बुधवार, 4 सितंबर 2019

कहां दिल्ली का ‘मरद’ दिनेश मदान और कहां दब्बू मैं !



कानून तोड़ने के लिए भी 56 इंच का सीना चाहिए और पास में 23 हजार रुपए भी !
बहुत दिनों बाद एक दिन पटना शहर की ओर गया तो 
सोचा कि 
बिहार विधान मंडल भवन भी हो लूं।
पर,पाॅकेट में हाथ डाला तो झटका लगा।
‘प्रेस पास’ तो घर ही छोड़ आया था।
  नहीं गया।
पता नहीं, कौन कोई नया सुरक्षा प्रहरी मुझे गेट पर ही रोक ले।
1969 से ही बिहार विधान भवन जा रहा हूं।
अनेक नए-पुराने संतरी परिचित हैं।
पर, कोई खतरा मोल नहीं लिया।
 पर, देखिए दिल्ली के दिनेश मदान को !
ड्राइविंग लाइसेंस नहीं।
रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट नहीं।
बीमा नहीं।
हेल्मेट नहीं।
प्रदूषण प्रमाण पत्र भी नहीं।
फिर भी बीच शहर में स्कूटर की सवारी !
मदान जैसे मरद लोग जानते हैं कि यहां ऐसे ही चलता है।
हम ही क्यों ?
अनेक नेता लोग भी तो सत्ता में आते हैं,देश को लूटते हैं।
जेल जाते हैं।
फिर सजामुक्त होकर लौटते हैं।
फिर सत्ता में आ जाते हैं।
जो कमाया,उसमें से थोड़ा बहुत मुकदमेबाजी में लगा।
बाकी देश-विदेश में संचित धन बच ही तो गया।
छवि बचाने के लिए मीडिया में बयान दे दिया कि राजनीतिक बदले की भावना से फंसा दिया गया था।
या किसी खास जाति या धर्म का हूं,
इसलिए जानबूझ कर राजनीतिक विरोधियों द्वारा साजिश से  फंसाया  गया था।
अब दूध का दूध ,पानी का पानी हो गया।
ऐसे देश में दिनेश मदान पर 23 हजार रुपए फाइन ! !
नई बात है।
लगता है कि इन दिनों सुप्रीम कोर्ट से सिपाही तक सक्रिय हैं।

  

राजेंद्र माथुर स्कूल की पत्रकारिता कहती है कि सरकार गलत काम करे तो उसका विरोध करो।पर ,सही काम करे तो उसकी तारीफ करो।
इंडिया टूडे की भी ऐसी ही पत्रकारिता है।
लेकिन कई लोग इससे सहमत नहीं हैं।
इस प्रवृत्ति को राजनीति में भी देखा जा सकता है।
 1962,1965 और 1971 के युद्धों में तब के विपक्ष ने मोटे तौर पर सत्ता व सेना का समर्थन किया।
आज का विपक्ष उससे अलग है।
इसीलिए दुबलाता जा रहा है।



 बेटी भी कहीं पतोहू है
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‘सास भी कभी बहू थी’
यह एक धारावाहिक का नाम है।
पर, यह एक सामाजिक स्लोगन भी बन चुका है।
इसके साथ एक और स्लोगन को जोड़ने की जरुरत है।
‘बेटी भी कहीं पतोहू है’
  दरअसल अनेक मामलों में सास, अपनी पतोहू के साथ वैसा ही व्यवहार नहीं करती जैसा वह अपनी बेटी के साथ करती है।
नतीजतन कई परिवार बिखर रहे हैं।
हालांकि बिखरने के और भी कारण हैं।
पर, एक बड़ा कारण यह भी है।
एक ही शहर में बेटा-पतोहू अलग मुहल्ले में रहते हैं । माता-पिता अलग मुहल्ले मेंं।
  परिणामस्वरुप कई बार बूढ़े व अशक्त मां-बाप अपराधियों या फिर अपने ही नौकर की  हिंसा के शिकार हो जाते हैं।
 आए दिन ऐसी खबरें छपती रहती हैं।
ऐसा पूरे देश में हो रहा है।

वो नहीं जानते कि वो क्या चाहते हैं ! !
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1.-1990 में मंडल आरक्षण पर जब आंदोलन चरम सीमा पर था तो बिहार के एक आरक्षण विरोधी नेता ने मुझसे कहा था कि हम इस देश में एक सवर्ण लैंड की मांग करेंगे।
  उनका ऐसा बयान छपा भी।
क्या वे उस मांग को अब भी दोहरा सकते हैं ? कत्तई नहीं।
वह तो वक्त की गरमी थी।
1.-  1962 के चीन -भारत युद्ध से पहले द्रविड आंदोलन अलग देश की मांग कर रहा था।
 पर, उस युद्ध के कटु अनुभवों के बाद द्रविड नेताओं को लगा कि एक मजबूत केंद्रीयकृत शासन वाले देश के साथ रहने में ही द्रविड़ों की भी भलाई है।
3.-  इन दिनों कश्मीर के कुछ अदूरदर्शी  लोग जेहादी मानसिकता से ग्रस्त हैं।
 वे जेहादी मानसिकता वाले नेताओं -लश्करों से भरे पड़े कुछ  मुस्लिम बहुल देशों की दुर्दशा देख कर भी सबक नहीं ले रहे हैं।
पर एक दिन उन्हें भी यह महसूस होगा कि एक लोकतांत्रिक व विकासशील देश में उनके और उनके बाल -बच्चों के लिए बेहतर भविष्य होगा।
  किसी अज्ञात स्वर्ग की कामना को छोड़ कर वे किसी दिन इसी धरती को स्वर्ग बनाएंगे,ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।
  पाक प्रधान मंत्री इमरान खान भारत पर परमाणु हमले की अपनी धमकी से पलटते हुए अब कहा है कि हम  न्यूक्लीयर बम का पहले इस्तेमाल नहीं करेंगे।
संभवतः उन्हें पाक की अधिकतर जनता की यह राय मिली होगी कि पहले बम फोड़ोगे तो भारत में तो फिर भी एक अरब लोग बच जाएंगे,पर, पाक तो पूरा मटियामेट हो जाएगा।
  यानी पाक के कुछ लोग तो जरूर जेहाद के लिए कर्बान होने को तैयार हैं।पर साथ -साथ यह भी लगता है कि पाक के जो लोग नाहक जान गंवाना नहीं चाहते,उनकी संख्या बहुत अधिक है। लगता है कि इमरान खान ने अपने देश में अघोषित जनमत संग्रह करवा लिया। 

