मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

सन 1988 में तत्कालीन मुख्य मंत्री भागवत झा आजाद ने 
मध्य प्रदेश काॅडर के आई.पी.एस.अफसर एम.कुरैशी को
बिहार का डी.जी.पी.बनाया था।
यदि बिहार में ही ‘अपराधियों-माफियाओं के काल’ के रूप में काम करने वाले कोई आई.पी.एस.अफसर उपलब्ध हों तब तो ठीक ही रहेगा।यदि उपलब्ध नहीं हांे तो बिहार सरकार को चाहिए कि वह सन 1988 वाला प्रयोग करके देखे।कुरैशी साहब तो ज्यादा कड़क साबित नहीं हो सके थे।शायद अगली बार वाले साबित हों।
इस बार देश भर से किसी कड़क अफसर की तलाश कर लीजिए।
क्योंकि कम से कम मौजूदा डी.जी.पी के.एस.द्विवेदी के अवकाश ग्रहण के बाद तो कानून -व्यवस्था वैसा ही हो जाए जैसा 2005 के बाद के कुछ वर्षों तक  था।
मुख्य मंत्री नीतीश कुमार को चाहिए कि वे अपने इस यू.एस.पी.को  तो किसी कीमत पर बनाए रखें।

जब चंद्रशेखर ने इंदिरा -संजय को पटना में जेपी समर्थक उग्र भीड़ से बचाया


         
 9 अक्तूबर 1979 । पटना के श्रीकृष्ण स्मारक भवन में जय प्रकाश नारायण का शव अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था।
संजय गांधी के साथ इंदिरा गांधी वहां पहुंचीं।
  इंदिरा जी की कार जैसे ही भवन के द्वार पर पहुंची,युवा कांग्रेसियों ने  उनके पक्ष में तेज नारे लगाने शुरू कर दिए।
 प्रतिक्रियास्वरूप जेपी और युवा जनता से जुड़े युवजनों ने इंदिरा गांधी मुर्दावाद का नारा शुरू  किया।
एक तरफ युवा कांग्रेसी और दूसरी ओर वाहिनी और युवा जनता के कार्यकत्र्तागण।
दोनों एक दूसरे पर टूट पड़े।अजीब तनावपूर्ण दृश्य उपस्थित हो गया।
 स्थिति बिगड़ते देख जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर तेजी से इंदिरा जी के पास पहुंच गए।
चंद्र शेखर जी ने इंदिरा जी के अगल -बगल अपनी बांहों का घेरा बनाया और हाथापाई पर उतारू भीड़ को बुरी तरह फटकारा।
 वह चंद्र शेखर के दबंग व्यक्तित्व का ही असर था कि इंदिरा-संजय के साथ उस दिन कोई अप्रिय घटना नहीं हुई।
  पटना में श्रीकृष्ण स्मारक भवन से जब जेपी का शव पास ही बह रही गंगा नदी किनारे श्मशान घाट पहुंचा तो वहां भी एक अप्रिय दृश्य इंतजार कर रहा था।
प्रधान मंत्री चरण सिंह,राज नारायण और जार्ज फर्नांडिस के खिलाफ नारे लगाए गए।उन्हें दल बदलू कहा गया।
दरअसल जेपी आंदोलन और आपातकाल से जन्मी  मोरारजी सरकार  को दल बदल कर गिराने वाले चरण सिंह तथा उनके समर्थकों पर पटना के अनेक लोग सख्त नाराज थे।
 खैर, इन दो दृश्यों के अलावा जेपी की ऐतिहासिक शव यात्रा में बाकी सब कुछ ठीकठाक गुजरा।
शव यात्रा में करीब 15 लाख लोग शामिल हुए थे।
इनके अलावा अंतिम दर्शन के लिए बाहर से आए व्यक्तित्वों  में राष्ट्रपति एन.संजीव रेड्डी,प्रधान मंत्री चरण सिंह,पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई,आचार्य जे.बी.कृपलानी,नाना जी देशमुख और जगजीवन राम प्रमुख थे।
