शुक्रवार, 14 जून 2019

पिछले कार्यकाल की मोदी सरकार

प्रधानमंत्री मोदी ने 12 जून को कहा कि  ‘सभी मंत्री समय पर आफिस पहुंचें और कुछ मिनट का समय निकाल कर अधिकारियों के साथ मंत्रालय के कामकाज की जानकारी लें। घर से काम करने से बचना चाहिए।’

प्रधानमंत्री ने बहुत बड़ी बात कही है। प्रकारांतर से उन्होंने यह बता दिया कि पिछले कार्यकाल में उनकी सरकार कैसे चल रही थी। यानी पिछले कार्यकाल में कई मंत्री न तो समय पर आफिस जाते थे और न ही मंत्रालय के कामकाज में रुचि लेते थे। घर से काम करते थे।

ध्यान रहे कि मोदी ने कहा कि कुछ मिनट का समय निकाल कर! सब जानते हैं कि घर से काम करने का क्या मतलब होता है! इन सबके बावजूद मोदी यह सब बर्दाश्त करते रहे। क्योंकि 2014 में उनकी अपनी पार्टी को लोकसभा में बहुमत तो मिला था, पर बाद के दिनों में वह भी समाप्त -सा हो गया था।

अब उनका अपना ही पूरा बहुमत है। अब लगता है कि लापारवाह और इधर -उधर झांकने वाले मंत्रियों पर लगाम कस सकेंगे।

कारनामे चंबल वाले, लूटने का तरीका बदला


इस देश में लोकतंत्र नहीं आता तो वे शायद चंबल के बीहड़ों में कंधे पर बंदूक लेकर विचरण कर रहे होते। पर, कुछ दशक पहले कतिपय नेताओं की मेहरबानी से वे चुनावी राजनीति मेंं प्रवेश कर गए।

पहले कुछ नेताओं के लिए बूथ कैप्चर कर रहे थे। बाद में खुद चुनाव लड़ कर विधायिका और सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने लगे। कुछ अन्य सीधे राजनीति में पहुंचे। पर, उनके कारनामे फिर भी कमोवेश चंबल वाले ही रहे। हां, लूटने का तरीका बदल गया।

कई कारणों से उनके लिए अब राजनीति में गुंजाइश कम होती जा रही है। यह नहीं कह रहा हूं कि गुंजाइश पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। पर, उम्मीद है कि कम होती जाएगी। इसलिए उनके लिए बेहतर यह होगा कि वे फिर एक बार अपना पेशा बदल लें। 

शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल को केंद्र सरकार की मंजूरी

केंद्र सरकार ने शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल के निर्माण की मंजूरी दे दी। इसे मैं मात्र एक पुल नहीं बल्कि सारण जिले के विकास का महा-द्वार कहूंगा। याद रहे कि अविभाजित सारण जिला मनिआर्डर इकोनाॅमी का जिला रहा है। ‘आबादी अधिक व जमीन कम’ वाला जिला।

यह पुल बन जाने के बाद दिघवारा से हाजीपुर तक ‘एक और नोयडा’ बनने का रास्ता साफ हो जाएगा। पर, यह भी देखना है कि शेरपुर -दिघवारा गंगा पुल कितना शीघ्र बनकर तैयार होता है। 
उम्मीद तो है कि हमलोगों के जीवनकाल में ही बन जाएगा !

13 जून 19

सोमवार, 10 जून 2019

बिहार में दहेज की ताजा दर

बिहार में दहेज की ताजा दर का मोटा—मोटी पता चला है। बिहार के एक गिरफ्तार इंजीनियर ने हाल में बताया कि मैंने अपनी बिटिया की शादी के लिए 2 करोड़ 36 लाख रुपए घर में रखे थे।

निगरानी दस्ते ने 14 लाख रुपए घूस लेते सुरेश प्रसाद सिंह को हाल गिरफ्तार किया। नकदी भी बरामद हुई। याद रहे कि उनकी बिटिया डाॅक्टर है। यानी डाक्टर भी है तो क्या हुआ! 


लड़की वालों का दोहन तो होना ही है।


दरअसल जब कोई लड़की वाला वर की तलाश में निकलता है तो उसे अच्छी तरह पता चल जाता है कि जातिवाद कितना बेमतलब शब्द है। क्या किसी को कभी दया आती है कि बेचारे का अधिक दोहन नहीें किया जाए क्योंकि आखिर अपनी ही जति का तो है! 


