सोमवार, 16 अगस्त 2021

    

प्रधान मंत्री जी, कल लाल किले से घोषित कीजिए

-- ‘‘भ्रष्टों के लिए फांसी का कानून बनेगा।’’

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भ्रष्टाचारियों की ओर इंगित करते हुए 15 अगस्त 2014 को  नरेंद्र मोदी  ने कहा था,

‘‘मेरा क्या ?’’ और ‘‘मुझे क्या !’’

की प्रवृति से बाहर निकलना होगा।

पर, वे बाहर नहीं निकले।

अब उनके लिए कड़वी दवा की जरूरत है।

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--सुरेंद्र किशोर--

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 इसे कहेंगे -छोटा मुंह, बड़ी बात !!

फिर भी मेरी यह सलाह है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी कल लाल किले से एक खास घोषणा करें।

  वह भ्रष्टाचारपीड़ित देश को आश्वासन दें कि भ्रष्टाचारियों के लिए फांसी का प्रावधान करने के लिए कानून बनाया जाएगा।

  मुझे लगता है कि उसके बिना इस देश को आने वाले दिनों में भारी संकट झेलना पड़ेगा।

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15 अगस्त, 2014 को लाल किले से मोदी जी ने सरकारी दफ्तरों का हाल बताते हुए कहा था कि किसी काम के लिए किसी के यहां जाइए तो वह पूछता है कि ‘‘इसमें मेरा क्या ?’’

(यानी, मुझे कितना मिलेगा।)

जब उसे बताया जाता है कि उसे कुछ नहीं मिलेगा तो वह कहता है कि ‘‘तो फिर मुझे क्या ?’’

यानी, मैं यह काम नहीं करूंगा।’’

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 प्रधान मंत्री की जिम्मेदारी निभाते को साढ़े सात साल हो गए।

खुद उनके और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों के बारे में अब तक किसी बड़े घोटाले की खबर नहीं आई है।

खुद मोेदी जी के बारे में तो आ भी नहीं सकती।

क्योंकि वे दूसरी ही मिट्टी के बने हैं।

किंतु क्या यही बात उनकी सरकार के अन्य अंगों के बारे में कही जा सकती है ?

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मैं खुद एक भोली आशा में जी रहा था।

मुझे लगता था कि यदि कोई ऐसा प्रधान मंत्री इस देश की गद्दी पर बैठे जो न तो खुद खाए और न किसी के खाने की राह प्रशस्त करे तो देश में भारी फर्क पड़ेगा।

मोदी जी ने शुरू में ही कहा था कि ‘‘मैं न तो खाऊंगा और न खाने दूंगा।’’

खुद को लेकर उन्होंने इस वादा को पूरी तरह निभाया।

साथ ही, वैसा काम भी नहीं किया जिससे किसी कुर्सीधारी को यह प्र्रेरणा मिले कि वह खा सकता है।

  फिर भी सरकार के विभिन्न स्तरों पर खाने वाले खा ही रहे हैं।लोगाबाग पीड़ित हो रहे हैं।

  वैसे लोगों के दिल ओ दिमाग में फांसी का भय पैदा करना अब जरूरी हो गया है।

  सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च के सिनियर फेलो राजीव कुमार ने मार्च, 2014 में लिखा था कि 

‘‘देश का सबसे बड़ा दुश्मन भ्रष्टाचार है।

यह देश के लिए दीमक की तरह है।’’

ऐसी बात अन्य अनेक नामी गिरामी लोग कहते रहे हैं।

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  आने वाले दिन इस देश के लिए कठिन होने वाले हैं।

बाह्य व आंतरिक सुरक्षा पर भारी धन खर्च करना होगा।

जितना खतरा बाहरी दुश्मन देशों से है,उससे कम खतरा भीतरघातियों से नहीं है।

यदि सरकारी धन इसी तरह भ्रष्टाचार में लूटे जाते रहेंगे तो 

देश की सुरक्षा और विकास के लिए धन की कमी हो जाएगी।

हालांकि मोदी सरकार ने बड़ी मात्रा में लूट को रोका भी है।

पर वह काफी नहीं।

चीन आज दुनिया के दारोगा की भूमिका अमेरिका से छीन लेने के लिए प्रयत्नशील है ।

 उसके पीछे चीन की  आर्थिक ताकत है।

आर्थिक ताकत से सामरिक ताकत बढ़ती है।

 ऐसा इसलिए भी संभव हुआ क्योंकि चीन में ए ग्रेड के भ्रष्टों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है।

