शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

यू.पी. में मद्य तस्करों की शामत

उत्तर प्रदेश में शराब के अवैध धंधेबाजों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और गैंगेस्टर एक्ट के तहत कड़ाई से कार्रवाई की जाएगी। यू.पी. सरकार ने इस संबंध में सभी जिला प्रशासन को बुधवार को निदेश दे दिए हैं। 

याद रहे कि एन.एस.ए. के तहत शासन जब तक चाहे आरोपी को नजरबंद कर सकता है। शासन को नजरबंदी का आधार बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गैंगेस्टर एक्ट के तहत भी कड़े कदम उठए जा सकते हैं। 

बुधवार, 3 जुलाई 2019

धावा दलों के अलावा रिश्वतखोरों के खिलाफ स्टिंग आपरेशन भी जरूरी


मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डी.जी.पी गुप्तेश्वर पांडेय पुलिस तंत्र को चुस्त करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। बार -बार उच्चस्तरीय बैठकें हो रही हैं। पर इन बैठकों का फील्ड अफसरों पर कम ही असर हो रहा है।

सरकारी योजनाओं की प्रगति और कर्मियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सरकारी धावा दल भी सक्रिय हैं। कर्मी घूस लेते पकड़े भी जा रहे हैं। पर भ्रष्टाचार है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है।

अपने मुख्यमंत्रित्व काल के प्रारंभिक दिनों में नीतीश कुमार ने लोगों से अपील की थी कि वे उन भ्रष्ट सरकारी कर्मियों का स्टिंग आपरेशन करें जिन पर घूस लेने का अक्सर आरोप लगता है। बिहार प्रशासनिक सेवा संघ ने इसका सार्वजनिक रूप से विरोध कर दिया। तर्क था कि इससे प्रशासन में पस्तहिम्मती आएगी।

पर सवाल है कि तब से अब तक प्रशासनिक सेवा संगठनों ने अपने बीच व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए क्या किया ? दूसरी ओर सरकारी दफ्तरों की इस मामले में हालत बिगड़ती ही जा रही है। कुछ अन्य उपाय भी करने होंगे। दरअसल धावा दल के साथ -साथ शासन को चाहिए कि वह स्टिंग आपरेशन भी कराए। यह काम प्रामाणिक एजेंसियों को  सौंपा जा सकता है। या कोई स्वयं करता है तो सरकार उसे अच्छा -खासा इनाम देकर प्रोत्साहित करे।

सूचना देने वालों को इनाम

आज भी आयकर महकमा उन लोगों को भारी इनाम देता है जो कर वंचकों के बारे में जानकारियां देते हैं। सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के शासनकाल में काला धन के बारे में सूचना देने वालों के लिए इनाम देने का प्रावधान था।

सही सूचना देने पर एक बार चंद्रशेखर, जो बाद में प्रधानमंत्री बने, को भी सरकार ने इनाम दिया था। बिहार में कुछ सरकारी कर्मियों के बारे में यह कहा जाता है कि वे आॅफिस आने के लिए वेतन लेते हैं और काम करने के लिए नजराना और शुकराना।

ऐसे ‘नजराना-शुकराना’ वालों के खिलाफ शासन को सूचना मुहैया कराए या फिर स्टिंग आपरेशन का सबूत कोई दे तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह उन्हें इनाम दे। अब तो स्मार्ट फोन अनेक हाथों में रहता है। इसलिए स्टिंग को काम आसान है।

माप-तौल महकमे की निष्क्रियता  

कम माप- तौल की शिकायत पुरानी है। व्यापक है। पर उस अनुपात में प्रशासनिक इंतजाम नहीं है। चूंकि उपभोक्ता तराजू लेकर तो खरीददारी करने जाता नहीं, इसलिए उसका फायदा मुनाफाखोर खूब उठाते रहते हैं।

जिस तरह कुछ महकमों के कामकाज की पड़ताल के लिए बिहार सरकार ने धावा दलों से काम लेना शुरू किया है, उसी तरह कम माप -तौल के मामले में भी उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा होनी ही चाहिए। कई साल हुए। मैंने पटना के न्यू मार्केट से दो किलोग्राम लीची खरीदी। घर आकर तौला तो डेढ़ किलोग्राम ही निकली।

समझदार राहुल गांधी !

कौन कहता है कि राहुल गांधी कभी समझदार नेता नहीं बन सकते !
कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने का राहुल गांधी का निर्णय अत्यंत समझदारी भरा है।

दरअसल वे समझ गए हैं कि जब तक नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी आमने-सामने रहेंगे, तब तक मोदी की बल्ले -बल्ले ही रहेगी। कांग्रेस इसी तरह दुबली होती जाएगी। नतीजतन कांग्रेस के भले के लिए ही राहुल गांधी ने अपना इस्तीफा वापस न लेने का अंतिम निर्णय कर लिया है।

भूली बिसरी याद

आपातकाल में जेपी की गिरफ्तारी का विवरण चंद्रशेखर के शब्दों में --
‘साढ़े तीन बजे भोर में हमारे पास अचानक फोन आया कि जेपी को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंच गई है। हमलोग गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंचे।

जब हम पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में आए तो वे लोग जेपी को अंदर ले गए। मैं साथ जा रहा था तो एक दारोगा ने मुझे रोक दिया। मैं बाहर खड़ा था। उसी समय कोई डी.एस.पी. या डिप्टी कमीश्नर आया। उन्होंने वहां स्थानीय एस.पी. के कान में कुछ कहा। उन्होंने मुझे कहा कि आपसे अलग से बात करना चाहते हैं।

