बुधवार, 9 मार्च 2022

     लगातार गाछ बदलने वाली राजनीतिक अमरलत्तियां

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सुरेंद्र किशोर

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डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी,यशवंत सिन्हा और शरद यादव आदि अब भी  राज्य सभा की सदस्यता का मोह छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

लगातार गाछ बदलने वाली अमरलतियां कब तक अपनी खैर मनाएंगी ?!!

  इनसे अच्छे तो एल.के.आडवानी और मुरली मनोहर जोशी हैं जो सम्मान के साथ रिटायर लाइफ बिता रहे हैैं।

  एक इशारे पर मधु लिमये को मुलायम सिंह यादव और कपिलदेव ंिसंह को कर्पूरी ठाकुर या मुलायम सिंह यादव उच्च सदन में भेज सकते थे।

 पर, जहां तक मेरी जानकारी है, मधु लिमये और कपिलदेव सिंह ने उसके लिए कभी कोई रूचि नहीं दिखाई।

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9 मार्च 22 

    


शनिवार, 5 मार्च 2022

      श्रद्धांजलि

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रमेश थानवी नहीं रहे।

वे 78 साल के थे।

गत 12 फरवरी, 2022 को ही जयपुर में उनका निधन हुआ।

निधन के समय वे अपने भतीजा ओम थानवी (पूर्व संपादक और मौजूदा वी.सी.)के आवास पर थे।

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उनके निधन की सूचना मुझे उनकी पत्रिका ‘औपचारिकता’ के जरिए मिली जिसका ताजा अंक मुझे डाक से आज मिला। 

रमेश जी उस पत्रिका के संस्थापक संपादक थे।

रमेश जी शिक्षा विद्,गांधी विचार के संवाहक,प्रौढ़ शिक्षा का अलख जगाने वालों में अग्रणी और साहित्य दर्शन के अध्येता  थे।

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रमेश थानवी 2019 में मेरे पटना स्थित आवास पर आए थे।

उस समय मैंने जो पोस्ट लिखा था,उसे दुबारा यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

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4 अक्तूबर, 2019

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आज रमेश थानवी मेरे घर आए।

स्नेहिल व्यक्तित्व के धनी थानवी जी शहर से दूर गांव में होने के बावजूद मेरे यहां आए।

सड़क भी अच्छी नहीं है।

वे गांधी विचार समागम के सिलसिले में पटना आमंत्रित थे।

रमेश जी जब सत्तर के दशक में दिल्ली से प्रकाशित चर्चित साप्ताहिक पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’  के संपादकीय विभाग मंे कार्यरत थे,उन दिनों मैं उस पत्रिका का बिहार संवाददाता था।

  उन दिनों तो यदाकदा पत्रिका के काम के सिलसिले में  उनसे सिर्फ पत्र-व्यवहार होता था।

बाद के वर्षों में कई बार फोन पर बातचीत हुई।

 रमेश थानवी एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसके एक से अधिक सदस्य अपने बारे में कम ,देश व समाज के बारे में अधिक सोचते रहे हैं।

यह परिवार जोधपुर के पास के गांव का मूल निवासी है।

 खुद रमेश जी ने अनौपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया।

देश-विदेश घूमे।

ज्ञानार्जन किया।

नये काम किए।

  उनके भतीजा ओम थानवी जनसत्ता के संपादक रहे।

इन दिनों ओम जी हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जन संचार विश्व विद्यालय,जयपुर के कुलपति हैं।

  ओम थानवी के दिवंगत पिता शिवरतन थानवी शिंक्षक,शिक्षाविद् और शिक्षा से संबंधित दो सम्मानित पत्रिकाओं के संपादक रह चुके थे।

गत साल उनका निधन हो गया।

जब मैं जनसत्ता में था तो ओम थानवी जी यदाकदा कहा करते थे कि आप तो मेरे चाचा के साथ काम कर चुके हंै।

ऐसे यशस्वी परिवार के सदस्य रमेश थानवी जब आज मेरे घर आए तो उसके पीछे  सिर्फ उनका मेरे प्रति स्नेह ही था और किसी प्रयोजन का सवाल की नहीं उठता।

मैं अभिभूत हो गया।

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सुरेंद्र किशोर


बुधवार, 2 मार्च 2022

 क्या इक्के -दुक्के वैसे नेता भी सत्ता में 

न रहें जिनकी ‘‘नाक नहीं कटी’’ है ?

