गुरुवार, 7 जनवरी 2021

 आम जन से अलग-थलग 

पड़ता भारतीय विपक्ष

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    दृश्य-1

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नोटबंदी के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि 

‘‘इतिहास में पहली बार किसी प्रधान मंत्री ने नोटबंदी के जरिए गरीबों पर हमला किया है।

नोटबंदी मोदी निर्मित महा विपत्ति है।’’

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नोट बंदी के कुछ ही महीेने बाद उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव हुआ।

भाजपा को अभूतपूर्व सफलता मिल गयी।

क्योंकि गरीब नोटबंदी से खुश थे।

यानी, राहुल गांधी गरीबांे की भावना को नहीं समझ सके थे।

अंदाज लगाइए, प्रतिपक्ष आम जन से कितना कटा हुआ था।

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  दृश्य-2

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जी.एस.टी.लागू होने के बाद राहुल गांधी ने अक्तूबर, 2017 में कहा कि 

‘‘यह गब्बर सिंह टैक्स है।’’

किंतु व्यापारियों से भरे प्रदेश गुजरात में जब उसके तत्काल बाद विधान सभा चुनाव हुआ तो नतीजा भाजपा के पक्ष में रहा।

जनता से कितना कट गयी है कांग्रेस ? !!

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दृश्य-3

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पुलवामा व उसके बाद के  सर्जिकल स्ट्राइक का कांग्रेस ने मोदी सरकार से सबूत मांगा।

पर पक्का सबूत तो देश की आम जनता ने दे दिया।

नरेंद्र मोदी को पिछली बार की अपेक्षा 2019 के लोक सभा चुनाव में अधिक बहुमत मिल गया।

इस देश में आजादी के बाद जिस प्रधान मंत्री ने पहली बार सिर्फ अपनी लोकप्रियता के बल पर लगातार दूसरी बार लोस चुनाव जीता,उसका नाम है नरेंद्र मोदी।

कांग्रेस को पता ही नहीं चल सका कि सर्जिकल स्ट्राइक पर आम जनता की क्या राय है।

कितना कट गई है कांग्रेस आम लोगों से ?

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  दृश्य-4

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सितंबर, 2020 में संसद से किसान बिल पास हुआ।

तत्काल बाद में बिहार विधान सभा का चुनाव हुआ।

फिर राजग सत्ता में आ गई।

क्या बिहार में किसान नहीं बसते ?

बसते हैं। 

किंतु कांग्रेस के नेता तो सरजमीन से कट चुके हंै।

वे क्या जानंे किसानों का हाल ?

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अगला दृश्य

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  अधिकाधिक उपज व भारी मुनाफे के लिए पंजाब के खेतों में जितनी मात्रा में रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाएं डाली जाती हंै उतनी किसी भी जन हितैषी नेताओं वाले देश में नहीं डाली जाती।

  बेशुमार रासायनिक खाद के कारण जो अनाज वहां पैदा हो रहा है,उससे बड़े पैमाने पर पंजाब मंे कैसर के रोगी बढ़ रहे हैं।

पंजाब का अनाज बाहर भी जाता है।

वहां के बारे में भी सर्वे होना चाहिए।

  केंद्र सरकार पर तथाकथित किसानों के जरिए दबाव डलवा

कर पराली जलाने की छूट ले ली गई है।

अब दिल्ली के पर्यावरण का भगवान ही मालिक है।

दिल्ली के लोगांे,खास कर बच्चों व गर्भवती महिलाओं  के फेफड़े भीषण वायु प्रदूषण व मोटे धुएं से भले खराब होते जाएं, पर बिचैलियों व बड़े किसानों को तो सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब है।


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पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के बाद देश में सी.ए.ए.और एन.आर.सी.लागू करने की केंद्र सरकार के समक्ष मजबूरी होगी।

अन्यथा,देर सवेर यह देश नहीं बचेगा।

तब इस देश के जेहादी तत्व फिर सड़कों पर आ जाएंगे।

उन्हें तथाकथित सेक्युलर दल व बुद्धिजीवी कवच प्रदान करेंगे।

उसका क्या नतीजा निकलेगा ?

भाजपा को उसके आगे के चुनावों में और भी अधिक बहुमत मिलेगा।

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नोट-

इस संबंध में मैंने एक राजनीतिक प्रेक्षक से पूछा,

‘‘इस देश का प्रतिपक्ष इतना गैर जिम्मेदार क्यों है ?

