गुरुवार, 7 मार्च 2019

 पाकिस्तानी सेना ने बुधवार को कहा कि जैश ए मुहम्मद का पाकिस्तान में अस्तित्व ही नहीं है।
इससे पहले पाकिस्तान ने ओसामा बिन लादेन की पाकिस्तान में उपस्थिति को भी तब तक नकारा था जब तक अमरीका ने पाक में घुस कर उसे 2011 में मार नहीं दिया।
  जैश ए मुुहम्मद की उपस्थिति से इनकार से पाक का भारत के प्रति असली इरादों का पता चलता है।
यानी पाक भारत में आगे भी आतंकी भेजता रहेगा।
आखिर उन आतंकियों का कड़ा मुकाबला कौन करेगा ? 
वे लोग करेंगे जिनके बयानों पर पाकिस्तान इन दिनों तालियां बजा रहा है ?

सोमवार, 4 मार्च 2019

 राजनीतिक तथा अन्य तरह के तनावों की इस घड़ी में 
सोशल मीडिया में पर्याप्त संयम बरतते रहने की जरूरत है।
यदि किसी व्यक्ति का
विचार आपके विचार से अलग है तो उस पर आपको या हमको एतराज क्यों होना चाहिए ?
  उसे विचार प्रकट करने दीजिए।
हां,कहीं यदि तथ्यों,सूचनाओं और आंकड़ों के मामले में गलतियां लगें तो शालीनता से इंगित भर कर दीजिए।
लोकतंत्र तो यही है । हजार फूल खिलने दो।
यदि फूल असली है तो सुगंधित होगा।यदि फूल कागज का है तो वह जाने और उसका काम जाने !
हां, देश के संविधान-कानून के दायरे में ही रह कर कुछ भी हो।
  

कोई हमसे कलम मांगता है तो कई बार हम उसे दे 
तो देते हैं,पर होल्डर अपने पास ही रख लेते हैं।
क्या ऐसा पूरी दुनिया में होता है ?
या सिर्फ अपने देश में ?
   हम कलम के साथ-साथ होल्डर भी कब देने लगेंगे ?