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सुरेंद्र किशोर

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मैं यहां नीतीश सरकार या नरेंद्र मोदी सरकार की सफलता या विफलता की चर्चा नहीं करूंगा।

उस पर अलग -अलग राय हो सकती है।

मैं नीतीश कुमार के सिर्फ दो विरल गुणों की चर्चा करूंगा।

उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी उन पर भ्रष्टाचार या वंशवाद-परिवारवाद का आरोप नहीं लगा सकते।

यही बात मैं नरेंद्र मोदी के बारे में कहूंगा।

नीतीश कुमार व नरेंद्र मोदी जैसे इस देश में अभी कितने नेता मौजूद हैं जिन्होंने लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पदों पर रहने के बावजूद इन दो गुणों को बनाए रखा ?

होंगे,पर मुझे नहीं मालूम।

  ऐसे नेताओं को किसी न किसी बहाने सत्ता से जल्द से जल्द हटाने की कोशिश निहितस्वार्थियों द्वारा होती रहती है।

कारण कई हैं।

पर, एक कारण यह भी है कि इनके हटने से देश भर में फैले वंशवादी-परिवारवादी व भ्रष्ट नेताओं को यह कहने का अवसर मिल जाएगा कि राजनीति में वंशवाद-परिवारवाद और भ्रष्टाचार जरूरी है।याद रहे कि अपवादों को छोड़कर जो वंशवादी परिवार वादी है,वह भ्रष्ट भी है। 

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दश्कों से देख रहा हूं।

बिहार के कई नेताओं ने सांसद बनने के बाद दूसरी शादी कर ली।

उनमें से एक नेता ने अपनी पहली पत्नी को यह कह कर समझाया था कि दिल्ली की राजनीति में तरक्की करने के लिए दूसरी पढ़ी लिखी पत्नी जरूरी है।

  (उस पहली पत्नी ने पत्रकार कन्हैया भेलारी को यह बात कई दशक पहले बताई थी।)

मुझे तो लगता है कि नीतीश कुमार को राष्ट्रपति पद का आॅफर देना उस उद्देश्य का हिस्सा हो सकता है ।वह यह कि एक ईमानदार मुख्य मंत्री को उसके पद से यथाशीघ्र अलग कर दिया जाए।

नरेंद्र मोदी से ‘पीड़ित’ बाहर-भीतर के भ्रष्ट तत्व भी कह रहे हैं कि 75 साल की उम्र के बाद उन्हें पद से हट जाना चाहिए।ताकि, कोई ऐसा प्रधान मंत्री बने जो भ्रष्टों का भी ध्यान रखे।

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मैं कोई दावा नहीं करता कि नीतीश कुमार की सरकार में भ्रष्टाचार मौजूद नहीं है।

किंतु इस गरीब प्रदेश के लिए यह संतोष की बात है कि जो सरकारी पैसे पहले अधिकतर मुख्य मंत्री लूटते रहे हैं,वे बच रहे हैं और  अब जनता के कल्याण के काम में लग रहे हैं।

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कुछ लोग कहते हैं कि नीतीश कुमार का पुत्र राजनीति में आने को अनिच्छुक है।

इसलिए उन पर यह आरोप नहीं है।

पर सवाल है कि भ्रष्ट तरीके से अपार धन कमाने से नीतीश को कौन रोक रहा है ?कौन प्रवृति बाधक है ?

  दरअसल ऐसा सवाल करने वाले यह स्वीकार नहीं करते कि जिस नेक व सेवा भावी प्रवृति के कारण कोई भ्रष्ट नहीं होता,उसी प्रवृति के कारण वह परिवारवादी-वंशवादी भी नहीं होता।

क्या इस देश के वंशवादी परिवारवादी नेता सिर्फ पुत्र को ही राजनीति में आगे बढ़ाते हैं ?

नेहरू और मुलायम जैसे नेताओं ने तो लगभग अपने सभी उपलब्ध परिजन को राजनीति में आगे किया।

  नीतीश कुमार व मोदी के भी भाई,भतीजा,साला, बहनोई हैं।

किसी अन्य परिवारवादी नेताओं के रिश्तेदारों से वे कम योग्य नहीं हैं।

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लगता है कि कुछ नेता चाहते हैं कि वैसे सत्ताधारी नेताओं को मुख्य धारा से हटा दिया जाए जिनकी ‘नाक अब तक नहीं कटी’ है।

हमारी नाक कटी है तो राजनीति ऐसी बने जिसमें सबकी कटी हुई दिखाई पड़नी चाहिए।

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23 फरवरी 22   


 


