बुधवार, 21 अगस्त 2019

आइडिया आॅफ इंडिया बनाम जेहाद
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जब ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ के झंडावरदार लोग प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से जेहादियों के साथ हो जाएंगे तो आम जनता क्या करेगी ?
वही करेगी जो काम आज कर रही है।
पर,दूसरी ओर कुछ लोग कह रहे हैं कि जनता 
इडिएट है।राष्ट्रवादी है।हिन्दूवादी है।
  देश की एकता खतरे में है।
1962,1965 और 1971 की लड़ाइयों के समय भी इस देश की 
अधिकतर जनता में वैसी ही भावना पैदा हुई थी जैसी भावना 
‘पुलवामा बनाम बालाकोट’ के बाद पैदा हुई।
पर, तब तो किसी ने जनता पर हिन्दूवादी होने का आरोप  नहीं लगाया । तब भी नहीं लगाया जब  इंदिरा गांधी को दुर्गा कह दिया गया।
   दरअसल तब और अब में फर्क यह है कि तब प्रतिपक्ष सहित लगभग सारा देश युद्ध लड़ने वाली सेना और सरकार के साथ थी।
 और आज ?
देख ही रहे हैं कि आज क्या हो रहा है !
सिर्फ मध्य युग की कलंक कथाएं याद आ रही हैं।