2013 में चीन के  पूर्व रेल मंत्री को फांसी की सजा दी गई थी।

बाद में उसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया। 

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इसलिए इस देश में भी ऐसी व्यवस्था हो कि ए ग्रेड के भ्रष्टों यानी बड़े भ्रष्टों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान हो।

  बी-ग्रेड के भ्रष्टों के लिए आजीवन कारावास और उसकी अपेक्षा कम पैसांे का घोटाला करने वालों के लिए कम से कम 10 साल की सजा का प्रावधान हो।ऐसा होने पर जरूर फर्क पड़ेगा।

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इस देश के जो लोग भ्रष्टाचार के लाभुक नहीं हैं,वे मेरी सलाह को पसंद करेंगे।

जो लोग विभिन्न क्षेत्रों में फैले भ्रष्ट तत्वों से पीड़ित हुए हैं या हो रहे हैं,वे तो कुछ ज्यादा ही पसंद करेंगे।

करेंगे तो नहीं किंतु यदि मोदी जी इस दिशा मंे कदम उठा लें तो उनका जन समर्थन भी काफी बढ़ जाएगा।

वैसे भी नो रिस्क, नो गेन !!

हालांकि इस कदम में कोई रिस्क नहीं है, गेन ही गेन है।

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--14 अगस्त 21


   


सोमवार, 9 अगस्त 2021

 विपक्षी दलों की बेचैनी के निहितार्थ 

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   --सुरेंद्र किशोर--

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   अपनी गोलबंदी के जरिए विपक्ष सत्ता में बदलाव का डर दिखाकर जांच एजेंसियों पर दबाव डालने में लगा है कि उसके नेताओं के खिलाफ मामलों में तेजी न दिखाई जाए

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  लोक सभा के अगले चुनाव में अभी ढाई साल से अधिक का समय है।

 फिर भी विपक्षी दल अभी से ही नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ गोलबंद होने की कोशिश करने लगे हैं।

  वे आखिर इतनी जल्दीबाजी में क्यों हैं ?

सत्ता के प्रति उनमें कटुता की इतनी अधिक भावना क्यों है ?

      इसके दो कारण नजर आ रहे हैं।

 एक तो अगले साल उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। 

  उसके लिए प्रतिपक्ष को अपने पक्ष में माहौल बनाना है।

 प्रतिपक्ष के कई दलों के सामने एक और बड़ी समस्या है।

 वह यह कि उनके कई नेताओं और रिश्तेदारों के खिलाफ जारी भ्रष्टाचार के मुकदमों में उन्हें कोई राहत मिलती नजर नहीं आ रही है।

  दरअसल भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी सरकार की शून्य सहनशीलता नीति ने यह स्थिति पैदा कर दी है।

  हालांकि अतीत में भी भ्रष्टाचार के मुकदमे देश में दर्ज होते थे।

  किंतु तब जल्दी -जल्दी सरकारें बदल जाने के कारण मुकदमों को आम तौर पर दबा या दबवा दिया जाता था।

 एक गैर कांग्रेसी सरकार के प्रधान मंत्री कहा करते थे कि एक खास राजनीतिक परिवार को नहीं ‘छूना’ है।

  मोदी सरकार में उस परिवार के साथ -साथ देश के अनेक नेताओं और घरानों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमे चल रहे हैं।

वे सुनवाई के विभिन्न स्तरों पर हैं।

अगले 34 महीनों में पता नहीं, कितने मुकदमों में क्या-क्या निर्णय हो जाए !