बाहर जाकर उन्होंने कहा कि जेपी के लिए गाड़ी आ गई है। मेरी हिम्मत नहीं होती यह कहने की। आप उनसे कहिए। आपको तो दूसरी जगह जाना है। मैं समझ नहीं पाया। पूछा, क्या मुझ पर भी वारंट है ? उसने कहा, हां, पुलिस आपके घर गई थी।

उसी समय यू.एन.आई. के संवाददाता अरूण कुमार भी आ गए। जेपी से मैंने कहा कि आप तो जाइए आपकी गाड़ी आ गई है। मुझे दूसरी जगह जाना है। उन्होंने पूछा, आप भी गिरफ्तार हैं ? मैंने कहा, हां, तभी उन्होंने थाने से निकलते हुए कहा, ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि।’

और अंत में

भारतीय महिलाएं औसतन रोज छह घंटे घर के काम करती हैं। यह चीन की महिलाओं से 40 प्रतिशत अधिक है।

(28 जून 2019 को प्रभात खबर-बिहार- में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम कानोंकान से)


सिर का तो इलाज तो संभव ही नहीं

गत लोकसभा चुनाव में पराजित कुछ राजनीतिक दलों के मर्ज तो उनके सिर में है।

पर वे अपने पैरों का इलाज करने का नाटक कर रहे हैं। क्योंकि सिर का तो इलाज तो संभव ही नहीं है।

सिर्फ बातें ही नहीं, कार्रवाई भी तो हो !


मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक आकाश विजयवर्गीय के बैट कांड पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मेादी ने कहा है कि ‘वह किसी का भी बेटा हो .....घमंड और दुर्व्यवहार बर्दाश्त नहीं, सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, एक विधायक कम होगा तो क्या हो जाएगा ?’

इससे पहले गत 17 मई को प्रधानमंत्री ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बारे में भी ऐसी ही टिप्पणी की थी। तब साध्वी प्रज्ञा ने नाथूराम गोड्से को ट्रू पेट्रिएट कहा था। उस पर प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं साध्वी प्रज्ञा को कभी दिल से माफ नहीं कर पाऊंगा।

प्रधानमंत्री जी, आपकी बातें तो अच्छी हैं। पर ऐसे लोगों पर कार्रवाई कब होगी ?

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

मीडिया खुशवंत सिंह के जमाने में


हिंदी साप्ताहिक ‘आउटलुक’-17 अक्तूबर 2005

आउटलुक--तो दिक्कत कहां हुई ?

खुशवंत-..........सत्ता इंदिरा गांधी से मोरारजी के हाथों में आ गई।

उन्होंने जैनों से निश्चित रूप से मुझे बाहर निकालने के लिए संकेत किया क्योंकि मैं श्रीमती गांधी का समर्थन कर रहा था।

(याद रहे कि खुशवंत सिंह तब इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया के संपादक थे।)

आउटलुक - आप श्रीमती गांधी के इतना करीब कैसे आए ?

खुशवंत- इंदिरा मुझे पसंद करने लगीं क्योंकि मैं संजय का समर्थन कर रहा था।

भारत में ‘इस्लामिक स्टेट’ का प्रोविंस


झारखंड में हिंसक भीड़ ने तबरेज को मार डाला। उस घटना की निंदा हुई। निंदा होनी ही चाहिए।

पर, जो लोग तबरेज की हत्या की निंदा करते नहीं थकते, उन्होंने इस बात पर कभी चिंता जाहिर नहीं की कि ‘इस्लामिक स्टेट’ ने भारत में अपना ‘प्रोविंस’ बना लिया है।

प्रोविंस यानी प्रांत बनाने वाली खबर 12 मई 2019 के ‘हिन्दू’ में छपी है। इस बीच भारत में आई.एस. की अन्य हिंसक गतिविधियों की भी खबरें छपती रहती हैं।

पर एक अपराधी की लिंचिंग की चिंता तो उन्हें बहुत है, पर आई.एस. तथा इस तरह के अन्य देशद्रोही संगठनों की गतिविधियों की कोई चिंता नहीं है जो लोग हथियारों के बल पर इस देश को इस्लामिक देश के रूप में बदल देना चाहता है। ऐसा वे घोषित भी करते हैं।

इसका क्या अर्थ लगाया जाए ! ?

सोमवार, 1 जुलाई 2019

लोकतंत्र का एक चेहरा यह भी !

गत लोकसभा चुनाव के दौरान, खासकर टिकट वितरण के समय एक चर्चा आम थी। हालांकि ऑफ द रिकॉर्ड ही सही, पर कई प्रमुख लोग यह कहते सुने गए थे कि टिकट बेचे -खरीदे जा रहे हैं।

वैसे तो देश के कुछ दूसरे हिस्सों से बेचने-खरीदने की खबरें पहले से भी आती रही थी, पर इस बार बिहार भी इसमें पीछे नहीं रहा। हालांकि चर्चा को यदि सही मानें तो टिकट खरीदने वाले लगभग अधिकतर उम्मीदवार चुनाव हार गए।

हां, इसमें मीडिया की एक खास भूमिका हो सकती थी। स्टिंग आपरेशन करके कुछ खरीदने-बेचने वालों के बारे में आम लोगों को बताना चाहिए था। पर, यह काम नहीं हो सका।

खैर, कोई बात नहीं, इस बार नहीं तो अगली बार सही। यदि यह प्रचलन सचमुच जारी है तो अगले चुनाव में भी तो जारी ही रहेगा।