 चारा घोटाले के सजायाफ्ता आई.ए.एस.अफसरों 

 को मिले अपार कष्टों से भी किसी ने सबक नहीं सीखा

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     सुरेंद्र किशोर

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  बिहार के चर्चित चारा घोटाले में अन्य लोगों के अलावा आधा दर्जन आई.ए.एस.अफसर भी आरोपित किए गए थे।

सजायाफ्ता भी हुए।

उन्होंने जेल और जेल के बाहर भी अपार कष्ट झेले।

उनकी दुनिया ही बदल गई।

 इसके बावजूद प्रशासन में भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ।हां,चारा घोटाले जैसे बड़े और अनोखे घोटाले अब नहीं हो रहे हैं।

‘मेरे जीवन में अंधेरा छा गया।’यही कहा था कि आयुक्त स्तर के  आई.ए.एस.अफसर रहे के. अरुमुगम ने ।

कई साल पहले की बात है।वे चारा घोटाले से संबंधित  मुकदमे की सुनवाई के सिलसिले में अपने गृह राज्य तमिल नाडु से रांची अदालत में पहुंचे थे।

   बिहार सरकार के पशुपालन विभाग के सचिव रहे अरूमुगम को चारा घोटाले में सन 2013 में तीन साल की सजा हुई।ढाई साल तक जेल में रहे और अर्थाभाव व उपेक्षा के बीच कुछ ही साल पहले चीफ सेके्रट्री बनने का सपना लिए इस दुनिया से चले  गए।

  जो अन्य आई.एस.अफसर सजा पाए ,उनके नाम हैं फूलचंद सिंह,बेक जुलियस,महेश प्रसाद,एस.एन.दुबे और सजल चक्रवर्ती। 

अब भी इस घोटाले में जेल में बंद अनेक नेता, अफसर, आपूत्र्तिकत्र्ता खुद और उनके परिजन  कष्ट ,अर्थाभाव व उपेक्षा झेल रहे हैं।

 फिर भी आश्चर्य है कि बिहार में या यूं कहिए कि पूरे देश में भ्रष्टाचार कम ही नहीं हो रहा है।

कभी सृजन घोटाला सामने आ रहा है तो कभी मुजफ्फर पुर आसरा गृह घिनौना कांड।

 न तो नल जल योजना में भ्रष्टाचार रुक रहा है और न एमपी-विधायक फंड में कमीशनखारी बंद हो रही है।

 सवाल है कि घोटालेबाजों को अपना धंधा जारी रखने की यह ताकत कहां से मिल रही है ? 

नेताओं से,अफसरों से या फिर पूरा सिस्टम ही इसके लिए जिम्मेदार  है ?

इस पृष्ठभूमि में बिहार के चर्चित चारा घोटाले की एक बार फिर चर्चा मौजू है।क्योंकि हाल में एक अन्य केस में लालू प्रसाद तथा अन्य लोगों को सजा हुई है।

  इसके बावजूद अन्य मामलों में भी बाद के वर्षों में देश के  अन्य आई.ए.एस.अफसर भी जेल जाते रहे हैं।यानी कई लोग कोई सबक लेने को तैयार ही नहीं हंै।

भ्रष्टाचार से मिल रहे आसान पैसों का आकर्षण तो देखिए !

 चारा घोटाले के सिलसिले में जितने लोग अभी जेल में हैं,उनमें से कुछ लोग बीमार हैं।उनमें से कुछ लोग चारों तरफ से उपेक्षा के भी शिकार है।

 कुछ अन्य लोगों के परिवार बिखर गए।

कुछ आरोपी असमय गुजर गए।

कुछ ने आत्म हत्या कर ली।

 घोटाले के मुख्य अभियुक्त के पुत्र की असमय मृत्यु हो गयी क्योंकि जांच एजंेसी की पूछताछ वह बर्दाश्त नहीं कर सका।

पुत्र के शोक में  मुख्य अभियुक्त का भी असमय निधन हो गया।

 कई आरोपितों व सजायाफ्ताओं के परिवार की शादियां टूट गयीं।परिवार बिखर गए।

मित्र कन्नी काटने लगे।

नाजायज ढंग से कमाए धन अदालती चक्कर में समाप्त हो गए।

 इसमें आई..एस.अफसर अरूमुगम की कहानी दर्दनाक रही।

निधन से पहले उन्होंने कहा था कि ‘‘चारा घोटाले में नाम आते ही मेरी दुनिया बदल गयी।’’

