गुरुवार, 14 नवंबर 2019


  नेहरू का राष्ट्रधर्म और आज की कांग्रेस 
         -- सुरेंद्र किशोर--   
आज भारत और पाकिस्तान के बीच जो तनातनी है,
वह किसी छिपी नहीं ,फिर भी कांग्रेस के कुछ नेता उसके खिलाफ नहीं ,बल्कि ऐसे बयान देते रहते हैं जो भारत सरकार के विरुद्ध जाते हैं।
  जाहिर तौर पर पाकिस्तान इन बयानों का अपने पक्ष में इस्तेमाल करता है।
नेहरू के जमाने में भी कांग्रेस के अपने वोट बैंक थे।
लेकिन चीनी हमले के समय नेहरू ने वोट बैंक की परवाह नहीं की।
चीनी हमले से उत्पन्न विषम स्थिति में देश को बचाने के लिए उन्होंने उन देसी -विदेशी शक्तियों से भी मदद ली  जिन्हें वह  हिकारत भरी नजरों से देखते थे और जिनसे उनके  राजनीतिक -सैद्धांतिक मतभेद थे।
लगता है  आज के कांग्रेसी नेता यह सब भूल चुके है।
चीनी हमले के समय नेहरू ने इजरायल से भी हथियार मंगाए।ध्यान रहे कि तब तक भारत ने इजरायल को मान्यता नहीं दी थी।
हथियार मंगवाने के क्रम में नेहरू ने अरब देशों से अपनी दोस्ती की भी परवाह नहीं की।
उन्होंने  इजरायल को  लिखा था कि आप ऐसे जहाज से  हथियार भेजें जिन पर  आपके देश का ध्वज  न हो।
इजरायल  जब इस  पर राजी नहीं हुआ  तो नेहरू ने ध्वज सहित जहाजों  की अनुमति  दी। कुछ कम्युनिस्टों को छोड़कर  तब  प्रतिपक्ष ने आरोप नहीं लगाया कि नेहरू विदेश नीति से समझौता कर रहे हैं।
लेकिन आज जब मोदी सरकार अपनी सीमाओं की रक्षा और कश्मीर में आतंकियों के मुकाबले के लिए कुछ करती है तो प्रतिपक्ष युद्धोन्माद का आरोप लगाता है।
क्या देश पर प्रत्यक्ष -परोक्ष हमले कव विरोध करना   युद्धोन्माद  है ?  
   नेहरू ने चीन के हमले के बाद न सिर्फ अमेरिका से संबंध सुधारे थे,बल्कि  संघ के स्वयंसेवकों को  1963 के गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने का मौका भी दिया था।
साफ है कि उनके लिए देश पहले था।
संघ के शाहदरा मंडल के कार्यवाह विजय कुमार 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में गणवेशधारी सदस्यों के समूह में शामिल थे।
 कुछ साल पहले उन्होंने बताया  था परेड से सिर्फ  24 घंटे पहले शासन से यह आमंत्रण आया कि हमें परेड में शामिल होना चाहिए।
कम समय की सूचना पर भी तीन हजार स्वंयसेवक शामिल हुए।
इससे पहले स्वयंसेवकों ने चीनी हमले के समय सीमा स्थित बंकरों में जाकर सैनिकों को खीर खिलाई थी।
संभवतः इसकी खबर नेहरू को थी।  
    चीनी हमले के दौरान नेहरू ने चीन और सोवियत संघ,दोनों से एक साथ  झटके खाए थे।
माना जाता है कि  यदि  नेहरू कुछ और साल  जीवित रहते तो वह  संभवतः विदेश नीति को ही  बदल देते।
  क्योंकि राष्ट्रधर्म यही मांग कर रहा था।
 कुछ दस्तावेजों से यह साफ है कि नेहरू के साथ न सिर्फ चीन ने धोखा किया, बल्कि सोवियत संघ ने भी मित्रवत व्यवहार नहीं किया।
इसे देश कर उन्होंने अपनी पुरानी लाइन के खिलाफ जाकर अमेरिका की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया।
ज्ञात हो कि अमेरिका के भय से ही चीन ने हमला बंद किया था।
 यह आम धारणा सही नहीं कि 1962 में सोवियत संघ की नीति थी कि ‘दोस्त भारत’ और ‘भाई चीन’ के बीच युद्ध में हमंें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
 लेखक एजी नूरानी का कहना है कि 
