सोमवार, 8 नवंबर 2021

       अपराधी साबित होने तक निरपराध ??

       ऐसे न्याय-शास्त्र से इस भ्रष्टाचारग्रस्त 

       देश का काम अब नहीं चलेगा।

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             --सुरेंद्र किशोर--

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‘‘अपराधी साबित होने तक किसी को निर्दोष मानने वाले कानून में परिवत्र्तन होना चाहिए।’’

    यह मशहूर कथन मेरा नहीं है।

वैसे मैं कर्नाटका के पूर्व लोकायुक्त व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगडे़ की इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं।

  यह बात हेगड़े साहब ने कही है।

  अब तक तो यही माना जाता रहा कि जब तक किसी को सुप्रीम कोर्ट से सजा न हो जाए, तब तक उसे अपराधी नहीं माना जाए। 

  हेगड़े साहब के अनुसार, इस कानूनी मान्यता ने भ्रष्टाचार को घटाने में मदद नहीं की।

  जनवरी, 2010 में ही पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगडे़ ने कहा था कि कड़े कानून होने के बावजूद देश में भ्रष्टाचार नहीं घटा।

 हेगड़े साहब ने यह भी कहा कि ‘हमें उस न्याय शास्त्र को भी भुला देना चाहिए कि जो यह कहता है कि किसी निर्दोष को पीड़ित करने की तुलना में नौ अपराधियों को बरी करना बेहतर है।

(यानी, भले नौ आरोपी छूट जाएं,किंतु किसी एक भी निरपराध को सजा नहीं होनी चाहिए।)

  अवकाशप्राप्त न्यायाधीश ने यह भी कहा कि आतंकवाद को लेकर हमने कानून बदले हैं और भ्रष्टाचार की समस्या भी ऐसी ही है।

    हेगड़े ने हाल ही मेें यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया था कि एक विधवा महिला से यौन संबंधों की मांग करने वाले आईएएस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई तो नहीं हुई लेकिन उसे प्रमोट जरूर किया गया।

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6 नवंबर 21


 

    


       ‘दमन तक्षकों का’ 

      नामक किशोर कुणाल (रिटायर 

      आई.पी.एस.) की 

      जीवनी प्रकाशित     

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       --सुरेंद्र किशोर--

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    पुस्तक में बड़े-बड़े अपराधियों और 

    भ्रष्टाचारियों पर अभूतपूर्व प्रहार

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   सनसनीखेज और चर्चित बाॅबी हत्याकांड 

   का प्रामाणिक विवरण इस पुस्तक में समाहित

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   किशोर कुणाल की चिर प्रतीक्षित जीवनी आ गई है।

यह एक निर्भीक पुलिस पदाधिकारी की संघर्ष गाथा है।

  स्वाभाविक ही है इसका नाम - ‘‘दमन तक्षकों का’’ -रखा जाए।

मैंने अभी इसे उलट-पलट कर थोड़ा ही पढ़ा  है।

    जीवनी क्या है मानो इसके पन्नों पर भ्रष्ट व्यवस्था का नंगा चेहरा उद्घाटित है।

  किस तरह सत्ता की बड़ी -बड़ी कुर्सियों पर आसीन लोग भ्रष्टों व अपराधियों को बचाने के क्रम में किसी भी सीमा तक चले जाते हैं,उसका विवरण इस पुस्तक में है। 

 पहली बार श्वेतनिशा त्रिवेदी उर्फ बाॅबी के सनसनीखेज हत्याकांड का प्रामाणिक विवरण इसमें उपलब्ध है। 

  बहुत कुछ जानते हुए भी, जैसी बातें लिखने की हिम्मत मुझमें भी नहीं है,वह सब कुछ इस किताब में आपको मिलेंगी।

   यह सच है कि किशोर कुणाल को रास्ते अनेक तक्षक मिले हैं।

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पुस्तक के प्रस्तुति कत्र्ता सायन के शब्दों में --

‘‘कुणाल गुजरात, बिहार, झारखंड और भारत सरकार में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे।

पुलिस से अचानक स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर उन्होंने सबको स्तब्ध कर दिया।

 तक्षक वह जहरीला सांप था जिसके डंसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हुई थी।

  इस पुस्तक में तक्षक अपराधियों का प्रतीक है।

(आज) तक्षक तीन तरह के होते हंै।--

खूंखार अपराधी,

घूसखोर नेता,

और बिके हुए अधिकारी।

जब तक इन तीनों प्रकार के तक्षकों एवं उनके संरक्षकों का कानून सम्मत दमन नहीं किया जाएगा,जुर्म से मही मुक्त नहीं होगी।’’

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‘‘कुणाल नाम है उस शख्स का ,जिसे कोई धनराशि लुभा नहीं पायी,

जिसे कोई पैरवी झुका नहीं पायी और 

जिसे कोई धमकी डरा नहीं पायी।

अपराधियों व भ्रष्टाचारियों पर इतना प्रबल प्रहार किसी (अन्य) पुस्तक में नहीं मिलेगा।’’

समकालीन इतिहास का साक्षी होने के नाते सायन के इस कथन से मैं सहमत हूं।

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  7 नवंबर 21


शनिवार, 6 नवंबर 2021

   राजनीतिक सामान्य ज्ञान पर 

   आधारित एक अनुमान !

