सोमवार, 9 मार्च 2020

अपने देश में नौकरशाही काम को रोकर घूस लेती है
जबकि चीन में नौकरशाही कार्य को संपन्न कराने के लिए 
घूस लेती है।
--डा.भरत झुनझुनवाला,
  दैनिक आज 
  8 मार्च 2020 

रविवार, 8 मार्च 2020

सन 1962 से पहले चीन के असली इरादों के बारे में 
प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू भारी गलतफहमी में थे।
उस गलतफहमी का भारी खामियाजा इस  देश को भुगतना 
पड़ा था।
  आज सी ए ए -एन.पी.आर.-एन.आर.सी. के खिलाफ देसी-विदेशी मदद से 
पी,एफ.आई. की ओर से जारी हिंसक-अहिंसक आंदोलन के असली इरादों के बारे में 
इस देश के अनेक
लोगों व संगठनों को भारी गलतफहमी है।
या फिर उनमें से या तो कुछ लोग अनजान हैं या फिर बेईमान।
इसका भी खामियाजा यह देश न भुगते ,इसका इंतजाम 
समय रहते कैसे होगा ?
कौन करेगा ?
यह एक यक्ष प्रश्न है।
--सुरेंद्र किशोर
8 मार्च 2020

शनिवार, 7 मार्च 2020

   
   पुलिस विफल तो लोकतंत्र पर खतरा !
      --सुरेंद्र किशोर--- 
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राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकर अजित डोभाल ने कहा है कि 
‘‘अगर पुलिस कानून 
लागू करने में नाकाम रहती है तो 
लोकतंत्र नाकाम होता है।’’
अच्छी मंशा वाले डोभाल इससे अधिक और क्या कह सकते हैं !
   सिस्टम के महत्वपूर्ण अंग रहे अजित डोभाल देख रहे हैं कि एक ईमानदार 
प्रधान मंत्री के रहते कानून लागू होने में भारी दिक्कत हो रही है।
  पहले यह माना जाता था कि शीर्ष राजनीतिक कार्यपालिका के पदों पर 
रुपए-पैसों के मामले में
शब्द के सही अर्थ में ईमानदार व्यक्ति बैठे तो बहुत 
सारी चीजें अपने -आप ठीक हो जाएंगी।
पर, ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है।
लगता है कि ‘दीमक’ ने सिस्टम को खोखला बना दिया है।उसे  
ठीक करना किसी पी.एम.या सी.एम.के
वश की बात नहीं रह गई है।  
  मनमोहन सिंह के शासन काल में यह आरोप लगा था कि गृह मंत्री दिल्ली 
के पुलिस थाने में खास 
एस.एच.ओ.तैनात कराने में भी रूचि रखते हैं। 
मोदी राज के गृह मंत्रियों के बारे में तो ऐसा नहीं सुना गया।
फिर भी आज दिल्ली के थानों में बिना पैसे जनता के कितने काम होते हैं ?  
  ऐसे में क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि भारत में लोकतंत्र विफल 
होने के कगार पर है ? इसके अन्य अनेक लक्षण सामने आते रहे हैं। 
पर ,अभी ऐसा कहना अभी जल्दीबाजी होगी।
 फिर भी सरजमीनी स्तर पर इस देश में क्या हो रहा है,उसके कुछ नमूने देखिए।
 दिल्ली से पटना आइए।
   कई दिनों बाद आज मैं सुबह -सुबह घर से निकला।
एन.एच.पर पहुंचते ही देखा कि बालू लदे दर्जनों ट्रैक्टर हाईवे पर खड़े थे।
सड़क पर ही बालू की बिक्री जारी थी।
उन ट्रैक्टरों के कारण हाईवे पर वाहनों की गति निर्बाध नहीं रह गई थी।
फिर भी उन्हें रोकने -टोकने वाला वहां कोई नहीं था।
पता चला कि स्थानीय थाने को रोज प्रति ट्रैक्टर 1000 रुपए मिलते हैं।
  मन क्षोभ से भर उठा।
 उसके बाद एक विकासशील मुहल्ले में गया।
वहां सींमेंटी सड़क और नाले का निर्माण चल रहा था।
निर्माण कार्य पटना नगर 
निगम के जिम्मे है।
सड़क निर्माण में किसी भी मानक का ध्यान नहीं रखा जा रहा था।
नाला एक तरफ से बनता जा रहा था और दूसरी ओर से टूटता जा 
रहा था।
लगा कि इस निर्माण कार्य को देखने कोई अफसर उधर ताकता तक नहीं। 
 ये तो मात्र छोटे नमूने हंै।
जहां हाथ डालिए, देश में कमोवेश एक ही हाल है।
लूट सके सो लूट !!
हालांकि शुक्र है कि आम तौर पर महा घोटाले अब नहीं हो रहे हैं।
विकास व कल्याण के कार्य भी अब पहले से अधिक हो रहे हैं।
  फिर भी स्थानीय स्तर के लोगबाग ‘सरकार’ से परेशान हंै।
सरकारी अफसरों-कर्मचारियों की घूसखोरी जीवन शैली बन चुकी है।
ऐसे में लोकतंत्र कब तक बचेगा ?
फिर इस देश का क्या होगा ?
 अनुमान के घोड़े दौड़ाते रहिए ।
 जिन देशों में लोकतंत्र नहीं है,वहां क्या है !
वैसे भी धर्मांध लोगों से लड़ाई ठन चुकी है।
 ऐसी लड़ाई में लोकतंत्र कितना कारगर साबित होता है,
 यह भी देखना दिलचस्प होगा !!
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6 मार्च 2020

