर त्यागी ने लिखा है कि 
‘ 14 मई 1947 को बापू बहुत थके हुए थे कि उनसे मिलने डा.विधान चंद्र राय आए।उनके स्वास्थ्य को देखकर उनसे कहा कि ‘यदि आपको अपने लिए नहीं तो जनता की अधिक सेवा कर सकने के लिए आराम लेना  आपका धर्म नहीं हो जाता ?’
बापू बोले,‘हां,यदि लोग मेरी कुछ भी सुनें और मैं लोगों के और सत्ताधीश मित्रों के लिए किसी उपयोग का हो सकूं तो जरूर ऐसा करूं।’
परंतु अब मुझे नहीं ंलगता कि मेरा कहीं भी कोई उपयोग है।भले ही मेरी बुद्धि मंद हो गयी हो फिर भी इस संकट के काल में आराम करने की बजाय ‘करना या मरना’ ही पसंद करूंगा।मेरी इच्छा काम करते- करते
और राम रटन करते -करते मरने की है।मैं अपने अनेक विचारों में अकेला पड़ गया हूं।फिर भी अपने अनेक मित्रों के साथ दृढ़ता से भिड़ने का साहस ईश्वर मुझे दे रहा है।’
त्यागी लिखते हैं,‘उन दिनों केंद्र और सभी प्रदेशों में राष्ट्रीय सरकारों की स्थापना हो चुकी थी,पर हमारे मंत्रिमंडलों का जो रहन -सहन और कार्य प्रणाली थी,उससे बापू खुश नहीं थे।
लोगों की शिकायत थी कि अनेक त्याग व बलिदान के सहारे कांग्रेस एक महान संस्था बनी है और इसका इतिहास बहुत उज्ज्वल है फिर भी शासन की सत्ता हाथ में आने से कांग्रेसी उन गुणों को खोते जा रहे हैं और पद प्राप्ति के लिए अनुचित रूप से स्पद्र्धा कर रहे हैं।
        ---और अंत में---ं
महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘एक बार हमारे देश में पंचायती राज स्थापित हो जाए तो जनमत वह कर पाएगा जो हिंसा कभी नहीं कर सकती।’
आज की पंचायती व्यवस्था को देखकर क्या यह लगता है कि बापू  का सपना पूरा हुआ ?  
@ 13 जुलाई 2018 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@





किसानों की आय में वृद्धि के बिना कैसे बढ़ेंगे उद्योग-धंधे !


मन मोहन सिंह सरकार ने सन 2010 में धान के लिए न्यूनत्तम समर्थन मूल्य 50 रुपए बढ़ा दिए थे।उस सरकार ने 2008 के लिए 155 रुपए कर दिए थे।
 उनकी सरकार ने 2012-13 के लिए 170 रुपए बढ़ाए।
याद रहे कि 2009 में लोकसभा चुनाव हो चुका था।
 2014 में चुनाव होने वाला था।
अब जब 2019 में लोक सभा चुनाव होने वाला है तो नरेंद्र मोदी सरकार ने एम.एस.पी.में रिकाॅर्ड 
बढ़ोत्तरी कर दी है।याद रहे कि 2015-16 मेें मोदी सरकार ने मात्र 50 रुपए की बढ़ोत्तरी की थी।
 यानी विभिन्न सरकारें चुनावों को ध्यान में रखकर किसानों की चिंता करती रही है।
 उधर उद्योगपतियों और व्यापारियों पर सरकारी बैंकों के जरिए अरबों रुपए लुटाने में सरकार अतिरिक्त उदारता बरतती रही है।कभी जानबूझकर तो कभी अनजाने में।
  देश में उद्योग भी बढ़ने ही चाहिए।अधिक कर्जे उद्योग के लिए ही मिलते  हैं।
पर जब तक कृषि व कृषकों का आथर््िाक विकास नहीं होगा,तब तक उद्योग कैसे बढ़ेंगे ?
