सोमवार, 6 अगस्त 2018

5 अगस्त, 2018 के प्रभात खबर-पटना-में एक अच्छी खबर 
छपी है--‘सावधान ! संभालिए अपने लाड़लों को,छोटी उम्र में बड़े शौक हो रहे है आत्मघाती ’
  प्रभात खबर ने यह लिख कर बड़ा काम किया है।यह समस्या व्यापक बनती जा रही है।
उस अनुपात में बातें बाहर नहीं आतीं।
दरअसल इसमें अधिक कसूर हम अभिभावकों का है।हम अपने काम और परिवार के बीच संतुलन बनाकर नहीं चलते।
यश,तरक्की और पैसे बनाने की आपाधापी में हम अपने बाल -बच्चों की उपेक्षा करते हैं।
राजनीतिक कर्मियों व नेताओं के पास तो और भी कम समय होता है।इसलिए आम तौर पर देखा जा रहा है कि ईमानदार नेता के बाल -बच्चे ईमानदार बनें या नहीं,पर आम तौर से भ्रष्ट नेताओं की संतान भ्रष्ट और अपराधी नेताओं के बेटे अपराधी जरूर बन रहे हैं।अपवादों की बात और है।
डा.राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि राजनीति में रहने का निर्णय करने वालों को अपना परिवार खड़ा नहीं करना चाहिए।
  हाई प्रोफाइल लोग अपने बाल -बच्चों को भरपूर पैसे देकर 
ही अपने कत्र्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। 
  आपाधापी का हाल देखिए।इसे आप कहावत मानिए या सच्चाई ,पर सच्चाई के करीब तो जरूर ही लगेगा।
एक डाक्टर ने अपनी पत्नी से कहा कि मैं अपनी बेटी के लिए एक डाक्टर वर ढूंढ़ रहा हूं।
पत्नी डाक्टर से शादी के सख्त खिलाफ थी।खुद झेल चुकी थी।
पत्नी ने कहा कि मैं डाक्टर को दामाद बनाने के लिए तैयार हूं।पर एक शत्र्त है।आप सिर्फ इतना बता दीजिए कि आपका सबसे छोटा बेटा  किस क्लास में पढ़ता है।डाक्टर साहब नहीं बता सके। 


जब भी निष्पक्ष पत्रकारिता की जरूरत की चर्चा होती है तो मुझे दो-तीन बातें याद आ जाती हैं।
1.-अस्सी के दशक में  राजेंद्र माथुर ने मुझसे कहा था कि  
‘आप इंदिरा@गांधी@ जी के खिलाफ जितनी भी कड़ी खबरें  लाकर मुझे दीजिए, मैं उसे जरूर छापूंगा।पर, इंदिरा जी में बहुत से गुण भी हैं।मैं उन्हें भी छापूंगा। एक बात समझ  लीजिए।मेरा अखबार अभियानी भी नहीं है।’
2.-नब्बे के दशक में एक अखबार  में बी.बी.सी.के एक बड़े अधिकारी का इंटरव्यू पढ़ा था।
उस अधिकारी से पूछा गया था कि बी.बी.सी.की साख का राज क्या है ?
उन्होंने कहा था कि ‘यदि दुनिया के किसी देश में कम्युनिज्म आ रहा है तो हम उसे रोकने की कोशिश नहीं करते।हम लोगों को सिर्फ यह सूचना देते हैं कि कम्युनिज्म आ रहा है।उसी तरह यदि किसी देश से कम्युनिज्म जा रहा है तो हम उसे बचाने की भी कोशिश नहीं करते,बल्कि हम सिर्फ उसकी सूचना देते हैं।यही हमारी साख का राज है।’