शुक्रवार, 7 जून 2019

आदतन दल—बदलुओं को बुलाना, यानी अपने कार्यकर्ताओं का हक मारना

मौसमी पक्षियों के डाल-बदल यानी दल—बदल के लिए हर चुनाव एक अच्छा मौसम होता है। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद खूब दल—बदल होते हैं। इस बार के चुनाव से पहले भी दल बदल हुए। चुनाव के बाद भी होंगे, इसके संकेत मिल रहे हैं।

कई पराजित उम्मीदवारों के बयानों और हाव—भाव से संकेत साफ हैं। वे किसी ऐसे दल में प्रवेश करने की कोशिश में हैं जिसके बल पर वे अगले चुनाव में जीत हासिल कर सकें। लोकसभा नहीं तो विधानसभा ही सही। जो ट्रेन पहले खुल रही हो, उसी पर चढ़ जाना है!

इनमें से कुछ दल—बदलू प्रवेश भी पा जाएंगे। कुछ तो आदतन दल—बदलू हैं। होना तो यह चाहिए कि जो नेता तीन बार पहले ही दल—बदल कर चुका हो, उसे चौथी बार कोई दल स्वीकार न करे। चौथी बार स्वीकार करने का मतलब है बिच्छू की माला पहनना है।

पर कुछ दल डंक झेलने की कीमत पर भी वह माला भी समय-समय पर ग्रहण करते ही रहते हैं। इस बार भी करेंगे ही। पर, उन कार्यकर्ताओं का क्या होगा, जहां के कार्यकर्ताओं का हक मार कर आदतन दल—बदलू उस मजबूत दल के टिकट भी पा जाएंगे?

दरअसल ये आदतन दल—बदलू ताश के पत्तों की तरह हैं। कभी एक हाथ में, तो कभी दूसरे हाथ में। इससे नए लोगों का राजनीति में प्रवेश और विकास रुकता है। इस कारण भी कुछ राजनीतिक दल नदी की जगह तालाब बन गए हैं। तालाब का पानी सड़ सकता है, पर नदी का नहीं।


एंटोनी की सलाह थरूर से बेहतर

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद ए.के. एंटोनी ने हार के कुछ कारण बताए थे। उसी साल शशि थरूर ने भी कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए आठ सूत्री सुझाव हाईकमान तक पहुंचाए थे।

हार के कारणों को लेकर एंटोनी की बातें सच से अधिक करीब थीं। पर, कांग्रेस ने गत पांच साल में न तो एंटानी की बातों पर ध्यान दिया और न ही थरूर की बातों को कोई तवज्जो दी।

एक बार फिर थरूर सहित कुछ अन्य लोग कांग्रेस के पुनरुद्धार के लिए सलाह दे रहे हैं। जाहिर है कि उनपर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा। दरअसल कांग्रेस जैसी कुछ पार्टियों के साथ दिक्कत यह है कि कोई भी सलाह उन दलों के सुप्रीमो के चाल, चरित्र, चिंतन में बदलाव की जरूरत नहीं बताती। उतनी हिम्मत है ही नहीं। पर वे भी क्या करें ? सुप्रीमो पर ही पार्टी आधारित है। उन्हें हटा दीजिएगा तो पार्टी बिखर जाएगी। यदि नहीं हटाइएगा तो धीरे -धीरे दुबली होती जाएगी।


नल-जल योजना, घर-घर की कहानी

नल जल योजना, यानी घर- घर की कहानी। इस महत्वाकांक्षी योजना के जरिए सरकार घर -घर पहुंच रही है।   इस योजना के साथ सरकार की छवि भी पहुंच रही है। इसलिए इसके बेहतर कार्यान्वयन की सख्त जरूरत है।

पर शिकायतें आ रही हैं। सोशल आडिट से गड़बडि़यों को रोका जा सकता है। मुजफ्फरपुर शेल्टर होम की सही जांच ‘टिस’ की जिस टीम ने की थी, वैसे ही कर्तव्यनिष्ठ लोगों की टीम से या उसी से नल—जल योजना की भी जांच कराने की जरूरत है।


साथ-साथ चुनाव से 60 हजार करोड़ की बचत

2019 के लोकसभा चुनाव में लगभग 60 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए। इनमें सरकारी और गैरसरकारी खर्च शामिल हैं। इसी तरह पूरे देश के विधानसभा चुनावों में अलग से इतने ही या फिर इससे भी अधिक खर्च होंगे। क्या यह जनता के धन का दुरुपयोग नहीं है?

1967 तक दोनों चुनाव एक ही साथ होते थे। इसलिए दोहरे खर्च की नौबत नहीं थी। अब भी यदि देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होने लगे तो कितने पैसे बचेंगे ?

