गुरुवार, 6 मई 2021

     भ्रष्टाचार के खिलाफ महायुद्ध के बिना हमारी खैर नहीं 

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दुनिया का कोई भी देश आक्सीजन, बेड, वेंटिलेटर, आई.सी.यू. में कई गुना बढ़ोत्तरी करके भी कोरोना पर काबू नहीं कर सका।

   यह असंभव,अस्थायी और महंगा हल है।

   स्थायी हल है घर में रहना, शारीरिक दूरी का पालन और मास्क पहनना।

    याद रखिए कि सड़क दुर्घटनाएं रोकने के लिए अस्पताल नहीं बनाए जाते,बल्कि गाड़ी ढंग से चलानी पड़ती है।

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  ---डा.प्रवीण झा,

  दैनिक जागरण

   6 मई 21 

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यह बात सही है जो डा.झा ने कही।

किंतु अन्य कई देशों की तरह ही हमारे देश की सबसे गंभीर समस्या सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार है।

भीषण भ्रष्टाचार है।

भ्रष्टाचार आजादी के साथ ही गंभीर से गंभीरत्तम होता चला गया।

वोट बैंक,जातिवाद व वंशवाद की राजनीति ने इसे बढ़ाया।

अधिकतर लोग ईमानदारों की तलाश अपनी जाति में और भ्रष्टों की तलाश दूसरी जाति में करते हैं।

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इस देश के जो सार्वजनिक धन भ्रष्टाचार में चले गए,जा भी  रहे हैं, वे अन्य सुविधाओं के साथ -साथ शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्रों में भी लगे होते तो कोरोना के कारण आई महा विपत्ति से हम आज अपेक्षाकृत कम पीड़ित होते।

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पर,सवाल है कि जो लोग व संस्थान यहां तक कि अदालत तक, कोरोना को लेकर आज विभिन्न सरकारों पर आग- बबूला हो रहे हैं,वे कब यह महसूस करेंगे कि सरकारी-गैर सरकारी भीषण भ्रष्टाचार के खिलाफ महा युद्ध किए बिना हमारा असित्त्व नहीं बचेगा ?

भ्रष्टाचार से अन्य अधिकतर समस्याएं भी पैदा होती हैं और बढ़ती रहती हैं-यहां तक आतंकवाद भी।

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--सुरेंद्र किशोर

6 मई 21 

     


    पश्चिम बंगाल में आने वाले

    दिन और भी डरावने

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भाजपा ने कहा है कि हमारे कार्यकत्र्ताओं को आतंकित करने के लिए पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस शासन की मदद से अभूतपूर्व हिंसा कर रही है।

कांग्रेस और माकपा ने भाजपा के इस आरोप को सही बताया है।

साथ ही, इन दोनों दलों ने कहा है कि हमारे कार्यकत्र्ताओं को भी टी.एम.सी.द्वारा निशाना बनाया जा रहा है।

(इस बीच दिल्ली के कुछ बुद्धिजीवी यह चाहते हैं कि कांग्रेस,वाम और अन्य दल मिलकर ममता के नेतृत्व में अगली बार लोस चुनाव लड़ें और नरेंद्र मोदी को सत्ताच्युत कर दें।)

दूसरी ओर, तृणमूल नेता कह रहे हैं कि जो भी हिंसा बंगाल में हो रही है,वह भाजपा के भीेतर के आपसी झगड़े के कारण हो रही है।

अब आप ही बताइए कि कौन गलत और कौन सही है ?