इनके आरोपितों को लगता है कि यदि वे भाजपा विरोधी प्रतिपक्ष को जल्द से जल्द एक करने में सफल हो गए तो 

अभी से केंद्रीय जांच एजेंसियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाल सकेंगे कि हम सत्ता में आने ही वाले हैं।

  इसलिए मामले में आप ज्यादा तेजी मत दिखाइए।

लेकिन लोक सभा से पहले उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव होंगे।

  प्रतिपक्ष की कोशिश है कि उसके लिए भी मोदी विरोधी माहौल बनाना जरूरी है।

  उनके अनुसार लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि मोदी सरकार संसद चलाने में भी विफल है।

 हालांकि लोग देख रहे हैं कि संसद में व्यवधान कौन पैदा कर रहा है।

वैसे तो अगले ढाई साल में कौन सी राजनीतिक,गैर राजनीतिक घटना होगी,उसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

  यह भी नहीं कहा जा सकता कि उसका राजनीति व चुनाव पर कैसा असर पड़ेगा।

किंतु आज की राजनीतिक स्थिति यह है कि नरेंद्र मोदी का पलड़ा भारी लगता है।

 मोदी के 40 प्रतिशत वोटों के खिलाफ प्रतिपक्ष के 60 प्रतिशत 

मतों की गोलबंदी विपक्षी कोशिशों के केंद्र में है।

 हालांकि यह दिवास्वप्न की तरह ही लगता है।

पिछले चुनावों में कई राज्यों में राजग को 50 प्रतिशत वोट मिल चुके हैं।

  कुछ अन्य राज्यों में राजग के खिलाफ प्रतिपक्ष की पूर्ण एकता असंभव जैसा लक्ष्य है।

  उत्तर प्रदेश इसका एक उदाहण है।

बंगाल के हालिया विधान सभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 47 दशमलव 97 प्रतिशत और भाजपा को 38 दशमलव 09 प्रतिशत वोट मिले।

 2019 के लोक सभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 43 प्रतिशत और भाजपा को 40 प्रतिशत वोट मिले थे।

बंगाल के गत विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को 2 दशमलव 94 प्रतिशत और माकपा को 4 दशमलव 72 प्रतिशत मत मिले।

एक कांग्रेसी नेता के अनुसार कांग्रेस समर्थक मुसलमानों ने 

आखिरी वक्त में तृणमूल के उम्मीदवारों को वोट दे दिए।

 माकपा के अधिकतर समर्थकों ने भी यही काम किया।

 अब सवाल है कि जितने मत माकपा और कांग्रेस को मिले,उनमें से कितने वोट अगले चुनाव में भी इन विलुप्त होते दलों को मिल पाएंगे ?

  हारते हुए उम्मीदवारों को कितने लोग वोट देते हैं ?

यानी कांग्रेस और माकपा के बचे- खुचे वोट दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच बंट सकते हैं।

कुछ अन्य राज्यों में भी यही हाल रहने वाला हैं

 हालांकि 2024 के लोक सभा चुनाव परिणाम के बारे में अभी कुछ कहना जल्दीबाजी होगी, किंतु इतना कहा जा सकता है कि राजग विरोधी दलों की आशावादिता का अभी ठोस आधार नजर नहीं आ रहा है।

   अब जरा दो विपरीत स्थितियों की कल्पना कीजिए।

राजग यदि तीसरी बार जीत गया तो क्या होगा ?

 दूसरी ओर, राजग विरोधी गठबंधन जीत गया तो क्या-क्या होगा ?

  राजग की जीत के बाद बड़े -बड़े नेताओं,उनके परिजनों   और व्यापारियों के खिलाफ जारी अधिकतर मुकदमों के फैसले नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में संभवतः आ जाएंगे।

 उनसे कई -बड़े नेताओं और घरानों की राजनीति का अवसान संभव है।

   जाहिर है कि आरोपित नेता और व्यापारी गण आज अपने होशोहवास में नहीं होंगे।

  अब आप इसके विपरीत स्थिति की कल्पना कीजिए।

 यदि 2024 में मिलीजुली सरकार बन जाएगी तो क्या होगा ?

उस सरकार का पहला काम तो यही होगा कि नेताओं,उनके परिजनों और समर्थक व्यापारियों के खिलाफ जारी मुकदमों को या तो बंद किया जाए या फिर उन्हें कमजोर किया जाए।

जिनके खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं ,उनमें कश्मीर से कन्याकुमारी तक और हरियाणा से बंगाल तक के नेतागण शामिल हैं।

 आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि उनके खिलाफ जारी मुकदमे जब कमजोर हो जाएंगे तो देश के शासन और राजनीति पर उसका कैसा असर पड़ेगा ?