 सोवियत संघ की सहमति के बाद ही चीन ने 1962 में भारत पर चढ़ाई की थी।
 इसकी पुष्टि में लेखक ने  सोवियत अखबार ‘प्रावदा’ और चीनी अखबार ‘पीपुल्स डेली’ में 1962 में छपे संपादकीय को सबूत के रूप में पेश किया था।
  चूंकि खुद नेहरू वास्तविकता से वाकिफ  हो चुके थे
इसीलिए उन्होंने अमेरिका के साथ के अपने ठंडे रिश्ते को भुलाकर राष्ट्रपति जाॅन एफ.कैनेडी को मदद के लिए कई  संदेश भेजे।
  इससे कुछ समय पहले कैनेडी से नेहरू की  अपनी एक  मुलाकात के बारे में खुद कैनेडी ने  कहा था कि ‘नेहरू का व्यवहार काफी रूखा  रहा।’
 चीन ने  अक्तूबर, 1962 में  भारत पर हमला किया था।
चूंकि तब हमारी सैन्य तैयारी लचर थी और हम ‘पंचशील’ के मोहजाल में  फंसे थे , इसलिए चीन भारी पड़ा।
नेहरू का कैनेडी के नाम त्राहिमाम संदेश इतना दयनीय और समर्पणकारी था कि अमेरिका में भारत के राजदूत  बी.क.े नेहरू कुछ क्षणों के लिए इस दुविधा में पड़ गए कि इस पत्र को व्हाइट हाउस तक पहुंचाया जाए या नहीं।
आखिर में उन्होंने वह काम बेमन से किया।
दरअसल उस पत्र में अपनाया गया रुख  नेहरू के अमेरिका के प्रति पहले के विचारों से  विपरीत था।
 इससे लगा कि  नेहरू अपनी विफल विदेश और घरेलू नीतियों को बदलने की भूमिका तैयार कर रहे थे।
  चीनी हमले को लेकर भाकपा भी दो हिस्सों में बंट गई थी।
एक गुट मानता था कि ‘विस्तारवादी भारत’ ने  ही चीन पर चढ़ाई की ।
बाद में चीनपंथी गुट ने सी.पी.आई.-एम बनाया।
 नेहरू ने 19 नवंबर, 1962 को अमेरिकी राष्ट्रपति को लिखा था कि ‘ हम न केवल लोकतंत्र की रक्षा, बल्कि  देश के अस्तित्व की रक्षा के लिए भी चीन से हारता हुआ युद्ध लड़ रहे हैं।इसमें आपकी तत्काल सैन्य मदद की  सख्त जरूरत है।’
उस दौरान नेहरू ने अमेरिका को एक ही दिन में दो -दो चिट्ठियां लिख दीं।
इन चिट्ठियों को पहले गुप्त रखा गया  ताकि नेहरू की दयनीयता देश के सामने न आ पाए,
पर चीनी हमले की 48 वीं वर्षगाठ पर एक अखबार ने उन्हें सार्वजनिक कर दिया।
   आजादी के बाद नेहरू के प्रभाव में भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई जबकि सरकार का झुकाव सोवियत लाॅबी की ओर था।
एक संवदेनशील प्रधान मंत्री,जो देश के तमाम लोगों का ‘हृदय सम्राट’ था,1962 के धोखे के बाद भीतर से टूट गया।
युद्ध के बाद नेहरू सिर्फ 18 माह ही जीवित रहे।
  चीन युद्ध में पराजय से हमें यही शिक्षा मिली कि किसी भी दल  के लिए राष्ट्रहित और सीमाओं की रक्षा का दायित्व सर्वोपरि होना चाहिए।
इस दायित्व का निर्वाह दुनिया के सब देश करते हैं,लेकिन अपने देश में उसे लेकर संकीर्ण राजनीति होती है।
कांग्रेस को यह भी याद रखना चाहिए कि नेहरू समय -समय पर अपनी गलतियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी करते थे।
  वह कई सहकर्मियों की राय के सामने झुके।
1950 में राष्ट्रपति का नाम तय करने के समय नेहरू ने पहले ते राज गोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाने की जिद की,पर जब देखा कि उनके नाम पर पार्टी में सहमति नहीं बन रही है तो वह राजेंद्र प्रसाद के नाम पर राजी हो गए।
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-- 14 नवंबर, 2019 को दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा लेख।





