शनिवार, 24 अगस्त 2019

सोनिया गांधी का यह दावा गलत है कि ‘राजीव सरकार
 ने किसी को डराने की कोशिश नहीं की थी’
.................................................................................................................
    सोनिया गांधी ने हाल में कहा है कि राजीव गांधी को 1984 में पूर्ण बहुमत मिला था।
लेकिन उन्होंेने उसका इस्तेमाल डर का माहौल बनाने और धमकाने के लिए नहीं किया था।
पी.चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई के बाद 22 अगस्त को सोनिया गांधी ने यह बयान दिया ।
उनका आशय यह था कि मोदी सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों को डरा रही है।
मेरा मानना है कि इस देश में न्यायालय स्वतंत्र है।
इसलिए किसी निर्दोष व्यक्ति को डरने की कोई जरूरत ही नहीं।
इस देश का ऐसा कोई मामला मैं नहीं जानता जिसमें किसी बड़े नेता को
फंसा कर अदालत से सजा दिलवा दी गई हो।
      औरों की बात कौन कहे ,राजीव सरकार ने तो तब एक बड़े मीडिया हाउस को ही डराने की कोशिश कर दी थी।
केंद्र सरकार  के वित्त मंत्रालय के 400 अफसरों व कर्मचारियों  ने तब देश भर में फैले इंडियन एक्सप्र्रेस के सभी 11 दफ्तरों पर एक साथ छापा मारा था।
 इस पर राजीव गांधी ने कहा था कि यदि प्रेस को स्वतंत्रता हासिल है जांच एजेंसियों को भी स्वतंत्रता है।
  यह कहा गया था कि एक्सप्रेस पर जिस तरह की आर्थिक गड़बडि़यों का आरोप लगाया गया था, वैसे मामूली आरोप तो अधिकतर व्यापारियों पर लगते रहे हैं।
अधिकतर अखबारों के मालिक व्यापारी ही होते हैं।
पर तब कार्रवाई सिर्फ एक्सप्रेस पर ही हुई थी।क्योंकि उसने राजीव सरकार के भ्रष्टाचारों का भंड़ाफोड़ करना शुरू कर दिया था।
छापेमारी की उस घटना पर पूर्व प्रधान मंत्री मोराजी देसाई ने कहा था कि भले सरकार इस छापेमारी का औचित्य सिद्ध करने की कोशिश करे,पर लोग उस पर विश्वास नहीं करेंगे।यह प्रेस की स्वतंत्रता पर ही हमला है।
  याद रहे कि मोरारजी आम तौर पर ऐसे बयान नहीं दिया करते थे।
उस छापेमारी की व्यापक निंदा हुई थी।यहां तक प्रतिद्वंद्वी अखबारों के संपादकों ने भी छापेमारी की आलोचना की थी।
 एक्सप्रेस के अरूण शौरी ने कहा था कि  अखबार की संपादकीय नीतियों को प्रभावित करने के लिए देश व्यापी छापेमारियां की  गर्इं।
याद रहे कि एक्सप्रेस समूह के अखबार राजीव गांधी सरकार के खिलाफ घोटालों के आरोपों की खबरें विस्तार से छाप रहा था।उस पर सरकार सख्त नाराज थी।मैं भी उन दिनों एक्सप्रेस समूह के दैनिक अखबार जनसत्ता से जुड़ा था।
इतना ही नहीं,राजीव सरकार से विद्रोह करके अलग हुए वी.पी.सिंह के पुत्र अजेय सिंह को बदनाम करने के लिए सेंट किट्स में उनके नाम से जाली बैंक खाता खोलवा दिया गया और उसमें पैसे जमा करवा दिए।