         --सुरेंद्र किशोर--

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लगता है कि ममता बनर्जी काफी जल्दीबाजी में हैं।

वह चाहती हैं कि कांग्रेस उन्हें अभी से ‘पी.एम. 

कैंडीडेट’ घोषित कर दे।

   ताकि, उन्हें देशव्यापी दौरे के लिए पर्याप्त समय मिल जाए।

 वैसे मेरा यह सिर्फ अनुमान ही है और कुछ नहीं।

पर, दूसरी ओर यह भी लग रहा है कि कांग्रेस ऐसा नहीं करने जा रही है।

  कांगे्रेस के शीर्ष नेतृत्व को उनके बड़े -बुजुर्ग सिखा गए हंै कि चुनाव से पहले पी.एम.का उम्मीदवार किसी और को घोषित मत करना।

  चाहे चुनाव-बाद जो भी करना पड़े !

यह भी मेरा अनुमान ही है।

हम पत्रकारों को अनुमान के घोड़े दौड़ाने से भला कौन रोक सकता है !

अब देखना है कि आने वाले दिनों में राजनीतिक ऊंट और हाथी किस करवट बैठते हंै !

    या फिर 2024 के लोस चुनाव से ठीक पहले तक कन्फ्यूजन ही बना रहता है !! 

वैसे उससे पहले अगले साल मिनी महाभारत तो उत्तर प्रदेश में होने वाला है।

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5 नवंबर 21

 

  


 पुनरावलोकन

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  ‘‘मैं अपना कीमती वोट राममनोहर लोहिया को दूंगा’’

            ----प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू

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       -----.सुरेंद्र किशोर----.

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17 नवंबर, 2013 के दैनिक ‘प्रभात खबर’ में जवाहरलाल नेहरू और डा.राम मनोहर लोहिया की उक्तियां छपी हैं।

  नेहरू की इस उक्ति से मैं अवगत नहीं था।

हां,लोहिया की उक्ति के संदर्भ का अनुमान लगा सकता हूं।

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इन दोनों उक्तियों में दो संदेश हैं।

 आज के संदर्भ में ये संदेश और भी मौजूं हैं।

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आज के कुछ नेता,यहां तक कि कुछ बड़े नेता भी, अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कैसी -कैसी ‘‘गालियां’’निकालते रहते हैं !

राजनीति में इतनी कटुता आ गई है कि आम लोगों को शर्म आने लगी है,भले उन गाली वक्ताओं को आए या नहीं !

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कल्पना कीजिए कि किसी नेता या नेता परिवार ने सत्ता में रहते समय अपने लिए अरबों रुपए इकट्ठे किए।

दूसरी सरकार आई और उनके अरबों रुपए मुकदमे में फंस गए।

 वैसी स्थिति में उस नेता की जुबान पर शालीनता बरकरार कैसे रहेगी ?

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खैर, असली बात पर आते हैं।

जवाहरलाल नेहरू ने कभी कहा था कि 

‘‘राजनीतिक मतभेद अपनी जगह है,लेकिन अगर मुझसे कोई यह पूछे मैं अपना वोट किसे दूंगा,तो मैं निश्चित रूप से यही कहूंगा कि मैं अपना कीमती वोट राममनोहर लोहिया को दूंगा।’’

  संभवतः यह बात सन 1962 के आम चुनाव के समय की है जब नेहरू और लोहिया एक दूसरे के खिलाफ फुलपुर में लोक सभा चुनाव लड़ रहे थे।

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अब सन 1957 की राजनीतिक घटना पर

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बिहार में कांगे्रस विधायक दल के नेता पद का चुनाव हो रहा था।

डा.श्रीकृष्ण सिंह और डा.अनुग्रह नारायण सिंह एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे।

कांटे का मुकाबला था।

फिर भी श्रीबाबू ने अपना वोट नहीं दिया।

किसी ने उनसे कारण पूछा।

उन्होंने कहा कि वोट देता तो अनुग्रह बाबू को ही देता।

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डा.राममनोहर लोहिया की एक उक्ति प्रस्तुत है।

