रविवार, 10 नवंबर 2019

यह केवल भारत जैसे स्वाभाविक रूप से धर्म निरपेक्ष देश में ही संभव है कि देश की 80 प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी अपनी आस्था के केंद्र पर निर्णय के लिए 70 वर्षों तक प्रतीक्षा कर सकती है।
  धार्मिक सहिष्णुता पर भारत को भाषण देने वाले पश्चिमी देशों को खुद अपने अतीत पर गौर करना चाहिए।
                         -----  मिन्हाज मर्चेंट 

शनिवार, 9 नवंबर 2019

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय किसी की हार या किसी की जीत नहीं है।
यह निर्णय इस देश की एकता-अखंडता के पक्ष में हैं।
गंगा-जमुनी संस्कृति के हक में है।
 राम का मंदिर बनेगा तो वह मर्यादा पुरूषोत्तम का मंदिर होगा।
जिन्होंने धोबी के कहने पर पत्नी को घर से दूर कर दिया था।
जिन्होंने शबरी के बेर खाए थे।
यानी वे बिना किसी भेदभाव के अपनी  प्रजा को समान नजर से देखते थे। 
मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार-योगी सरकार को चाहिए कि वे न सिर्फ मस्जिद के लिए पांच एकड़ अच्छी जमीन का शीघ्र प्रबंध करें बल्कि अल्पसंख्यकों की आर्थिक समस्याओं को भी हल करने की दिशा में ठोस पहल करें।
 उसे तुष्टिकरण मानने की अपनी पुरानी नीति छोड़ें।
 उम्मीद है कि इस निर्णय के बाद अब किसी भी पक्ष के अतिवादी तत्वों को ‘राजनीति’ करने का कोई अवसर आम जनता नहीं देगी।



शुक्रवार, 8 नवंबर 2019

नदी घाट के लिए तरसती बड़ी आबादी
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घाट पर तीखी ढलान के कारण इस साल भी मेरे गांव में
छठव्रतियों को भारी असुविधा हुई।
बिहार के सारण जिले के दरिया पुर अंचल के भरहा पुर गांव के निकट एक छोटी नदी बहती है।
कुछ साल पहले उस नदी के किनारे सुरक्षा बांध बना दिया गया।बांध ऊंचा है। 
बांध में तीखी ढलान है।
बांध बनने से पहले छठ करने में कोई खास दिक्कत नहीं थी।
क्योंकि तब ढलान तीखी नहीं थी।
  इस बिगाड़ दिए गए घाट को सुधार देने का कत्र्तव्य भी शासन का ही बनता है।
पर, आज कितने शासक अपने कत्र्तव्यों के प्रति जागरूक हैं ?
बचपन से ही उस घाट को देखता रहा हूं।
आसपास के गांवों के लोग भी वहां छठ करने आते रहे  हंै।
  इस बीच ग्रामीणों ने कुछ जन प्रतिनिधियों से संपर्क करके उनसे उनके फंड से घाट बनवाने का आग्रह किया।
पर यह काम नहीं हुआ।
दरअसल हमारा वह इलाका मिलीजुली आबादी वाला है।
अपवादों को छोड़ कर आम तौर पर जन प्रतिनिधि
किसी खास जाति -समुदाय की बड़ी आबादी वाले गांवों में ही अपने फंड के जरिए विकास  कामों को प्राथमिकता देते हैं ताकि थोड़ी लागत में ही थोक वोट संग्रह की गुंजाइश बन जाए।
पता नहीं, आम लोगों की खास जरुरतों पर कब ध्यान दिया जाएगा ?  

औरंगजेब ने जहांआरा को शाहजहां के साथ कैदखाने में रहने की इजाजत दे दी थी।
अंग्रेजों ने भी जेल में डा.लोहिया को जय प्रकाश नारायण के साथ रहने की अनुमति दी थी।
पर, इमरजेंसी में किसी मनपसंद राजनीतिक कैदी को जय प्रकाश नारायण के साथ रहने की इजाजत इंदिरा गांधी सरकार ने नहीं दी। --सु.कि.