कारखानों में उत्पादित माल को खरीदने वालों की पहले संख्या तो बढाइए।
  इस साल सरकार न्यूनत्तम समर्थन मूल्य के जरिए देश के किसानों को 15 हजार  करोड़ रुपए देने जा रही है। 
  मोटा- मोटी अनुमान के अनुसार इनमें से करीब 5 हजार करोड़ रुपए फिर भी बिचैलिए खा जाएंगे।
पांच हजार करोड़ रुपए किसान अपनी खेती में लगाएंगे।
बचे 5 हजार करोड़ रुपए में से किसान अपने बच्चों के लिए पोशाक ,जूता, स्टेशनरीज , थैला और परिवार के लिए  जरूरी सामान खरीदंेगे जिनका उत्पादन  छोटे -बड़े कारखानों में होता है।
  इससे कारखानों के मुनाफा बढ़ेंगे।और नये कारखाने लगेंगे।
 यानी खेती के साथ- साथ उद्योग का भी विकास होगा।
पर आजादी के बाद से ही हमारी सरकारों ने कृषकों की आय बढ़ाने के बदले कारखानों के विकास की ओर  अधिक ध्यान दिया।सरकार ने पब्लिक सेक्टर इकाइयों को बढ़ाया ताकि सफेदपोश लोगों को अधिक से अधिक नौकरियां दी जा सके।पर पब्लिक सेक्टर के लिए जितनी कठोर ईमानदारी व कार्य कुशलता की जरूरत होती है, उन पर ध्यान नहीं दिया गया।नतीजतन अधिकतर लोक उपक्रम सफेद हाथी बनते चले गये।
याद रहे कि आज भी इस देश के करीब 70 प्रतिशत आबादी खेती से जुड़ी है।
अन्य अनेक तरीकों से कृषकों की आय बढ़ानी जरूरी है।  
--बहुद्देश्यीय जल प्रबंधन परियोजना--
सारण प्रमंडल  की मही नदी पर प्रस्तावित बहुद्देश्यीय जल
प्रबंधन परियोजना पर प्रारंभिक काम शुरू हो गया है।
यह छोटी नदी गंडक नदी से निकल कर गोपालगंज और  सिवान होते हुए सारण जिले के  छितु पाकर गांव के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
 इस प्रस्तावित परि योजना के तहत इस नदी में कई चेक बांध बना कर पानी को रोकने का प्रावधान होगा।स्लूइस गेट  आवाजाही के लिए पुल का भी काम करेंगे।
मछली पालन संभव होगा।सिंचाई के लिए सालों भर पानी उपलब्ध रहेगा।इस नदी के पानी को साफ करके  पेय जल के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।
वर्षा जल रुकने के कारण भूजल स्तर को बनाये रखने व बढ़ाने में सुविधा होगी।
पर इसके साथ ही इस नदी में पास की जो नदी आकर मिलती है,उसके लिए भी ऐसी ही बहुद्देश्यीय योजना बनाने की जरूरत है।
  रिटायर हेड मास्टर राघव प्रसाद सिंह की सलाह पर मुख्य मंत्री ने इस नदी परियोजना पर शुरूआती काम शुरू करवा दिया है।
 राज्य के अन्य जिलों में भी ऐसी छोटी -छोटी नदियों पर ऐसी परियोजनाएं बनें तो  प्रदेश के किसानों की आय बढ़ेगी।
    -- उधर क्या हो रहा यह सब !--
डी.एन.ए.टेस्ट के लिए किस तरह के सेम्पुल फारंेसिक साइंस लेबोरेटरीज में भेजे जाएं,इस विधा की पक्की जानकारी डाक्टरों को होनी चाहिए।
पर दुःखद स्थिति है कि ऐसी बुनियादी जानकारी भी अनेक डाक्टरों को नहीं है।
एक अन्य खबर के अनुसार आरक्षण कोटे की बनिस्पत भारी डोनेशन देकर मेडिकल काॅलेजों में दाखिला करवाने और डाक्टर बन कर निकलने वालों से डाक्टरी पेशा का स्तर  अधिक गिर रहा है।
 डाक्टरी पेशा की बात कौन करे, अब तो सी.बी.एस.ई.अपनी परीक्षा की काॅपियां जांच करने वाले ऐसे योग्य शिक्षक भी नहीं खोज पा रहा है जो माक्र्स की सही- सही टोटलिंग भी कर सके।
 आए दिन यह खबर आती रहती है कि परीक्षाओं में गलत प्रश्न पत्र सेट कर दिए जाते हैं।इससे सेटरों के स्तर का पता चलता है।जब देश में शिक्षा-परीक्षा का स्तर ही लगातार नीचे की ओर जा रहा हो तो क्या कहना ?