इनके अलावा कश्मीर,महाराष्ट्र,मध्य प्रदेश,तमिलनाडु ,पंजाब,उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के मुख्य मंत्री शोकगस्त भीड़ में शामिल थे।
  उससे पहले 8 अक्तूबर, 1979 की सुबह पटना के कदम कुआं स्थित उनके आवास में जेपी का 77 साल की उम्र में निधन हो गया।
स्वतंत्रता सेनानी व 1974 के चर्चित बिहार आंदोलन के नेता जय प्रकाश नारायण की किडनी  उस समय खराब हो गयी थी जब वे आपातकाल में जेल में थे।
करीब चार साल से वे डायलिसिस पर थे।
8 अक्तूबर की सुबह करीब 4 बजकर 40 मिनट पर  जेपी की नींद खुली।
फारिग होकर हाथ पैर धोया और फिर लेट गए।
सेवक अमृत से उन्होंने समय पूछा और कहा कि तुम जाओ अब मैं सोऊंगा।पर अमृत कुछ देर तक वहीं रहा।फिर बाहर आ गया।
कुछ देर बाद जब दूसरा सेवक गुलाब भीतर गया तो देखा कि 
जेपी का एक हाथ लटका हुआ है।
तुरंत डाक्टर बुलाए गए।डा.सी.पी.ठाकुर उनके निजी चिकित्सक थे।
डाक्टर ने उनमें चेतना लाने की कोशिश की ,किन्तु सब बेकार।
सत्ता की राजनीति से दूर रहे जय प्रकाश नारायण के निधन पर सी.पी.आई.के अध्यक्ष एस.ए.डांगेे ने कहा था कि ‘राष्ट्र ने एक बेचैन आत्मा खो दी है।’
संयुक्त राष्ट्र महा सभा के अध्यक्ष सलीम ने महा सभा की कवर्यवाही रोक कर जेपी के निधन की सूचना दी और कहा कि ‘वह अन्याय के खिलाफ चाहे वह किसी भी शकल में हो,
आंदोलन करते रहे।
 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी के सत्ताच्युत होने का कारण जेपी ही बने थे।फिर भी इंदिरा जी उनके अंमित दर्शन के लिए पटना पहुंचीं।
1977 में मोरारजी देसाई को प्रधान मंत्री बनाने में जेपी और जे.बी.कृपलानी की मुख्य भूमिका थी।हालांकि बाद में मोरारजी से जेपी का मन मुटाव हो गया था।
उस समय की राजनीतिक-प्रशासनिक स्थिति से क्षुब्ध जेपी ने तो एक बार एक भेंट वात्र्ता में  यहां तक कह दिया था कि यदि अब नक्सली हथियार उठाएंगे तो मैं उन्हें नहीं रोकूंगा।
 उससे पहले 1969 के मुसहरी नक्सल कांड के शमन के लिए जेपी ने वहां कैम्प किया था।
फिर भी मोरारजी देसाई भी जेपी के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।
राष्ट्रपति ऐसे अवसरों पर कम ही निकलते हैं।पर  नीलम संजीव रेड्डी के लिए वह तो विशेष अवसर बना ।
बिहार के जो लोग उस दिन पटना नहीं पहुंच सके थे,उन लोगों ने अपने -अपने शहरों में शोक जुलूस निकाला और शोक सभाएं कीं।
उन दिनों परिवहन के साधन कम थे।यहां तक कि पटना के निकट तब तक गंगा में कोई पुल भी नहीं था।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अपनी विशेष बैठक कर सात दिनों तक शोक मनाने का निर्णय किया।
बिहार सरकार ने 13 दिनों तक शोक मनाया।
सत्ता से जुड़े नहीं रहने के बावजूद देश -विदेश से शोक संवदेनाएं प्रकट करने की  इतनी अधिक खबरें आई थीं कि वह संख्या हैरान करने वाली थी।
@ यह लेख 8 अक्तूबर 2018 के फस्र्टपोस्ट हिन्दी में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम ‘दास्तान ए सियासत’ से@