रविवार, 5 अगस्त 2018

--अपने ढंग से जिए इंदिरा-राजीव से खट्टे - मीठे संबंधों वाले कमलापति त्रिपाठी--


           
कमला पति त्रिपाठी ने एक बार कहा था कि ’मेरा तजुर्बा है कि राजीव गांधी साफ बात कहने वालों से ,इंदिरा गांधी के मुकाबले में,
बहुत कम नाराज होते थे।’
  कमलापति जी ने एक दिन प्रधान मंत्री राजीव गांधी से कहा कि ‘मैं तो केवल कड़ी बातें कहने आया हूं।’
इस पर  मुस्कराते हुए राजीव जी ने कहा कि ‘जरूर कहिए, शुरू कीजिए।मैं कड़वी बातों से बिगड़ता नहीं।’
  कमलापति जी ने बाद में बताया कि ‘मैं राजीव जी की इस बात से प्रभावित हुआ था।’
 पर बाद में पता नहीं ,क्या बात हुई कि कमलापति त्रिपाठी ने राजीव गांधी को मई, 1986 में एक लंबा और कड़ा पत्र लिख दिया।
 दरअसल कमलापति जी  इस बात से दुःखी रहते थे कि इंदिरा भक्तों की उपेक्षा हो रही है।
 हालांकि खुद इंदिरा गांधी ने कमलापति त्रिपाठी को 1980 के नवंबर में  रेल मंत्री पद छोड़ने को मजबूर कर दिया था।
जब 1980 में त्रिपाठी जी रेल मंत्री थे तो प्रधान मंत्री ने प्रेस को कह दिया कि मैं रेल मंत्री के काम से संतुष्ट नहीं हूं।उसके बाद रेल मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
बाद में जब किसी ने इंदिरा जी के यहां त्रिपाठी जी के लिए पैरवी की तो इंदिरा जी ने कहा कि ‘मंत्री बनाऊंगी भी तो उन्हें रेल मंत्रालय नहीं मिलेगा।क्योंकि तब लोग कहेंगे कि मैं दबाव में आ गयी।’हालांकि वे बाद में मंत्री नहीं बनाए गए।
याद रहे कि वे 1975 से 1977 तक रेल मंत्री रह चुके थे।
1970 में उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बने थे।
  खैर ,मई 1986 में जब कमलापति जी ने राजीव जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा तो उसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई।
हालांकि राजीव जी के समर्थन नेता केरल के प्रमुख कांग्रेसी नेता करूणाकरण ने उस पत्र के बारे में कहा था कि 
‘इंदिरा जी के नाम पर सत्ता हथियाने की यह कोशिश है।’
 त्रिपाठी की चिट्ठी के तीन साल के बाद ही कांग्रेस की चुनाव में ऐसी हार हुई कि फिर वह कभी उबर नहीं सकी।उसके बाद आज तक कांग्रेस को लोक सभा में अपना बहुमत नहीं मिल सका।
क्या कांग्रेस की अधोगति के वही कारण थे जो काशी के धर्मनिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी कमलापति त्रिपाठी ने अपने पत्र में गिनाए थे ?इस पर एक मत नहीं है।
  त्रिपाठी ने लिखा था कि ‘मैं देख रहा हूं कि जो लोग इंंदिरा गांधी के साथ थे,उनके लिए लड़े -मरे,उनकी लगातार उपेक्षा हो रही है,।दूसरी ओर जिन लोगों ने उनके साथ धोखा किया ,उन्हें परेशानी में डाला,आज वे लोग सत्ता सुख भोग रहे हैं। 
