बुधवार, 18 दिसंबर 2019

20 जनवरी, 2013 को देश के तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने जय पुर में कहा था कि 
‘‘भाजपा और आर.एस.एस.आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों का संचालन कर रहे हैं 
और वे हिन्दू आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।’’
   शिंदे साहब, इन दिनों देश के कई हिस्सों में मुस्लिम अतिवादी आतंक मचाए हुए हैं।जबकि सीएए से उन्हें कोई नुकसान नहीं होने वाला है।
 फिर भी, आपकी कल्पना के उन शिविरों से निकल कर कोई उनका मुकाबला करने के लिए सड़कों पर क्यों नहीं 
आ रहा है ?
यदि वे शिविर हैं तो वे किस दिन के लिए हैं ?
आप ही इसका जवाब दे दीजिए।
वैसे आपको और दिग्विजय ंिसंह को छोड कर किसी अन्य को वे शिविर कहीं नजर नहीं आ रहे हैं।़
  दूसरी ओर इस देश  की अधिसंख्य आबादी में इस बात को लेकर भी नाराजगी देखी जा रही है कि मोदी सरकार उन अतिवादियों को सड़कों पर करारा जवाब क्यों नहीं दे रही है।
   इस बात को लेकर भी गुस्सा है कि आपकी पार्टी की एकतरफा सोच एक बार फिर प्रकट हो रही है जिससे आपके दल को और देश को ही नुकसान हो जाने का खतरा है।
आपके दल कोे नुकसान होगा तो भाजपा ही को तो फायदा होगा !
आप भाजपा के प्रचारक क्यों बने हुए हैं ?
2014 के लोस चुनाव के बाद आई ए.के. एंटोनी कमेटी की रपट को एक बार पढ़ लीजिएगा।
उस पर अमल करने के लिए हाईकमान को कहिए।उससे आपका व देश का भला होगा।  
18 दिसंबर 2019




मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

   अपने ही पैरों पर  कुल्हाड़ी !!!
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मध्य युग का अपने देश का इतिहास हमने पढ़ा हैं।
ब्रिटिश इतिहासकार सर जे.आर सिली की पुस्तक भी मेरे पास है। 
सिली की किताब का नाम है ‘हमने भारत को कैसे जीता।’ 
 सिली के अनुसार भारतीयों ने भारत को हमारे लिए जीत कर हमारी थाली में रख दिया।
   सी.ए.ए. और एन.आर.सी. पर हो रही ताजा घटनाओं को देखते-समझते हुए मुझे लगता है कि
इस देश में इस मामले में कुछ भी नहीं बदला है।
---सुरेंद्र किशोर ......17 दिसंबर 19

 वी.वी.आई.पी.के लड़खड़ाने की कहानी
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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी कानपुर के अटल घाट की सीढि़यों पर लड़खड़ा गए थे।
वह तस्वीर कल के अखबार में छपी।
कई साल पहले तत्कालीन बुजुर्ग राष्ट्रपति डा.शंकर दयाल शर्मा भी लड़खड़ाए थे,वह भी बुरी तरह।
तब ‘जनसत्ता’ ने पहले पेज पर फोल्ड के ऊपर लड़खड़ाते राष्ट्रपति की तस्वीर छाप दी थी।
  पता नहीं, मौजूदा प्रधान मंत्री  को वैसा फोटो छपना बुरा लगा या नहीं !
पर, तब के राष्ट्रपति को तो बुरा लग गया था।
डा.शर्मा ने जनसत्ता के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी को फोन किया था।
कहा था कि क्या भई,बाह्मण होते हुए भी आपने मुझे नहीं बख्शा ?’
यह बात मुझे बाद में जोशी जी ने ही बताई थी।
मैं अंदाज लगा सकता हूं कि जोशी जी ने उन्हें क्या जवाब दिया होगा।
क्योंकि एक बात मैं पक्के तौर पर उनके बारे में जानता था।
जोशी जी खबरों के मामले में न तो अपनी जाति का ध्यान रखते थे और न अपने किसी मित्र का।
यदि खबर है तो वह छपेगी ही।
  जनसत्ता में यदि अखबार के किसी अन्य सहकर्मी के खिलाफ भी कोई शिकायत आती थी तो उसे वे खुद पर ले लेते थे।
 जैसे सती प्रथा पर छपी संपादकीय।
उसे उनके प्रमुख सहकर्मी ने लिखा था।
16 दिसंबर 2019
       