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

 दोहरा मापदंड
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राजस्थान के मुख्य मंत्री अशोक गहलोत ने नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी सोसायटी से डा.कर्ण सिंह तथा अन्य कांग्रेसियों के निकाले जाने पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है।
इससे पहले खुद गहलोत साहब ने राजस्थान में सत्ता संभालते ही पहले से जारी जेपी सेनानी पेंशन को बंद कर दिया।
मध्य प्रदेश में कमलनाथ ने भी यही काम किया।
  यदि गहलोत को जय प्रकाश नारायण का नाम अच्छा नहीं लगता तो भाजपाइयों को नेहरू मेमोरियल में सिर्फ कांग्रेसियों का जमावड़ा अच्छा नहीं लगता।
30 एकड़ भूमि में स्थित नेहरू स्मारक यानी तीन मूत्र्ति भवन में यदि नेहरू सहित सभी पूर्व प्रधान मंत्रियों की स्मृतियां सहेजी जाएं तो देश के अधिकतर लोगों को अच्छा लगेगा।
पर, नेहरू-इंदिरा परिवार और कांग्रेस चाहते हैं कि 30 एकड़ पर सिर्फ एक ही परिवार का बौद्धिक कब्जा रहे।
  सत्ता में जो आएगा,वह अपनी नीतियों -रणनीतियों के अनुसार ही तो काम करेगा।
    

बोफर्स में दलाली की खबर अंततः सच साबित हुई
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मंगलवार को आयकर विभाग ने मुम्बई स्थित विन चड्ढ़ा के फ्लैट को 12 करोड ़2 लाख रुपए में नीलाम कर दिया।
बोफर्स दलाल दिवंगत विन चड्ढ़ा के परिजन ने इस नीलामी का विरोध तक नहीं किया।
आयकार न्यायाधीकरण ने 2010 में ही कह दिया था कि बोफर्स की दलाली के मद में 41 करोड़ रुपए क्वात्रोचि और विन चड्ढ़ा को मिले थे।
उस पर भारत सरकार का आयकर बनता है।
आयकर महकमे ने सूद के साथ विन चड्ढ़ा पर 224 करोड़ रुपए का दावा ठोका था।
इस आयकर की वसूली के लिए मन मोहन सरकार ने दस साल में कुछ नहीं किया।
यहां तक कि उस सरकार ने बोफर्स से संबंधित मुकदमे को सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने तक नहीं दिया।
पर मोदी सरकार ने कदम उठाया और नीलामी भी हो गई।
  इस नीलामी के साथ यह  प्रचार गलत निकला कि बोफर्स सौदे में कोई दलाली नहीं ली गई थी।
याद रहे कि राजीव गांधी की सरकार के लोग लगातार क्वात्रोचि और विन चड्ढ़ा का बचाव करते रहे।मतदाताओं ने
राजीव गांधी व उनके समर्थकों की बातों पर अविश्वास किया।नतीजतन 1989 के लोस चुनाव में कांग्रेस हार गई। 

  

बुधवार, 6 नवंबर 2019

   जैसी समस्या,वैसा उपाय
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गुजरात आतंक विरोधी विधेयक, 2015 को अंततः राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई।
 इस संबंध में विधेयक गुजरात विधान सभा ने पहली बार 2004 में पास किया था।
 पर, राष्ट्रपति ने उसको अपनी मंजूरी नहीं दी।
यानी, मन मोहन सिंह सरकार ने अपने शासनकाल में उसकी मंजूरी के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश नहीं की।
  दुनिया के जिन -जिन देशों को आतंक की मार झेलनी पड़ रही है,उन देशों ने जरुरत के अनुसार अपने यहां कानून कड़े किए।
पर उसके विपरीत 2004 में मन मोहन सरकार के सत्ता में आने के बाद पहले से बने कड़े व कारगर कानून पोटा को समाप्त कर दिया गया।
   गुजरात विधान सभा ने 2004 में पारित इस विधेयक को 2015 में संशोधित रूप से पास किया।
  आतंकियों खासकर जेहादी आतंकियों के नए -नए 
खूंखार कारनामों  को देखते हुए गुजरात के इस कानून में जो प्रावधान किया गया है,उसके अनुसार  टेलिफोन पर हुई बातचीत को वैध साक्ष्य माना जाएगा।
आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमांे की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन होगा।
साथ ही, विशेष लोक अभियोजक बहाल होंगे।
संगठित अपराध के जरिए एकत्र संपत्ति की जब्ती हो सकेगी।
ऐसी संपत्ति के ट्रांसफर को रद भी किया जा सकेगा।
आशंका है कि इस देश में सक्रिय  आतंकवादियों के पक्षधर इस कानून को अदालत में चुनौती देंगे।
पर उम्मीद की जाती है कि सुप्रीम कोर्ट देशहित में ही निर्णय करेगा।
साथ ही, सरकार को चाहिए कि वह सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय को बदलने की गुहार करे जिसके तहत आरोपी की अनुमति के बगैर उसके नार्को व डी.एन.ए.टेस्ट की मनाही है।