जबल पुर आम्र्स फैक्ट्री से ए के -47 अवैध ढंग से निकाले 
जाते थे और उन्हें 900 किलोमीटर दूर मुंगेर पहुंचा कर 
बेचे जाते थे।
 फैक्ट्री के रद किन्तु  मरम्मत योग्य हथियार आयुध कारखाने के कर्मचारी के सहयोग  से  तस्कर के हाथ पहुंच जाते थे।तस्कर उन्हें मरम्मत करवा कर मुंगेर पहंुचा देते थे।
  आखिर ये अवैध हथियार कैसे 900 किलोमीटर चले और बीच में किसी पुलिस ने नहीं पकड़ा ?
कैसे पकड़ेगी ? सबके हिस्से बंधे जो होते हैं।
लंबे समय से ऐसे ही यह देश चल रहा है।
 हालत तो यह है कि किसी दिन कोई विदेशी हमारे देश में 
और भी खतरनाक काम कर सकता है।
क्योंकि यहां बिकने के लिए अनेक लोग सदा तैयार रहते हैं।ऐसे देशद्रोहियों को बचाने वाले लोग भी यहां मौजूद हैं।ऐसे लोगों के लिए आधी रात में सुप्रीम कोर्ट भी खुलवा दिया जाता है।
  मुंगेर कांड की तरह कुछ अन्य कांड़ों के उदाहरण यहां पेश हैं।
1995 में एक छोटे विदेशी विमान से बहुत सारे हथियार पश्चिम बंगाल में गिरा दिए गए।
वे हथियार पश्चिम बंगाल के सत्ताधारी कम्युनिस्टों से लड़ने के लिए कुछ लोगों ने बाहर से मंगवाए थे।
चाहे जिस उद्देश्य से आए हों,पर यहां पहंुचाने के तरीके बताए जा रहे हैं ताकि हमारे हुक्मरानों की नींद  अब भी तो खुले।
 उस विमान ने उससे पहले मद्रास में ईंधन भी लिया था।
बाद मंे यह भी पता चला कि उस हथियार वाले विमान के पुरूलिया आने के समय कलकत्ता एयरपोर्ट पर स्थित  चारों मशीनें मरम्मत के लिए बंद थीं जिनसे अवांछित विमानों की पहचान होती है।नियमतः बारी -बारी से ऐसी मशीनों  की मरम्मत की जाती  है।
   1993 में बंबई को दहलाने के लिए पाकिस्तान से बड़ी मात्रा में विस्फोटक पदार्थ समुद्री मार्ग से आसानी से बंबई पहंुचा दिए गए थे।उसके लिए पुलिस व कोस्ट गार्ड ने रिश्वत ली थी।
स्मगलर पहले एक डोंगी को पार कराने के लिए 350 रुपए घूस देते थे।
जब विस्फोटक पदार्थों के प्रति तस्करों की सावधानी देखी तो भ्रष्ट कोस्ट गार्ड और पुलिस ने उनसे कहा कि लगता है कि कोई कीमती चीज है।ज्यादा पैसे लगेंगे।तस्करों ने रिश्वत दुगुनी कर दी थी।जाहिर है कि रिश्वत के पैसे ऊपर तक जाते हैं।
  आपातकाल में गुजरात से दो बार डायनामाइट पटना आसानी से आ गया था।एक बार बिहार के लोग लाए,दूसरी बार गुजरातियों ने पहुंचाया।डायनामाइट आपातकाल से लड़ने के लिए आए थे।
 सोहराबुद्दीन का नाम सुना होगा। 2005 में वह मारा गया था।वह गुजरात सहित तीन राज्यों के मार्बल व्यवसायियों से हफ्ता वसूलता था और न देने पर हत्याएं करता था।
उसके मध्य प्रदेश स्थित गांव के कुएं से पुलिस ने 1995 में अन्य हथियारों के साथ 40 ए.के.-47 भी बरामद किए थे।
सोहराबुद्दीन वह सारे हथियार अहमदाबाद से इंदौर के पास अपने गांव ले जा सका था क्योंकि बीच में रिश्वत लेकर पार कराने वाली पुलिस कदम -कदम पर मौजूद थी।
 इस तरह के और न जाने और कितने उदाहरण इस देश में आपको मिल जाएंगे।
शासन की ऐसी कमजोरियों पर कभी कोई गंभीर चर्चा नहीं होती।चुनाव में तो और भी नहीं।क्योंकि उससे कुछ वोट बिगड़ने का खतरा जो रहता है।
हां,जब सोहराबुददीन
मारा जाता है तो पुलिस अफसरों को जेल जरूर हो जाती है।
कुछ दिन के बाद सुनिएगा कि ताजा मुंगेर हथियार कांड के अपराधियों के बचाव में भी कितने बड़े -बड़े लोग आगे आ जाते हैं।
हां,यह एक अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट के नये मुख्य न्यायाधीश ने कह दिया कि अब हम फांसी के मामले को छोड़ कर बारी से पहले कोई केस  नहीं सुनेंगे।    