शनिवार, 2 मार्च 2019


-दलीय पदाधिकारी बनाने से पहले पात्रता की जांच करा लें नेतागण-
  भाजपा ने अपने अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रादेशिक उपाध्यक्ष असगर मस्तान को अंततः पार्टी से निकाल दिया।
पर सवाल है कि ऐसे विवादास्पद व्यक्तियों को राजनीतिक दल पदाधिकारी बनाते ही क्यों हैं ?
अनेक विवादास्पद लोग अपने काले कारनामों को जारी रखने के लिए किसी न किसी दल का कवच पहन लेते हैं।
ऐसे लोगों को ‘सम्मानित’ करने के मामले में भाजपा अकेली पार्टी नहीं है।
सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए किसी को भी पार्टी का सदस्य बना दो और दलीय पदाधिकारी बनाने से पहले उसकी पात्रता का कोई ध्यान न रखो ,अधिकतर दलों का यही चलन हो गया है।
कई मामलों में जब माफिया,बलात्कारी  और हत्यारों को लोक सभा -विधान सभा का उम्मीदवार बना दिया जाता हो तो दलीय पदाधिकारी के चरित्र की चिंता भला कौन करता है !
हां ,यह और बात है कि इससे राजनीति के प्रति आम लोगों की धारण कुछ और खराब होती चली जाती है।भले वे मजबूरी में इन्हीं में से किसी न किसी दल  को वोट दे दें।
कई बार  आम लोगों के सामने विकल्प सीमित हो जाते हैं।
 सदस्य व पदाधिकारी बनाने के मामले में अन्य दलों को कम्युनिस्ट पार्टियों से सीखना चाहिए।उनके यहां ऐसा करने की गुंजाइश बहुत कम है।अपवादों की बात और है। 
  याद रहे कि भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रादेशिक उपाध्यक्ष तांत्रिक असगर मस्तान के यहां से पिछले दिन भारी मात्रा में आपत्तिजनक सामग्री मिली।
हथियारों में 40 तलवारें भी थीं।
इतनी संख्या में तलवारों की भला क्या जरूरत थी ?
असगर तो नेपाल भाग गया,पर उसके यहां बरामद भारी धन राशि जब्त कर ली गई।
 बुधवार को खबर आई कि एक करोड़ 50 लाख रुपए बरामद किए गए।पर आज की खबर है कि 67 लाख रुपए पाए गए।
पता नहीं, सच्चाई क्या है !
पर सवाल दूसरा है कि किसी को दलीय पदाधिकारी बनाने से पहले राजनीतिक दल उसके बारे में थोड़ी जांच- पड़ताल क्यों नहीं कर लेते ?ऐसा करना पार्टी की प्रतिष्ठा के साथ -साथ स्वस्थ लोक़तंत्र के लिए भी जरूरी है।
 --अगली लोक सभा में कितने बाहुबली-
   सन 2004 के लोक सभा चुनाव में 125 ऐसे उम्मीदवारों की विजय हुई थी जिनके खिलाफ तरह -तरह के मुकदमे चल रहे थे।
संभव है कि इन मुकदमों में से कुछ मुकदमे उनके राजनीतिक आंदोलनों के कारण हुए हों।पर इनमें से अधिकतर सांसदों के
खिलाफ गंभीर प्रकृति के अपराधों से संबंधित आरोप थे।
  2009 के लोक सभा चुनाव में ऐसे सांसदों की संख्या बढ़कर 157 हो गई।सन 1996 में यह संख्या सिर्फ 40 थी।
2014 के लोक सभा चुनाव में यह संख्या और भी बढ़ गई।
निवत्र्तमान लोक सभा के 180 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं।
 अगला चुनाव इसी साल होना है।देखना है कि यह संख्या इस बार बढ़ती है या घटती है।
यह तो राजनीतिक दलों पर निर्भर है कि वे ऐसे लोगों की संख्या संसद में बढ़ाना चाहते हैं या घटाना चाहते हैं।
--कुछ दिलचस्प आंकड़ें-
निवत्र्तमान लोक सभा के 26 सदस्य ऐसे हैं जो सात या अधिक बार चुने गए ।
इनमें से 3 सदस्य नौ बार चुने गए।उनमें कमल नाथ भी शामिल हैं जो अब मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री हैं।
ऐसे दो अन्य सदस्य हैं बासुदेव आचार्य और एम.एच.गवित। 
9 सदस्य आठ बार चुने गए।
14 सदस्य 7 बार चुने जा चुके हैं।
अभी यह आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि इनमें से कितने सदस्य ऐसे हैं जो कभी चुनाव नहीं हारे।
हां, दिवंगत जगजीवन राम वैसे सांसदों में शामिल थे जो कभी नहीं हारे।
पता नहीं, इनमें से कितने नेता अगली बार चुनाव लड़ेंगे और कितने जीतेंगे।
--भूली बिसरी याद--
पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण माहौल पर कल कांग्रेस सहित 21 प्रतिपक्षी दलों ने कहा कि ‘इसमें राजनीतिक लक्ष्यों की पूत्र्ति का कोई स्थान नहीं हो सकता है।सरकार सैनिक शहादतों का राजनीतिकरण न करे।’
पर, सवाल है कि खुद कांग्रेस ने 1971-72 में क्या किया था ?
उन दिनांे तो लोगों ने देखा कि किस तरह कांग्रेस ने सैनिकों की  शहादत को वोट में बदला था।
यहां तक कि उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष  के विरोध के बावजूद वहां भी विधान सभा का समय से पहले चुनाव करवा दिया गया था।
ताकि, राष्ट्रभक्ति की भावना का चुनावी लाभ जल्द से जल्द उठाया जा सके।समय बीत न जाए और भावना कमजोर न हो जाए !
 वैसे भी युद्ध में किसी दल की सरकार जीतती है तो उसका चुनावी लाभ तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी को मिलता ही है।
द्वितीय विश्व युद्ध में विजय के बाद विंस्टन चर्चिल की पार्टी जरूर इसका अपवाद साबित हुई थी।
यदि इंदिरा गांधी ने बंगला देश युद्ध मंे विजय का 1972 के विधान सभाओं के चुनाव में जान बूझकर योजनाबद्ध ढंग से इस्तेमाल नहीं भी किया होता तौभी उसका लाभ उन्हें मिलता।
  क्योंकि तब यह आम धारणा थी कि उन्होंने  उचित अवसर पर देश हित में समुचित साहस का परिचय दिया था।
  पर,युद्ध में विजय का चुनावी लाभ सार्वजनिक रूप से उठाने की कोशिश का लोभ उन्होंने  संवरण नहीं किया था।
अभी जो भारत-पाकिस्तान के बीच द्वंद्व चल रहा है,उसका नतीजा यदि अंततः भारत के पक्ष में सकारात्मक हुआ तो उसका चुनावी लाभ भी नरेंद्र मोदी को मिलेगा ही,चाहे मोदी  उसका लाभ उठाने की कोशिश करेंं या नहीं।
पर कांग्रेस चाहती है कि सारा श्रेय भारतीय सेना को मिले और नरेद्र मोदी को उसका कोई चुनावी लाभ न मिले।
  इस पृष्ठभूमि में 1972 की घटना को याद कर लेना मौजूं होगा।
1971 में पूर्वी पाकिस्तान को लेकर भारत-पाक युद्ध हुआ था।
पाक सेना को 16 दिसंबर, 1971 को सरेंडर करना पड़ा।
उस पर देश-विदेश में इंदिरा सरकार की काफी वाहवाही हुई।
अटल बिहारी वाजपेयी ने सार्वजनिक रूप से इंदिरा गांधी को बधाई दी।
अटल जैसी उदारता आज के प्रतिपक्ष में नहीं है।
1972 के प्रारंभ में देश के कई राज्यों में एक साथ विधान सभाओं के चुनाव हुए थे।उस चुनाव से ठीक पहले प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने मतदाताओं के नाम अलग से एक चिट्ठी प्रसारित की थी।वह कई भाषाओं में अनुदित की गयी।
  उस चिट्ठी में लिखा गया था कि ‘ देशवासियों की एकता और उच्च आदर्र्शों के प्रति निष्ठा ने हमें युद्ध में जिताया।अब उसी लगन से हमें गरीबी हटानी है।इसके लिए हमें विभिन्न प्रदेशों में ऐसी स्थायी सरकारों की जरूरत है जिनकी साझेदारी केंद्रीय सरकार के साथ हो सके।’
 साप्ताहिक पत्रिका ‘दिनमान’@5 मार्च 1972 @  ने इस संबंध में लिखा था कि ‘ जहां तक कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र का संबंध है,उसने यह बात छिपाने की कोशिश  नहीं की है कि भारत -पाक युद्ध में भारत की विजय श्रीमती इंदिरा गांधी के सफल नेतृत्व का प्रतीक है और श्रीमती  गांधी के हाथ मजबूत करने के लिए विभिन्न प्रदेशों में अब कांग्रेस की ही सरकार होनी चाहिए।’
  --और अंत में-
दिल्ली के एक अपराधग्रस्त मुहल्ले में 2062 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए।
 यह खबर आई है कि पहले की अपेक्षा वहां अपराध कम हो गया।
पटना में भी कई जगह कैमरे लगे हंै।हाल में जब अपराधी हत्या करके भाग रहे थे तो उनकी छवि को कैमरे ने पकड़ लिया।
पर वह छवि इतनी धुंधली पाई गई कि वह किसी काम की नहीं है। अरे, भई जरा कैमरे की गुणवत्ता की भी तो जांच कर लिया कीजिए ।
@ 1 मार्च 2019 के प्रभात खबर-बिहार- में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@