मंगलवार, 20 अगस्त 2019


इमरजेंसी में डाॅ.मिश्र ने बिहार में भूमि 
सुधार की दिशा में करवाये  थे अच्छे काम 
      -- सुरेंद्र किशोर-- 
सन् 1996 के प्रारंभ में कुछ ही सप्ताह पहले चारा घोटाले को बोफर्स और हवाला का ‘ग्रेट ग्रैंड फादर’ करार देने वाले 
डा.जगन्नाथ मिश्र बाद में खुद भी इस घोटाले के आरोपी बन गए थे।
बाद में रांची लोअर कोर्ट से सजायाफ्ता भी हुए।
इसे विडंबना ही कह सकते हैं।
  3 फरवरी 1996 को डा.मिश्र जब यह बात संवाददाताओं को बता रहे थे,तब उन्हें अपने बारे में इसकी कोई आशंका ही नहीं थी।
वे संभवतः यह समझ रहे थे कि चारा घोटालेबाजों से  जितना भी और जैसा उनका ‘संपर्क’ रहा,वह एक आम राजनीतिक चलन मान कर नजरअंदाज कर दिया जाएगा।
  पर, ऐसा नहीं हो सका।उन्हें लंबी जेल यात्राएं भी करनी पड़ी।
  गंभीर बीमारी के आधार पर ही उन्हें जमानत मिली थी।
बीमारी अंततः जानलेवा साबित हुई।
जब डा. मिश्र को जमानत मिली थी तो कुछ लोगों ने यह सवाल उठाया था कि एक ही केस में लालू प्रसाद भीतर 
और मिश्र बाहर क्यों ?
कम से कम वैसे दिलजले लोगों को अब समझ में आ जाना चाहिए कि मिश्र को जमानत देने का अदालत का निर्णय कितना सही था। 
पर, डा.मिश्र के राजनीतिक जीवन का सिर्फ यही एक पक्ष नहीं है।
 उन्होंने दशकों तक बिहार की राजनीति को प्रभावित किया।
सकारात्मक ढंग से भी और नकारात्मक तरीके से भी।
  दरअसल उन्हें अपने अग्रज,स्वतंत्रता सेनानी  व दिग्गज कांगे्रेसी नेता दिवंगत ललित नारायण मिश्र की लगभग पूरी  राजनीतिक विरासत मिल गई थी।
 ललित बाबू स्वतंत्रता सेनानी परिवार से थे।खुद प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे । ललित बाबू ने केंद्रीय मंत्री के रूप में बिहार खास कर उत्तर बिहार के विकास के लिए महत्वपूर्ण काम किए थे।
  ललित बाबू की 1975 की जनवरी में हत्या के  बाद राजनीतिक क्षतिपूत्र्ति के तौर पर 1975 में ही डा.मिश्र को मुख्य मंत्री बनाया गया था।उससे पहले वे बिहार के सिंचाई मंत्री थे।
वे 1977 तक मुख्य मंत्री उस पद पर रहे।
इस बीच देश में इमरजेंसी लग गयी थी।
 आपातकाल ज्यादतियों का दौर था।
बिहार भी उससे अछूता नहीं रहा।
पर डा.मिश्र के कार्यकाल में भूमि सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम भी हुए।खास कर हदबंदी से फाजिल जमीन निकालने के सिलसिले में। 
इमरजेंसी की ज्यादतियों के साथ -साथ भूमि सुधार के कारण भी अनेक भूमिपति कांग्रेस से सख्त नाराज थे।
उनमें से कुछ ने मुझे यह बात बताई भी थी।
  बिहार में 1977 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस सारी सीटें हार गईं।पर 1980 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई।
संजय गांधी की मेहरबानी से डा.मिश्र एक बार फिर 1980 में मुख्य मंत्री बने।
1983 में विवादास्पद परिस्थितियों में उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
तब तक राजीव गांधी का उदय हो चुका था।
1980-83 का डा.मिश्र का कार्यकाल कुल मिलाकर विवादास्पद रहा।
 इस कार्य अवधि में उन पर तरह -तरह के आरोप लगे।हालांकि पटना अरबन कोपरेटिव घोटाले में डा.मिश्र को सुप्रीम कोर्ट से क्लिन चिट मिल गई।
 कांग्रेस के भीतर की एक मजबूत लाॅबी डा.मिश्र के खिलाफ थी।
पटना के स्थानीय अखबार समूह से उनकी ठन गई।मिश्र सरकार ने प्रेस को कंट्रोल करने के लिए विवादास्पद प्रेस बिल लाया।वह एक कलंकपूर्ण अध्याय  था।
  प्रेस बिल के खिलाफ बिहार सहित पूरे देश में पत्रकारों का आंदोलन चला।
अंततः उन्हें बिहार प्रेस बिल वापस लेना पड़ा।
प्रेस बिल तो वापस हो गया,पर मीडिया से डा.मिश्र का पहले जैसा मधुर संबंध नहीं रहा।
1983 में उन्हें मुख्य मंत्री पद छोड़ने के लिए हाईकमान ने बाध्य कर दिया।
  उससे कांग्रेस से असंतुष्ट होकर उन्होंने पार्टी छोड़ दी ।तब उनके समर्थकों की  अपनी अच्छी -खासी जमात थी।फिर भी उनकी पार्टी नहीं चली।
फिर कांग्रेस में गए।केंद्र में मंत्री भी बने।
पर चारा घोटाले ने उनके कैरियर पर विराम लगा दिया।
इसके बावजूद जदयू ने उन्हें अपने दल में मिलाकर उनके पुत्र को बिहार में मंत्री बना दिया था।
ऐसा उनके समर्थकों की अच्छी -खासी संख्या के कारण ही संभव हुआ। 
  डा.मिश्र जैसे एक विवादास्पद नेता को जदयू में मिलाने पर जब प्रश्न चिन्ह लगाया गया तो जदयू ने कहा कि डा.साहब के मिथिला के हर विधान सभा क्षेत्र में चार-पांच हजार ठोस समर्थक हैं।वे राजग को काम आएंगे।वे काम आए भी और 2005 में बिहार में राजग सत्ता में आ गया।
---20 अगस्त 2019 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित।