भ्रष्टाचार, अपराध और आतंकवाद में तेजी आएगी या कमी ?

  सरकार बदलने पर मुकदमे कैसे कमजोर किए जाते हैं,

इसके कुछ उदाहरण यहां पेश हैं।

  कांग्रेस की मदद से केंद्र में सन 1979 में चैधरी चरण सिंह की सरकार बनी थी।

  जब उन्होंने संजय गांधी पर जारी मुकदमों पर पर्दा डालने से मना कर दिया तो कांग्रेस ने उनकी सरकार गिरा दी।

 सन 1080 में लोक सभा के चुनाव हुए।

 कांग्रेस सत्ता में आई।

फिर सारे मुकदमे रफा -दफा कर दिए गए।

  नवंबर, 1990 में केंद्र में कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर

की सरकार बनी थी।

 जब प्रधान मंत्री चंद्रशेखर ने बोफोर्स केस को बंद करने से मना कर दिया तो उनकी भी सरकार गिरा दी गई।

 फिर 1991 में कांग्रेस की सरकार बनी।

किंतु कांग्रेस के पास खुद का बहुमत नहीं था।

 इसलिए तत्कालीन प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव पर आरोप लगा कि उन्होंने अपनी सरकार बचाने के लिए कुछ सांसदों से सौदा किया।

  यानी, इस देश की राजनीति का कुछ और पतन हुआ।

 साफ है कि यदि मोदी सरकार भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहनशीलता की नीति पर लगातार चल पा रही है तो इसका सबसे बड़ा कारण सन 2014 और सन 2019 के लोक सभा चुनावों में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलना था।

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8 अगस्त, 2021 के दैनिक जागरण और 

नईदुनिया(मध्य प्रदेश) में एक साथ प्रकाशित


  

   

 

 


 

शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

 


रिश्वतखोरों के खिलाफ मुकदमों की 

राज्य स्तरीय निगरानी जरूरी

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-- सुरेंद्र किशोर --

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आए दिन रिश्वत लेते सरकारी कर्मी गिरफ्तार होते रहते हैं।

उनके खिलाफ केस भी चलते हैं।

पर, अंततः क्या होता है ?

 इस बात का पता कम ही चल पाता है कि उनमें से कितनों को अदालती सजा हो पाती है।

 जहां तक मेरी जानकारी है, ऐसे मामलों की अलग से राज्यस्तरीय और कड़ी मोनीटरिंग नहीं होती।

सजा होते तो कम ही देखा-सुना जाता है।

 नतीजतन भ्रष्ट सरकारी कर्मी जेल से छूटते ही एक बार फिर अपने पुराने धंधे में लग जाते हैं।

   ऐसे में यदि कोई फरियादी कहता है कि उसे सरकारी आॅफिस में कहा जाता है कि सी.एम.क्या पी.एम.के यहां जाओ,पैसे के बिना यहां कोई काम नहीं होगा,तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होता।

क्या राज्य सरकार भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता वाले किसी सेवारत या रिटायर अफसर के नेतृत्व में एक कोषांग गठित कर ऐेसे मुकदमों की निरंतर निगरानी करवाएगी ?

शायद उसके जरिए सबक सिखाने लायक अदालती सजा दिलवा जा सके !  

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   कब बंद होगा सदनों में हंगामा 

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देश भर के पीठासीन पदाधिकारी जब कभी इकट्ठा होते हैं तो वे इस बात की चर्चा करते हैं कि ‘‘विधायिका में बढ़ते शोर -शराबा,हिंसा व उदंडता को देखते हुए बैठक को सुचारू रूप से चलाना दिन प्रति दिन कठिन होता जा रहा है।’’

यानी,इस देश में अयोध्या विवाद खत्म हो सकता है।

तीन तलाक के खिलाफ कानून बन सकता है।

योगी आदित्यनाथ तो उत्तर प्रदेश में कई असंभव सा दिखने वाले काम कर सकते हैं ।

किंतु हमारे हुक्मरान लोकतंत्र के मंदिर में शालीनता और गरिमा कायम नहीं कर सकते हैं !!