अमरीकी राजनीति विज्ञानी सैम्युल हंटिंगटन ने 
यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि 
‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान संघर्षों का मुख्य कारण होगी।’
  पर, 57 इस्लामिक देशों का संगठन, हंटिंगटन की इस स्थापना को गलत सिद्ध करने की दिशा में  आगे बढ़ रहा है।
 इस संगठन के अबु धाबी में हुए कल के सम्मेलन में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज गेस्ट आॅफ आॅनर थीं।दूसरी ओर इस संगठन के संस्थापक सदस्य पाकिस्तान ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया।
  याद रहे कि पाकिस्तान उन इस्लामिक आतंकवादियों को पनाह देता रहा है जो पूरी दुनिया में अपने धर्म का शासन कायम करने के लिए मरने -मारने पर उतारू रहते हंै।
दूसरी ओर, भारत आतंकवाद से लड़ने वाले देशों में प्रमुख है और कह रहा है कि ‘हमारी लड़ाई आतंकवाद से है न कि किसी मजहब से।’
इस्लामिक देशों के संगठन ने धैर्यपूर्वक सुषमा स्वराज की इस बात को सुना। दुनिया को एक खास दिशा देने वाले इस अबु धाबी सम्मेलन के बाद अब देखना है कि इस संसार में आगे क्या होता है।
  यानी, अंततः इस दुनिया में मिलजुल कर रहने वालों की जीत होती है या जेहादियों की ?