क्या गैर जिम्मेवार व्यवहार के जरिए वह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार रहा है ?

उसने कहा कि कल्पना कीजिए कि आपने नाजायज तरीके से 

एक हजार करोड़ रुपए कमा लिए हैं।

उसे सरकार ने जब्त कर लिया।

फिर क्या होगा ?

क्या तब भी आप अपना मानसिक संतुलन बनाए रख सकेंगे ?

मैंने कहा, ‘‘ बिलकुल नहीं।’’

उन्होंने कहा कि उसी तरह प्रतिपक्ष के अनेक नेता अपने होश ओ हवाश में नहीं है।

  एक तो भाजपा ने उनसे सत्ता छीन ली।

सत्ता से बाहर रहने पर जो पैसे काम आते हैं,उसे भी जब्त कर लिया।

फिर वही होगा, जो हो रहा है।

आगे -आगे देखिए होता है क्या !!!

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--सुरेंद्र किशोर -4 जनवरी 21

  

 


 जान हथेली पर लेकर पत्रकारिता करने 

वाले प्रकाश सिंह की एक और कामयाबी

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    --सुरेंद्र किशोर--

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रिपब्लिक टी.वी.चैनल के प्रकाश सिंह ने पटना सिविल कोर्ट में सन 2017 में घूसखोरों के खिलाफ स्टिंग आपरेशन किया था।

   नतीजतन देर से ही सही, किंतु  घूसखोरी के आरोप में पटना हाईकोर्ट ने वहां के 16 कर्मियों को बर्खास्त कर दिया।

   यह प्रकाश के स्टिंग का कमाल रहा ।

कई साल पहले कचहरियों में भ्रष्टाचार के बारे में फरजंद अहमद ने भी इंडिया टूडे के लिए संभवतः पहली बार साहस के साथ विस्तृत रपट लिखी थी।

उस पर कोई कार्रवाई हुई या नहीं, लोगों को मालूम नहीं हो सका।

अब तो हुई।

यही है इलेक्ट्रानिक मीडिया की ताकत।

पर ताकत के साथ जिम्मेदारी भी बनती है।

उम्मीद की जाती है कि यह नई मीडिया उसका भी ध्यान रखे।

    इस देश के अनेक सांसद (सब नहीं) पैसे लेकर गलत काम करते रहते हैं,यह पूरा देश जानता है।साठ के दशक में ही मैंने सुना था कि 60 सांसद एक उद्योगपति के पे-रोल पर हैं।

  पर लोकसभा के 10 और राज्य सभा के एक सदस्य की सदस्यता 2005 में तभी समाप्त की गई जब वे एक स्टिंग आपरेशन में रंगे हाथ पकड़े गए।

  यदि स्टिंग आपरेशन नहीं होता तो भाजपा के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण भी जेल नहीं जाते।

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यदि स्टिंग आपरेशन से ही भ्रष्टों के खिलाफ निर्णायक व सबक देने लायक कार्रवाई हो पा रही है तो क्यों नहीं कुछ अच्छी सरकारें व अच्छे संगठन व अन्य लोग इसी काम में लग जाते हैं ?!!

भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा तो देश नहीं बचेगा।

क्योंकि रिश्वत लेकर यहां के जयचंदी मानसिकता वाले लोग देसी-विदेशी आतंकियों की भी मदद कर रहे हैं। 

आतंकियों-जेहादियों के खिलाफ निर्णायक युद्ध की आशंका को आप अब निराधार नहीं बता सकते।युद्ध की स्थिति में  सरकार व नेता को अधिक स्वच्छ होना होगा।

1993 में मुम्बई को दहलाने के लिए जो खतरनाक विस्फोटक दाऊद ने भिजवाया था,उसको मुुम्बई समुद्र किनारे  से महानगर तक टपाने के लिए कस्टम के लोगों ने भारी रिश्वत ली थी।

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  मुख्य मंत्री बनने के तत्काल बाद नीतीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से लोगों से अपील की थी कि वे सरकारी दफ्तरों में चल रही घूसखोरी के खिलाफ स्टिंग आपरेशन करें।

पर, उसका ‘बासा’ ने प्रेस कांफं्रेस करके विरोध कर दिया।

  देश के प्रधान मंत्री और बिहार के मुख्य मंत्री की प्रवृत्ति नाजायज तरीके से  निजी संपत्ति बढ़ाने की कत्तई नहीं है।