पद्मा सचदेव की अधूरी आस
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सन 1982 में शेख अब्दुल्ला के निधन के बाद पद्मा सचदेव ने धर्मयुग में उन पर लंबा लेख लिखा था।
उसकी कुछ पंक्तियां यहां प्रस्तुत हैं।
‘ मेरे मन में एक अरमान था।
महाराजा के जमाने का बना यह कानून कि रियासत के बाहर ब्याही लड़कियों को अपने मैके में दो गज जमीन खरीदने का भी हक न होगा,किसी रोज शेख साहब खत्म कर देंगे।
और मैं शिवालिक की अपनी पहाडि़यों पर एक घर बना सकूंगी।
मैंने सुना है,बेग साहब ने इस पर कुछ आवाज भी उठाई थी।
पर कुछ न हुआ।
मुझे याद आ रहा है कश्मीरी के शायर गुलाम रसूल आजाद का कलाम,
काबुक निशान थोमुत,
बुतखान त्सेई बनोभुत,
गीताई क्या खता कोर,
बनतम कुरान वाले ।
 इसका अर्थ है--‘काबा का निशां रक्खा,बुतखाना भी तुमने बनाया।गीता ने क्या खता की है,कुरान वाले ये तो बताओ।’
यह सवाल कभी मैं जिससे करना चाहती थी ,आज वह चला गया है।’
--धर्मयुग-19 सितंबर 1982
---याद रहे कि जम्मू में जन्मी पद्मा की शादी बाहर  हुई--




सोमवार, 19 अगस्त 2019

दिवंगत डा.जगन्नाथ मिश्र की याद में 
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डा.जगन्नाथ मिश्र ने बिहार में राजनीति व प्रशासन को लंबे 
समय तक सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ढंग से प्रभावित किया।
उनकी वे सब कहानियों देर -सवेर कही ही जाएंगी।
  पर मैं संक्षेप में उनसे जुड़ी हुई एक छोटी सी कहानी आज कहूूूूूूूूूूूूूूूूूूूंगा।
  मैंने पाया कि डा.मिश्र आम तौर पर पत्रकारों से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं पालते थे।
यदि कोई अपवाद है तो मैं नहीं जानता।
हां, इंडियन नेशन समूह से उनकी जरूर ठन गई थी।
उनका प्रेस बिल एक काला अध्याय था।
पर वह समूह की बात अधिक थी,व्यक्ति की कम ।
 मुख्य मंत्री के रूप में उनके अच्छे -बुरे कामों -निर्णयों के बारे में मैं बराबर लिखा करता था।
  विरोध वाली रपटों पर वे व उनके कुछ खास समर्थक बहुत नाराज रहते थे।
खुद डा.मिश्र ने कोशिश की थी कि दैनिक आज
का प्रबंधन मेरा पटना से कहीं बाहर तबादला कर दे।
पर ‘आज’ने मुख्य मंत्री की बात नहीं मानी।
इसको लेकर आज प्रबंधन का शुक्रगुजार रहा हूं।
सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर कोई अखबार जल्दी मुख्य मंत्री की बात नहीं टालता।
एक अन्य सत्ताधारी नेता ने तो बाद के वर्षों में अखबारों से एकाधिक पत्रकारों को नौकरी से ही निकलवा दिया था।
  इस पृष्ठभूमि में जगन्नाथ जी उदार लगे  थे।वे सिर्फ तबादला चाहते थे।खैर इस बीच जनसत्ता में मेरी नौकरी हो गई और ‘आज’ प्रबंधन का मानसिक बोझ समाप्त हो गया।
  पर जब डा.मिश्र ने अपना दैनिक ‘पाटलिपुत्र टाइम्स’ निकाला तो उन्होंने सी.पी.आई.के एम.एल.सी. सह पत्रकार सह डा.मिश्र के  मौसरे भाई चंद्र मोहन मिश्र से कहा कि आप जनसत्ता वाले से पूछिए कि क्या वह पाटलिपुत्र में काम करेगा ?
  चंद्र मोहन जी के यहां मैं अक्सर जाया करता था।मिलने पर उन्होंने मुझसे कहा कि मैंने जगन्नाथ जी को तो जवाब दे दिया है कि जनसत्ता छोड़कर वह आपके यंहा क्यों आएगा,फिर भी मैं आपसे पूछ रहा हूं कि आप पाटलिपुत्र ज्वाइन करिएगा ?
मैंने कहा कि आपने जगन्नाथ जी को ठीक ही कहा था।दरअसल मेरा अनुभव रहा है कि अखबार के ‘नेता मालिक’ की अपेक्षा ‘व्यापारी मालिक’ बेहतर होते हैं।
  वैसे मुझे जगन्नाथ जी की इस उदारता पर सुखद आश्चर्य हुआ कि जिस पत्रकार ने उनकी इतनी नींद हराम की थी,उसके प्रति कोई कटुता नहीं !!?