  यह सब जान-सुनकर अनेक लोगों को दुख होता है। 

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 मंडल दिवस पर आत्म निरीक्षण

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मंडल आरक्षण का श्रेय लेने वाले आज के नेताओं को ‘मंडल दिवस’ (7 अगस्त ) पर जरा आत्म निरीक्षण भी कर लेना चाहिए।

केंद्रीय सेवाओं में पिछड़ों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान वी.पी.सिंह सरकार ने सन 1990 में किया था।

1993 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस आरक्षण पर अपनी मुहर लगा दी।

यानी, तब से यह लागू भी हो गया।

किंतु इतने साल बीत जाने  पर भी औसतन 15 प्रतिशत सीटें ही भर पाती हंै।

  अनेक मंडलवादी नेता इस बीच केंद्र सरकार के बड़े -बड़े पदों पर रहे।

  उन्होंने 15 प्रतिशत को बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की दिशा में कौन का कदम उठाया ?

हां, इस बीच उनमें से कुछ नेताओं ने  27 प्रतिशत को बढ़ा देने की मांग जरूर की ।

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भूली बिसरी याद

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26 मई, 1950 को बिहार विधान सभा में कांग्रेस के एक प्रमुख सदस्य ने याद रखने वाला भाषण दिया था।

वे साठी लैंड रेस्टोरेशन विधेयक पर वे बोल रहे थे।

 उस विधेयक के जरिए भूमि के गलत आवंटन को रद करना था।

चम्पारण जिले के साठी की भूमि का आबंटन कांग्रेस के तब के बड़े -बड़े नेताओं व उनके करीबियों के नाम कर दिए गए थे।

वह विधेयक उप प्रधान मंत्री व गृह मंत्री सरदार पटेल के दबाव से लाया गया था। 

 नेता जी के भाषण से तब ही यह लग गया था कि आजादी के बाद के हमारे नये हुक्मरान इस प्रदेश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।

  उनके भाषण के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हंै।

‘‘.......मैं कहता हूं कि इस जमीन को बंदोबस्त करने में कोई गुनाह नहीं हुआ है।

क्या हमें भी यह अधिकार नहीं है कि देश की सेवा करते हुए

अपने बाल -बच्चों की परवरिश के लिए चंद तरह के व्यवसाय की व्यवस्था करें ?

या किसी राज या जमींदार से जमीन लेकर जोतें ?

मैं इतना तक कहूंगा कि कांग्रेस ने गलती की कि कांग्रेस वालों को ज्यादा जमीन नहीं दी।

 आज ही नहीं, दो -तीन वर्ष पहले बेतिया राज में विदेशी सरकार ने विदेशियों के साथ बहुत सी जमीन बंदोबस्त की थी।

क्या उस समय आपको (यानी प्रतिपक्षी दलों को ) इसका विरोध करने की जुबान नहीं थी ?

हरवंश सहाय की सैकड़ों एकड़ जमीन अंग्रेजों ने इसलिए जब्त कर ली थी क्योंकि उन्होंने महात्मा गांधी का साथ दिया था।

बड़े अफसोस की बात है कि उन पर भी इस हाउस में आक्षेप किया जाता है।

  हमलोगों में से अधिकतर लोगों का खयाल है कि शाही बंधुओं के साथ जो बंदोबस्ती हुई है, वह सही है।’’

  यानी, उन दिनों के अनेक सत्ताधारी नेताओं का यह मानना था कि आजादी की लड़ाई के दौरान हमें जो नुकसान हुआ,उसकी अब भरपाई होनी ही चाहिए।

  सत्ताधारी दल के अनेक नेताओं की उसी प्रवृति के कारण सन 1985 आते -आते सौ सरकारी पैसे घिसकर 15 पैसे हो गए।

 बाद के वर्षों में क्या -क्या होने लगा है,वह सब आज की पीढ़ी के सामने है।

याद दिला दूं कि तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि 

दिल्ली से तो हम एक रुपया भेजते हैं किंतु उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही गांवों तक पहुंच पाते हैं।

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और अंत में

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हर साल ब्रिटिश संसद के 20 कार्य दिवसों के एजेंडा  का निर्धारण प्रतिपक्ष करता है।

क्या भारत में ऐसी व्यवस्था लागू हो जाएगी तो प्रतिपक्ष संसद में हंगामा करना बंद कर देगा ? 