 जाली  बैंक खाता खोलवाने में केंद्र सरकार के मंत्री और अफसर के हाथ थे।इसके अलावा भी लोक सभा में 404 सीटें पाई राजीव सरकार ने इस तरह के और भी कई कारनामे किए।
 कई कारणों से राजीव सरकार बदनाम हुई । नतीजतन 1989 के लोस चुनाव में कांग्रेस को  बहुमत तक नहीं मिला।
दरअसल ऐसे बयान देने से पहले नेता लोग यह सोचते हैं कि जनता की स्मरण शक्ति कमजोर होती है।
दूसरी बात ।यह अस्सी के दशक की बात है।
तब से कई दशक बीत चुके हैं।
नई पीढि़यां आ चुकी हैं।
वे शायद सोनिया जी की बातों पर विश्वास कर लेंगी।
इसीलिए मैंने इसे लिख दिया।
हालांकि ऐसा बयान देने का आरोप सिर्फ एक ही पार्टी 
पर नहीं लग सकता।अन्य कई दल भी दूध के धुले नहीं हैं।वे भी यदाकदा लोगों की क्षीण स्मरण शक्ति का लाभ उठाने की कोशिश करते रहते हैं।



शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

इतिहास के पन्नों से --3
-------------------
जब जेपी को मिला रेमान मैगसेसाय पुरस्कार
  सुरेंद्र किशोर
‘‘जय प्रकाश नारायण आधुनिक भारत में जन चेतना की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं।
उनमें यह देख और कह सकने का साहस रहा है कि 
स्वाधीनता ,राष्ट्रीयता और समाजवाद जैसी संस्थाएं इंसान की बिलकुल बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में अपने आप में पर्याप्त नहीं है।
  जब दफ्तरशाही ,सत्ता के केंद्रीकरण और गलत व्याख्या के कारण ,ये अत्याचार की सहचरियां बन जाती हैं तब इनमें कोई सार नहीं रहता।
इसीलिए जयप्रकाश नारायण व्यक्ति को उसकी मुक्तिकांक्षा और समानता -साधना को सर्वोपरि मानते हैं।’’
जय प्रकाश नारायण को जन सेवा के लिए मैगसेसाय पुरस्कार प्रदान करते हुए उनकी प्रशस्ति में उपर्युक्त बातेें कही गई थीं।
   1965 में उन्हें  मिला   पुरस्कार लगभग 50 हजार रुपए का था।
 कहीं मैंने पढ़ा था कि इसके सूद के पैसे  जेपी के निजी
खर्च में लगते थे।
  मैगसेसाय मिलने पर ‘दिनमान’ ने लिखा था  कि 
‘ जवाहरलाल नेहरू के बाद भारतीय राजनीति में सर्वाधिक प्रभावशाली जय प्रकाश नारायण का जन्म 1902 में बिहार के सारण जिले के सिताब दियारा में हुआ था।
@याद रहे कि सिताब दियारा का वह टोला बाद में उत्तर प्रदेश में चला गया।हालांकि जेपी पटना में रहते थे।गांव की उनकी खेती की देखभाल उनके विश्वस्त जगदीश सिंह करते थे@
मैट्रिक के बाद महात्मा गांधी के प्रभाव में आकर जेपी ने पढ़ाई छोड़ दी।
1922 में अपनी पढ़ाई आगे चलाने के लिए वे अमेरिका गये।
उन्होंने वहां सात वर्ष तक कैलीफोर्निया,विसकांसिन और कोलम्बिया विश्व विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की।
समाजशास्त्र की ड्रिग्री लेकर स्वदेश लौटे।