देश के मशहूर पत्रकार व ‘द प्रिन्ट’ के प्रधान संपादक 
शेखर गुप्त ने आज के दैनिक भास्कर में  लिखा है कि ‘राजनीतिक इतिहास देखें तो  भरोसेमंद दिग्गजों ने 
--इंदिरा गांधी के खिलाफ जगजीवन राम और राजीव के खिलाफ वी.पी.सिंह ने क्रमशः 1977 और 1988-89 में समीकरण बदले थेे।’
 वी.पी.सिंह के मुतल्लिक तो शेखर जी की बात सही है,पर जग जीवन राम के बारे में नहीं।
 1989 में चंद्र शेखर जी जब छपरा में अपना नामांकन पत्र दाखिल करने गए  थे तो वहां के लोगों ने पहले उनसे यह वचन लिया कि आप जीत कर वी.पी.सिंह को ही प्रधान मंत्री बनाएंगे,तभी उन्हें नामंाकन पत्र दाखिल करने दिया।
 चंद्रशेखर जी उस समय उत्तर प्रदेश के बलिया के साथ- साथ बिहार के महाराजगंज से भी विजयी हुए थे।
 पर, बिहार के बलिया की कहानी दूसरी रही ।
 बलिया से जगजीवन राम ने 1977 में अपनी समधिन सुमित्रा देवी को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़ा कर दिया था।
 श्याम नंदन मिश्र के लिए बेगूसराय में चुनाव सभा थी।वहां   जगजीवन बाबू उनके प्रचार मंे गए थे। अपने भाषण में जैसे ही जग जीवन बाबू ने अपनी समधिन के चुनाव चिन्ह की चर्चा करके उनके लिए वोट मांगा,बड़ी चुनाव सभा में भारी हंगामा हो गया।
बेगूसराय के बगल में ही बलिया लोक सभा क्षेत्र है।चाहते हुए भी जन रोष को देखते हुए जगजीवन बाबू बलिया में सुमित्रा देवी के लिए चुनाव सभा नहीं कर सके थे।
अधिकतर लोग जनता पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के पक्ष में  थे।
  वहां से जनता पार्टी के उम्मीदवार राम जीवन सिंह थे और वे भारी मतों से जीते । सुमित्रा देवी की जमानत जब्त हो गयी।उन्हें सिर्फ 31 हजार मत मिले।
  इससे पहले भी एक ड्रामा हुआ।
नामांकन पत्र दाखिल हो जाने के बाद जगजीवन बाबू ने बंबई जाकर जसलोक अस्पताल से जनता पार्टी के पटना आफिस को जेपी की ओर से तार भिजवा दिया।उसमें जेपी ने कहा था कि बलिया से जनता पार्टी के उम्मीदवार को सुमित्रा देवी के पक्ष में बैठा दिया जाए।  
पर जन भावना को देखते हुए जेपी की बात नहीं मानी गयी जबकि सर्वोदय वाले ही राज्य पार्टी के इंनचार्ज  थे।
  अंतिम समय में जग जीवन राम के कांग्रेस छोड़ने के कारण थोड़ा मनो वैज्ञानिक असर जरूर पड़ा,किन्तु वोट की दृष्टि से कोई फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि आपातकाल के अत्याचारों के कारण अधिकतर लोगों ने इंदिरा जी की पार्टी को हराने के लिए पहले ही मन बना लिया था।
 1988-89 की स्थिति बिलकुल अलग थी।

