बुधवार, 5 जून 2019

चौकीदार और ‘गोदी मीडिया’

चौकीदार चोर है, मोदी जी ने 30 हजार

करोड़ रुपए अनिल अंबानी की जेब में 

डाल दिए और ‘गोदी मीडिया’ का शोर 

23 मई के चुनावी रिजल्ट के बाद से 

अब बंद है।

क्या अब चौकीदार चोर नहीं है ?

उस 30 हजार करोड़ रुपए का क्या हुआ ?

विश्व पर्यावरण दिवस पर

आने वाले दिनों में बिगड़ते पर्यावरण की बढ़ती समस्या के पूर्वाभास के कारण ही मैंने अपनी बेटी अमृता सिंह को पर्यावरण विज्ञान की पढ़ाई करने की सलाह दी थी।

इसी साल उस विषय में उसे पीएच.डी.की उपाधि भी मिली है। अब तो वह शादीशुदा है। पर जब तक वह हमारे साथ थी, हमें भी उसकी पढ़ाई का लाभ मिलता रहा।

पानी बचाने और साफ-सुथरा रहने आदि की सीख उससे पूरे परिवार को मिलती रही। अब तो साफ-सफाई व पर्यावरण रक्षा उसके स्वभाव का अंग हो चुकी है। जब भी मैं उसके घर जाता हूं, उस घर की सफाई का स्तर देख कर अत्यंत खुशी होती है। 

तेजाबी संबंधों का नुकसान !

यदि किन्हीं दो जातियों के बीच कभी ‘तेजाबी संबंध’ रहा हो तो उसका असर जल्दी नहीं जाता।  यानी, यदि वे दोनों कभी मिलकर भी चुनाव लड़ेंगे तो आम तौर पर केमिस्ट्री से गणित पराजित हो जाएगा।

2016 में पश्चिम बंगाल में यही हुआ था। इस बार उत्तर प्रदेश में भी यही हुआ।

बिहार में भी फसल काट लेने वाले समुदाय यदि अपनी फसल बचाने की कोशिश में लगे समुदाय से चुनावी तालमेल भी करें तो उसका कोई लाभ नहीं होगा।

इस कहानी का यही मोरल है कि राजनीतिक दल विभिन्न जातियों के बीच के झगड़े को न बढ़ाएं।बल्कि उसे कम करने की कोशिश करें। अन्यथा, उन्हें लाभ के बदले कभी भारी नुकसान भी  हो सकता है।

2016 में सी.पी.एम. ने सोचा था कि यदि वह कांग्रेस के साथ तालमेल करके पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ेगी तो दो जोड़ तीन बराबर पांच हो जाएगा जो चार से अधिक होगा। पर ऐसा नहीं हुआ। सी.पी.एम. को 23 सीटें ही मिल सकी जबकि कांग्रेस 43 सीटें जीत कर प्रमुख विपक्षी दल बन गया।

ऐसा इसलिए हुआ कि सी.पी.एम. के लोगों ने तो कांग्रेसी उम्मीदवारों को मत दे और दिला दिए, पर कांग्रेस समर्थकों ने ऐसा कम ही किया। क्योंकि दशकों तक कांग्रेस समर्थक लोग वाम मोरचा की भीषण हिंसा के शिकार हुए थे।

उत्तर प्रदेश में इस बार के लोकसभा चुनाव में बसपा को 10 सीटें मिल गई जबकि सपा पांच पर ही अटक कर रह गई। जानकार लोग कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में भी पश्चिम बंगाल दुहरा दिया गया।  

मंगलवार, 4 जून 2019

दारोगा की अपार ताकत

राष्ट्रीय सहारा के अनुसार, बिहार के डी.जी.पी. गुप्तेश्वर पांडेय रविवार देर शाम पटना के एसएसपी कार्यालय पहुंचे। बढ़ते अपराध पर चिंता प्रकट की। पुलिसकर्मियों से कहा कि ‘सुधर जाइए, वरना कार्रवाई के लिए तैयार रहिए।’

उन्होंने चेताया कि शराब, बालू और भूमि माफिया से साठगांठ रखने वाले पुलिसकर्मियों और पदाधिकारियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। डी.जी.पी. बनने के बाद पांडेय जी दूसरी बार एसएसपी आफिस गए थे। शायद इसी काम के लिए उन्हें तीसरी बार भी जाना पड़े!