1934 में उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही  कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाई।
 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का संचालन किया।अपने विद्रोही साहसी व्यक्तित्व के कारण वे राजनीति में जन नायक के रूप में आये।
 आजादी के बाद अपनी सिद्धांतप्रियता के कारण वह राजनीति के क्षेत्र में अकेले होते गये और उनके साथ खोये अवसरों का इतिहास जुड़ता गया।
देश के सामने आई हर प्रमुख समस्या का उन्होंने अपने ढंग से निदान दिया।लेकिन उन्हें अल्पमत ही प्राप्त हुआ।
और आज वह सक्रिय राजनीति से दूर एक सर्वोदयी नेता ही माने जाते हैं।







-ग्राउंड फ्लोर पार्किंग के बिना शहरों में जाम की समस्या से निजात नहीं-सुरेंद्र किशोर  
इन दिनों पटना में सड़कों से अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं।
आम लोगों की रोज -रोज की तकलीफें दूर करने की दिशा में यह सराहनीय कदम है।
भले पटना हाईकोर्ट के कड़े निदेश पर ही हो रहा है,पर हो तो रहा है।
इन दिनों सरकार किसी अतिक्रमणकारी की नहीं सुन रही है।
ऐसा ही होना चाहिए।अब सड़कें और भी चैड़ी हांेगी।लोगों का आना-जाना सुगम  होगा।
  पर एक मूल समस्या की ओर प्रशासन का भी ध्यान नहीं है।
वह है ग्राउंड फ्लोर पार्किंग की स्थायी व्यवस्था करने की जरूरत ।
  पटना की मुख्य सड़कों के किनारे बड़े -बडे व्यावसायिक प्रतिष्ठान  तो खडे़ कर दिए गए।
पर उन प्रष्ठिानों के  भूतल पर भी पार्किंग की जगह दुकानें खोल दी गईं हैं।
जबकि नक्शा पास करवाए  गए ग्राउंड फ्लोर पार्किंग के साथ।
  आज भी जो मुख्य मार्गों पर जो व्यावसायिक भवन  खड़े किए जा रहे हैं,उनमें भूतल या भूमिगत पार्किग का कोई प्रावधान नहीं रखा जा रहा है।
ऐसे निर्माणों की देखभाल करने वाली सरकारी एजेंसियों को सच्चे कामों से क्या मतलब ?
उन्हें तो कुछ और से ही मतलब रहता है।
  कुछ महीने पहले पटना की दो मुख्य सड़कों के ग्राउंड फ्लोर पार्किंग रहित भवनों के मालिकों को संबंधित अधिकारी ने नोटिस भेजे थे।कहा था कि आप अपने भवन के निचले हिस्से में पार्किंग स्थल बनवाइए।
पर अब तक तो बनने के कोई संकेत नहीं हैं।
  यदि भूतल या भूमिगत पार्किेग का प्रबंध नहीं होगा तो उससे कोई लाभ स्थायी नहीं होगा।
सड़कों को आप और कितना चैड़ा कीजिएगा ? 
 --एकलौती उपलब्धि--
अस्सी के दशक में पटना के मजहरूल हक पथ यानी फ्रेजर रोड के एक निजी होटल को भूमिगत पार्किंग बनाने के लिए शासन ने बाध्य कर दिया  था।लोगबाग उससे खुश थे।
लगा था कि यह काम आगे भी बढ़ेगा।
अन्य प्रतिष्ठानों के नीचे भी पार्किंग स्थल बनवाने का काम होगा।
पर, वह हो नहीं सका।
पार्किंग की कमी समस्या सिर्फ पटना में  ही नहीं है।
यह बिहार के अन्य शहरों में भी है।पर पहले पटना में तो सुधार हो !