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

यदि किसी रैयत की जमीन के नीचे खनिज पदार्थ मिल जाए तो उसके लिए कानून उपलब्ध है।
पर,यदि किसी  मस्जिद के नीचे किसी मंदिर का अवशेष मिल जाए तो उसके लिए क्या कोई कानून उपलब्ध है ?
कानून नहीं है तब तो अदालती निर्णय जमीन के दस्तावेज के 
अनुसार ही होगा।
पर कानून बनाने में क्या दिक्कत है ?
कानून बन जाए तो कोई किसी के धर्म स्थलों को आगे नुकसान तो नहीं पहुंचाएगा। 

   जब दारोगा राय ने ठुकरा दी थी  रिश्वत-राशि
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कल उनके जन्म दिन पर मुझे दारोगा प्रसाद राय के बारे में एक खास बात की याद आ गई।
 सारण जिले के एक मुखिया ने उनके बारे में एक संस्मरण मुझे सुनाया था।मुखिया जी मेरे पारिवारिक मित्र थे।
हाल ही में उनका निधन हुआ है।
तब दारोगा प्रसाद राय मुख्य मंत्री थे।
मुखिया जी उनके काफी करीबी थे।
मुखिया जी एक इंजीनियर की पैरवी का काम लेकर मुख्य मंत्री के पास पहुंचे थे।
 उन दिनों नन-वर्क से वर्क में तबादले के लिए 12 हजार रुपए नजराना देना पड़ता था।
दारोगा बाबू ने उनका काम कर दिया।
मुखिया जी मुख्य मंत्री को 12 हजार रुपए देने लगे।
दारोगा बाबू ने कहा कि ‘मुखिया जी,इसे आप ही रख लीजिए।
मुझे तो चुनाव लड़ने के लिए चंदा मिल ही जाता है। सिर्फ एक बार टाटा नगर जाना पड़ता है।’



सोमवार, 2 सितंबर 2019

अरुंधती राय बनाम तसलीमा नसरीन
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तसलीमा नसरीन ने हाल में लिखा है कि 
‘हम जानते हैं कि पाकिस्तानी फौज कितनी क्रूर है।
पूर्वी पाकिस्तान में उन्होंने दो लाख महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया।
30 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
उन्होंने हमारा घर लूटा।
मेरे पिता को लगभग मार ही दिया था।
आखिर अरुंधती राय ने यह कैसे कहा कि पाकिस्तानी फौज अपने लोगों पर हमला नहीं करती।
2011 में उन्होंने कैसे पाकिस्तानी फौज की तारीफ कर दी ?
और इतने साल बाद वह मुगालते में रहीं ।’
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याद रहे कि 2011 के अपने बयान को लेकर अरुंधती 
ने हाल में माफी मांगी है।
पर,सवाल है कि वह अपने कितने भारत विरोधी बयानों 
के लिए माफी मंागेंगी ?
अरुंधती ने तो यह भी कह दिया था कि 2001 में भारतीय संसद पर जो आतंकी हमला हुआ,वह खुद भारत सरकार के खुफिया संगठन ने करवाया था।
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अब लगे हाथ यह भी जान लीजिए कि पाकिस्तानी फौज ने पूर्वी पाकिस्तान में तब क्यों जुल्म ढाया था।
1970 में पाकिस्तान की राष्ट्रीय एसेम्बली की 300 सीटों के लिए आम चुनाव हुआ।
पूर्वी पाकिस्तान आधारित मुजीबुर रहमान की पार्टी को 160 सीटें मिल गईं।यानी पूर्ण बहुमत।
पर पश्चिम पाकिस्तान के नेता भुट्टो व सेना नहीं चाहते थे कि पूर्वी पाक का कोई नेता देश पर शासन करे।
उन्हें बहुमत से कोई मतलब नहीं था।
नतीजतन पूर्वी पाकिस्तान में, जो अब बंगाला देश है,गृह युद्ध छिड़ गया।
सेना व कट्टर पंथियों से प्रताडि़त होकर पूर्वी पाक के करीब 1 करोड़ शरणार्थियों ने भारत में शरण ली।
यानी, भारत पर पाक सेना ने युद्ध थोप दिया।