‘‘मैं वोट के लिए विचार धारा नहीं बदल सकता।

भले ही मैं हार जाऊं।

भले ही पार्टी के सभी उम्मीदवार हार जाएं।

मैं समझता हूं मेरी विचारधारा देशहित में है।

क्योंकि देश किसी दल और चुनावों से बड़ा है।’’

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संभवतः डा.लोहिया ने यह बात सन 1967 के चुनाव के समय कही थी।

तब वे लोक सभा का चुनाव लड़ रहे थे।

1967 तक विधान सभाओं के चुनाव भी साथ- साथ ही होते थे।

किसी पत्रकार ने उनसे पूछा कि सामान्य नागरिक संहिता के बारे में आपकी क्या राय है ?

डा.लोहिया ने कहा कि मैं चाहता हूं कि इस देश में काॅमन सिविल कोड लागू हो।

  इस पर डा.लोहिया के दल के कुछ नेताओं ने उनसे कहा कि अब तो आप चुनाव हार जाइएगा।

क्योंकि आपके चुनाव क्षेत्र में मुसलमान आबादी बहुत है।

उसी की प्रतिक्रिया में लोहिया ने उपर्युक्त बात कही थी।

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अब देखिए,आज क्या हो रहा है ?

शब्द-प्रहार को लेकर और देशहित की नीतियों को लेकर।

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डा.लोहिया आज जिंदा होते और सामान्य नागरिक संहिता के बारे में वही बात कहते तो सेक्युलर दलों की क्या प्रतिक्रिया होती ?

सिर्फ एक ही प्रतिक्रिया होती--

‘‘लोहिया संघी हो गया है।’’

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5 नवंबर 21

 

    


 पुनरावलोकन

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हस्तियों के आॅटोग्राफ्स

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      --सुरेंद्र किशोर-

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किसी हस्ती का आॅटोग्राफ लेने की आम तौर से 

एक उम्र होती है।

  मैं भी जब उस उम्र में था तो मैंने समाजवादी नेता राज नारायण से लेकर आचार्य रजनीश और अशोक मेहता से लेकर मणिराम बागड़ी तक के आॅटोग्राफ लिए थे।

 (अब आप पूछ सकते हैं कि आपने बागड़ी साहब से क्यों लिया।

आॅटोग्राफ लेने से पहले मैंने सम्मेलन मंच से उनका जोरदार भाषण सुना था।

मैं तब तक उन्हें जानता नहीं था।

    पंडाल में पास बैठे एक बुजुर्ग समाजवादी से मैंने पूछा,

‘‘ये कौन हैं ?’’

वे बोले --‘‘इनको नहीं जानते ?’’

मानो इनको जानना समाजवादियों के लिए जरूरी हो !

मैंने जब नहीं कहा तो उन्होंने मुस्कान के साथ बताया कि ‘‘ये वही नेता हैं जो पानी से बिजली निकालते रहते हैं।’’

 बाद में पता चला।

 बुजुर्ग की बात की पृष्ठभूमि है।

वे हरियाणा के थे।

2012 में उनका निधन हुआ।

हिसार से वे तीन बार लोक सभा के सदस्य चुने गए थे।

वहां खेतों में पानी तो पहले ही कांग्रेस सरकार पहुंचा चुकी थी।

  फिर वे उसकी आलोचना कैसे करते ?

इसलिए वे अपनी सभाओं में कहा करते थे,

‘‘ऐ किसानो, तुम्हारे खेतों में जो सरकार पानी पहुंचाती है,उसकी बिजली यानी तेज तो वह पहले ही उससे निकाल लेती है।’’)

  अब भला ऐसे नेता का ,जो जीवन भर समाजवादी व ईमानदार रहे हों, मैं कैसे आॅटोग्राफ नहीं लेता !       

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मेरे आॅटोग्राफ बुक में साठ के दशक में आचार्य रजनीश ने अपने आॅटोग्राफ से पहले लिखा था--

‘रजनीश के प्रणाम !’

  उन दिनों तक वे ओशो नहीं बने थे।

(किसी ने मुझे बताया कि चूंकि महात्मा गांधी किसी के आॅटोग्राफ बुक में ‘बापू के आशीर्वाद’ लिखते थे,

इसलिए रजनीश उनसे अलग दिखने के लिए उससे उल्टा लिख देते थे।)

सन 1967 में मैंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के गया (बिहार)में संपन्न राष्ट्रीय सम्मेलन में अनेक नेताओं के आॅटोग्राफ लिए।

उनमें ‘अदमनीय’ राज नारायण ने जो कुछ लिख दिया,उसका निहितार्थ  मैं न तो तब समझ सका था और न आज तक समझ पाया हूं।