  --लाॅ कालेजों में शिक्षा-परीक्षा का हाल-
हाल में बिहार में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीशों की बहाली हुई।
कुल बारह  उम्मीदवारों का चयन हुआ ।इनमें  बिहार से सिर्फ चार हैं।
इन चार में से भी एक की पढ़ाई दिल्ली लाॅ कालेज में हुई है।
आखिर ऐसा क्यों होता है कि  बाहर के ही अधिकतर  उम्मीदवार चयनित हो जाते हैं ?ऐसा आज ही नहीं हुआ है।वर्षों से ऐसा हो रहा है।
इसका सबसे बड़ा कारण यह  है कि बिहार के  अधिकतर लाॅ कालेजों में शिक्षण-परीक्षण का हाल ठीक नहीं है।
अपवाद स्वरूप ही  बिहार के किन्हीं  लाॅ कालेजों में अच्छी पढ़ाई होती है।
  ऐसे मामले में चिंता प्रकट करने वालों को चाहिए कि वे पहले बिहार के लाॅ कालेजों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई का प्रबंध कराएं।
फिर उम्मीद करें कि बिहार के उम्मीदवार अधिक संख्या में जज बनेंगे।
--चीन की बदलती जनसंख्या नीति--
1949 के बाद यानी कम्युनिस्ट शासन काल में चीन अपनी जनसंख्या नीति में समय- समय पर परिवत्र्तन करता रहा है।
उसकी पहली नीति कार्ल माक्र्स की नीतियों पर आधारित थी।बाद की नीति व्यावहारिक अनुभव के आधार पर।
1949 की क्रांति के बाद चीन ने नारा दिया-‘आबादी,आबादी और आबादी।’
शासन ने  गर्भ निरोधकों पर प्रतिबंध लगा दिया।
याद रहे कि माक्र्स आबादी बढ़ाने  के पक्ष में थे। 
हमारे देश भारत में भी इन दिनों जनसंख्या नियंत्रण पर गंभीर चर्चा शुरू हुई है।
 पता नहीं ,नियंत्रण के लिए हमारी सरकार  कोई नीति बना भी पाएगी भी या नहीं।
चीन में तो तानाशाही है।वहां तो ऐसी नीति लागू करना संभव भी है।
हमारे यहां तो यह बहुत मुश्किल काम है।पर मुश्किल काम को भी देशहित में कई बार करना पड़ता है।
  भारत में तो आए दिन सरकारी निर्णयों को धार्मिक भावना या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ दिया जाता है।
पर जब चीन में वैचारिक कट्टरता थी तभी 1957 में चीन के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि ‘परिवार नियोजन के बिना हम  देश को गरीबी के चंगुल से न तो शीघ्र मुक्त कर सकेंगे न ही समृद्ध और शक्तिशाली बना सकेंगे।’
चीन में तब गर्भ निरोधक बितरित किए गए थे।
 पर उस नीति को  थोड़े ही समय बाद
छोड़  दिया गया।
फिर एक दूसरा दौर भी आया।
1964 में चाउ एन लाई ने कहा कि हमने गर्भ नियंत्रण के तौर -तरीकांे के अध्ययन के लिए लोगों को जापान भेजा है।
चीन ने 1969 में दो बच्चों की नीति बनाई।
1979 में एक बच्चा नीति चली।
1980 में चीन सरकार ने आदेश दिया कि यदि पहली संतान लड़की हो तो दूसरी संतान पैदा की जा सकती है।
2019 की ताजा नीति दो बच्चों की हो गई।
भारत में दो बच्चे की नीति बनाना भी लोहे के चने चबाने जैसा काम होगा।पर कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं।
जहां संसाधन कम और आबादी अधिक हो,उस देश की तरक्की 
तो मुश्किल है ही।
--और अंत में-
1949 में चीन की मुख्य भूमि पर कम्युनिस्टों का आधिपत्य हुआ।
उन दिनों चीन सरकार ने आबादी बढ़ाओ कार्यक्रम चलाया।
उसका एक उद्देश्य यह भी था कि मुख्य भूमि से लोगों को ले जाकर उन्हें तिब्बत में बसाया जाए ताकि वहां जातीय स्थिति का स्वरूप बदले।
1950 में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया और वहां जन मुक्ति सेना के लाखों सैनिकों को बसाया गया।
--कानोंकान-प्रभात खबर-बिहार -23 अगस्त 2019 से।


    




यदि किसी दल या दलीय समूह का शामियाना, घोटालों के ताना और आतंकवाद-समर्थन के बाना से बना हो तो फिर उसमें भारतीय मन कैसे समा सकता है ?