यह खबर पढ़कर मुझे एक साथ कई घटनाएं याद आ गईं और पुलिसकर्मियों खासकर दारोगा की अपार ताकत भी।

आजादी से पहले की बात है। कहानी मेरे पुश्तैनी गांव के थाने यानी सारण जिले के परसा थाने की है। बचपन में सुना था कि उस थाने के निवासी दुनिया राय ने अपने पुत्र का नाम दारोगा प्रसाद राय रखा। वे चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा होकर दारोगा बने। पर, बाद में तो दारोगा बाबू मुख्यमंत्री तक बने। 

इस बात का पूरा रहस्य तब पता चला जब अस्सी के दशक में मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘बिहार में दारोगा राज है।’ जबकि, आजाद जी खुद एक बड़े कड़क नेता थे।

नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण के स्थानीय संपादक दीनानाथ मिश्र ने उन्हीं दिनों एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था -‘डीजीपी हारा, दरोगा जीता।’ एक बार बिहार के एक अन्य मुख्यमंत्री ने भी कहा था कि थाने के भ्रष्टाचार को खत्म नहीं किया जा सकता।

सवाल सिर्फ बिहार का ही नहीं है। कई साल पहले केंद्रीय गृह संचिव रहे एक अफसर ने कहा था कि होम मिनिस्टर की इस बात में भी रूचि रहती थी कि दिल्ली के किस पुलिस थाने में किसे एस.एच.ओ बनाया जाए।

सड़कों पर भारी अतिक्रमण से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कई महीने पहले पटना हाईकोर्ट ने जक्कनपुर के थाना प्रभारी से पूछा था कि अतिक्रमण करवाने से आपको कितनी ऊपरी आय हो जाती है ? हाईकोर्ट की उक्त टिप्पणी के बावजूद आज पटना में अतिक्रमण का हाल जस का तस है। बल्कि बढ़ ही रहा है।

डी.जी.पी. फटकार ही रहे हैं। मुख्यमंत्री भी समय -समय पर चिंता प्रकट करते ही रहते हैं। फिर आखिर कौन से ‘अदृश्य निर्मल बाबा’ हैं जो थानेदारों पर लगतार कृपा पर कृपा बरसाते जा रहे हैं ?!

एक और कहानी सारण जिले की ही। डा.राजेंद्र प्रसाद जब राष्ट्रपति बने तो उनके गांव की एक महिला से किसी ने कहा था कि वे बहुत बड़े आदमी बन गए हैं। इस पर उस महिला ने भोजपुरी में सवाल किया कि ‘का दारोगा बन गईल बाड़ें ?’

जून 2019

सोमवार, 3 जून 2019

देश के अधिकतर मतदाता कभी गलत नहीं हुए

‘गरीबी हटाओ’ के नारे की पृष्ठभूमि में इंदिरा गांधी ने 1971 का लोकसभा चुनाव अकेले बल पर भारी बहुमत से जीत लिया था। जनसंघ नेता बलराज मधोक ने तब आरोप लगाया कि मतपत्रों पर रसियन स्याही का यह कमाल है।

तब तो संभावतः एक ही ‘मधोक’ थे। तब तक की राजनीति में आज जितने गैर जिम्मेवार नेता पैदा नहीं हुए थे।

2019 के जनादेश को झुठलाने की असफल कोशिश में आज अनेक ‘मधोक’ लग गए हैं। एक बुद्धिजीवी ने तो 2019 के मतदाताओं को इडिएट तक कह डाला। जबकि मेरा तो मानना रहा है कि इस देश के अधिकतर मतदाता कभी गलत नहीं हुए।

यहां तक कि तब भी नहीं जब बिहार में 1991 के लोकसभा चुनाव में और 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद को भारी बहुमत मिला था। 

शनिवार, 1 जून 2019

अपहरण : इसे कहते हैं हैंगओवर ! ! !