वे चाहते भी है कि भ्रष्टाचार घटे।

फिर भी, इस देश में भ्रष्टाचार कम नहीं हो पा रहा है।

    अब तो एक ही उपाय नजर आ रहा है।

कोई मौजूदा या भावी संगठन इस बात के लिए कमर कसे कि वह खतरा उठाकर भी स्टिंग आपरेशन व्यापक रूप से चलाएगा।

अब तो तकनीकी भी बेहतर हो गई।

शायद तभी भ्रष्टाचार कम होगा।

  पटना सिविल कोर्ट के कर्मियों की बर्खास्तगी के बाद भी भ्रष्टाचार रुक जाएगा,ऐसा मान लेना नादानी होगी।

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यदि कोई राजनीतिक दल स्टिंग आपरेशन करे या करवाए तो उसे चुनाव में वोट की कमी नहीं रहेगी।

जातीय व सांप्रदायिक वोट पर उसे तब निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

यदि किसी सरकार का भ्रष्टाचार निरोधक निकाय अपना स्टिंग शाखा खोले तब तो कमाल हो सकता है।

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  खैर, अब सिनियर एडीटर प्रकाश सिंह ,रिपब्लिक टी.वी.और उसके कत्र्ताधत्र्ता अदमनीय अर्नब गोस्वामी के बारे में कुछ बातें।

पहले पटना हाईकोर्ट को बहुत -बहुत धन्यवाद।उसने सख्त कार्रवाई की। 

 प्रकाश सिंह ने इससे पहले व बाद में भी जान हथेली पर लेकर इस तरह की कई स्टोरी की है।

पहले वे टाइम्स नाऊ में थे।अब रिपब्लिक टी.वी.में हैं।

  अर्नब गोस्वामी को भी बधाई जिनके यहां प्रकाश सिंह जैसे पत्रकार के लिए पूरी गुंजाइश है।

(लगे हाथ अर्नब गोस्वामी से अनेक लोगों की ओर से एक ही गुजारिश है-

डीबेट में उन बदतमीज अतिथियों  के माइक तत्काल डाउन कर देने का बंदोबस्त करिए जो बारी से पहले चिल्लाने लगते हैं। 

खुद आपकी आवाज भी थोड़ी नीची रहे तौभी काम चल जाएगा।

वैसे आपके स्टुडियो के शोरगुल को छोड़ दें तो देशहित में आपके अच्छे कामों की अनेक लोग सराहना करते हैं। )

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आज के प्रभात खबर के अनुसार,

पटना हाईकोर्ट प्रशासन ने भ्रष्टाचार में लिप्त पटना सिविल कोर्ट के 16 कर्मियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया है।

सभी घूस लेने के आरोपित थे।

वहीं पटना पुलिस ने पीरबहोर थाने में इन सभी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है।

एसएसपी उपेंद्र शर्मा ने इसकी पुष्टि की।

15 नवंबर 2017 को टीवी चैनल ने कोर्ट में घूस के पैसे के लेनदेन को कैमरे में कैद कर प्रसारित किया था।

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बर्खास्त हुए कर्मियों के नाम हैं--

रोमेंद्र कुमार,

संतोष तिवारी,

कुमार नागेंद्र,

संजय शंकर,

आशीष दीक्षित,

 प्रदीप कुमार,

 सुनील कुमार यादव,

विश्वमोहन विजय

(सभी पेशकार)

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मुकेश कुमार

( क्लर्क)

सुबोध कुमार (टाइपिस्ट)

शहनाज रिजवी(नकलखाना क्लर्क)

सुबोध कुमार(सर्वर रूम का क्लर्क)

मनी देवी,

मधु राय,

राम एकबाल,

आलोक कुमार

(सभी आदेशपाल)

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--सुरेंद्र किशोर --6 जनवरी 20


    


बुधवार, 6 जनवरी 2021

 जय हो जग में जले जहां भी 

नमन पुनीत अनल को ......।

         --  दिनकर

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विधायक फंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ 

माले की पहल सराहनीय

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फंड के आॅडिट में कारगर होगी 

‘टिस’ के विद्यार्थियों की मदद 

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    --सुरेंद्र किशोर--

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आज के ‘प्रभात खबर’ पटना में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण समाचार का शीर्षक है-

‘‘माले विधायकों के फंड का आॅडिट करेगी पार्टी।’’

मेरी समझ से राजनीति व प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को कम करने व विकास का अधिक लाभ लोगों तक पहुंचाने के लिए इससे बेहतर पहल नहीं हो सकती है।