    

बुधवार, 13 नवंबर 2019

साठ के दशक में अपने गांव में मैंने एक कहावत 
सुनी थी।
‘‘लडि़का मालिक बूढ़ दीवान।
ममिला बिगड़े सांझ -बिहान।।’’
यह कहावत कुछ जमींदारों को ध्यान में रख कर परंपरागत विवेक वाले बुजुर्गों ने बनाई थी।
अब आज की राजनीति
पर भी यह लागू हो रही है।
वंशवाद को आगे बढ़ाने के लिए ‘लडि़का’ को दल का मालिक बनाने का खामियाजा कुछ दलों को तो भुगतना ही पड़ रहा है।
आगे-आगे देखिए होता है क्या !!!!!

मंगलवार, 12 नवंबर 2019


पटना के गांधी सेतु पर जाम में जब बड़े नेता फंसे
तभी धृतराष्ट्र बने पुलिस अफसरों की आंखें खुलीं।
नतीजतन सेतु पर सुशासन का चीर हरण कर रहे 
45 पुलिसकर्मी निलंबित हुए।
गांधी सेतु से गुजरने
वाली पूरी आबादी जानती है कि 
वहां कैसे -कैसे दुःशासन तैनात रहते हैं।
क्योंकि आम जनता तो रोज ही एक तरफ भीषण जाम में घंटों फंसी रहती है तो दूसरी ओर लोगों की आंखें के सामने वसूली करके प्रतिबंधित वाहनों को पास कराया जाता है।
500 से 1000 रुपए तक प्रति वाहन !
इतनी बड़ी आय न जाने कितने अफसरों -नेताओं को धृतराष्ट्र बना दे !
 अब देखना है कि कब किन्हीं स्वजातीय या फिर हिस्सेदार  नेताओं -अफसरों की पैरवी पर इन 45 निलंबितों के निलंबन उठ जाते हैं !
फिर चीर हरण शुरू होने में कोई देर नहीं लगेगी।
2018 में भी ऐसे ही चीर हरण के आरोप में एस.एस.पी.मनु महाराज ने दो थानेदारों सहित 55 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया था।
उन निलंबनों पर आगे की कौन सी कार्रवाई हुई ?
किसी को कोई सजा मिली ?
मिली होती तो एक बार फिर 45 को निलंबित क्यों करना पड़ता ?
फाॅलो अप के लिए संवाददाताओं को कहां फुर्सत रहती है !
उन पर रोज-बरोज के काम का ही इतना अधिक बोझ  रहता है कि बेचारा संवाददाता और कितना कुछ करेगा ?
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कई दशक पहले की बात है।
कहीं पढ़ा था ।
क्राइम की  निरंतर व सटीक फाॅलो -अप रिपोर्टिंग के कारण ही दिल्ली के हिन्दुस्तान टाइम्स का सर्कुलेशन कभी आसमान छूने लग गया था।  