  

यदि नरेंद्र मोदी इस बीच एम.जे.अकबर से मुक्ति नहीं पा लेंगे तो 2019 के चुनाव में राजग विरोधी दलों के हाथ में प्रचार का 
एक ठोस मसाला मिल जाएगा। 

 पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री रहमान मलिक ने 24 सितंबर 2018 को इस्लामाबाद में कहा कि राहुल गांधी  भारत के प्रधान मंत्री बनने वाले हैं।
  इससे पहले कांग्रेस के प्रमुख नेता मणि शंकर अय्यर ने नवंबर, 2015 में पाकिस्तान जाकर वहां के एक टी.वी.चैनल पर पाकिस्तानियों से अपील की थी कि ‘मोदी को हटाइए और हमें सत्ता में लाइए।’
   25 सितंबर 2018 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने यह सवाल उठाया  कि क्या भारत का पी.एम.दूसरे देश तय करेंगे ?
कांग्रेस कह रही है कि जब-जब भाजपा कमजोर होती है तो उसे पाकिस्तान की याद आती है।
पर यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि ऐसी नौबत लाता कौन है ?
क्या  मणि शंकर अय्यर जैसे नेता जो पाकिस्तान से मदद मांगते हैं ?
 कांग्रेस ने जब मणि को पार्टी से निलंबित किया था तो लगा था कि वह पार्टी अय्यर के विचारों से सहमत नहीं है।
पर उनका निलंबन समाप्त हो जाने पर अब लोगों को क्या नतीजा निकालना चाहिए ?

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

 आज न सिर्फ एक नेता दूसरे को चोर,कुत्ता और नीच 
कह रहा है,बल्कि एक टी.वी.एंकर दूसरे एंकर को गुंडा भी कह रहा है।
साठ के दशक से राजनीति व मीडिया को देख-समझ रहा हूं।राजनीति की शब्दावली में भले पहले  इतनी ‘नीचता’ न थी,पर मीडिया को तो हर दम बंटा हुआ ही देखा।
बिहार के जेपी आंदोलन के दौरान मीडिया बंटा हुआ था।
बोफर्स प्रकरण के दौरान भी वही हाल था।आपातकाल तो अपवाद था।उस समय तो सब धान साढ़े बाइस पसेरी था।
याद कीजिए साठ -सत्तर के दशक को और बंबई के ब्लिट्ज और करंट के तेवर को।दोनों साप्ताहिक टैबलाॅइड।
  एक घोर वामपंथी तो दूसरा घनघोर दक्षिणपंथी।
वह भी शीत युद्ध के जमाने में।
एक चिग्घाड़ता था तो दूसरा फुफकारता था।
मैं तो दोनों को जोड़कर पहले दो से भाग देता  था, फिर सही खबरों तक पहुंचता  था।जिस तरह आज भी परस्पर विरोधी तेवर वाले चैनलों को यदा कदा देख लिया करता हूंं।
 दैनिक अखबारों का भी तब कमोवेश वही हाल था,पर शालीनता लिए हुए।
वैसे कुल मिलाकर सरकार समर्थक अखबार ही पहले भी  अधिक थे।
सोशलिस्टों-कम्युनिस्टांे की शिकायत रहती थी कि अखबार उन्हें बहुत कम जगह देते हैं।
 खैर जब बारी-बारी से गैर कांग्रेसी सरकारें भी केंद्र व राज्यों में सत्ता में आने लगीं तो थोड़ा -बहुत सभी दलों को कवरेज मिलने लगा।
अब जब इस अर्थ युग में राजनीति का यह हाल हो चुका है तो उससे अलग मन मिजाज वाली मीडिया की उम्मीद ही क्यों कर रहे हैं आप ? अपवाद तो हर जगह होते हैं।