नब्बे के दशक में माले के ही बगोदर से विधायक महेंद्र सिंह ने विधायकों के जाली टी.ए.-डी.ए. बिल के खिलाफ अभियान चलाया था।

पर, दुर्भाग्यवश जालसाजों के समक्ष वे बिलकुल अकेला पड़ गए थे।उस समय उनकी पार्टी से भी उन्हें मदद मिली,ऐसी कोई सूचना नहीं है।

नतीजतन वे भ्रष्टाचार की उस जकड़न को तोड़ नहीं पाए ।

अब शायद इस बार माले के सभी 12 विधायक, विधायक फंड के भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी के अभियान में साथ देंगे,ऐसी उम्मीद है। 

  मेरा यह भी मानना है कि माले जैसा संगठित दल यह काम कर सकता है।वही कर सकता है।

 यदि वह मुम्बई के ‘टिस’ के विद्यार्थियों की मदद ले तो  आॅडिट ठीकठाक होगा।

मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम घोटाले की आरंम्भिक जांच

बिहार सरकार ने टाटा समाज विज्ञान संस्थान यानी टिस  के विद्यार्थियों से ही करवाई थी।

  तभी भीषण गड़बड़ियों का पता चल सका था।

 किसी और से करवाई होती तो आसानी से लीपापोती हो गई होती ।

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सांसद विधायक फंड में भारी कमीशनखोरी कायम रखने में इस देश की राजनीति के अधिकतर लोगों  का भारी निहितस्वार्थ है।

विधायकों -सांसदों में अत्यंत अपवाद स्वरूप लोग ही बचे हैं जो कमीशनखोरी के भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं और खुद उससे दूर हैं।

  इन ताकतवर कमीशनखोरों को न तो प्रधान मंत्री के रूप अटल बिहारी वाजपेयी चाहते हुए भी पराजित कर सके और न मन मोहन सिंह।

नीतीश कुमार पर तो इतना दबाव पड़ा कि विधायक फंड को खत्म करने के बाद फिर से उसे उन्हें वापस लाना पड़ा।

नरेंद्र मोदी जैसे ईमानदार प्रधान मंत्री सांसद फंड के कमीशनखोरों को पराजित करने की इन दिनों बड़ी कोशिश कर रहे हैं।

देखना है कि उनकी कोशिश में कौन जीतता है -पी.एम.

या ताकतवर कमीशनखोर !

   विधायक-सांसद फंड इस गरीब देश में सरकार व राजनीति के भ्रष्टाचार के पीछे का ‘‘रावणी अमृत कुंड’’ 

है ।यह  देश में भ्रष्टाचार को कम करने ही नहीं दे रहा है।

जब अपने सेवा काल के प्रारंभिक वर्षों में ही सांसद-विधायक फंड की कमीशखोरी में जो आई.ए.एस.अफसर लिप्त हो जाएगा,वह ऊपर के पदों पर जाने के बाद ‘राम भजन’ तो नहीं ही करेगा !!

हालांकि न तो सारे अफसर कमीशनखोर हैं और न ही  सारे जन प्रतिनिधि।

किंतु यह भी सच है कि अधिकतर लिप्त हैं।

इस सांसद-विधायक फंड ने इस देश में राजनीति व प्रशासन को जनता की नजर में जितना गिरा दिया है,उतना किसी अन्य फंड ने नहीं गिराया।

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माले के 12 विधायक अपने -अपने चुनाव क्षेत्रों में विधायक फंड के खर्चे में ईमानदारी कायम करा सकें तो उससे एक साथ कई लाभ होंगे।

  जो इस धंधे में हैं,उनका जनता के बीच भंडाफोड़ हो जाएगा।

कुछ को सजा भी हो जाएगी।

खुद माले की ताकत जनता में बढ़ेगी।

क्योंकि अच्छे कामों की सुगंध बड़ी तेजी से दूर दूर तक फैलती है।

भ्रष्ट प्रशासनिक अफसर, ईमानदार जन प्रतिनिधियों से डरने लगेंगे।

नतीजतन सरकार के अन्य निर्माण ,विकास व कल्याण के कामों में जारी भीषण भ्रष्टाचार भी कम होगा।

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यदि माले ठीक से विधायक फंड का आॅडिट करा पाए तो उसका नाम भ्रष्टाचार उन्मूलन के क्षेत्र में इतिहास में दर्ज हो जाएगा।

आज आम जन सरकारी भ्रष्टाचार से बुरी तरह पीड़ित है।

भ्रष्टों के सामने जनता असहाय है।

किसी भी दल की अपेक्षा अभी माले में अधिक ईमानदार कार्यकत्र्ता उपलब्ध हैं।

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--सुरेंद्र किशोर--27 दिसंबर 20

 


शनिवार, 2 जनवरी 2021

 अंग्रेजी साल का आज पहला दिन

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व्यक्ति हो या देश !