अपने ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ को आगे बढ़ाते हुए 27 जून 1961 को तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मुख्य मंत्रियों को लिखा कि मैं जाति आधारित किसी तरह के आरक्षण खास कर सरकारी नौकरियों में आरक्षण के सख्त खिलाफ हंू।
 पर हाल में छत्तीसगढ़ की कांग्रेसी सरकार ने पिछड़ों के लिए पहले से उपलब्ध  आरक्षण को हाल में दुगुना कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की मुहर के बाद मंडल आरक्षण की अधिसूचना को भी कांग्रेस शासन काल में जारी करनी पड़ी थी।
  यानी नेहरू की कांग्रेस के एक हिस्से ने भी बाद में आरक्षण की जरूरत समझी।
क्योंकि आरक्षण के अभाव में सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के हकों की ‘हत्या’ हो रही थी।
  जवाहरलाल नेहरू ने कभी धारा 370 का समर्थन करके उसका प्रावधान संविधान मंे कराया। 35 ए का प्रावधान भी कराया।
पर, उसी धारा से मिली ‘सुविधा’ का लाभ उठा कर जब मुस्लिम अतिवादियों ने लाखों हिन्दुओं खास कर पंडितों को घाटी से निकाल बाहर किया,उन पर अन्य तरह के जघन्य अपराध किए तो मोदी सरकार ने उसे हटा देने की जरूरत समझी।
उसी धारा की उपस्थिति के कारण कश्मीर को देसी-विदेशी जेहादियों  का अड्डा बना दिया गया और उससे पूरे देश की सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो गया तो  क्या फिर भी उस धारा को नहीं हटाया जाना चाहिए था ?
  कोई कानून,संवैधानिक प्रावधान या नियम समय की जरूरतों को पूरा करने में विफल रहे तो अग्रसोची देश उसे समाप्त कर देते हैं या बदल देते हैं।
  पर अपना देश ?



गुरुवार, 22 अगस्त 2019

22 अगस्त 2019 के दैनिक ‘आज’ की एक रपट
---------------------------
बाइकर्स गैंग के आतंक से खौफजदा हैं शहरवासी
---------------------
     राजनीतिक पार्टियों का संरक्षण
   ..................................................................
‘.............बाइकर्स गैंग को राजनीतिक पार्टियों का संरक्षण प्राप्त  है।पुलिस इन्हें पकड़ कर इनके नाम- पते पूछने  ही लगती  है कि राजनीतिक नेताओं के फोन आने श्ुारू हो जाते हैं।
वे कहते हैं कि बच्चे हैं,पार्टी से जुड़े हैं।गलती की है,इस बार माफ कर दीजिए।
  यही सिलसिला चलते रहता है।
इसका मुख्य कारण यह है कि राजनीतिक पार्टियों को जब मोटर साइकिल रैली निकालनी होती है तो बाइकर्स गंैग के यही लोग रैली में शामिल होते हैं।
  आम लोगों की बात कौन कहे, हाल में पटना में एक रिटायर आई.पी.एस.अफसर और उनके परिजन  बाइकर्स गैंग की हिंसा के शिकार बन गए।
दूसरी घटना के तहत एक हाईकोर्ट जज को बाइकर्स गैंग से बचाने के लिए खुद डी.जीपी को घटनास्थल पर पहुंचना पड़ा।
   ......................................................................................................
 नोट-- कौन कहता है कि बिहार में देर- सवेर जंगल राज की वापसी नहीं हो सकती,यदि राजनेताओं की इसी तरह 
मदद मिलती रहे  ! ! !