 हाल में यह खबर आई कि लाॅ कालेज के छात्रों ने धमकी दे दी कि यदि आप परीक्षा में चोरी नहीं करने देंगे तो हम परीक्षा का बहिष्कार कर देंगे।
 नयी नौकरी पाए जो  शिक्षक लगातार तीन बार जांच परीक्षा में फेल कर जा रहे हैं,उनकी नौकरी भी बनाए रखी जा रही है।
बिहार के डी.जी.पी.ने पिछले दिनों कहा था कि कई जांच अधिकारियों को कानून का सामान्य ज्ञान भी नहीं है। अपने देश में यह सब क्या हो रहा है ?
--एक भूली बिसरी याद-- 
  पूर्व उप प्रधान मंत्री जगजीवन राम की पुण्य तिथि पर उनकी याद में दो शब्द।
 बाबू  जग जीवन राम जब सन 1984 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सासाराम लोक सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे,तब एक बात राजनीतिक हलकों में तैर रही थी।
वह यह कि तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी चाहते थे कि बाबू जी को लोक सभा में होना चाहिए।
 याद रहे कि इंदिरा जी की हत्या के कारण तब कांग्रेस के पक्ष में देश भर में सहानुभूति की लहर थी।
 तब कांग्रेस बिहार की लोक सभा की 54 सीटों में से 48 सीटें जीत गयीं थी।‘बाबू जी’ भी जीते जरूर,पर सिर्फ 13 सौ मतों से।
इस तरह  हमेशा चुनाव जीतने का उनका रिकाॅर्ड कायम रह गया।
सन 1986 में उनका निधन हो गया।
याद रहे कि जग जीवन राम को लोग ‘बाबू जी’ कहा करते  थे।
 1977 में प्रधान मंत्री पद के लिए जग जीवन राम का नाम जरूर आया था।पर मोरारजी देसाई उनसे बीस पड़े।
सबसे बड़ी बात यह थी कि मोरारजी पूरे आपातकाल  जेल में थे ।उन्होंने पेरोल पर छूट जाने की कोई कोशिश तक नहीं की।दूसरी ओर तब के मंत्री जगजीवन राम ने  संसद में इमरजेंसी की मंजूरी का प्रस्ताव पेश किया था।
चुनाव की घोषणा के बाद ही जगजीवन बाबू ने कांग्रेस छोड़ी थी।
   जगजीवन राम में  इतने अधिक  गुण थे जो किसी नेता को महान बना देने के लिए पर्याप्त हैं।उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति के लिए अपना निजी कैरियर छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल हो जाना भी एक बड़ी बात थी। ंवे प्रभावशाली वक्ता व कुशल प्रशासक के रूप में चर्चित हुए।जिस मंत्रालय को उन्होंने संभाला,उसमें बेहतर काम हुए।उन्हें इस देश व समाज की बेहतर समझ थी। बांग्ला देश युद्ध के समय वे रक्षा मंत्री थे।
--और अंत में--
पंजाब के मुख्य मंत्री अमरेंदर सिंह ने आदेश दिया है कि इस बात का पता लगाने के लिए सरकारी सेवकों की वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण होगा कि वे नशीली
दवाएं लेते हैं या नहीं।
  दरअसल ड्रग्स के ओवरडोज लेने  से पंजाब में बढ़ रही मौतों के कारण राज्य सरकार चिंतित है।
वहां के एक मंत्री ने सलाह दी है कि बड़े पुलिस अफसरों की भी  ऐसी ही जांच होनी चाहिए।उधर यह भी मांग उठी है कि मुख्य मंत्री सहित सभी जन प्रतिनिधियों की भी जांच जरूरी है।
याद रहे कि पिछले पंजाब विधान सभा चुनाव में अकाली-भाजपा सरकार की हार का एक बड़ा  कारण यही था।आरोप था कि 