इस सवाल का जवाब पाने से पहले यह जानना जरूरी है कि हंगामे का मकसद क्या है ?

मूल समस्या क्या है ?

समस्या यह नहीं है कि प्रतिपक्ष को समय नहीं मिलता।

दरअसल समस्या कुछ और ही है जिसका हल केंद्र सरकार के पास नहीं है।

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कानोंकान

साप्ताहिक काॅलम

6 अगस्त, 2021 के प्रभात खबर,

बिहार संस्करण 

में प्रकाशित




मंगलवार, 3 अगस्त 2021

 हिन्दी अखबार में अंग्रेजी और 

अंग्रेजी अखबार में हिन्दी !!

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सुरेंद्र किशोर

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28 जुलाई, 21 के एक हिन्दी अखबार की खबर का शीर्षक था,

‘‘विलफुल डिफाल्टर की संख्या बढ़कर 2494 हुई’’

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आज के एक अंग्रेजी अखबार ने दो-दो  खबरों के शीर्षकों में मिनिस्टर की जगह ‘मंत्री’ यानी ड।छज्त्प् शब्द का इस्तेमाल किया है।

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यह अच्छी बात है कि हिन्दी अखबार अंग्रेजी शब्द लिखें और

अंग्रेजी अखबार हिन्दी शब्द।

  किंतु इस मामले में हिन्दी अखबार जरा सावधानी बरतें।

यानी वे अंग्रेजी के आसान शब्दों का ही इस्तेमाल करें।

हिन्दी अखबारों के पाठकों में साक्षर से लेकर पीएच.डी.तक होते हैं।

कितने साक्षर यानी मिडिल पास व्यक्ति विलफुल डिफाॅल्टर का अर्थ समझेंगे ?

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अंग्रेजी अखबारों के सामने तो मजबूरी भी है।

उसको तो सिस्टर इन लाॅ और ब्रदर इन लाॅ जैसे शब्दों का इस्तेमाल उनके हिन्दी अर्थों को लेकर ही करना चाहिए।

जैसे ब्रदर इन लाॅ और सिस्टर इन लाॅ के हिन्दी भाषान्तर का प्रयोग करना ही चाहिए।

ब्रदर इन लाॅ का हिन्दी तर्जुमा होगा-

बहनोई, 

साला,

देवर

या जेठ।

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सिस्टर इन लाॅ के भी हिन्दी अर्थ कई होंगे-

जैसे-साली

भाभी

जेठानी

और देवरानी।

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यदि अंग्रेजी अखबार कभी लिखता है कि फलां के ब्रदर इन लॅा की मृत्यु हो गई तो पाठक क्या समझेेंगे ?

इस तरह के अन्य उदाहरण भी दिए जा सकते हैं।

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31 जुलाई 21

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 वही नेता इस देश को संकटों से बचाकर 

आगे ले जा सकते हैं जिनमें कम से कम 

चार गुण हों।

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1.-अपने लिए अपनी जायज आय से अधिक 

  धन एकत्र करने में जिसकी कोई रूचि न हो।

2.-जो न वंशवादी हो और न परिवारवादी।

   जो सभी जातियों-धर्मों के लोगों के साथ समान व्यवहार 

   करता हो।

   जिसकी जितनी जरूरत हो, उसे उतनी सहायता 

   पहुंचाने की कोशिश करता हो।

3.- जो वोट के लिए देश की आंतरिक व बाह्य सुरक्षा

    के साथ कोई समझौता न करे। 

4.-जो भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी तंत्र को ‘‘डंडों के बल’’ पर 

   ठोक ठाक कर ठीक करने की हिम्मत रखता हो। 

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-- सुरेंद्र किशोर 

   2 अगस्त 21  


     प्रतिपक्ष द्वारा संसद को पंगु बना देने के 

  मामले मंे राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट से राय मांगें 

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पूछें कि क्या नई कानूनी व संवैधानिक व्यवस्था

ही सदनों में गरिमा बहाल कर पाएगी ?