    दैनिक आज तो यह भी लिखता है कि ‘रंगदारी से लेकर हत्या तक की सुपारी लेते हैं बाइकर्स गैंग।’

   14 मार्च 2001 
------------
 तहलका कांड पर भाजपा संसदीय दल की बैठक के बाद पार्टी के प्रवक्ता प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा ने मीडिया से कहा था कि ‘बैठक में पार्टी के सांसदों और घटक दलों से कहा गया कि उन्हें इस मामले में रक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है।उन्हें इससे आक्रामक रूप से निपटना होगा।क्योंकि न तो कोई रक्षा सौदा हुआ है और न ही किसी मंत्री पर इसमें शामिल होने का आरोप लगा है।
कुछ दिन में जब सच्चाई सामने आ जाएगी तब पता चल जाएगा कि इसके पीछे कौन सी ताकत है।’
----------
नतीजा--
बंगारू लक्ष्मण को 2012 में चार साल की सश्रम सजा हुई।
भाजपा ने उनकी पत्नी को उनके बदले लोक सभा का उम्मीदवार बना दिया था।
------------------
21 अगस्त 2019
---------
पी.चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई पर 
पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी--
‘पी.चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई एक साजिश है।उनकी छवि खराब करने की कोशिश है।’
........................................................................................
नतीजा- हालांकि भविष्य के गर्भ है।
पर, संकेत बताते हैं कि यदि जांच एजेंसियों ने लगातार ठीक से काम किया तो चिदंबरम को सजा मिलनी तय मानी जा रही है। भले राहुल गांधी जो कहें !
...............................................................................................
दशकों से इस देश की राजनीति देख रहा हूं।इसी तरह चल रही है।
मैंने तो सिर्फ दो उदाहरण दिए हैं।
ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं।
एक नेता के खिलाफ कार्रवाई होती है तो उसके दल का दूसरा  नेता कहता है कि ‘उसी पर क्यों ?’
फलां पर क्यों नहीं ?
कार्रवाई अभी ही क्यों ?
इसमें कोई साजिश है।
बदले की भावना है।
किसी खास जाति या समुदाय का होने के कारण ही 
कार्रवाई हो रही है।
1952 से जितने नेताओं ने देश को लूटा है,सब पर पहले कार्रवाई होनी चाहिए।
 ......................................................................
यानी, मैं चोर तो तू भी तो चोर ! ! !
हमारी पार्टी में अपराधी तो तुम्हारी पार्टी कौन सी दूध की धुली हुई !! ?
................................................................................................
इसी तरह की बेशर्म डायलाॅगबाजी के बीच इस देश की राजनीति चल रही है।
..........................................................................
पर,इस बीच भी कुछ बातें पक्की हैं।
अच्छी हैं।
उम्मीद की किरणें भी मौजूद हैं।
विभिन्न दलों के कुछ नेता ईमानदार हैं।
उनमें से कुछ अत्यंत ईमानदार हैं।
योग्य भी हैं।
वे अपने लिए नहीं ,देश के लिए कुछ करना चाहते हैं।
कर भी रहे हैं।
विभिन्न दलों के कुछ ऐसे नेताओं को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं जो सत्ता में रहे,सत्ता में हैं,पर खुद के लिए या परिवार के लिए कुछ नहीं किया।
किसी का नाम लेना ठीक नहीं।
कुछ नेता तो जान पर खतरा उठा कर भी देश के लिए काम रहे हैं।
............................................................................................
राजनीतिक दलों में भी फर्क है।
कुछ दलों में स्वार्थी कम निःस्वार्र्थी अधिक हैं।
कुछ अन्य दलों में निःस्वार्थी कम और स्वार्थी अधिक हैं।
........................................................................
निःस्वार्थी हल्का शब्द है।
इसका आशय आप चोर,डकैत,घोटालेबाज,हत्यारा,
बलात्कारी,साम्प्रदायिक कुछ भी समझ सकते हैं।
.......................................................................
फिर भी इन्हीं विपरीत परिस्थितियों में  अधिकतर मतदातागण
अपवादों को छोड़ कर अपेक्षाकृत कम भ्रष्ट और कम अपराधी को चुनते रहते  हंै। 
गनीमत है !  
जिस तरह उम्मीद पर दुनिया जिंदा है,
उसी तरह इस देश का लोकतंत्र भी !