आप पावर ब्रोकर की बात कर रहे हैं।कौन लोग पावर ब्रोकर हैं ?बंबई अधिवेशन के बाद आपने प्रणव मुखर्जी और गुंडू राव को पावर ब्रोकर समझ कर वर्किंग कमेटी से निकाल दिया।आपको मालूम हैं कि ये दानों इंदिरा गांधी समर्थक थे।पावर ब्रोकर तो वे हैं जो मंत्री बन कर बैठे हैं।इंदिरा जी  के खिलाफ गवाही देकर लोग मुख्य मंत्री बन बैठे हैं।इधर कांग्रेस से पुराने लोग कटते जा रहे हैं।अंग्रेजों का साथ देने वाले राजाओं का असर बढ़ता जा रहा है।’
उन्होंने यह भी लिखा कि इस बार कांग्रेस में जबरदस्त ढंग से बोगस सदस्यता हुई है।
 इसके अलावा भी त्रिपाठी जी ने कई कड़वी बातें लिखी थीं।
पर राजनीतिक विश्लेषक उदयन शर्मा ने इस पर लिखा कि ‘इंदिरावादियों ने किसी सैद्धांतिक मुददे को लेकर नहीं बल्कि निहित स्वार्थों  की खातिर विद्रोह की मुद्रा अख्तियार की है।इसलिए इनकी लड़ाई बहुत दूर तक नहीं जा सकेगी।’
  खैर जो हो,पंडित कमलापति त्रिपाठी अपने ढंग के स्वाभिमानी नेता थे।
 1905 में काशी के कुलीन ब्राह्मण परिवार में जन्मे कमलापति जी का 1990 में निधन हुआ।
कम उम्र में ही आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे।
लंबी जेल यातना सही।वे 1932 से 1946 तक दैनिक ‘आज’ के संपादक रहे।
1946 से 1952 तक दैनिक ‘संसार’ के संपादक रहे।
बाद में विधायक,सांसद,मुख्य मंत्री और केंद्रीय मंत्री भी रहे।
कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भी।
एक स्वाभिमानी व योग्य संपादक , एक स्वाभिमानी राजनेता भी बने रहे।
इलाहाबाद के पत्रकार पी.डी.टंडन के अनुसार,त्रिपाठी जी ने मुझसे 1972 में एक बार कहा था कि उनकी एक बड़ी कमजोरी है।जब उनके स्वाभिमान पर धक्का लगता है तो वह बरदाश्त नहीं कर पाते।
एक बार इंदिरा जी के मुंहलगे प्यादे ने कांग्रेस संसदीय बोर्ड की मीटिंग के बाद उनकी उत्तर प्रदेश सरकार के बारे में कुछ अशोभनीय बातें कह दीं।
 तब उन्होंने मुझे बुला कर कहा कि ‘टंडन ,तुम पहली गाड़ी से दिल्ली जाओ।और इंदिरा जी से कह दो कि अब अगर कभी किसी आदमी ने, जो उनके नजदीकी हों,ऐसी बातें कहीं तो मैं तुरंत इस्तीफा दे दूंगा।’
  वरिष्ठ पत्रकार के.विक्रम राव के अनुसार ,एक बार कमलापति त्रिपाठी के खिलाफ समाजवादी नेता राज नारायण चुनाव लड़ रहे थे।
कहीं मिले तो राजनारायण जी ने त्रिपाठी जी के पाॅकेट से सौ रुपए निकाल लिए।त्रिपाठी जी ने पूछा कि ऐसा क्यों किया ?राजनारायण जी ने कहा कि मेरी गाड़ी में पेट्रोल नहींे है।इसलिए पैसे निकाल लिये।
त्रिपाठी जी हंस कर रह गए।
  @फस्र्टपोस्टहिन्दी में 30 जून, 2018 को प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम ‘दास्तान ए सियासत’ से@   
  