 यदि आप समझते हों तो जरूर बताइएगा।

उन्होंने लिखा,

‘‘नारी एक पुरुष दुइ जाया,बूझें पंडित ज्ञानी।

पाहन फोर गंग एक निकली,चहुंदिशि पानी पानी।।

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6 नवंबर 21


शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

      पुनरावलोकन

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मजाक में कही गई बात सच निकली

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   --सुरेंद्र किशोर--

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   मुख्य मंत्री अब्दुल गफूर ने बिहार विधान सभा में  कहा कि सोशलिस्ट पार्टी के  एक विधायक (उनका इशारा कर्पूरी ठाकुर की ओर था)हस्त रेखा विशेषज्ञ के यहां गये थे।

   उस विश्ेाषज्ञ ने विधायक से कहा कि यदि आप निर्धारित समय से पहले विधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देंगे तो आप अगली बार मुख्य मंत्री बन जाएंगे।

   संयोग से सन 1977 में यह बात सही भी हो गई।

  कर्पूरी ठाकुर मुख्य मंत्री बन गये।

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 हालांकि गफूर ने यह बात हंसी -मजाक में कही थी।

  याद रहे कि उन दिनों बिहार में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था।

जेपी ने विधायकों से अपील की थी कि आप सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे दें।

  कर्पूरी ठाकुर सहित अनेक प्रतिपक्षी सदस्यांे ने इस्तीफा दे दिया।

कुछ प्रतिपक्षी सदस्यों ने नहीं भी दिया।

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4 नवंबर 21



बुधवार, 3 नवंबर 2021

  अजित पवार,अनिल देशमुख और आर्यन के समर्थको,   

 रोने-गाने के बदले डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी का 

   अनुसरण क्यों नहीं करते ? !!

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   --सुरेंद्र किशोर--

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महाराष्ट्र के सत्ताधारी महा विकास अघाड़ी के एक नेता ने सवाल किया है कि केंद्रीय जांच एजेंसियां भाजपा नेताओं पर कार्रवाई क्यों नहीं करतीं ?

  दूसरे अघाड़ी नेता ने कहा था कि जिसके घर शीशे के होते हैं,वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते।

  यानी,वहां के जिन नेताओं व अन्य मशहूर हस्तियों पर कार्रवाई हो रही है,उनके बचाव में उन्हें कुछ नहीं कहना।

यानी,उन पर जो आरोप हैं,उनको वे परोक्ष रूप से स्वीकार कर रहे हैं।

उनकी मांग है कि भाजपा नेताओं पर भी कार्रवाई हो।

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यदि सचमुच उन पर गंभीर आरोप हैं तो मैं उन भाजपा नेताओं के खिलाफ कार्रवाई के उपाय अघाड़ी नेताओं को बताता हूं।

कांग्रेसी शासन काल में जब कांग्रेस सरकार अपने दल व गठबंधन के भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही थी तो डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने एक रास्ता बनाया।

डा.स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट से यह आॅर्डर पारित करवाया कि कोई निजी व्यक्ति भी भ्रष्टाचार के मामले में बड़ी से बड़ी हस्ती मुकदमा दायर कर सकता है।

डा.स्वामी ने इस आदेश का लाभ उठा कर कुछ बड़ी हस्तियों को सजा दिलवाई थी।

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महाराष्ट्र के सत्ताधारी गठबंधन के

पीड़ित नेता डा.स्वामी से विचार -विमर्श करके या यूं ही भाजपा नेताओं के खिलाफ कोर्ट में  क्यों नहीं जाते ,यदि किसी भाजपा नेता ने सार्वजनिक धन की लूट की है तो ?

डा.स्वामी भी आजकल नरेंद्र मोदी सरकार पर खुश नहीं हैं।

वे अघाड़ी की मदद कर ही सकते हैं।

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पर,मैं जानता हूं कि भाजपा नेताओं के खिलाफ कोई राजग -विरोधी नेता कोर्ट नहीं जाएगा।

क्योंकि अघाड़ी नेता तो सिर्फ यही चाहते हैं कि तुम हमारे खिलाफ कार्रवाई मत करो और हम तुम्हारे खिलाफ नहीं करेंगे।

  यानी हम दोनों मिलकर देश को लूटें।

  जब देश पूरी तरह बर्बाद हो जाए तो हम विदेश भाग चलें जिस तरह परमवीर सिंह बेल्जियम भाग गया।

यहां मैं यह नहीं कह रहा हूं कि भाजपा नेताओं पर अजित पवार व अनिल देशमुख जैसे आरोप हैं या नहीं हैं।

यदि आरोप है तो उन्हें क्यों बख्श रह हो भाई ?

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3 नवंबर 21