पिछली  सरकार ड्रग्स माफिया को संरक्षण दे रही थी।
ऐसा ड्रग टेस्ट अन्य राज्यों में भी होना चाहिए।
@6 जुलाई 2018 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@




गुरुवार, 12 जुलाई 2018

पूर्व मुख्य मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह के जन्म दिन --12 जुलाई --के अवसर पर 
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----छोटे साहब में  था अपनी भूलेंं भी गिनाने का नैतिक साहस ---
              
   अधिक साल नहीं हुए जब  सत्येंद्र बाबू उर्फ छोटे साहब की जीवनी प्रकाशित हुई। जब वह तैयार हो रही थी,तभी मुझे उसके बारे में बताया गया था कि उसमें खरी -खरी बातें रहेंगीं।
 बिहार की राजनीति के विदयार्थी की हैसियत से मुझे उस जीवनी की बड़ी प्रतीक्षा थी।
जब प्रकाशित होने में देर हुई तो मैंने उन महानुभावों से कई बार कहा भी था कि भई,जल्दी कीजिए।
  जब वह दीर्घ-प्रतिक्षित पुस्तक आई तो मैं उसे पढ़ गया।उस पुस्तक का नाम ही पढ़ कर लग गया कि वह ईमानदारी से लिखी गई पुस्तक होगी। नाम है, ‘मेरी यादें,मेरी भूलें।’यादें तो अनेक लोग लिखते रहे हैं,पर अपनी भूलें तो कोई- कोई ही लिखता है।अपनी भूलें स्वीकार करना और उसे लिख भी देना बड़ी हिम्मत का काम है।उसके लिए बेजोड़ नैतिक साहस की जरूरत है।ऐसा सोचते हुए वह पुस्तक मैं पढ़ गया। उसे पढ़कर मेरी धारणा कैसी बनी,यह तो मैं बाद में बताऊंगा।पहले एक अन्य सज्जन की धारण बताता हूं।चूंकि मैं चाहता था कि  उसे अधिक से अधिक प्रबुद्ध लोग पढ़ें, इसलिए मैंने एक स्वतंत्रता सेनानी और श्रीबाबू तथा महेश बाबू के प्रशंसक और सहकर्मी को पढ़ने को दिया।उसे पढ़ने के बाद उनकी प्रतिक्रिया थी कि ‘सुरेंद्र जी मेरी धारणा सत्येंद्र बाबू के बारे में अब बदल गई।मुझे अब तक कुछ और बातें ही उनके बारे में बताई जाती थी।जितनी ईमानदारी से उन्होंने यह जीवनी लिखी या लिखवाई है,वह तो अदभुत है। वास्तव में वे एक बड़े आदमी हैंे।’याद रहे कि तब तक छोटे साहब जीवित थे।
  मैंने भी उनसे कहा कि यदि सत्येंद्र बाबू के कुछ जीवित समकालीन नेता भी इसी तरह ईमानदारी से  बिहार कांग्रेस की और राज्य सरकार की कहानियां लिखते तो राजनीति के छात्रों,पत्रकारों  व शोधकर्ताओं का बड़ा भला होता।
   दरअसल पूर्व मुख्य मंत्री  सत्येंद्र नारायण सिंह की जीवनी में सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने अपनी भूलों और गलतियोंे को भी उसी बेबाकी से लिखा है जिस बेबाकी से अपनी उपलब्धियों को । आज तो स्थिति यह है कि अधिकतर नेतागण अपनी सरकार या फिर पार्टी की उपलब्धियों के लिए श्रेय तो खुद ले लेते हैं और विफलताओं का ठीकरा दूसरों  पर फोड़ देते हैं।कुछ नेताओं की यह आदत रही है कि चुनावी जीत का श्रेय तो वे खुद ले लेते हैं,पर चुनावी विफलता के लिए मीडिया या फिर अफवाह फैलाने वाली किसी काल्पनिक शक्ति को जिम्मेदार ठहरा देेते हैं।पर जिस बेबाकी से छोटे साहब ने अपनी भूलों को भी गिनाया है,उससे उनकी उपलब्धियों के बयान पर भी पाठकों को सहज ही विश्वास हो जाता है।पाठक जानते हैं कि भूल-स्वीकार तो  कोई भीतर से ईमानदार नेता या व्यक्ति ही कर सकता है।