यदि मिलजुल कर रहना चाहे तो उसके कई उपाय हैं।

यदि लड़ते -झगड़ते रहना चाहे तो उसके अनेक बहाने हैं।

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सबसे बड़ा सवाल यह है कि आप इसी धरती को स्वर्ग बनाना चाहते हैं या किसी अज्ञात -अनजाना स्वर्ग के लिए इस धरती को नरक में तबदील कर देने पर अमादा है !

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संस्कृत के एक श्लोक का हिन्दी अर्थ यह है कि

‘‘जो धु्रव को छोड़कर अध्रुव को पाना 

चाहता है,उसका ध्रुव तो चला ही जाता है।

और अधु्रव तो अधु्रव है ही।’’  

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--सुरेंद्र किशोर-

1 जनवरी 2021


 ‘आज’ के स्थापना दिवस पर

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पत्रकारिता की मेरी पहली पाठशाला

    --सुरेंद्र किशोर--

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  बात तब की है जब सक्रिय राजनीति से मन उचट जाने के बाद मैं पेशेवर पत्रकारिता में प्रवेश करना चाहता था।

किंतु राह नहीं मिल रही थी।

याद रहे कि सन 1966 में मैं लोहियावादी राजनीति में सक्रिय हुआ था।

  पटना के एक दैनिक अखबार में बड़े पद पर कार्यरत एक व्यक्ति से मेरे छोटे भाई ने मेरी पैरवी की।

उस व्यक्ति ने कहा कि मेरी साली से शादी कर लेगा तो उसे यहां नौकरी मिल जाएगी।

पर, मैंने मना कर दिया।

उन दिनों एक कार्यकत्र्ता होने के साथ -साथ मैं बीच -बीच में समाजवादी पत्रिकाओं के लिए भी काम करता था।

कुछ पैसे भी मिल जाते थे।

  इस बीच सन 1977 के प्रांरभ में जब दैनिक ‘आज’ का पटना ब्यूरो खुला तो मैंने एक बार फिर कोशिश की।

  ब्यूरो प्रमुख पारसनाथ सिंह को मशहूर पत्रकार जितेंद्र सिंह से मैंने अपने लिए एक पत्र लिखवाया।

  जितेंद्र बाबू पटना के सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रकारों में एक थे।

बिहार में टाइम्स आॅफ इंडिया के विशेष संवाददाता थे।

वे भी समाजवादी पृष्ठभूमि के थे।

तब साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ (नई दिल्ली) और ‘जनता’( पटना) में प्रकाशित हो रहे मेरे लेखों व रपटों के वे प्रशंसक थे।

 मैंने उनसे यही कहा था कि पारस बाबू के गांव में मेरे बड़े भाई की शादी जरूर है।

  पर, वे रिश्तेदारों की पैरवी सुनने वाले व्यक्ति नहीं हैं।

  इसलिए आप उन्हें लिख दीजिए कि मुझे टेस्ट परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दें।

  दरअसल ऐसी छिटपुट बहालियों के लिए सीमित परीक्षा ली जाती थी।

क्योंकि अखबार में विज्ञापन देने पर बड़े -बड़े सत्ताधारियों से उम्मीदवार पैरवी करवा देते थे ।

वैसे में अखबार के मालिक द्विविधा में पड़ जाते थे ।

 खैर, मुझे पारस बाबू ने टेस्ट परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी।

रिजल्ट हुआ।

मैं पास कर गया।

मुझे उन्होंने डेढ़ सौ रुपए महीना का आॅफर दिया।

मैंने मना कर दिया।

 यह कह कर घर लौट आया कि ढाई सौ से कम नहीं।

   बाद में उन्होंने खबर भिजवाई कि आपको ढाई सौ मिल जाएंगे।

दरअसल टेस्ट की काॅपी में उन्होंने पाया होगा कि इसकी लगभग अंग्रेजी-हिन्दी ठाक ठाक है।