    

 फांसी की सजा का प्रावधान क्यों नहीं  ???
         सुरेंद्र किशोर 
केंद्रीय एजेंसी एक कारपोरेट समूह को कर्ज दिए जाने के मामले में 
यस बैंक के संस्थापक 
राणा कपूर की भूमिका की जांच कर रही है।
दैनिक जागरण के अनुसार यह कर्ज दिए जाने के बाद कथित रूप से राणा
 कपूर की पत्नी के खातों में 
रिश्वत की रकम पहुंची थी।
  उधर यह खबर भी आई है कि यस बैंक का एक बड़ा खातेदार कैंसर 
से पीड़ित है।
हर माह दवा के लिए उसे 15 लाख रुपए चाहिए।
पहले तो वह उतने पैसे अपने खाते से निकाल रहा था।
पर अब नहीं।
    यदि वह खातेदार दवा के अभाव में मर गया तो राणा कपूर पर हत्या का
 मुकदमा क्यों नहीं चलना चाहिए ?
यदि ऐसा कानून नहीं है तो कानून क्यों नहीं बनना चाहिए ?
इस देश में जगह- जगह फैले भारी भ्रष्टाचार के कारण असंख्य गरीब सरकारी 
अस्पतालों में 
समुचित इलाज के बिना मर रहे हैं।
फिर भी भ्रष्टों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान क्यों नहीं  ? 
    ---सुरेंद्र किशोर-
      7 मार्च 2020

बुधवार, 4 मार्च 2020

सोशल मीडिया अकाउंट को ‘आधार’ से जोड़ दीजिए।
ट्विटर पर पहचान गुप्त रखना बंद करा दीजिए।
फर्जी खबरों और वीडियो के लिए व्हाट्सऐप को कटघरे 
में खड़ा कर दीजिए।
   बहुत सारी चीजें ठीक हो जाएंगी।
दिल्ली हिंसा ने सोशल के एक बड़े खतरे को 
सामने ला दिया है।
---अखिलेश शर्मा,वरिष्ठ पत्रकार