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

बंगला देश युद्ध का कांग्रेस ने उठाया था चुनावी लाभ 
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पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण माहौल पर कल कांग्रेस सहित 21 प्रतिपक्षी दलों ने कहा कि ‘इसमें राजनीतिक लक्ष्यों की पूत्र्ति का कोई स्थान नहीं हो सकता है।सरकार सैनिक शहादतों का राजनीतिकरण न करे।’
पर, सवाल है कि खुद कांग्रेस ने 1971-72 में क्या किया था ?
उन दिनांे तो लोगों ने देखा कि किस तरह कांग्रेस ने सैनिकों की  शहादत को वोट में बदला था।
यहां तक कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष  के विरोध के बावजूद वहां भी विधान सभा का समय से पहले चुनाव करवा दिया गया था।
ताकि, राष्ट्रभक्ति की भावना का चुनावी लाभ जल्द से जल्द उठाया जा सके।समय बीत न जाए और भावना कमजोर न हो जाए !
 वैसे भी युद्ध में किसी दल की जब सरकार जीतती है तो उसका चुनावी लाभ तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी को मिलता ही है।
द्वितीय विश्व युद्ध में विजय के बाद विंस्टन चर्चिल की सत्ताधारी पार्टी जरूर इसका अपवाद साबित हुई थी।
यदि तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने बंगला देश युद्ध मंे विजय का 1972 के विधान सभाओं के चुनाव में जान बूझकर योजनाबद्ध ढंग से इस्तेमाल नहीं भी किया होता तौभी उसका लाभ उन्हें मिलता।
  क्योंकि तब यह आम धारणा थी कि उन्होंने  उचित अवसर पर देश हित में समुचित साहस का परिचय दिया था।
  पर,युद्ध में विजय का चुनावी लाभ सार्वजनिक रूप से उठाने की कोशिश का लोभ उन्होंने भी संवरण नहीं किया था।   भारत-पाकिस्तान के बीच अभी जो द्वंद्व चल रहा है,उसका नतीजा यदि अंततः भारत के पक्ष में सकारात्मक हुआ और होगा ही ,तो उसका चुनावी लाभ भी नरेंद्र मोदी के राजग को मिलेगा ही,चाहे मोदी  उसका लाभ उठाने की कोशिश करेंं या नहीं।
पर कांग्रेस चाहती है कि सारा श्रेय भारतीय सेना को मिले और नरेद्र मोदी को उसका कोई चुनावी लाभ न मिले।
        जरा याद कर लें 1972
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 इस पृष्ठभूमि में 1972 की घटना को याद कर लेना मौजूं होगा।
1971 में पूर्वी पाकिस्तान को लेकर भारत-पाक युद्ध हुआ था।
पाक सेना को 16 दिसंबर, 1971 को सरेंडर करना पड़ा।
उस पर देश-विदेश में इंदिरा सरकार की काफी वाहवाही हुई।
अटल बिहारी वाजपेयी ने सार्वजनिक रूप से इंदिरा गांधी को बधाई दी थी।
अटल जैसी उदारता आज के प्रतिपक्ष में नहीं है।
1972 के प्रारंभ में देश के कई राज्यों में एक साथ विधान सभाओं के चुनाव हुए थे।उस चुनाव से ठीक पहले प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने मतदाताओं के नाम अलग से एक चिट्ठी प्रसारित की थी।वह कई भाषाओं में अनुदित की गयी।
  उस चिट्ठी में लिखा गया था कि ‘ देशवासियों की एकता और उच्च आदर्र्शों के प्रति निष्ठा ने हमें युद्ध में जिताया।अब उसी लगन से हमें गरीबी हटानी है।इसके लिए हमें विभिन्न प्रदेशों में ऐसी स्थायी सरकारों की जरूरत है जिनकी साझेदारी केंद्रीय सरकार के साथ हो सके।’
 साप्ताहिक पत्रिका ‘दिनमान’@5 मार्च 1972 @  ने इस संबंध में लिखा था कि ‘ जहां तक कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र का संबंध है,उसने यह बात छिपाने की कोशिश  नहीं की है कि भारत -पाक युद्ध में भारत की विजय श्रीमती इंदिरा गांधी के सफल नेतृत्व का प्रतीक है और श्रीमती  गांधी के हाथ मजबूत करने के लिए विभिन्न प्रदेशों में अब कांग्रेस की ही सरकार होनी चाहिए।’
 @--कानोंकान-प्रभात खबर-बिहार-1 मार्च 2019@

  भाजपा नेता सरयू राय ने एक बार कहा था कि ‘मैं कई बार बहस हार जाता हूं,पर दोस्त नहीं।’
   अभी देश में राजनीतिक तथा अन्य तरह का जो माहौल है,उसमें बहस में जीतने की कोशिश में दोस्त हार जाने या खो देने का खतरा बढ़ गया है।
  सोशल मीडिया ने इसमें भारी इजाफा कर दिया है।
 सरयू राय तो एक पार्टी के बड़े नेता हैं।फिर भी उन्हें दोस्त के खोने की आशंका रहती है। सही भी है ।
नाहक क्यों खोया जाए ! उससे हासिल क्या होना  है !
पर, जिन्हें न तो किसी पार्टी से कोई संबंध है और न किसी ‘सरकारी परसादी’ की प्रत्याशा , उन्हें तो बहस में जीतने के चक्कर में दशकों पुराने दोस्त को नहीं ही खोना चाहिए ! 
 अन्यथा, बाद में अधिक नहीं, तो थोड़ा पछतावा तो होगा ही।