  मैंने ज्वाइन कर लिया।

1977 के चुनाव की घोषणा हो गई थी ।

पारस बाबू के साथ मैंने पटना के कदम कुआं मुहल्ले में   चरखा समिति जाकर ‘आज’ के लिए जयप्रकाश नारायण लंबा इंटरव्यू किया।

आज में वह ‘पेज हेडिंग’ के साथ छपा।

इंटरव्यू की बड़ी चर्चा रही।

बी.बी.सी.ने भी उसे उधृत किया।

क्योंकि उसमें जेपी ने पहली बार यह कहा था कि यदि हम लोक सभा चुनाव जीत गए तो विधान सभाओं के भी चुनाव करवा देंगे।

 बाद में जार्ज फर्नांडिस के चुनाव क्षेत्र मुजफ्फर पुर से मेरी रिपोर्ट भी पठनीय बन गई थी।

नई दिल्ली के एक बड़े अंग्रेजी अखबार के विशेष संवाददाता मुजफ्फरपुर जाने के रास्ते में पटना आए।

पारस बाबू से मिले।

पारसनाथ सिंह ‘आज’ के दिल्ली ब्यूरो में भी काम कर चुके थे।

उनके परिचित थे।

  पारस बाबू ने उन्हें मेरी रिपोर्ट पढ़वाई।

उन्होंने कहा कि यह तो सम्यक रिपोर्ट है।

अब मुझे मुजफ्फर पुर नहीं जाना।

इसी का अनुवाद कर देेता हूं।

उन्होंने यही किया।

उनके अखबार में वह रपट पेज वन एंकर बाइलाइन  छपी।

मैंने यह सब इसलिए लिखा क्योंकि मेरा काम देख कर मुझे आज के प्रबंधन ने कुछ ही महीने के भीतर स्टाफर बना दिया।

यानी पी.एफ.वाली नौकरी मेें मैं लग गया।

कहते हैं कि वह एक रिकाॅर्ड था।इतने कम समय में स्टाफर बनने का।

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  पटना संस्करण-1979

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आज ही के दिन सन 1979 में ‘आज’ का पटना संस्करण  शुरू हुआ।

आॅफसेट प्रिंटिंग वाला पटना का यह पहला अखबार था।

मुझे मुख्य संवाददाता की जिम्मेदारी दी गई।

वैसे तकनीकी रूप से मैं वरीय कार्यालय संवाददाता ही था।

 उन दिनों छह पेज का ही अखबार निकलता था।

हम खूब मेहनत करते थे।

कहिए कि करना पड़ता था।

 स्टाफ काफी कम थे।

विज्ञापन कम था।

पेज भरना होता था।

मैटर अधिक चाहिए।

रिपोर्टिंग भी करता था और काॅपी भी देखता था।

रात में पेज मेकअप करवा कर ही घर लौटता था।

  यानी, आज ने मेहनत करने की आदत लगा दी जो जीवन में आज भी काम आ रही है।

हालांकि सबसे बड़ी बात दूसरी हुई।

   पारस बाबू ,पड़ारकर स्कूल आॅफ जनर्लिज्म से आते थे।

नतीजतन उन्होंने हमें खूब सिखाया-लेखन कला और संस्कार भी।

वे अतिवाद के खिलाफ थे।

शालीन पत्रकारिता के पक्षधर थे।

रपट के लेखन में वे स्पष्टता व संक्षिप्तता चाहते थे।

वाक्य छोटे व उसमें कसावट।

ताकि पाठकों के दिमाग पर बोझ न पड़े।

किसी के खिलाफ नाहक निंदा या प्रशंसा अंिभयान नहीं।

और भी बहुत कुछ।

यानी मेरी खूब मंजाई हुई।

एक बार उनसे मैंने उनसे कहा कि ‘आज’ में सब जगह ब्राह्मण भरे हुए हैं।

उन्होंने कहा कि आप लोहियावादी पृष्ठभूमि से आए हैं।

इसीलिए अंटशंट बोल रहे हैं।

आप नहीं जानते ब्राह्मणों की योग्यता -क्षमता।

वे विद्याव्यसनी और विनयी होते हैं।

उनका स्वभाव इस पेशे के अनुकूल होता है।

आप भी वैसा बनिए।

आगे बढिएगा।

यहां आपका लोहियावाद नहीं चलेगा।

   मैंने उनकी इस सीख का भरसक पालन किया।

मुझे हर तरह से उसका लाभ मिला।

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1983 में जब मैंने ‘जनसत्ता’ ज्वाइन कर लिया तो आज में 