डा.राजेंद्र प्रसाद ने 1950 में राष्ट्रपति का पद संभाला था।
संसद में उनके पहले अभिभाषण के समय का यह ग्रूप फोटोग्राफ है।
  प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ राष्ट्रपति की यह तस्वीर 12 दिसंबर, 2014 के अंग्रेजी पाक्षिक ‘फं्रटलाइन’ में छपी थी।
अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दू’ के अभिलेखागार में एक से एक विरल तसवीरें उपलब्ध हैं।
 ‘फं्रटलाइन’ हिन्दू ग्रूप की चर्चित पत्रिका है। 
चित्र में बैठे नजर आ रहे हैं --बाएं से पहले 
डा.बी.आर.आम्बेडकर।
उनके बाद रफी अहमद किदवई,
सरदार बलदेव सिंह,
मौलाना अबुल कलाम आजाद,
जवाहरलाल नेहरू,
डा.राजेंद्र प्रसाद,
सरदार वल्लभ भाई पटेल,
जाॅन मथाई,
जगजीवनराम ,
राज कुमारी अमृत कौर
और श्यामा प्रसाद मुखर्जी।
पीछे खड़े हैं--बाएं से --
खुर्शीद लाल,
आर.आर.दिवाकर,
मोहनलाल सक्सेना,
गोपाल स्वामी आयंगार,
एन.वी.गाडगिल,
के.सी.नियोगी,
जयराम दास दौलत राम,
के.संथानम,
सत्यनारायण सिन्हा 
और बी.वी.केसकर।
याद रहे कि यह नेहरू के जन्म दिन का महीना है।



    
    नफरतो ,भारत छोड़ो 
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‘‘अयोध्या पर फैसले के ठीक एक दिन बाद ‘ईद मिलाद उन नबी’ पर देश के तमाम हिस्सों में निकले जुलूस ए मोहम्मदी में हर तरफ तिरंगे लहराते दिखे।
इनमंे शिरकत कर आपसी भााईचारे की मिसाल पेश करते सभी धर्मों के लोगों की तस्वीरें देख कर सीना गर्व से चैड़ा हो गया।
इसका संदेश यही है कि नफरतो भारत छोड़ो।’’
                           ---समीर अब्बास 
इस सकारात्मक माहौल को बिगाड़ने के काम में ओवैसी और हबीबुल्ला जैसे लोग लग गए हैं।
दूसरी ओर, आम लोगों की समझ यह रही है कि
बाबर ने 1526 में राम मंदिर को तोड़ कर अयोध्या में मस्जिद बनवाई थी।
उस अन्याय को सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में समाप्त करके देश मेें 
बेहतर माहौल बनाने की कोशिश की है।
ऐसा अधिकार सुप्रीम कोर्ट को संविधान के -142 में हासिल भी है।
 उस अनुच्छेद के अनुसार,
‘‘उच्चत्तम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकेगा या ऐसा आदेश दे सकेगा ,जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो..........।’’
वैसे तो अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का  निर्णय ‘एक बड़ी हद तक पुरातात्विक ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित है’, फिर भी   
जो उन्हें सबूत नहीं मानते कि अयोध्या में मंदिर ध्वस्त करके बाबरी मस्जिद बनाई गई तो उन्हें वाराणसी के ज्ञानव्यापी मस्जिद की तस्वीर गुगल पर देख लेनी चाहिए।
 वहां अब भी भवन के निचले हिस्से में मंदिर का ढांचा और ऊपरी हिस्से में मस्जिद देखने को मिल जाएंगे।
  यदि पांच सौ साल पहले की किसी घटना का सबूत आज उपलब्ध नहीं है तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह घटना हुई ही नहीं।
  अयोध्या की  उसी बाबरी मस्जिद के नीचे दबे और उत्खनन से निकले  सबूतों के साथ वामपंथी इतिहासकारों ने किस तरह छेड़छाड़ की,वह जानना हो तो 12 नवंबर 2019 के दैनिक जागरण में प्रो.मक्खन लाल का लेख पढ़ लें।
                         ---सुरेंद्र किशोर
      12 नवंबर 2019