  खबर है कि भाजपा के कार्यकत्र्ता पश्चिम बंगाल छोड़कर 

असम में शरण ले रहे हैं।

  भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को यह भी आशंका है कि तृणमूल कांग्रेस की इस भारी हिंसा से तंग आकर उनके कुछ कार्यकत्र्ता तृणमूल ज्वाइन कर सकते है।

  कहा जा रहा है कि मौजूदा हिंसा आजादी के समय की सांप्रदायिक हिंसा की याद दिला रही है।

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कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चैधरी ने कहा है कि ‘‘हमारे मुस्लिम वोट तृणमूल कांग्रेस में चले गए और वाम दलों ने अपने वोट तृणमूल को ट्रांसफर कर दिए।’’(दैनिक आज-5 मई 21)

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अब आप पश्चिम बंगाल की गंभीर स्थिति अनुमान लगा लीजिए।

एक समुदाय के लोग अभूतपूर्व एकजुटता आखिर क्यों दिखा रहे हैं ?जाहिर है कि उद्देश्य गैर राजनीतिक है।

दरअसल उन्हें आशंका है कि भाजपा सी.ए.ए.और एन.आर.सी.लागू कर सकती है।.

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जानकार लोग बताते हैं कि वह तो भाजपा की केंद्र सरकार को लागू करना ही पड़ेगा।

अन्यथा, देश नहीं बचेगा।

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केंद्र को कुछ और काम करने ही पड़ंेगे।

तृणमूल  के जितने नेताओं पर तरह -तरह के भ्रष्टाचार के  आरोप में मुकदमे चल रहे हैं,जांच चल रही है,उन्हें उनकी तार्किक परिणति तक पहुंचाना ही पड़ेगा।

 साथ ही,सीमा पर बाड़ लगाना ही पड़ेगा।

बाड़ लगाने के लिए ममता सरकार पहले जमीन अधिग्रहण करने में आनकानी कर रही थी।

बाद में राजी हुई थी।

पता नहीं, नई ताकत के साथ एक बार फिर सत्ता में आने के बाद अब वह क्या करंेगी ? 

 यह सब करने के सिलसिले में केंद्र सरकार को कितना विरोध झेलना पड़ेगा,उसकी झलक केंद्र को अभी से मिलनी शुरू हो गई है।

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--सुरेंद्र किशोर

5 मई 21

 


मंगलवार, 4 मई 2021

    ‘सेक्युलरिस्टों’ की फेल होती रणनीति

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 टुकड़े -टुकड़े गिरोह और जेहादी तत्व इस देश में

मजबूती से सक्रिय हैं।

बाहरी-भीतरी मदद से वे अपनी ताकत बढ़ाते जा रहे हैं।

 दूसरी ओर इस देश के अधिकतर लोग चाहते हैं कि इन तत्वों का सख्त विरोध हो।

किंतु इस देश के कितने ‘सेक्युलर’ दल,‘सेक्युलर’ 

बुद्धिजीवी तथा ‘सेक्युलर’ संगठन ऐसे तत्वों का विरोध कर रहे हैं ?

 शायद कोई नहीं।

बल्कि वे ऐसे तत्वों का प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से समर्थन ही कर रहे हैं।

नतीजतन तथाकथित सेक्युलर शक्तियां कमजोर होती जा रही हैं। 

  दूसरी ओर, जो राजनीतिक व गैर राजनीतिक शक्तियां देश तोड़कों का विरोध कर रही हैं,उनका जन समर्थन बढ़ता जा रहा है।

  पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी यही हो रहा है।

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अरे तथाकथित सेक्युलरिस्टो,अब भी तो चेत जाओ !

क्यों अपनी ही गलतियों से उन शक्तियों को मजबूत कर रहे हो जिन्हें तुम सांप्रदायिक कहते हो ?

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  अपने ही समकालीन इतिहास से सबक क्यों नहीं लेते ?

नब्बे के दशक में जब तथाकथित प्रगतिशील व सेक्युलर दल व बुद्धिजीवी देश की कुछ महा भ्रष्ट्र ,जातिवादी व अपराधी तत्वों की सरकारों का समर्थन कर रहे थे तो उस समर्थन का कारण उनसे पूछा जाता था।

वे जवाब देते थे कि ‘‘हम सांप्रदायिक ताकतों यानी भाजपा को  सत्ता में आने से रोकने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

  पर, सवाल है कि क्या आप सत्ता में आने से रोक सके जिन्हें आप सांप्रदायिक कहते हैं ?