इस्तीफा देने सौम्य स्वभाव वाले प्रबंधक अमिताभ चक्रवर्ती के पास गया।

 उससे पहले पारस बाबू रिटायर कर गए थे।

  अमिताभ जी ने मुझसे कहा कि आपको जनसत्ता से अधिक पैसे दूंगा।

आप मत जाइए।

मुझे चूंकि बडे़े फलक पर काम करने की ललक थी,

इसलिए अमिताभ जी की बात नहीं मानी।

  लेकिन एक बात साफ हुई कि आज के प्रबंधन ने मान रखा था कि आज के लिए एक उपयोगी

व्यक्ति हूं। 

इससे संतोष हुआ।

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आज भी यह कह कर गर्व होता है कि ‘आज’ खासकर पारस बाबू ने मुझे जो सिखाया,वह मेरे लिए बहुमूल्य साबित हुआ।

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एक समय था जब देश में हिन्दी पत्रकारिता के दो ही स्कूल माने जाते थे--

आज स्कूल आॅफ जर्नलिज्म और नईदुनिया स्कूल आॅफ जर्नलिज्म।

  नईदुनिया से निकल कर प्रभाष जोशी ने जनसत्ता जैसे 

युगांतरकारी अखबार निकाला तो राजेंद्र माथुर ने नवभारत टाइम्स को संवार कर उसे एक गंभीर अखबार बना दिया।

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--सुरेंद्र किशोर-28 दिसंबर 20  


 


1975 के आपातकाल को असंवैधानिक घोषित करने की सुप्रीम कोर्ट से गुहार -सुरेंद्र किशोर 

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क्या सुप्रीम कोर्ट आपातकाल यानी इमरजेंसी (1975-77)की घोषणा को असंवैधानिक घोषित कर सकता है ?

  क्या ऐसा वह करेगा ?

यह तो उसके निर्णय से ही पता चलेगा।

किंतु इमरजेंसी में हुई एक अभूतपूर्व ज्यादती को लेकर सन 2011 का सुप्रीम कोर्ट का अपना ही निर्णय ताजा गठित खंडपीठ के सामने होगा।

2011 के जजमेंट की पृष्ठभूमि में 

ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि वह उसे असंवैधानिक घोषित कर दे।

  इस संबंध में 94 साल की वीरा सरीन ने हाल में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।

उन्होंने आपातकाल में बहुत अत्याचार व दुख झेले।

वह चाहती हैं कि इमर्जेंसी को असंवैधानिक घोषित किया जाए।

 उनकी याचिका पर विचार करने के लिए एस.के. कौल की अध्यक्षता में गठित बेंच राजी हो गया है।

अदालत ने इस पर केंद्र सरकार की राय मांगी है। 

  याद रहे कि आपातकाल में एटार्नी जनरल नीरेन डे ने  सुप्रीम कोर्ट में कह साफ-साफ कह दिया था कि ‘‘यदि स्टेट आज किसी की जान भी ले ले तो भी उसके खिलाफ कोई व्यक्ति कोर्ट की शरण नहीं ले सकता।क्योंकि ऐसे मामलों को सुनने के कोर्ट के अधिकार को स्थगित कर दिया गया है।’’

सुप्रीम कोर्ट ने तब नीरेन डे की बात पर अपनी मुहर लगा दी थी।

पर कई साल बाद यानी सन 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने  यह स्वीकार किया कि इस कोर्ट का तब का फैसला गलत था। 

देश में आपातकाल के दौरान इस कोर्ट से भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था।

आपातकाल के करीब 35  साल बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूत्र्ति आफताब आलम और जस्टिस अशोक कुमार गांगुली के बेंच ने उस समय की अदालती भूल को स्वीकार किया।

  अब सवाल है कि जो आपातकाल आम लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला था,उसे ही तो असंवैधानिक घोषित करने की मांग की जा रही है।

यदि असंवैधानिक घोषित हो गया तो पीड़ितों व उनके परिजन को मुआवजा मिलनी चाहिए।

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   बिहार ने सर्वाधिक झेला

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बिहार के सर्वाधिक लोगों ने आपातकाल में यातनाएं झेली थीं।

हालांकि पूरे देश को जेल में परिणत कर दिया गया था।

  जयप्रकाश नारायण के साथ अंग्रेज राज की अपेक्षा अधिक क्रूूरता के साथ व्यवहार इमरजेंसी में किया गया।