सोमवार, 11 नवंबर 2019

दिवंगत टी.एन.शेषन की याद में 
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चुनाव नियमों की किताब को मुख्य चुनाव आयुक्त 
टी.एन.शेषन ने आलमारी से निकाला।
उस पर पड़ी धूल को झाड़ा।
 उन्हें लागू करने की कोशिश की।
फिर तो धांधलीबाज नेताओं की नानियां मरने लगी थींं।
जार्ज बर्नार्ड शाॅ ने कहा था कि ‘‘सभी आत्म कथाएं 
झूठी होती हैं।’’
  नब्बे के दशक में टी.एन.शेषन ने भी बर्नार्ड शाॅ को सही ही साबित किया  था।
शेषन की जब जीवनी आई तो पूर्व कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख ने उनकी कई बातों को झूठा ठहरा  दिया।
खैर जो हो,सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ढंग से टी.एन.शेषन ने
जितना प्रभावित किया,वह एक रिकाॅर्ड है।
वह रिकाॅर्ड टूटने वाला भी नहीं है।क्योंकि कोई सरकारी अफसर वैसा बन ही नहीं सकता।
शेषन ने एक बार कहा था कि ‘मैं अमिताभ बच्चन की तरह चर्चित हूं।’
शेषन कुछ भी बोल सकते थे।
पटना राज भवन में आयोजित प्रेस कांफ्रंेस में मुख्य चुनाव आयुक्त से मैंने जब एक तीखा सवाल किया तो उन्होंने जवाब देने की जगह कहा कि ‘तुम पर मंगल ग्रह है।’
बगल में बैठे वरिष्ठ पत्रकार सीता शरण झा ने धीरे से कहा कि शेषन ज्योतिषी भी है।
खैर, तब बिहार में शेषन पर चालीसा भी लिखा गया।
जय प्रकाश क्रांतिकारी ने लिखा,‘
आए शेषन लेकर डंडा,
हो गए होश सभी के ठंडा।
शेषन है अति बजरंगी,
मतदाता के असली संगी।
अब चुनाव मंे मजा आएगा,
भ्रष्ट नेता चने चबाएगा।
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........................चालीसा लंबा है।
31 जनवरी 1994 को शेषन ने सरेआम यह कह दिया था कि ‘भारत का लोकतंत्र  धन, अपराध और भ्रष्टाचार के स्तम्भों पर खड़ा है।’
यह सुनकर जानकार व भुक्तभोगी लोग गदगद थे।
 1995 के बिहार विधान सभा चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन मुख्य मंत्री लालू प्रसाद से शेषन की टकराहट हो गई।
लालू को लगा था कि शेषन पिछड़ों की सरकार को हटवाना चाहता है।
लालू खर्चे के बहाने मतदाता पहचान पत्र को अव्यावहारिक बता रहे थे।
पर चुनाव नतीजे आने के बाद लालू ने शेषन को धन्यवाद दिया।
याद रहे कि लालू की पार्टी बहुमत से सत्ता में आ गई थी।
शेषन ने कमजोर वर्ग के लोगों को भी,जो तब लालू के मतदाता थे, मतदान करने का अवसर प्रदान किया।
शेषन ने अपनी अधिकृत जीवनी में तो सभी बातेंं सही नहीं लिखी हैं।
 यह अस्वाभाविक भी नहीं है।
मैंने तो जीवनियां कम ही पढी हंै।
पर बर्टेंड रसेल और बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह के अलावा ऐसी कोई जीवनी मेरी नजर से अभी नहीं गुजरी है जिसमें अपनी गलतियां-कमियां बताई गई हों।
 कोई निष्पृह होकर टी.एन.शेषन की जीवनी लिखें तो वह खूब बिकेगी।
पर, उसे राजीव गांधी की चमचागिरी से लेकर वह सारी बातें लिखनी पड़ंेगी जो घटित हुईं।
याद रहे कि असम में गलत ढंग से मतदाता बन जाने पर वित्त मंत्री मन मोहन सिंह के खिलाफ शेषन ने जांच शुरू कर दी थी।
        


रविवार, 10 नवंबर 2019

भारतीय संविधान में अनुच्छेद-142 का प्रावधान करने के लिए हम संविधान निर्माताओं के आभारी हैं।
  उस अनुच्छेद के अनुसार--
‘‘उच्चत्तम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकेगा या ऐसा आदेश दे सकेगा जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो.............।’’
अयोध्या विवाद पर जजमेंट देने में यह अनुच्छेद सुप्रीम कोर्ट के पीठ को काम आया है।
विविधता वाले  और तरह-तरह की आकांक्षाओं-इच्छाओं से भरे इस देश में ऐसे अनुच्छेद की अनिवार्यता संविधान निर्माताओं ने पहले ही समझ ली थी।