 अरूमुगम को  तीन साल की सजा हुई थी।

बाद में जमानत पर छूटे थे।

अरूगुगम ने  बताया था कि लंबे कारावास के कारण  मोतियाबिंद का समय पर आपरेशन नहीं हो सका।नतीजतन मेंरी एक आंख जाती रही।

रख रखाव के अभाव में मेरी निजी कार रखी -रखी सड़ गयी।

मेरे पास उसे रखने की कहीं जगह नहीं थी।

कबाड़ी में बेचना पड़ा।

जेल से बाहर आने के बावजूद मेरा निलंबन नहीं उठा।

यह सब कतिपय बड़े अफसरों के द्वेषवश हुआ जो मुझे मुख्य सचिव नहीं बनने देना चाहते थे।

रिटायर होने के बाद केस की सुनवाई के लिए मुझे अक्सर तमिलनाडु से रांची आना पड़ता था।

रांची में एक छोटे से कमरे में रहता था जो मेरे एक मित्र से मिला था।ढाबे में खाना खाता था।

कभी- कभी चूड़ा दूध खाकर काम चला लेता था।मुकदमों ने धन और चैन दोनों छीन लिए।

मेरे जीवन में अंधेरा छा गया।

  याद रहे कि पूर्व मुख्य मंत्री द्वय लालू प्रसाद व डा.जगन्नाथ मिश्र सहित कुछ अन्य आइ.ए.एस.अफसरों को भी सजाएं हुई हैं।

उनकी भी दुनिया बदल चुकी है।नेता लोग तो ऐसे भी राजनीतिक आंदोलनों के सिलसिले में जेल यात्राओं  के अभ्यस्त होते हैं। 

पर किसी आई.ए.एस. के तो सपने ही कुछ और होते हैं।

उनके ईर्दगिर्द एक अजीब प्रभा मंडल रहता है।खुद अरूमुगम भी मुख्य सचिव बनने के सपना देख रहे थे।पर उनकी गलतियों ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा।

 चारा घोटालेबाजों के कष्टों को देखते हुए पहले यह माना जा रहा था कि अब गलत ढंग से सरकारी खजाने से पैसे निकालने से पहले कोई हजार बार सोचेगा।

पर नहीं।

कुछ ही साल पहले भागल पुर से यह खबर आई कि वहां के सरकारी खजाने से अरबों रुपए इधर से उधर कर दिए गए।

आरोप है कि प्रभावशाली नेताओं-अफसरों के संरक्षण में ही वह घोटाला हुआ जो सृजन घोटाले के नाम से जाना जाता है।सी.बी.आई.उसकी भी जांच कर रही है।बड़ी संख्या में लोग गिरफ्तार हुए है।अब भी हो रहे हैं।

  ऐसी घटनाओं से  एक महत्वपूर्ण सवाल  उठता है ।

    सवाल यह कि नये घोटालेबाज उन पिछली सजाओं से भी नहीं डर रहे हैं जो पिछले घोटालों के बड़े बड़े ओहदेदार आरोपितों को मिलती जा रही है ? 

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?

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 आज के टाइम्स आॅफ इंडिया 

की एक खबर

(स्कैन काॅपी साथ में) 

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भारत में उक्रेन के राजदूत ने कहा है कि

जिस तरह मध्यकाल में मुगलों ने भारत में राजपूतों का कत्लेआम किया था,उसी तरह की नृशंसता रशियन 

हमलावर सेना आज उक्रेन में कर रही है।

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शायद लगता है कि भारत के ‘अति धर्मनिरेपक्ष ’ इतिहासकारों से उक्रेनियन राजदूत की मुलाकात ही नहीं हुई है !

अन्यथा, वे उन्हें अब तक यह पाठ पढ़ा दिए होते कि मुगलकाल में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था !!

मुगल तो महान थे !!!

हमने यानी इतिहासकारों ने अधिकतर भारतीयों को यह पाठ पढ़ा भी दिया है।

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सुरेंद्र किशोर

2 मार्च 22    


 राजस्थान की परीक्षाओं में कदाचार 

की यही सजा होगी

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10 साल की कैद, 10 करोड़ रुपए तक 

का जुर्माना और आरोपित की संपत्ति जब्त

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सुरेंद्र किशोर

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परीक्षाओं में कदाचार के लिए कितनी सजा होनी चाहिए ?