तब के छात्र नेता नीतीश कुमार को बंदूक दिखाकर गिरफ्तार किया गया था।

इन पंक्तियों के लेखक को मेघालय में जाकर भूमिगत होना पड़ा था।


 बिहार सरकार ने तो जेपी सेनानियों के लिए पेंशन का प्रावधान किया है।

  पर कुछ अन्य कांग्रेस शासित राज्य सरकारों ने पहले से जारी  ऐसी पेंशन को बंद कर दिया।यदि बिहार में इस बार गैर राजग सरकार बन जाती तो यहां भी पेंशन बंद की जा सकती थी।

क्योंकि कांग्रेस ने हाल में उद्धव ठाकरे सरकार से भी बंद करवा दी।

मध्य प्रदेश व राजस्थान में हाल में जब कांग्रेस सरकारें बनीं तो वहां भी बंद करवा दिया।पता नहीं,शिवराज सिंह सरकार ने उसे फिर से चालू करवाया या नहीं।

क्या राज्यों में जब- जब सरकारें बदलेंगी तब- तब पेंशन बंद हो जाएगी ?

इसलिए जरूरी है कि पेंशन केंद्र सरकार भी शुरू करे।

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पीठासीन पदाधिकारी सम्मेलन

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लोक सभा के स्पीकर ओम बिड़ला ने कर्नाटका विधान परिषद के उप सभापति एस.एल.धर्म गौड़ा की आत्म हत्या की घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की  है।

  याद रहे कि विधान परिषद में कुछ सदस्यों ने धर्म

गौड़ा को चलते सत्र में अभूतपूर्व ढंग से अपमानित किया था।

गत 12 दिसंबर, 2020 की उस शर्मनाक घटना से क्षुब्ध होकर उन्होंने ट्रेन से कटकर अपनी जान दे दी ।

   इस संदर्भ में माननीय ओम बिड़ला की ंिचंता वाजिब है। 

उससे पहले गत साल राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश को प्रतिपक्षी सदस्यों ने अभूतपूर्व ढंग से अपमानित किया था।

 दरअसल देश की विधायिका में बढ़ती अराजकता को देखते हुए देश के पीठासीन पदाधिकारियों का विशेष सम्मेलन बलाया जाना चाहिए।उसमें यह विचार हो कि क्या विधायिकाओं में आए दिन जो शर्मनाक दृश्य उपस्थित होते रहते हैं,उसे समाप्त करने के ठोस व कारगर उपाय नहीं हो सकते हैं ?

याद रहे कि जब टी.वी.पर किसी विधायिका में हंगामे का दृश्य जब आने लगता है तो कई लोग चैनल बदल देते हैं।

क्योंकि वह सब देख कर आमलोगों को तो शर्म आती है।क्या उन्हें आती है ? 

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और अंत में

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बिहार सरकार ने नल जल योजना के 138 ठेकेदारों और एजेंसियों को काली सूची में डालने का निर्णय किया है।

इस खबर के बाद मुझे इससे संबंधित एक बात याद आई।

मेरे एक परिचित, जो झारखंड में ठेकेदारी करते हैं,

बिहार में ठेकेदारी लेने  आए थे।

जब उन्हें पता चला कि रिश्वत की दर झारखंड की अपेक्षा बिहार में अधिक है तो वे लौट गए।

  इधर बिहार के कई स्थानों से यह खबर आती रही है कि नल जल योजना में जितना भ्रष्टाचार हुआ है, उतना शायद ही किसी अन्य निर्माण योजना में हुआ हो !

यदि इस योजना में लूट मचाने वाले सारे संबंधित लोगों को कठोर सजा देने -दिलाने का प्रबंध हो जाए तो उसका सुपरिणाम अन्य महकमों पर भी पड़ सकता है।

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1 जनवरी 21 के प्रभात खबर,पटना में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम ‘कानोंकान’ से। 


 परंपरागत विवेक कहता है कि 9 लोगों से 

दुश्मनी मत करो

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वे 9  हैं

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1.-शस्त्री-जिसके पास शस्त्र है

2.-मर्मी-जो आपका मर्म यानी भीतरी बात जानता है।

3.-प्रभु-यानी प्रभावशाली 

4.-शठ-यानी मूर्ख

5.-धनी 

6.-वैद्य

7.-चारण

8.-कवि

9.-रसोइया

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--सुरेंद्र किशोर-31 दिसंबर 20