सोमवार, 16 दिसंबर 2019

   लंबे सघर्ष के संकेत
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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कल दुमका में कह दिया
कि 
‘‘सरकार ने नागरिकता कानून में जो बदलाव किए हैं,वे देश
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को बचाने के लिए हैं।’’
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 अब आप इसके निहितार्थ को समझ कर लंबे ‘संघर्ष’ के लिए कम से कम मानसिक रूप से तैयार हो जाइए।
यह संदेश दोनों पक्षों के संघर्षशील लोगों के लिए है।
मोदी के समर्थक-प्रशंसक बताते  हंै कि जिस काम को प्रधान मंत्री ‘देश को बचाने वाला’ काम मानते हैं,उसे वे बीच में कभी नहीं छोड़ते।
वैसे भी उनका कार्यकाल 2024 तक है।
यानी उनके पास समय भी है।
इस बीच वे बड़े- बड़े खतरे उठाकर भी क्या -क्या कर गुजरेंगे , इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। 
और उसकी प्रतिक्रिया में भी क्या -क्या होगा,
इसका भी कोई अंदाज नहीं लगा सकता।
पर, होनी को भला कौन टाल सकता है !!
16 दिसंबर 2019
    

  दिल्ली की हिंसक घटना--तथ्य बनाम बयान
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 कल दिल्ली के जामिया मिलिया के आसपास क्या -क्या हो
रहा था ?
वहां कौन-कौन  क्या-क्या  कर रहा था ?
कौन शांत था ?
कौन उत्तेजना फैला रहा था ?
कौन शांति की अपील कर रहा था ?
कौन हिंसा कर रहा था ?
पुलिस क्या कर रही थी ?
क्या पुलिस बर्बरता कर रही थी ?
क्या भीड़ हिंसक  थी ?
वह सब कुछ लोगबाग घर बैठे अपने टी.वी.चैनलों 
पर सांस रोके देख रहे थे।
इसके अलावा और भी नंगी सच्चाई घटनास्थल पर लगे सीसीटीवी कैमरों की आंखों ने देखी।
फिर भी उस घटना पर हमारे देश के विभिन्न 
दलों के बडे़ -बड़े नेताओं ने क्या -क्या बयान दिए ?
मुझे लगा कि अधिकतर नेताओं के बयान तथ्य से अलग और राजनीति प्रेरित थे।मैं सिर्फ एक पक्ष के नेताओं की बात नहीं कर रहा हूं।
यानी, चैनलों ने उन नेताओं के सफेद झूठ का एक बार फिर भंडाफोड़ कर दिया। 
16 दिसंबर 2019

रविवार, 15 दिसंबर 2019

कई दशक पहले की बात है।
देश के एक बड़े  
पत्रकार के दिल्ली स्थित आवास पर उनसे मिलने 
मैं गया था।
बात- बात में उन्होंने मुझसे पूछा कि ‘‘मेरा लेखन आपको कैसा लगता है ?’’
मैंने कहा कि ‘‘बहुत अच्छा लगता है।क्योंकि आप सूक्ष्म दृष्टि से चीजों को देखते हैं।राजनीति को लेकर आपका आॅबजरवेटरी रडार बहुत शक्तिशाली है।
पर आप एकतरफा लिखते हैं।आप भाजपा की ओर झुके लगते हैं।’’  
  उन्होंने कहा कि ‘‘आप सही कह कर रहे हैं।मैं झुका हुआ हूं।
दरअसल जो किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा नहीं है,वह आम तौर पर पैसों से जुड़ा होता है।वैसे इसके अपवाद भी हैं।’’ 
 पंचायतों के अधिकतर मुखिया के बारे में यही बात कही जा सकती है।
  अधिकतर पैसों से जुड़े होते हैं।दलीय आधार पर चुनाव हो तो शायद थोड़ी स्थिति बदले !
ऐसा नहीं कि राजनीति में पैसों का खेल नहीं होता।पर निचले स्तर के नेता-कार्यकत्र्ता ऊपरी डर से कुछ सहमते भी हैं।
पर जहां डर नहीं, अंकुश नहीं, वहां की कल्पना कर लीजिए।
बहुत बातें तो आपकी जानकारी में भी होंगी।