समाजवादी राजनीति से पत्रकारिता में आने के कारण अपवाद को छोड़कर मेरे मन में आम कांग्रेसी नेताओं के प्रति प्रारंभिक दिनों में  
कोई श्रद्धा का भाव नहीं रहा।लगता रहा कि आजादी के शहीदों के  सपनों को सत्ता में आने के बाद इन लोगों को याद नहीं रखा। हां, पर वैसे स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति जरूर मेरे मन में इज्जत रही है जिन्होंने आजादी के बाद सत्ता का बेजा लाभ नहीं उठाया।
  पर समय बीतने के साथ ही जब लगभग सारे दलों के अनेक नेतागण  बारी -बारी से केंद्र और राज्य की सत्ता में आने लगे और उनके अच्छे -बुरे कर्मों से लोगबाग अवगत होने लगे तो नेताओं का तुलनात्मक अध्ययन आसान हो गया।
इस नजर देखने पर लगता है कि सत्येंद्र बाबू जैसे नेता  इक्के -दुक्के ही बच गये हैं।लगता है कि आज राजनीति की नई फसल कुछ दूसरे ही ढंग की हो रही है।यह देश और प्रदेश के लिए दुःखद है,पर स्थिति तो आज यही है।ऐसे में सत्येंद्र बाबू को यदाकदा  याद करते रहना 
आज की पीढ़ी के लिए ठीक  रहेगा।
  ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ के कम से कम दो प्रसंगों की चर्चा करना चाहूंगा जिनसे उनकी साफगोई और उनकी भावुकता झलकती है।
एक प्रसंग वीरचंद पटेल बनाम के.बी.सहाय चुनाव को लेकर था।सन 1963 मेें कांग्रेस विधायक दल के नेता पद के चुनाव में सत्येंद्र बाबू की मदद से के.बी.सहाय जीत गये थे और वीरू बाबू हार गये थे। सत्येंद्र बाबू ने मेरी यादें मेरी भूलें में लिखा कि ‘चुनाव हो जाने के बाद मैंने जब वीरू बाबू को चुनाव स्थल से बाहर निकलते देखा तो मैं रो पड़ा।मगर कुछ भी बात नहीं हुई।मैं घर चला गया और अपना कमरा बंद कर लिया।मैंने किसी से माला तक नहीं ली और न बधाई स्वीकार की।यहां तक कि जब कष्ण बल्लभ बाबू मेरे घर आये तो मैं उनसे भी नहीं मिला।वह मेरे परिवार के लोगों से मिलकर चले गये।मुझे बेहद दुःख हुआ था।पारिवारिक रिश्ते को धक्का जो लगा था।एक दिन बाद मैं वीरू बाबू के घर गया और उनके पैरों पर गिर कर माफी मांगी।फिर धीरे -धीरे हमलोगों का संबंध पूर्ववत होने लगा।’
  वीरचंद पटेल उर्फ वीरू बाबू से बिहार विभूति डा.अनुग्रह नारायण सिंह का भी कैसा निकट का संबंध था,इसकी चर्चा सत्येंद्र बाबू ने की है।उनके अनुसार ,‘मरने के दस मिन  पहले बाबू जी ने वीरू बाबू को बुला कर कहा था ,‘वीरू मैं तो अब सारा भार  तुम पर छोड़ कर जा रहा हूं।’
‘जब सन 52 में वीरू बाबू को डिप्टी मिनिस्टर बनाया गया,तब बाबू जी को बड़ी चोट लगी थी।बाबू जी ने उन्हें अपने साथ रखा था।श्रम और कषि विभाग का पूरा भार उनको सौंप दिया था। इतने निकट का संबंध हम लोगों के बीच था,पर सन 1963 के नेता पद के चुनाव में यह संबंध दुर्भाग्यवश चरमरा गया।’