उतनी ही जितनी सजा का प्रस्ताव राजस्थान सरकार ने 

एक विधेयक के जरिए किया है।

राजस्थान विधान सभा में वह विधेयक पेश हो चुका है।

पास भी हो जाएगा।

वहां सदन की बैठक जारी है।

  आशंका है कि इस कानून के लागू हो जाने के बाद गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार संभवतः सन 2023 चुनाव में अपदस्थ हो जाएगी।

जब एक घनघोर अपराधी के पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने के बाद 2018 के राजस्थान विधान सभा चुनाव में भाजपा सरकार हार गई थी तो कदाचार रोकना तो किसी अपराधी के मारे जाने की अपेक्षा अनेक लोगों की दृष्टि में अधिक बड़ा ‘‘अपराध’’ है।

  याद रहे कि उस घनघोर अपराधी की जाति के अनेक मतदाताओं ने राजस्थान की भाजपा सरकार को हराने में तब महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार ने कभी परीक्षा में कदाचार लोहे के हाथों से रोका था।

अगले ही चुनाव के ठीक पहले मुलायम सिंह की पार्टी ने कदाचारियों के पक्ष में हवा बनाई।

 विधान सभा चुनाव में सपा कल्याण सरकार को हटा कर खुद सत्ता में आ गई थी।लोग ‘‘राम लला मंदिर’’ के लिए  कल्याण सरकार के योगदान को भी भूल गए थे।

मुलायम सरकार ने नकल

विरोधी कानून को रद करा दिया।

  उसी तरह मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार पर एक घनघोर अपराधी की पुलिस मुंठभेड़ में हत्या का आरोप है।

देखना है कि उस अपराधी की जाति के कितने लोग इस चुनाव में कैसी भूमिका निभाते हैं !

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खैर जो हो,गहलोत सरकार इस विधेयक के लिए बधाई की  पात्र है।

  क्योंकि विभिन्न परीक्षाओं में भारी कदाचार इस देश के लिए भीषण अभिशाप बन चुका है।

पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं।

उसी के साथ देश भी।

विभिन्न परीक्षाओं में कदाचार इस तेजी से बढ़ता जा रहा है कि लगता है कि आगे चल कर न तो ठीकठाक प्रश्न

पत्र सेट करने लायक योग्य व्यक्ति मिलेंगे और न ही प्रश्न पत्र सही सही जांचने वाले।

  चिंता की बात यह है कि देश के अनेक मेडिकल और इंजीनिरिंग कालेजों (सभी नहीं)के भी छात्र कदाचार की अनुमति के बिना परीक्षाओं में बैठने के लिए भी तैयार नहीं होते हैं।

  अनेक मेडिकल काॅलेजों से आ रही इस तरह की सनसनीखेज जानकारियों की सत्यता की सरकारें व्यापक खुफिया जांच करवाएं।

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1 मार्च 22 


 राष्ट्र हित, धर्म हित और विचार धारा हित !

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्यतः इन्हीं तीन बातों को ध्यान में रखते हुए दुनिया का कोई भी देश अपनी विदेश नीति-रणनीति तय करता रहा है।

कोई देश इनमें से किसी एक तत्व पर जोर देता है तो कोई अन्य देश किसी अन्य तत्व पर। 

किंतु आजादी के बाद हमारे देश के कर्णधार ने विश्व नेता बनने के लिए विश्व हित का राष्ट्रहित की अपेक्षा अधिक ध्यान में रखा।

इस देश को उसके बुरे नतीजे भुगतने पडे़।

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  आज भी इस देश के कुछ अतीतजीवी लोग सवाल उठा रहे  हैं कि मोदी सरकार ने रूस-उक्रेन युद्ध में रूस का साथ क्यों नहीं दिया ?

  अब सवाल है कि क्या सन 1962 के चीनी हमले के समय सोवियत संघ ने भारत का साथ दिया था ?

 उस समय यह तर्क

दिया गया कि सोवियत संघ ने कहा कि हम भाई व मित्र के बीच हस्तेक्षप नहीं किया।

 किंतु असल कारण यह नहीं था।

असल कारण सोवियत संघ का विचारधारा हित था।

यानी, एक कम्युनिस्ट देश सोवियत संघ एक अन्य कम्युनिस्ट देश चीन के साथ था। 

 एक रिसर्च से बाद यह पता चला था कि सोवियत संघ की सहमति के बाद ही 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया था।

 रिसर्च पर आधारित वह लेख इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया में छपा भी था।

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1 मार्च 22