सर्दी हो या गर्मी अखबार का हाॅकर जरूर आता है !
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‘‘आपने मेरे बारे में ऐसा सोचा,यह देखकर मुझे अच्छा लगा।पर, मेरा काम इस गमछे से ही चल जाएगा।’’
इस अत्यंत खराब मौसम में भी जब सुबह-संबह  अखबार लेकर हाॅकर आज आया तो मैंने उससे कहा कि ‘‘मैं तुमको एक ऊनी मंकी कैप देना चाहता हूं।खराब मौसम में ही तुम्हारे महत्व का पता चलता है।’’
  पर हाॅकर स्वाभिमानी निकला और
अपने सूती गमछे को अपने कान में लपेटते हुए उपर्युक्त बातें कह दी।
खैर, उसकी बातों से अखबारी दुनिया का पूरा दृश्य मेरी आंखों के सामने घूम गया जहां मैंने दशकों बिताए हैं।
  हाॅकर तो अखबार का आखिरी पात्र होता है।
  उससे पहले किसी अखबार की कहानी कहां से शुरू होकर कहां अंत होती है,इसकी लंबी व संघर्षपूर्ण गाथा है।
अखबार का कोई मालिक होता है।उसमें वह अपनी पूंजी लगाता है।
खतरा उठाता है।
रामनाथ गोयनका जैसे इक्के दुक्के अभियानी मालिकों की बात छोड़ दें तो कोई भी पूंजीपति यही चाहता है कि उसकी पूंजी बनी रहे, साथ- साथ मुनाफा भी हो।
वह क्रांति करने के लिए अखबार नहीं निकाल रहा होता है।
   उसके समझदार स्टाफ को मालिक के इस लक्ष्य को ध्यान में रखना होता है।
  खैर,पत्रकारों के बारे में कम से कम एक बात जान लेनी चाहिए।
अधिकतर अखबार स्टाफ की कमी की समस्या झेलते रहते हैं।
संवाददाता मेहनत करके और कई बार खतरों से खेल कर  भी ऐसी खबरें लाता है जो पठनीय हों।
  डेस्क के लोग उसे पन्नों पर सजाते हैं।
अन्य पात्रों की बात अभी छोड़ भी दीजिए तो नाइट ड्यूटी वालों को अलग से श्रेय देना पड़ेगा।
   आपको सुबह-सुबह अखबार पहुंचाने  के लिए नाइट ड्यटी वाले स्टाफ करीब- करीब रात भर जग कर काम करते हैं।
परिवार से दूर और अपनी नींद की सामान्य अवधि बदल कर।
उनका बाॅडी क्लाॅक ही बदल जाता है।
  जरा कठिन काम है।इसीलिए सेवाकाल में खुद मैं हमेशा नाइट ड्यूटी से भागता रहा।
ऐसा कोई पद स्वीकार कभी नहीं किया जिसमें कम से कम 10 बजे रात तक भी काम करने की मजबूरी हो।मैं नौ बजे सो जाता हूं।
हाॅकर से लेकर नाइट ड्यूटी वाले तक  न जाने कितना काम करके आपको सुबह -सुबह अखबार पहुंचाते हैं।
उधर अखबार की प्रसार शाखा के लोग तो भोर में ही बिक्री केंद्रों पर पहुंच जाते हैं। 
 अंत में,एक जरूरी सूचना।
अखबार ही दुनियां का एकमात्र प्रोडक्ट है जो अपनी लागत खर्च से कम दाम पर  बिकता है।
  विज्ञापनों से उसका घाटा पूरा होता है।विज्ञापन अखबारों की रक्त धमनियां होती हैं।