नहीं रोक सके।

यानी, आपकी रणनीति फेल कर गई।

आप आज तक नहीं सीख सके कि उन्हें सत्ता में आने व उनके ताकतवर बनते जाने से उन्हें कैसे रोका जा सकता है। 

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आज जो रणनीति आपकी है,वह भी फेल ही होने वाली है।

फिर आप कहीं के नहीं रहेंगे।

फेल इसलिए होगी क्योंकि इस देश की अधिकतर जनता यह चाहती है कि जेहादी ताकतों का सख्त विरोध हो।

हां,सभी समुदायों के जरूरतमंद लोगों को उनकी जरूरत के अनुपात में सरकार की ओर से भरपूर मदद मिले।

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--सुरेंद्र किशोर

 12 अप्रैल 21  


    मोदी की बांग्ला देश यात्रा और चुनाव 

     --सुरेंद्र किशोर-- 

 कुछ लोग प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्ला देश यात्रा को 

पश्चिम बंगाल के चुनाव से जोड़कर आज देख रहे हैं।

  उन्हें 1972 में इस देश में हुए कुछ विधान सभाओं के चुनावों की यह कहानी पढ़ लेनी चाहिए।

   सर्जिकल स्ट्राइक के समय कांग्रेस के संचार विभाग के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि 

‘‘कांग्रेस पार्टी किसी भी स्तर पर सेना की बहादुरी का राजनीतिक लाभ लेेेने का विरोध करती है।’’

पर, सुरजेवाला की बात इतिहास की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

   सवाल है कि क्या कांग्रेस ने सन 1971 के बांग्ला देश युद्ध में विजय का चुनावी लाभ लेने का प्रयास नहीं किया था ?

वैसे कुछ साल पहले मोदी सरकार को ‘सर्जिकल स्ट्राइक डे’ मनाने की कोई जरूरत नहीं थी।

भाजपा सर्जिकल स्ट्राइक डे नहीं भी मनाती तो भी उसे उसका राजनीतिक या चुनावी लाभ मिलता।

उसी तरह कांग्रेस पार्टी बांग्ला देश युद्ध का चुनावी लाभ उठाने के लिए अतिरिक्त प्रचार नहीं भी करती तो भी उसे उसका लाभ मिल ही जाता।अतिरिक्त प्रचार कांग्रेस ने 1972 के विधान सभाओं के चुनाव के दौरान किया था।

  इंदिरा गांधी को तो आंध्र प्रदेश के एक कांग्रेसी सांसद ने ‘दुर्गा’ का दर्जा दे ही दिया था।देश के अधिकतर लोग भी इंदिरा गांधी की प्रशंसा कर रहे थे।

 पर धैर्य किसे है !उन्हें भी नहीं था।

 इस देश की राजनीति में न तो एक दूसरे पर आरोप लगाने में कोई धैर्य रहता है और न ही राजनीतिक लाभ उठाने में।

अब देखिए बांग्ला देश युद्ध के बाद तत्कालीन इंदिरा सरकार और कांग्रेस ने क्या किया था ?

उत्तर प्रदेश के प्रमुख कांग्रेसी नेताओं के विरोध के बावजूद समय से दो साल पहले यानी 1972 में विधान सभा चुनाव इंदिरा गांधी ने करवा दिया।

  प्रधान मंत्री को लग गया था कि दो साल बाद युद्ध में विजय का चुनावी लाभ उनके दल को शायद नहीं मिल सकेगा।याद रहे कि उत्तर प्रदेश विधान सभा का 1969 में चुनाव हुआ था।कांग्रेस को सदन में पूर्ण बहुमत भी हासिल था। 

  1972 के विधान सभा चुनाव के समय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने मतदाताओं के नाम जो चिट्ठी जारी की उसके अनुसार,

‘‘देशवासियों की एकता और उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठा ने हमें युद्ध में जिताया।

अब उसी लगन से हमें गरीबी हटानी है।

इसके लिए हमें विभिन्न प्रदेशों में ऐसी स्थायी सरकारों की जरूरत है जिनकी साझेदारी केंद्रीय सरकार के साथ हो सके।’’

(आज तो डबल इंजन की सरकार पश्चिम बंगाल में और भी जरूरी है।विकास-कल्याण की कीमत पर भी ममता सरकार मोदी सरकार से लगातार असहयोग कर रही है।आंतरिक-बाह्य सुरक्षा लगातार खतरे में है सो अलग !)