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  --सुरेंद्र किशोर--  

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भारत के राष्ट्रपति को चाहिए कि वह इस देश की विधायिकाओं को कुछ सदस्यों द्वारा लगातार पंगु बना दिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट से राय मांगंे।

   पूछें कि क्या संविधान की मंशा के अनुसार सदन को गरिमापूर्ण ढंग से चलाने के लिए किन्हीं विशेष कानून, नियम या संवैधानिक प्रावधान की जरूरत है ?

पीठासीन पदाधिकारियों के सम्मेलनों की सिफारिशें व सदन की कार्य संचालन नियमावली आदि निरर्थक बना दिए गए है।

साफ लगता है कि मौजूदा संसद के दोनों सदनों के मौजूदा पीठासीन पदाधिकारी भी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।

 देश किंकत्र्तव्यविमूढ़ होकर रोज-रोज लोकतंत्र की धज्जियां उड़ते अपने टी.वी.सेटों पर देख रहा है।नई पीढ़ी के सामने लोकतंत्र की बहुत ही खराब छवि पेश हो रही है। 

  याद रहे कि इन दिनों प्रतिपक्षी सदस्य संसद के दोनों सदनों को लगातार नहीं चलने दे रहे हैं।

 आज का सत्ता दल जब कल प्रतिपक्ष में था तो वह भी सदन में कुछ-कुछ ऐसा ही हंगामा करता था।

उसे वह जायज भी ठहराता था।

 आए दिन देश की अनेक विधान सभाओं का भी यही हाल होता रहता है।

  वहां भी अशोभनीय दृश्य उपस्थित होते हैं।

  हिंसा,मारपीट,गाली-गलौज ,सदन स्थगन आम बात हो गई है।

पिछले दिनों कर्नाटका विधान परिषद के कुछ सदस्यों ने अपने सभापति को सदन में ही इतना अपमानित किया कि उन्होंने रेलगाड़ी से कटकर आत्महत्या कर ली।

    संविधान के अनुच्छेद-143 में राष्ट्रपति को यह अधिकार 

दिया गया है कि वे महत्वपूर्ण मामलों में सुप्रीम कोर्ट से राय मांग सकते हैं।

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3 अगस्त 2021 


सोमवार, 2 अगस्त 2021

        

    भारत से हजारों अमीरों का वहां 

    बस जाने के लिए विदेश पलायन

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 अफसरों में भ्रष्टाचार, पुलिस की अकर्मण्यता 

 और धार्मिक उन्माद मुख्य कारण

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    --सुरेंद्र किशोर-- 

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एफ्रो एशियन बैंक द्वारा सन 2018 में प्रकाशित ग्लोबल वेल्थ

माइग्रेशन रिव्यू में बताया गया कि 

उस वर्ष चीन से 15 हजार अमीरों ने पलायन किया।

  रूस से 7 हजार, तुर्की 4 हजार और भारत से 5 हजार अमीरों ने पलायन किया।

 पहले तीन देशों से पलायन का कारण वहां की तानाशाही और घुटन हो सकती है।

 लेकिन लोकतांत्रिक भारत का इस सूची में सम्मिलित होना खतरे की घंटी है।.........

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........ हेनेली एंड पार्टनर्स कम्पनी द्वारा अमीरों को एक देश से 

दूसरे देश में पलायन करने में मदद की जाती है।

उस कम्पनी के अनुसार सन 2020 में भारत से पलायन करनेवालों में 63 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ......

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..... बताया जाता है कि भारत से पलायन का पहला कारण सुरक्षा की कमी है।

देश की पुलिस अकर्मण्य और अफसर भ्रष्ट हैं।

अमीर लोग नहीं चाहते कि किसी चैराहे पर उनके परिवार को अगवा कर लिया जाए।

  दूसरा कारण धार्मिक उन्माद है।

धार्मिक उन्माद तो पहले से है,वत्र्तमान में वह बढ़ ही रहा है ...........।

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--डा.भरत झुनझुनवाला

दैनिक आज

1 अगस्त 21

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