हमारे नेता वोट के लिए 
 कुछ भी करेंगे !!!!!
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--सुरेंद्र किशोर--
जब अवैध घुसपैठियों के वोट वाम 
मोरचा को मिलते थे
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4 अगस्त, 2005 को ममता बनर्जी ने लोक सभा के स्पीकर
के टेबल पर कागज का पुलिंदा फेंका।
उसमें अवैध बंगला
देशी घुसपैठियों को  मतदाता बनाए जाने के सबूत थे।
उनके नाम गैरकानूनी तरीके से मतदाता सूची में शामिल करा दिए गए थे।
ममता ने कहा कि घुसपैठ की समस्या राज्य में महा विपत्ति बन चुकी है।
इन घुसपैठियों के वोट का लाभ वाम मोर्चा उठा रहा है।
उन्होंने  उस पर सदन में चर्चा की मांग की।
चर्चा की अनुमति न मिलने पर ममता ने सदन की सदस्यता
 से इस्तीफा भी दे दिया था।
 चूंकि एक प्रारूप में विधिवत तरीके से इस्तीफा तैयार नहीं था,
इसलिए उसे मंजूर नहीं किया गया।
दृश्य -2
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जब घुसपैठियों के वोट ममता 
बनर्जी को मिलने लगे
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3 मार्च 2020
..............पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि 
जो भी बंगला देश से यहां आए हैं,बंगाल में रह रहे हैं ,
चुनाव में वोट देते रहे हैं, वे सभी भारतीय नागरिक हैं।
इससे पहले सीएए,एनपीआर और एन आर सी के विरोध में 
ममता ने कहा कि इसे लागू करने पर गृह युद्ध हो जाएगा । 
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पिछले दिनों पश्चिम बंगाल से भाजपा सांसद ने संसद में कहा 
कि पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में हिंदुओं को त्योहार मनाने के 
लिए अब स्थानीय इमाम से अनुमति लेनी पड़ती है।
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कई साल पहले इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर छपी थी।
उसमें एक गांव की कहानी थी।
वह गांव बंगला देशी मुस्लिम घुसपैठियों के कारण
 मुस्लिम बहुल बन चुका था।
वहां हिंदू लड़कियां हाॅफ पैंट पहने कर 
हाॅकी खेला करती  थी।
पर, अब मुसलमानों ने उनसे कहा कि फुल पैंट 
पहन कर ही खेल सकती हो।
खेल रुक गया है।
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यह बात तब की है जब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्य मंत्री थे।
उनका एक बयान जनसत्ता में छपा।
उन्होंने कहा था कि घुसपैठियों के कारण सात जिलों में 
सामान्य प्रशासन चलाना मुश्किल हो गया है।
बाद में उन्होंने उस बयान का खुद ही खंडन कर दिया।
पता चला कि पार्टी हाईकमान
के दबाव में कह दिया कि मैंने वैसा कुछ कहा ही नहीं था।
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कई दशक पहले मांगने पर वाम मोरचा सरकार ने केंद्र
 सरकार को 
सूचित किया था कि 40 लाख अवैध बंगलादेशी पश्चिम 
बंगाल में रह रहे हैं।
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अनुमान लगाइए कि अब 2020 में वह संख्या
 कितनी बढ़ चुकी होगी !!!! 
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4 मार्च 2020

  


सोमवार, 2 मार्च 2020

‘‘जब बांग्लादेश में हिंदू पर हमला होता है तो कोई मुस्लिम ही उन्हें पनाह देता है।
वहीं भारत में किसी मुसलमान पर हमले की स्थिति में हिंदू और
सिख ही उसे बचाने के लिए आगे आते हैं।
मैं आशा करती हूं कि ऐसे उदार लोगों की संख्या बढ़े और यह नफरती लोगों के आंकड़ों को पार कर जाए।’’
  ---तसलीमा नसरीन
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‘‘सी. ए. ए. में मुसलमानों को न जोड़ने को लेकर सवाल उठाने वाले पाकिस्तानियों से पूछना चाहता हूं कि क्या वे चाहते हैं कि मुसलमान पाकिस्तान छोड़ दें ?
अगर ऐसा है तो फिर पाक का वजूद और उसका मकसद ही खत्म हो
जाएगा।
 दूसरा सवाल यही कि अगर भारतीय मुसलमानों की इतनी फिक्र है तो क्या उनके लिए अपनी सीमाएं खोल दोगे ?’’
        --अदनान सामी 
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