  

 अच्छे व्यक्तियों  की, चाहे उनमें कोई अपनी जाति का भी क्यों न हो,तारीफ करना और उनकी मदद करना जातिवाद नहीं है।
हां, वह जातिवाद जरूर है जब आप अपनी जाति के माफिया या भ्रष्ट की भी मदद और वकालत करने लगते हैं।

रविवार, 18 अगस्त 2019

 भ्रष्टाचार--पहला कदम तो उठाए 
सरकार !---- सुरेंद्र किशोर 
2014 में लाल किले से अपने पहले संबोधन में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मैं ‘न तो खुद खाऊंगा और न किसी को खाने दूंगा।’
  पर, इस 15 अगस्त को उन्हंे यह कहना पड़ा कि भ्रष्टाचार से सरकार के साथ- साथ हर व्यक्ति को हर स्तर पर लड़ना होगा।क्योंकि यह दीमक की तरह लग गया है और मर्ज गहरा और व्यापक है।
  ताजा टिप्पणी उनके पांच साल के अनुभवों का परिणाम है।
उन्होंने बिलकुल ठीक कहा है कि इस दीमक से हर व्यक्ति को हर स्तर पर लड़ना चाहिए।
 पर खुद सरकार इस संबंध में जो कुछ कर सकती है, पहले वह काम तो करे।
साधारण उपचारों से काम नहीं चल रहा है तो वह भ्रष्टाचार पर भी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करना ही पड़ेगा।
  इस देश के भ्रष्टाचार पर समय- समय पर अनेक बड़े नेता कुछ न कुछ कड़ी बातें बोलते रहे हैं,पर जब कुछ करने का अवसर आता है तो वे उसी व्यवस्था के अंग बन जाते हैं।
या फिर व्यवस्था उन्हें अपने में समेट लेती है।
खुशी की बात है कि भ्रष्टाचार की  व्यवस्था ने नरेंद्र मोदी को अब तक  अपने -आप में समाहित नहीं किया है।
1998 में मन मोहन सिंह ने कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’
    प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के तत्काल बाद कहा था कि कालाबाजारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका देना चाहिए।
प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने 100 पैसे से 85 पैसे के बिचैलियों के पास चले जाने की हकीकत का रहस्योद््घाटन किया।
 हां,इंदिरा गांधी ने जरूर किसी तरह की कार्रवाई की घोषणा का  दिखावा नहीं किया।
उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार तो विश्वव्यापी समस्या है,यह सिर्फ इसी देश में थोड़े ही है।
  हां,नरेंद्र मोदी की बातों और उनके कर्मों से यह लगता है कि वे भ्रष्टाचार से उसी तरह लड़ना चाहते हैं जिस तरह आतंकवाद से।
  वैसे भी यह आतंकवाद से कम खतरनाक है भी नहीं भ्रष्टाचार ।
भ्रष्टाचार से निर्णायक लड़ाई की शुरूआत मोदी सरकार दो -तीन प्रारंभिक कदमों के साथ कर सकती है,यदि वह इस सांड को उसकी सींग से पकड़ना चाहती है तो।
 पहले कदम के रूप में  सांसद क्षेत्र विकास फंड को तत्काल बंद कर देना चाहिए।
यह फंड , ‘भ्रष्टाचार के रावण’ की नाभि का अमृत कुंड बन चुका है।
जानकार लोग बताते हैं कि इस फंड में से 40 से 50 प्रतिशत राशि कमीशन खोरी में चली जाती है।
सभी सांसद या अफसर तो रिश्वत नहीं लेते।पर अधिकतर लेते हैं।इस मद में रिश्वतखोरी के आरोप में एक सांसद की सदस्यता भी जा चुकी है।स्टिंग आपरेशन में फंसे थे।
अनेक आई.ए.एस.अफसरों को अपने सेवा काल के प्रारंभिक वर्षों में ही सासंद फंड ‘चखने’ का अवसर मिल जाता है। वैसी लत सेवाकाल के आखिरी वर्षों तक बनी रहती है।
आगे जाकर वे क्या -क्या गुल खिलाते रहते हैं,उसका सीधा अनुभव प्रधान मंत्री को मिल रहा  है।