  मार्च, 1972 के साप्ताहिक ‘दिनमान’ के अनुसार,

‘जहां तक कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र का संबंध है,उसने यह बात छिपाने की कोशिश नहीं की है कि भारत पाक युद्ध में भारत की विजय इंदिरा गांधी के सफल नेतृत्व का प्रतीक है।  इंदिरा गांधी के हाथ मजबूत करने के लिए विभिन्न प्रदेशों में अब कांग्रेेस की ही सरकार होनी चाहिए।’ 

  कोई भी बयान देने से पहले नेताओं को यह याद कर लेना चाहिए कि उसी सवाल पर उसने पहले खुद क्या रुख अपनाया था।

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         जरा ऐसे करके देखिए !

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अहंकारी, अशिष्ट और बदजुबान लोगों को बुढ़ापे में

उन्हें काफी अकेलापन झेलना पड़ता है।

  तब अत्यंत थोड़े लोग ही उनका हालचाल पूछते हंै ।

या, फिर मदद को आगे आते हैं।

 गांवों व शहरों में मैंने दशकों से यही अनुभव किया है।

  इसलिए जब आज आप जवान हैं या फिर आपके पास धन या कोई और शक्ति है तो कुछ अधिक ही विनीत व शिष्ट बन जाइए।

 मीठी जुबान के इस्तेमाल में कुछ  खर्च तो होता नहीं !

  साथ ही, किसी से मिलिए तो अपने बारे में कम बताइए,उसके बारे में अधिक पूछिए।

बल्कि अपने बारे में तभी बताइए जब वह पूछे।

ताकि, उसे यह लगे कि उसके गुण व उसकी तरक्की से कुछ लोग खुश भी होते हैं।

फिर देखिए संबंधों पर कितना व कैसा चमत्कारिक व स्थायी असर पड़ता है।

   --सुरेंद्र किशोर 


      

कई साल पहले मैं हड्डी विशेषज्ञ डा.एच.एन.दिवाकर 

से मिला था।

उन्होंने मुझे अनुलोम-विलोम भी करने की सलाह दी थी।

उन्होंने बताया था कि उससे स्वांस की नलियों को ताकत मिलेगी जो गर्दन की ह्डी को थामे रहती हंै।

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  अब कोरोना काल में डा.नरेश त्रेहन को यह कहते हुए सुना कि अनुलोम -विलोम करना चाहिए।

उनके अनुसार, उससे फेफड़ों को ताकत मिलेगी।

उससे फेफड़े कोरोना का मुकाबला कर पाएंगे।

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खुद मेरा विश्वास सर्वधारा चिकित्सा पद्धति में है जिसके लिए दिवंगत डा.श्रीनिवास जाने जाते थे।

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मेरी राय में 

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आयुर्वेद पद्धति--लोअर कोर्ट है,

होमियोपैथ--हाईकोर्ट है,

एलोपैथ--सुप्रीम कोर्ट है।

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योग व एक्युप्रेसर को भी आप लोअर कोर्ट ही मान सकते हैं।

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आजकल तो लोग कानूनी मदद के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट चले जाते हैं।

किंतु सामान्यतः इलाज के लिए पहले लोअर कोर्ट,फिर हाईकोर्ट व अंत में 

सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए।

वैसे अपवादों की बात और है।

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--सुरेंद्र किशोर

26 अप्रैल 21  


   सी.ए.ए.-एन.आर.सी. विरोधी और घुसपैठियां समर्थक अभियान-‘यज्ञ’ में दो तथाकथित ‘सेक्युलर’ दलों ने एक खास ‘सेक्युलर’ दल के पक्ष में एकजुटता के क्रम में खुद को ‘होम’ कर दिया। 

     सुरेंद्र किशोर

    3 मई 21