2018 में विधि आयोग को नौ राजनीतिक दलों ने साफ—साफ बता दिया कि हम साथ-साथ चुनाव के खिलाफ हैं। क्या 60 हजार करोड़ रुपए बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए? पर इस गरीब देश के कितने नेता इस कोशिश के लिए तैयार हैं ? यदि नहीं हैं तो उन्हें इस गरीब देश की जनता किस नाम से पुकारे ? नाम तय कर लीजिए।

सी.पी.एम. ने तो यहां तक कह दिया कि साथ-साथ चुनाव लोकतंत्र के ही खिलाफ है। क्या 1952 से 1967 तक देश में लोकतंत्र नहीं था जब साथ- साथ चुनाव होते थे ?


और अंत में

खबर है कि इस कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार ने कई बड़े महत्व के काम करने का मन बनाया है। पर वैसे कुछ कामों की राह में दिक्कत यह है कि राज्यसभा में राजग का अभी  बहुमत नहीं है। बहुमत के लिए 24 सदस्यों की कमी है।

एक आकलन के अनुसार 2022 तक राजग को बहुमत मिल जाएगा। यानी 2022 से 2025 तक की अवधि केंद्र सरकार के लिए सर्वाधिक अनुकूल होगी। 

(सात जून 2019 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे कालम कानोंकान से )

जिस पर आप भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा सकते, उसे जातिवादी कह देना आसान

मैं कभी आर.के. सिंह से मिला नहीं। मिलने की न कोई इच्छा है और न कोई प्रयोजन। पर उनके बारे में अपने अनुभव आपसे शेयर कर रहा हूं।

जब वे बिहार में पथ निर्माण विभाग के सचिव थे तो कुछ राजपूत ठेकेदार मुझसे मिले। उन्होंने कहा कि आप का लिखा नीतीश जी पढ़ते हैं। आप आर.के. सिंह के खिलाफ लिखें। वह अपनी छवि चमकाने के लिए चुन -चुनकर राजपूत ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट कर रहा है।

मैंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता। इस पर मैंने अपना अनुभव सुनाया। 

अस्सी के दशक की बात है। आर.के. पटना के डी.एम. थे। प्राथमिक शिक्षकों की जिला स्थापना समिति के डी.एम. ही अध्यक्ष होते हैं। मैं तब लोहिया नगर में रहता था। वहां के मेरे एक मित्र इन्दु जी मेरे यहां अक्सर आते थे।

मेरी पत्नी शिक्षिका रही हैं। उन्हें वेतन कम था। रोज बहादुरपुर रिक्शा से जाना पड़ता था। वेतन का बड़ा हिस्सा उसी में खर्च हो जाता था। मैंने तो निकट के स्कूल में बदली के लिए किसी से कहा नहीं, पर इन्दु जी ने खुद ही कहा कि आर.के. मेरे परिचित हैं। उनसे मैं कहूंगा।

मैंने इन्दु को मना नहीं किया क्योंकि मेरी पत्नी सुन रही थी। इन्दु आर.के. से मिले। कहा कि जनसत्ता के सुरेंद्र किशोर को जानते हैं न ! हमी लोगों का जात भाई है। उसकी पत्नी को बड़ा कष्ट है। निकट के स्कूल में बदली का सरकारी नियम भी है। निकट में कई स्कूल भी हैं। बदली कर दीजिए। आर.के. ने कहा कि पटना से पटना में मैं बदली नहीं करता।

इस कहानी पर भी ठेकेदार लोग नहीं माने। बोले कि इसीलिए तो कह रहा हूं कि वह कुलद्रोही है। इस पर मैंने कहा कि मैं लिखूंगा, पर मेरी एक शर्त है, आर.के. ने अपने कार्यकाल में जितने ठेकेदारों को ब्लैक लिस्ट किया है, उसकी सूची आर.टी.आई. के जरिए मांगिए। उसे देखकर मुझे यदि लगेगा कि किसी के साथ अन्याय हो रहा है तो मैं जरूर लिखूंगा।

पर बाद में वे ठेकेदार मेरे पास नहीं आए।

अरविंद जी, वे ठेकेदार तो नहीं लौटे, पर यह काम अब भी आप कर सकते हैं। यदि आपका आरोप उससे साबित हो जाएगा तो मैं आर.के. के खिलाफ आज भी लिखूंगा। दरअसल हमारे यहां एक चलन है। जिस पर आप भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा सकते, उसे जातिवादी कह देना आसान होता है।

बिहार सरकार के वार्षिक बजट का बढ़ता आकार

2005-06---- 26 हजार 328 करोड़ रुपए
2018-19----1 लाख 76 हजार करोड़ रुपए