शनिवार, 4 अगस्त 2018

मैंने 28 साल तक पी.एफ.वाली नौकरी की।मेरी मासिक पेंशन
 राशि है मात्र 1231 रुपए।
25 जून, 2018 के ‘इकाॅनामिक टाइम्स’ में खबर छपी  कि 
इ.पी.एस.पेंशन राशि न्यूनत्तम 2000 रुपए करने का प्रस्ताव है।
पर, लगता है कि मोदी सरकार ने बहुत सारे काम चुनाव की पूर्व संध्या के लिए टाल  रखा है।
  यदि मुझे स्वतंत्र लेखन से काम लायक पैसे नहीं मिल रहे होते तो जीवन की गाड़ी कैसे चलती ? पर,वह भी हाथ -पैर चलते रहने तक ही तो है ! 
  वैसे इस गरीब देश में ‘अमृत’ फिल्म का वह गाना  संतोष देता है-
‘दुनिया में कितना गम है,मेरा गम कितना कम है।
लोगों का गम देखा तो मैं अपना गम भूल गया।’ 

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

जब भी निष्पक्ष पत्रकारिता की जरूरत की चर्चा होती है तो मुझे दो-तीन बातें याद आ जाती हैं।
1.-अस्सी के दशक में  राजेंद्र माथुर ने मुझसे कहा था कि  
‘आप इंदिरा@गांधी@ जी के खिलाफ जितनी भी कड़ी खबरें  लाकर मुझे दीजिए, मैं उसे जरूर छापूंगा।पर, इंदिरा जी में बहुत से गुण भी हैं।मैं उन्हें भी छापूंगा। एक बात समझ  लीजिए।मेरा अखबार अभियानी भी नहीं है।’
2.-नब्बे के दशक में एक अखबार  में बी.बी.सी.के एक बड़े अधिकारी का इंटरव्यू पढ़ा था।
उस अधिकारी से पूछा गया था कि बी.बी.सी.की साख का राज क्या है ?
उन्होंने कहा था कि ‘यदि दुनिया के किसी देश में कम्युनिज्म आ रहा है तो हम उसे रोकने की कोशिश नहीं करते।हम लोगों को सिर्फ यह सूचना देते हैं कि कम्युनिज्म आ रहा है।उसी तरह यदि किसी देश से कम्युनिज्म जा रहा है तो हम उसे बचाने की भी कोशिश नहीं करते,बल्कि हम सिर्फ उसकी सूचना देते हैं।यही हमारी साख का राज है।’

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

पिछले महीने शिव सेना सांसद अरविंद सावंत ने 
संसद में यह सवाल उठाया कि सरकार यह बताए कि 
प्रधान मंत्री की चुनाव रैलियों के लिए पैसे कहां से 
आते हैं।
लगता है कि महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने शिव सेना के ‘साप्ताहिक चंदे’ पर कुछ नियंत्रण लगाया है या लगाने का प्रयास किया है।
 आरोप लगता है कि शिव सेना देशद्रोहियों से लोगों की रक्षा के लिए अपनी ताकत बनाए रखने के लिए अनेक लोगों से प्रोटेक्शन मनी लेती है।
 हालांकि संसद में शिव सेना ने सवाल तो सही  उठाया है।
दरअसल राजनीतिक दलों व उनके नेताओं ने चुनाव खर्च 
बहुत अधिक बढ़ा दिया है।
उससे कम पैसे में भी चुनाव लड़ा और जीता जा सकता है।
अत्यंत महंगे मंच और विमानों-हेलिकाॅप्टरों -गाडि़यों का अनावश्यक इस्तेमाल जरूरी नहीं।
खर्च की ऐसी अश्लीलता देख कर आम लोगों में राजनीति के प्रति खराब धारणा बनती है।पर लोग भी क्या करें ? अधिकतर दल अपनी ताकत  के अनुसार इस होड़ में शामिल रहते हैं।सब जानते हैं कि ये पैसे कहां से आते हैं।यह भी कि सारे राजनीतिक दल चंदे का स्त्रोत छिपाते हैं। 
कम से कम इस देश के ईमानदार नेताओं को यह चाहिए कि वे जल्द से जल्द इस स्थिति को बदलें।या बदलने की पहल करें।इस गरीब देश में यह सब ठीक नहीं है। 


बुधवार, 1 अगस्त 2018

 कई साल पहले की बात है।बंगला देशी घुसपैठ  समस्या
 पर एक टी.वी.चैनल पर चर्चा चल रही थी।
 एक तरफ शिव सेना के एक सांसद थे और दूसरी तरफ 
भारत के एक पूर्व विदेश सचिव।
जब शिव सेना के सांसद ने कहा कि पूरी सीमा पर कंटीले तार लगाए जाने चाहिए तो पूर्व विदेश सचिव ने कहा कि ऐसा होने से पूरी दुनिया में भारत की छवि खराब हो जाएगी।
इस पर शिव सेना सांसद ने तल्खी से उनसे पूछा कि ‘जनाब ,आप भारत के विदेश सचिव थे या बंगला देश के ?’
यदि मैं खुद नहीं सुन रहा होता तो मुझे इस डायलाॅग  पर विश्वास ही नहीं होता कि एक विदेश सचिव रह चुका व्यक्ति ऐसी बात कर सकता है।पर क्या कीजिएगा ?
उस अफसर को तत्कालीन राजनीतिक कार्यपालिका ने यही पाठ पढ़ाया था ताकि वोट बैंक में इजाफा हो सके।
दोनों पात्र अभी जीवित हैं। काश ! वे मेरा पोस्ट पढ़ पाते।