  नब्बे के दशक में प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव को हर्षद मेहता से एक करोड़ रुपए घूस लेने का आरोप लगा था।
उसी राव साहब ने 1993 में इस फंड को शुरू करके पूरी राजनीति को ही गंदा बना देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उनकी नाक कटी तो उन्होंने अधिकतर की नाक कटवा देने की भूमिका तैयार कर दी।
सांसद फंड को   सांसदों के दबाव के कारण तब से किसी भी प्रधान मंत्री को बंद करने की हिम्मत नहीं हुई।पर यदि है तो यह हिम्मत सिर्फ नरेंद्र मोदी में है,ऐसा अनेक लोग  महसूस कर रहे हैं।
  मोदी जी इस  नाभि पर वार किए बिना रावण को कत्तई नहीं मार सकेंगे ! 
   नब्बे के दशक में एन.सी.सक्सेना केंंद्र सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के सचिव थे।
उन्होंने कहा था कि इस देश के भ्रष्टाचार में जोखिम कम और लाभ ज्यादा है।इसीलिए वह नहीं रुक रहा है।
वर्मा अपने सेवाकाल में डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम यानी बैंक खाताओं में सीधे पैसे भेजने पर सबसे अधिक जोर देते थे।
  अब सवाल है कि भ्रष्टाचार को अधिक जोखिम और कम लाभ का धंधा कैसे बनाया जाए।
 यह काम तो सरकार ही कर सकती है।
भ्रष्टाचार के लिए फंासी की सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए।
क्योंकि भ्रष्टाचार के कारण लोगों की जानें भी जाती रहती हैं।
अमीर देशों में भ्रष्टाचार लोगों की सुख सुविधा में थोड़ी कमी कर देता है,पर हमारे यहां तो जान ही ले लेता है।
इस देश में शायद ही कोई खाद्य या भोज्य पदार्थ हो जिसमें मिलावट नहीं है।
 दवाओं की मिलावट सीधे -सीधे जान ले लेती है।
हां,सिर्फ जहर में मिलावट जान बचा लेती है।
 रिश्वत लेकर संबंधित पदाधिकारी मिलावट की छूट दे देते हैं।
निचले स्तर के घूसखोर कर्मियों को ऊपर के अफसर बचा लेते हैं।
  यानी जब घूसखोरी से जान जाती हो तो इसके कसूरवार को फांसी की सजा क्यों नहीं ?
भ्रष्टाचार बढ़ने या फिर बने रहने का एक बड़ा कारण यह है कि बड़े अफसरों के खिलाफ अभियोजन की शुरूआत करने की जल्दी अनुमति नहीं मिलती।
इस स्थिति को बदलने का काम तो प्रधान मंत्री ही कर सकते हैं।
 कुछ साल पहले लोक सभा के 10 और राज्य सभा के एक सदस्य की सदस्यता चली गई थी।सदस्यता संसद ने ही ली।उन पर घूसखोरी के आरोप थे।आरोप साबित हो गया।
टी.वी.चैनल के स्टिंग आपरेशन में वे पकड़े गए थे।
 पर सवाल है कि सिर्फ सांसदों तक  ही ऐसी कार्रवाई क्यों सीमित रहे ?
स्टिंग आपरेशन को कानूनी मान्यता भी मिले।
यदि फोरेंसिक जांच से वीडियो कसैट सही साबित हो जाए तो उसे अदालत में भी  सबूत माना जाए,ऐसी कानूनी व्यवस्था हो।इससे कानून व्यवस्था भी बेहतर होगी।
इससे माॅब लिंचिंग  को कम करने में भी सुविधा होगी।
भ्रष्ट सरकारी अफसरों के खिलाफ ऐसे सफल स्टिंग आपरेशन करने वालों को सरकार भारी इनाम दे।
  ऐसे व इस तरह के दूसरे उपायों को पहले खुद सरकार अपनाए।फिर तो भ्रष्ट लोगों के खिलाफ अभियान चलाने के लिए आम लोग भी उत्साहित होंगे।
  अभी तो अनेक लोगों को यह लगता है कि भ्रष्टाचार कम  होेने वाला है नहीं।
इस धारणा को सरकार पहले खत्म करने का ठोस उपाय करे।एम.पी.फंड की समाप्ति के साथ सरकार का पहला कदम उठे।
- 18 अगस्त 2019 के हस्तक्षेप-राष्ट्रीय सहारा मंें प्रकाशित। 
   