   अपने राजनीति फायदे के लिए या फिर अपनी गलती स्वीकारने के लिए अनेक नेताओं द्वारा चोरी -छिपे किसी ताकतवर नेता के पैर पकड़ने की दबी-छिपी घटनाओं की चर्चाएं राजनीति के अंतःपुर में होती ही रहती है।पर शायद किसी अन्य नेता ने ऐसा लिख देने की हिम्मत नहीं की।
   एक अन्य प्रसंग में सत्येंद्र बाबू ने ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ में लिखा कि उन्होंने किस तरह अपने ही दल के उम्मीदवार देव शरण सिंह को फतुहा विधान सभा चुनाव क्षेत्र में हरवा दिया।हरवाने के प्रयास में विनोदानंद झा,वीरचंद पटेेल और खुद सत्येंद्र बाबू का हाथ था।
‘देव शरण बाबू 1952 में स्वास्थ मंत्री बनाये गये थे।उस समय वे एम.एल.सी.थे।शायद उनकी अवधि समाप्त हो रही थी और फतुहा क्षेत्र रिक्त हो गया था।
  उस समय कृष्ण बल्लभ बाबू , बिहार केसरी डा.श्रीकृष्ण सिंह के पक्षधर थे। 
उन्होंने यानी कृष्णबल्लभ बाबू ने तय किया था कि अनुग्रह बाबू की मदद लिए बगैर देव शरण सिंह को विजयी बना कर खंडू भाई देसाई की रपट को गलत साबित कर देंगे।स्मरणीय है कि खंडू भाई देसाई ने यह रिपोर्ट केंद्र दी थी कि ‘श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू के एक साथ रहे बिना बिहार नहीं चलेगा।’ 
     कृष्ण बल्लभ बाबू के दम्भ को चूर करने के लिए हम लोगांे ने निर्णय किया कि देवशरण सिंह को हरा देना चाहिए।उसी क्षेत्र से शिव महादेव पी.एस.पी.के उम्मीदवार थे।हमलोगों ने उन्हें समर्थन देना शुरू कर दिया।ब्रजनंदन यादव और परमात्मा सिंह को माध्यम बनाया गया।जगजीवन बाबू ने भी जन सभाएं कीं और भाषण किया,पर उन्होंने भी प्रमुख हरिजन नेताओं को बुलाकर कह दिया कि पटना जिला के अध्यक्ष अवधेश बाबू जैसा कहें,चुनाव में आप सभी वैसा ही करें।अंततः देवशरण बाबू सात या आठ सौ मतों से हार गये।’
   कई अन्य नेतागण भी अपने ही दल के प्रतिद्वंद्वी गुट के उम्मीदवारों को हरवाते रहे हैं।पर है किसी में ऐसी हिम्मत कि वह यह बात कबूल भी करे।कुल मिलाकर यही लगता है कि जिसके जीवन में उपलब्धियों  अधिक होती हैं,वही व्यक्ति अपनी पुस्तक का नाम ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ रखने का साहस करता है। ऐसे ही रहे सत्येंद्र बाबू।आज जब राजनीति का अर्थ आम तौर पर व्यवसाय 
हो चुका है,राजनीति में बचे -खुचे बेहतर तत्वों को सत्येंद्र बाबू की किताब यानी उनकी बेबाक  जीवनी जरूर पढ़नी चाहिए।शायद वे अपने लिए उससे  कुछ रोशनी ग्रहण कर सकें।--सुरेंद्र किशोर।
@ 2010@

बुधवार, 11 जुलाई 2018

 कई दशक पहले इस देश में एक  कहावत प्रचलित थी।वह यह कि ‘गंुडे और गली के कुत्ते की जिंदगी दस  से पंद्रह साल की ही होती है।’
पर जब से गुंडों को जातीय और राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा,तब से उनकी आयु बढ़ गयी है।हां,बेचारे गली के कुत्ते 
की जिंदगी उतनी ही पर अभी ठिठकी हुई है।