हाल में पटना में पास से गुजर रहे एक व्यक्ति के बारे में मेरे परिचित ने मुझसे पूछा, ‘ आप जानते हैं इन्हें ? चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जैसे तरह लग रहे थे। मैंने हवाई चप्पल पहने उस व्यक्ति के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की।

उन्होंने उस हस्ती का नाम बताया। मैं चौंक गया। अच्छा तो यही हैं ?! इनका तो नब्बे के दशक में अपहरण हुआ था ! पर, आज इस स्थिति में क्यों ? सुना है कि अब तो शांतिपूर्वक अच्छा-खास कमा रहे हैं। यह तो बहुत ही अमीर व्यक्ति हैं ?

परिचित ने कहा कि अपहरण के बाद से ही दहशत में रहते हैं। अच्छे कपड़े पहनना और सजना- संवरना इन्होंने छोड़ दिया है। इनकी गाड़ी भी जर्जर जैसी ही लगती है। यह सब ऐहतियाती तौर पर करते हैं। शायद फिर किसी अपहरणकर्ता की उनपर नजर न पड़ जाए।

ऐसे कुछ अन्य धनपति भी हैं जो सबसे महंगी गाड़ी खरीद सकते हैं, पर आज भी मामूली सेकेंड हैंड कार पर चलते हैं।

इसे कहते हैं हैंगओवर ! ! !

चिदम्बरम परिवार को कोर्ट से लगातार मिल रही राहत तो अभूतपूर्व है


कल जिन-जिन नेताओं ने शपथ ली, उनमें से एक व्यक्ति आर.के. सिंह को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सहनशीलता शब्द के सही अर्थों में जीरो है। ऐसे मंत्री और भी होंगे, पर मैं उन्हें नहीं जानता।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मंत्री का तो कहना ही क्या! इतने दिनों तक सत्ता में रहने के बावजूद अपने लिए दुनिया के किसी हिस्से में एक—दो कमरे का फ्लैट तक नहीं खरीदा। मोदी का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान अब तेज होने वाला है।

गत पांच साल में भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम में उन्हें अपनी ही सरकार के बड़े अफसरों व अदालतों से जितना सहयोग मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। चिदम्बरम परिवार को कोर्ट से लगातार मिल रही राहत तो अभूतपूर्व है। इससे लोगों में कोर्ट के बारे में अच्छी राय नहीं बनती।

मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की धार कोई कुंद न कर सके, इसके लिए भ्रष्टाचार विरोधी मंत्रालय बनाकर उसकी जिम्मेवारी उस खास मंत्री को दे देनी चाहिए जिसकी ओर मेरा इशारा है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ आम तौर पर एजेंसियां रिएक्टिव कार्रवाई करती है। उसे प्री एन्टिव याानी पहल करके पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए। उसके लिए कोई खास एजेंसी सारे मंत्रालयों, मंत्रियों और अफसरों पर नजर रखे। साथ ही उन माफिया गिरोहों पर भी जिनकी ओर वोहरा कमेटी ने नब्बे के दशक में ही इशारा किया था।

ताजा खबर यह है कि केंद्र सरकार 36 बड़े अफसरों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति सी.बी.आई. को नहीं दे रही है। मोदी के शासनकाल में भी सी.बी.आई. का यह आरोप रहा है कि केंद्र सरकार के संबंधित अफसर जल्दी अनुमति नहीं देते या फिर लटकाए रहते हैं। यह बीमारी पुरानी है। इससे इस देश के भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ा रहता है।

असम के मुख्यमंत्री प्रफुल्ल महंत के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति राज्यपाल जनरल सिन्हा ने नहीं दी थी। जबकि उन पर लालू प्रसाद की अपेक्षा अधिक गंभीर आरोप थे। 2007 में मायावती और 2013 में अशोक चव्हाण के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति संबंधित राज्यपालों ने नहीं दी।

इन घटनाओं से भ्रष्टाचार की राह में रोड़ों की ताकत का अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसे में सही जगह पर सही व्यक्ति को जिम्मेवारी देने से मोदी का लक्ष्य पूरा होगा और अंततः जनता को राहत मिलेगी।

इस बीच इसी महीने यह खबर आई है कि डी.ओ.पी.टी ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय करेगा। यह विभाग प्रधानमंत्री के अधीन है। मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि भ्रष्टाचार इस देश की सबसे बड़ी समस्या है। इसी से अन्य अधिकतर समस्याएं पैदा होती हैं।