    


शनिवार, 17 अगस्त 2019

इतने भारत रत्नों के बावजूद अपना देश गरीब क्यों ?
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सौ एकड़ में से 85 एकड़ जमीन बेच कर खा 
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जाने वाले किसी किसान पुत्र को यदि ‘पुत्र रत्न’ नहीं कहा
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जा सकता तो सौ सरकारी पैसों को घिसकर 15 पैसे कर देने 
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वालों को ‘भारत रत्न’ कैसे कहा जाएगा ?
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1954 से 1983 तक 8 गणमान्य व्यक्ति ‘भारत रत्न’
 से सम्मानित किए जा चुके थे।
  अब तो उनकी संख्या 50 पहुंचने वाली है।
  यदि किसी किसान का बेटा अपनी 100 एकड़ पुश्तैनी जमीन में से 85 एकड़  बेच कर खाए तो क्या उसे ‘पुत्र रत्न’ कहा जा सकता है ?
  1985 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि हम दिल्ली से 100 पैसे भेजते हैं ,पर गांवों तक उसमें से सिर्फ
15 पैसे ही पहुंच पाते हैं।
  पता नहीं कि आज एक रुपया गांव पहुंचते- पहुंचते कितना घिस चुका होता है।
यह निष्पक्ष जांच का विषय है।
 फिर भी ‘भारत रत्नों’ की संख्या बढ़ती ही जा रही है।
याद रहे कि संविधान निर्माता ऐसे ‘सम्मान’ के सख्त खिलाफ थे। 
संविधान सभा में हृदय नाथ कंुजरू ने कहा था कि ‘पुरस्कारों द्वारा समाज को छोटे -बड़े में बांटने की प्रक्रिया शुरू होगी।
बाद में इन पुरस्कारों का राजनीतिकरण होगा।’
पर, जिन्हें लेना था,उन्होंने बाद में इसका प्रावधान कर ही दिया।
यानी, संविधान की भावना पर वह संभवतः पहली चोट थी।
    सबसे घटिया है इन पद्म सम्मानों का भोंड़ा प्रदर्शन।
नियम है कि पद्म सम्मानों से सम्मानित कोई व्यक्ति इसे अपने नाम के आगे या पीछे नहीं जोड़ सकता।
इसका कोई अन्य तरह से भी इस्तेमाल नहीं कर सकता।
फिर भी देश में इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल होता रहता है।
लोग अपने मकान के गेट पर अपने नेम प्लेट में तथा अपने लेटरहेड में भी लिखवा लेते हैं।
  अब तक दक्षिण भारत के दो फिल्मी अभिनेताओं के अलावा किसी अन्य को इसके दुरुपयोग के कारण दंडित किया गया है, यह मुझे नहीं मालूम।
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पुश्नचः
यदि आपका रसोइया 100 में 85 रोटियां जला दे तो क्या
आप फिर भी उसे अपना नौकर रखेंगे और पुरस्कार भी देंगे ?